नदलेस की ऑनलाइन काव्य पाठ मासिक गोष्ठी हुई, 26/10/2025 को
नदलेस ने की ऑनलाइन स्वतंत्र रचनापाठ गोष्ठी
दिल्ली। दिनांक 26 अक्टूबर 2025 को नव दलित लेखक संघ द्वारा गूगल मीट के माध्यम से ऑनलाइन मासिक गोष्ठी का आयोजन सम्पन्न हुआ। गोष्ठी स्वतंत्र काव्य पाठ की थी। जिसमें रचनाकारों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. अमित धर्मसिंह ने की एवं संचालन लोकेश कुमार ने किया। रचनाएं अधिकतर आंबेडकरवाद से प्रेरित थीं। पर कई रचनाकारों ने आजकल के ज्वलित विषयों को भी अपने शब्दों में पिरोकर व्यक्त किया। गोष्ठी में तेजपाल सिंह 'तेज', पुष्पा विवेक, राधेश्याम कांसोटिया, मदनलाल राज़, डॉ. पूरन सिंह, प्रमोद कुमार मारोती (युगांधर मझल), ओमप्रकाश गौतम, अंगद कुमार, प्रो. बिपिन कुमार, सलीमा, सावन कुमार, एदल सिंह, श्याम लाल राही 'प्रियदर्शी', रामश्रेष्ठ दीवाना, मामचंद सागर, गौतम प्रकाश, प्रदीप कुमार 'सागर', जयराम कुमार पासवान, फूलसिंह कुस्तवार, चितरंजन गोप लुकाठी, सुनील कुमार कर्दम, एम एन गायकवाड़, रूप सिंह 'रूप', बंशीधर नाहरवाल, कुंवर नाज़ुक, कश्मीर सिंह और ममता अंबेडकर आदि रचनाकार कविता रचनापाठ के लिए उपस्थित रहे।
कुमार साहब ने अपनी पहचान छत्तीसगढ़ी भाषा में एक सुंदर कविता कही जिसके केंद्र में बूढ़े होते मां बाप रहे की किस प्रकार आज की पीढ़ी अपने घर के बुजुर्गों की किस प्रकार तोहीन कर रही है ,उन्हें सता रही है जिनके पैर धो धोकर पीना चाहिए। इतना ही नहीं जनाब राधे श्याम कंसोडिया ने पेशे से एक वकील होते हुए आईपीसी की धारा19 पर अपनी क्षणिका सुनाई,जो हमारे फंडामेंटल राइट , स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति पर था।फिर मामचंद जी ने सार्वजनिक स्थानों पर कूडे की समस्या पर हमारा ध्यान इंगित किया।ऐसे ही कुछ समसामयिक विषयों और आंबेडकर बाद पर कविताएं,रचनाएं और लघु कथा भी सुनी और सुनाई गई। कविता पाठ का आगाज अंगद जी द्वारा सुनाई ग़ज़ल से हुआ। इसकी सुंदर पंक्तियां हैं"दिया जो भी तूने हमको,खजाना लुट न जाए
हमारे हाथ से मौका सुनहरा छूट न जाए।"
श्याम ’राही ’ जी ने सुंदर शब्दों से सजी ग़ज़ल कही,"यहां चमचों की दुनिया में बगावत कौन करता है,
शराफत करने को यारो शराफत कौन करता है।" इसी क्रम में वो आगे कहते हैं,"बड़े हैं आदमी तो यह अमल तेरे लिए भाई,
यहां पर क़र्ज़ लेकर वापिस कौन करता है,
यहां ताकत के बल पर फैसले कौन करता है,
यहां तलवारें खींचती है, अदालत कौन करता है।"
उक्त पंक्तियां समाज में पैठ लगाती न इंसाफियों की ओर इशारा करती हैं।
विपिन कुमार साहब ने अपनी कविता "मूर्ति के आंबेडकर" को सुंदरता से पेश किया।यह कविता मुख्यत व्यंग्यात्मक कविता है जिसमें बाबा साहब द्वारा किए कुल आठ गुनाहों की चर्चा की गई है जिसमें उनका सारे विपरीत परिस्थिति में भी पढ़लिखकर आगे बढ़ना ,समाज को आगे बढ़ाना और ईश्वर को कोरी कल्पना मात्र बताना ,ऐसे ही व्यंग में उनके किए गुनाहों की बात रखी गई है। ऐदल सिंह जी ने भी अपनी बात गंभीरता से रखी और नदलेस की पूर्व अध्यक्षा पुष्प विवेक जी ने आज के ज़माने में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हुई हिंसा पर चोट की। उन्होंने बड़ा गंभीर विषय उठाया कि महिलाएं आज कहीं भी सुरक्षित नहींहैं। घर में वह कुंठाओं में जीवन गुजर रही हैं और बाहर जाकर असुरक्षित महानगरों में अपने को खतरे में डाल रही हैं। इसी क्रम में लेखक तेजपाल सिंह ने अपनी लिखी पुस्तक "दस्तक" जो १०० कविताओं का संग्रह है,उसमें से कविता " भूख का जन्मदिन" सुनाई। उपस्थित श्रोतागण सभी भावुक हो गए। कविता की चंद पंक्तियां पेशे नजर हैं" आज फिर आया है उसका जन्मदिन,चूल्हे में ठंडी रख पाक रही है,हांडी में खाली आस पक रही है।"
सिर्फ आंसू थे और एक ढकी हुई थाली थी।
पर इस बच्चे का राशन भी किसी नेता के पेट में समाया था।"
पद्य की इस श्रृंखला पर विराम पूरण सिंह जी की लघु कथा "मर्यादा" ने लगाया। जिसमें शब्द कम पर घाव गहरा ,लगा इसमें स्कूल मास्टर द्वारा दलित बच्चे पर पक्षपात और अपमान का जिक्र था। कुमारजी ने एक मार्मिक कविता मां बाप पर उन्हीं के बच्चों द्वारा जुल्म पर सुनाई। कंसोटिया जी ने स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के अधिकार की बात की। तो ओमराकश जी ने आज की राजनीतिक अराजकता पर बात करते हुए कहा," बात कब समझेंगे मेरे वतन के नौजवान,
कुर्सियों के वास्ते उन्माद फैलाया गया।"
कुंवर नाजुक जी ने भी सदियों से हो रहे ’मूलनिवासियों’ के विरुद्ध जुल्मों को बयान किया। उनके शब्द इस तरह हैं" ज्वाला बनके फटेंगे कभी,जुल्म हमपर जो ज्यादा किया जाएगा"। मामचंद जी ने अपनी दो कविताएं सुनकर सबको मुग्ध किया।इस बोझिल होते माहौल को प्रदीप सागर जी ने अपनी हास्य कविता सुनाकर हल्का किया।गौतम प्रकाश जी ने आजके आम आदमी पर रचना सुनाई" इंसा को बांट डाला है जागीर की तरह" । बर्ताव उससे करते हो बेपीर की तरह ,कमज़र्फ का तमगा दिया एक मेहरबां ने।"
फूल सिंह जी ने अपनी रचना ,"राग पुराना" सुनाई। रूप सिंह" रूप" ने भी समसामयिक रचना कही जिसकी पंक्तिया थीं"हो गए आशीष मंचों पर मुकुट सजने लगे।"इनके अलावा जनाब चितरंजन गोप लुकाठी, सुनील कुमार कर्दम, बंशीधर नाहरवाल, जयराम पासवान, रामश्रेष्ठ दीवाना, डॉ. गायकवाड़, मदनलाल राज, डॉ. अमित धर्मसिंह आदि साथियों ने स्वतंत्र रचनापाठ किया।
अंत में अध्यक्षीय उद्बोधन डॉ. अमित धर्मसिंह द्वारा किया गया और सभी उपस्थित साथियों का धन्यवाद ज्ञापन मामचंद सागर द्वारा किया गया। और नदलेस के हिस्से में एक और सार्थक और सफल गोष्ठी आ गई।
सलीमा
सह प्रचार सचिव, नदलेस
31/10/2025





















































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