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Showing posts from April, 2022

नदलेस ने किया कहानी परिचर्चा का सफल आयोजन

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नदलेस ने किया कहानी परिचर्चा का सफल आयोजन आंबेडकर जयंती की पूर्व संध्या पर नदलेस ने डा. टेकचंद की कहानी ' राम के नाम पर ' (जो हाल ही में नया पथ पत्रिका में प्रकाशित हुई है) पर परिचर्चा गोष्ठी का आयोजन किया। जिसकी अध्यक्षता बंशीधर नाहरवाल ने की और संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। कहानी का यथोचित वाचन चंद्रकला ने किया। कहानी पर सारगर्भित टिप्पणी देने वालों में डा. मुकेश मिरोठा, ज्योति पासवान, पुष्पा विवेक, रानी कुमारी, जयराम पासवान, पूजा मदान, अमित बौद्ध, कुंवर नाज़ुक आदि प्रमुख रहे। कार्यक्रम में लक्की चौहान, देव प्रसाद, गीता कृष्णांगी, प्रिया गहलोत, सुनीत कुमार, प्रदीप कुमार, धीरज वनकर, रजनी दिसोदिया, इंदु रवि, बी एल तोंदवाल, प्रमोद मेहरा, डा. नाविला सत्यादास और चितरंजन गोप लुकाटी आदि गणमान्य साहित्यकार मौजूद रहे। परिचर्चा बेहद सफल रही। विस्तृत रिपोर्ट एक दो दिन बाद अमित धर्मसिंह  

अंबेडकर जयंती की पूर्व संध्या पर कोश निर्माण को लेकर नदलेस ने की कार्यकारिणी की बैठक

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कोश निर्माण को लेकर नदलेस की बैठक प्रेवि। आंबेडकर जयंती की पूर्व संध्या पर, भारतीय दलित साहित्य एवं साहित्यकार कोश निर्माण को लेकर नदलेस ने किया कार्यकारिणी की बैठक का आयोजन। दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस के आर्ट फैकल्टी लॉन में हुई इस बैठक में डा. अनिल कुमार, कर्मशील भारती, डा. अमित धर्मसिंह, डा. सुरेंद्र कुमार, बृजपाल सहज, उमरशाह, लोकेश चौहान, गीता कृष्णांगी और इंदु रवि आदि उपस्थित रहे। बैठक की अध्यक्षता डा. अनिल कुमार ने की व संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। सर्वप्रथम डा. अमित धर्मसिंह ने कोश निर्माण के विषय में विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने बताया कि भारतीय दलित साहित्य एवं साहित्यकार कोश अब तक के दलित साहित्य का वस्तुनिष्ठ इतिहास तो होगा ही साथ यह दलित साहित्य के अध्यताओं और शोधार्थियों के लिए बहुत ही उपयोगी साबित होगा। भारतीय दलित साहित्य एवं साहित्यकार कोश को लेकर पहली बैठक गत 13 मार्च को ऑनलाइन हुई थी। जिसमें अलग अलग प्रांतों से जुड़े सभी रचनाकारों ने एकमत होकर कोश निर्माण किए जाना महत्तपूर्ण कार्य बताया था। उसी संदर्भ में कोश निर्माण को लेकर जानकारी जुटाने हेतु फॉ...

सोच पत्रिका का प्रवेशांक

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संपादकीय सोच                           सोेच का यह पहला अंक                                                  डा. अमित धर्मसिंह यह आप ही नहीं, मैं भी सोचता हूं कि जब पहले ही इतनी पत्र, पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं तो एक और पत्रिका की क्या जरूरत। क्या वाकई पत्र पत्रिकाएं समाज में बदलाव लाने का काम करती हैं। या सिर्फ साहित्यकारों की लिखास और छपास की क्षुदा पूर्ति की ही भेंट चढ़ जाती हैं। आजकल जिस स्तर की पत्र, पत्रिकाएं एक दूसरे की हौड़ में संपादित की जा रही हैं, उससे तो यही अंदाजा लगता है कि सब देखादेखी किसी भी तरह यशकाय हो जाना चाहते हैं। ऐसी मानसिकता रखने वाले साहित्कार और संपादकों का फोकस वैचारिकी और साहित्य से सामाजिक परिवर्तन की ओर जाना या ले जाना नहीं बल्कि वे साहित्य में अपनी पैठ और संबंधों पर अधिक होता है। वे रचना सामग्री पर उतना फोकस नहीं करते जितना कि अपने साहित्यिक और लाभकारी संबंधों पर। आजकल ...