परिचर्चा एवं रचनापाठ गोष्ठी, 15/03/2026, संयोजक : राजवीर सिंह निम
नदलेस ने की परिचर्चा एवं रचनापाठ गोष्ठी
दलित। समाज के युग पुरुष मान्यवर कांशीराम जी की जयंती पर 15 मार्च, 2026 को नव दलित लेखक संघ (नदलेस) ने राजवीर सिंह निम के वसुंधरा स्थित निवास पर अपनी मार्च माह की मासिक गोष्ठी की । इस दौरान डॉ पूरन सिंह की नई आमद ‘वर्चस्व’ लघुकथा संग्रह का विमोचन किया गया जिस पर मुख्य वक्ताओं ने अपने-अपने सारगर्भित वक्तव्य दिए। गोष्टी को दो चरणों में विभाजित किया गया था। यह दोपहर 1 बजे से शुरू होकर शाम 6 बजे तक चली। पहले चरण में डॉ पूरन सिंह की पुस्तक ‘वर्चस्व’ पर वक्ता के रूप में क्रमश: बंशीधर नाहरवाल, मदन लाल राज, माम चंद सागर एवं राधे श्याम कंसोटिया ने अपनी-अपनी बेबाक टिप्पणियाँ कीं एवं लेखक को बधाइयाँ दीं। डॉ. पूरन सिंह ने सार्थक परिचर्चा आयोजित करने के लिए नदलेस का आभार व्यक्त करते हुए लेखकीय अभिमत के साथ- साथ वर्चस्व लघुकथा संग्रह से एक लघुकथा का पाठ भी किया। गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ अमित धर्मसिंह ने की एवं संचालन लोकेश कुमार ने किया। अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में डॉ अमित धर्मसिंह ने ‘वर्चस्व’ पर अपनी बात रखी। उन्होने कहा कि यह पुस्तक निश्चित रूप अंबेडकरी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है। लेखक ने जिस तरह दलित दर्द को अपनी रचनाओं में उतारा है उसके लिए वह प्रशंसा के पात्र हैं। ‘वर्चस्व’ की सभी लघुकथाएं सफल और सार्थक हैं। वह अपने समय का दस्तावेज़ हैं।
दूसरे चरण में उपस्थित कवियों ने अपनी-अपनी रचनाओं से समां बांधा। कविताओं का आगाज कवि जोगेन्द्र सिंह ने अपनी जिस कविता से किया उसका शीर्षक था ‘दोगले दलित’ अंबेडकरवाद और मनुवाद का जो/एक साथ आनंद उठाते हैं/ऐसे दौगले दलित संघर्ष नहीं करते/ मिशनरी लोगो के संघर्ष का मखौल उड़ाते हैं।
डॉ पूरन सिंह ने जातीय उत्पीड़न की लिखी कविता पढ़ी- मैं और रामस्नेही साथ-साथ पढ़ते थे/… काश हम बड़े न होते /क्या तुम भी यही सोचते हो रामसनेही/दिवारे कभी नहीं टूटती....। मंचीय कवि इंद्रजीत सुकुमार ने अपनी कविता को तरुन्नुम में गाकर समां बांधा। उनकी कविता के बोल थे- मूलनिवासी मूल बचा लो वरना कल रोना होगा, संविधान पर नजर किसी की जो पाया खोना होगा। राधेश्याम कंसोटिया ने छणिका सुनाई। पुष्पा विवेक की दो कविताएं इस प्रकार थीं – 1. मान्यवर कांशीराम एक सच्चा बैरागी/बहुत ताकतवर था वो इंसान/जो अंबेडकर को फिर से जिंदा कर गया/बुद्ध एवं धम्मा से पाकर शक्ति वो सच्चा बैरागी बन गया। 2. हम खुश थे अपनी झोपड़ी में भी/नहीं चाहा कभी राजसी ठाट बाट/ न ही कभी कुबेर का खजाना पाने की चाह रही।
माम चंद सागर ने छायावादी शैली की कविताएं सुनाईं जिनके बोल थे- 1 नभ प्रदूषण की चादर में लिपटा हुआ है, स्वच्छता अभियान कहाँ सिमटा हुआ है। 2 जिसने ये दिन तुम्हें समर्पित किया होगा, पुण्य रस कितना अपरिमित पिया होगा। गौतम प्रकाश ने अपनी कविता में शब्दों को यूं पिरोया- 1 ये कैसा राज तुम्हारा है जहां इंसा तिल-तिल मारता है/दावा करते सुशासन का गुंडों का राज बस चलता है। 2 शिकायत उन्हे है हम हैं रूखे सुखे/वजह इसकी क्या है वे खुद से ही पूंछे। बंशीधर ने अपनी लालसा को कुछ इस तरह व्यक्त किया- जगी लालसा एक मन में, मैं भी बाबा बन जाऊँ, ध्वलकेश राशि रूप में क्यूँ न लाभ उठाऊँ/मैं बैठा मौज मनाऊँ। बिजेन्द्र पाल सिंह मयंक ने गीतिका पेश की- तट पर डुबोने वाले दिखते हजारों लोग/भँवरों में नैया का खिबइया नहीं दिखता/ नाक के काटने वाले दिखते दुनियाँ में/दुनियाँ में नाक बचैया नहीं दिखते। मदन लाल राज ने अपने समय की ताजा कविता को बोल इस तरह दिए- हम बना दिए आलसी और लाचार/और मूलनिवासी बता दिये चोर/कल के शरणार्थी आर्यों के पास /अब हैं भारत देश की बागडोर। आरएस निम ने अपनी दो कविताएं सुनाई -1.वादा करो तो निभाओ/वादों को न तुम भुलाओ/जुमलों से तुम बहलाओ/पूरा करने में बाधा पाओ/तो प्रतीक्षारत को बतलाओ--2.बाबा जो रच गए संविधान/समाए उसमें गुरु महान/ इसीलिए भारत का संविधान/बना है सभी गुणो की खान/बुद्ध से प्रेरित होकर बना/लिख गए मैत्री संविधान/संत गाडके संत को पढ़कर/चला गए सर्व शिक्षा अभियान।
डॉ अमित धर्मसिंह ने अपनी रचना को बोल कुछ इस प्रकार दिए- 1. धुन का पक्का- विद्यादर्शन हस्तलिखित अखबार के जरिए/वह कर रहा है/देश की अस्सी फीसदी जनता का प्रतिनिधित्व/उजले कागज पर काली स्याही से /रोज लिखता है /उजले लोगों की काली करतूत। 2.वक्त है कुछ छीजे तलाशने का /मसलन लॉकर में बंद गड्डियों और आभूषणों के ढेर के नीचे में दबा/मजदूरों का चैन तलाशना होगा /न सिर्फ तलाशना होगा वरन लौटाना होगा /भारी खेद और क्षमायाचना के साथ। अंत में अध्यक्षता कर रहे डॉ अमित धर्मसिंह ने सभी कवियों की कविताओं पर टिप्पणी करके कवियों के हुनर को सराहा और उन्हे मुबारकबाद दी। गोष्ठी के संयोजक आरएस निम ने आए हुए सभी लेखकों का धन्यवाद देकर आभार जताया और कहा कि आप सुधि जन मेरे निवास पर पधारे यह मेरे परिवार का सौभाग्य है। इसी के साथ राजवीर सिंह निम की पत्नी शालिनी ने भी गोष्ठी को बहुत अच्छा बताया और सभी कवियों को सराहते हुए सबका धन्यवाद ज्ञापन किया।
रिपोर्ट- माम चंद सागर
16 मार्च,2026


















































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