राम मेश्राम के ग़ज़ल संग्रह 'शोलों के फूल' पर नदलेस ने की परिचर्चा : 28/02/2026
राम मेश्राम के ग़ज़ल संग्रह 'शोलों के फूल' पर नदलेस ने की परिचर्चा
दिल्ली। नदलेस ने अंबेडकरवादी ग़ज़लों के स्वरूप निर्धारण पर केन्द्रित अपनी साहित्यिक गतिविधियों को विस्तार देते हुए विरासत के अंतर्गत मरहूम शायर राम मेश्राम के महत्वपूर्ण ग़ज़ल संग्रह ‘शोलों के फूल’ पर ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी आयोजित की। गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ अमित धर्मसिंह ने की एवं संचालन लोकेश कुमार ने किया। मुख्य वक्ता तेजपाल सिंह 'तेज', बी आर विप्लवी और आर पी सोनकर रहे। मुख्य टिप्पणीकार शेखर पंवार और डॉ. राम गोपाल भारतीय रहे। राम मेश्राम की दो ग़ज़लों के विशेष पाठ करने के लिए इंद्रजीत सुकुमार और धन्यवाद ज्ञापन के लिए मामचंद सागर उपस्थित रहे। इनके अतिरिक्त गोष्ठी में देश भर से डॉ. पूरन सिंह, मदनलाल राज़, जगदीश कश्यप, अरुण कुमार पासवान, राजेश कुमार जैसवार, आर सी विवेक, जोगेंदर सिंह, आशु कुमार, नीरज कुमार नैचुरल, आर एस मीणा, अर्का समानता, पुष्पा विवेक, भूरी सिंह, अंगद कुमार राही, कुंवर नाज़ुक, पूजा सक्सेना, चितरंजन गोप लुकाठी, सलीमा, भीमराव, इंदु रवि, राधेश्याम कांसोटिया, भजनसिंह, अरविंद कुमार कौशल, श्रीलाल बौद्ध, तारा परमार और हरीश पांडल आदि शतकाधिक गणमान्य साहित्यकार उपस्थित रहे। आभासी पटल पर आयोजित यह गोष्ठी साँय 6:30 से शुरू हुई एवं रात्रि 9 बजे तक चली।
गोष्ठी में सर्वप्रथम लोकेश कुमार ने मरहूम गजलकार राम मेश्राम का शाब्दिक परिचय प्रस्तुत किया। बताया कि "वे 1946 में मध्य प्रदेश के वारासिवनी गांव में पैदा हुए थे। प्रशासनिक सेवा में रहते हुए, उन्होंने धारदार सृजन किया। खासकर उनकी ग़ज़लें देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित हुईं। ‘शोलों के फूल’ उन्हीं चुनिंदा ग़ज़लों का ऐतिहासिक दस्तावेज है।"
तत्पश्चात् आर पी सोनकर ने कहा कि "राम मेश्राम अपने समय के मुकम्मल शायर थे। यदि राम मेश्राम जैसे दलित साहित्यकारों को पढ़ा जाता तो कितने ही नामचीन साहित्यकार उनके आगे फीके पड़ जाते। दलित साहित्यकारों को अवसर से वंचित रखा गया है। इस नाते राम मेश्राम का भी उचित मूल्यांकन नहीं हो पाया। लेकिन नदलेस ने यह पहल करके बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है।"
बी. आर. विप्लवी ने कहा कि "नदलेस द्वारा आयोजित साहित्यिक गतिविधियां दलित संवेदनाओं का मुखर दस्तावेज़ हैं। राम मेश्राम दुष्यंत के समकक्ष शायर थे। उन्होने उस समय अपना मुकाम बनाया जब कोई दलित शायर को अपना शागिर्द तक नहीं बनाना चाहता था। यद्यपि अयाज़ कमर, रमेश यादव जैसे गजलकारों ने उन्हे आगे बढ़ाया। वह हमारी पीढ़ी के अगुआ गजलकार हैं। साहित्य की कोई आखिरी मंजिल नहीं होती, बावजूद इसके गजल में झकझोरने और जगाने की शक्ति छिपी होती है। वह केवल इश्क और मुहब्बत की बानगी भर नहीं है। राम मेश्राम की गजलों में धर्मनिरपेक्षता है। उनकी गजल साम्यवादी हैं और दलित की व्यथा कहने का हुनर रखती हैं।"
तेजपाल सिंह ‘तेज’ ने राम मेश्राम की गजलों पर विशेष रोशनी डाली। उन्होने बताया कि "राम मेश्राम हमारे समय के बहुत निर्भीक शायर थे। वे सामाजिक आलोचना के तहत सीधे-सीधे सवाल उठाते थे। उनकी ग़ज़लों में उस समय की मीडिया और सत्ता के गठजोड़ की बात सामने आती है। इस संदर्भ में शोलों के फूल एक सार्थक शीर्षक है। और, इस सार्थक ग़ज़ल संग्रह पर परिचर्चा करके नदलेस ने दूसरे गजलकारों को प्रोत्साहित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।"
इनके उपरांत डॉ राम गोपाल भारतीय ने राम मेश्राम की गजलों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि "उनकी गजलें अपने संक्रमण काल का दस्तावेज़ हैं। वे सत्ता के प्रति आक्रोश जगाती हैं। राम मेश्राम अपने भोगे हुए उस सच को लिख रहे थे जहां उनके हिस्से इश्क, मुहब्बत नहीं बल्कि दलित जन की पीड़ा आई। इसलिए वे पीड़ा जनित शायरी का निर्माण कर रहे थे। राम मेश्राम इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण शायर हैं।"
शेखर पँवार ने राम मेश्राम की अनेक ग़ज़लों से चुनिंदा शेर पढ़कर सुनाए और उनके आशय भी स्पष्ट किए। गजलों की भूरि-भूरि प्रसंशा करते हुए उन्होने कहा कि "राम मेश्राम अवाम के शायर थे। वे अपनी बात बहुत ही बेबाकी से कहने के लिए जाने जाते हैं।"
इंद्रजीत सुकुमार ने राम मेश्राम की दो ग़ज़लें- "चेहरों की भीड़भाड़ है, सूरत कहीं नहीं/ बातों के ही इंकलाब हैं राहत कहीं नहीं। और, जो दौलत के नशे में चूर होगा/ हक़ीक़त से वो कोसों दूर होगा।" तरन्नुम से सुनाकर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। सभी उपस्थित कवियों एवं शायरों ने राम मेश्राम की ग़ज़लों और इंद्रजीत सुकुमार की गायकी की मुक्तकंठ से प्रशंसा की।
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे डॉ अमित धर्मसिंह ने अध्यक्षीय वक्तव्य में सभी वक्तागणों के वक्तव्य और टिप्पणीकारों की टिप्पणियों की सारगर्भित विवेचना करते हुए कहा कि "राम मेश्राम का यह ग़ज़ल संग्रह 2006 में प्रकाशित हुआ। इसका मतलब है कि संग्रह में संग्रहीत गजलें दो हजार छह से पूर्व की रची हुई हैं। आज छपने के भी पूरे बीस बरस बाद इस पर परिचर्चा हो रहीं है। यह चर्चा दर्शाती है कि रचना में यदि दमखम होता है तो देर-सवेर उसका मूल्यांकन भी हो ही जाता है। 'शोलों के फूल' शीर्षक वास्तव में प्रतीकात्मक अर्थ लिए हुए है। इसका सीधा मतलब है कि शीर्षक में शोले दलित समाज के ज्वलंत मुद्दे हैं और ये ग़ज़लें उन्हीं शोलों से चुगे गए विविध विषयी फूल हैं। वास्तव में किसी रचना को उसकी समसामयिकता और प्रासंगिकता कालजयी बनाती हैं। इस नाते राम मेश्राम की ग़ज़लों में कालजयी होने के अधिकांश गुण विद्यमान हैं। वे अपने समय से मुठभेड़ करती हुई ग़ज़लें हैं। इन ग़ज़लों में गुजरात दंगे, भोपाल गैस त्रासदी, यहां तक कि बेगम परवीन सुलताना के शास्त्रीय गायन तक पर भी महत्वपूर्ण ग़ज़लें मौजूद हैं। ये सब ग़ज़लें ‘शोलों के फूल’ को न सिर्फ शायरी के लिहाज से बल्कि ऐतिहासिक दस्तावेज के तौर पर भी एक महत्तपूर्ण ग़ज़ल संग्रह साबित करती हैं।"
अंत में माम चंद सागर ने उपस्थित कवियों का हार्दिक धन्यवाद एवं सभी वक्ताओं के प्रति हार्दिक आभार प्रकट किया। गोष्ठी हमेशा की तरह बेहद रोचक और सफल रही।
रिपोर्ट –
माम चंद सागर
प्रचार सचिव, नदलेस
01/03/2026














































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