वर्ल्ड बुक फेयर 2026 में हुई नदलेस की गोष्ठी, 15/01/2026 को

        

वर्ल्ड बुक फेयर में नदलेस की काव्य एवम् विचार गोष्ठी 

          दिल्ली में चर्चित विश्व पुस्तक मेले का आयोजन १०/१/२६ से १८/१/२६ तक चला। हमें भी लगा कि इस बार नदलेस की मासिक गोष्ठी क्यों न इसी के प्रांगण में की जाए इसीलिए गत वर्ष की तरह इस बार भी नदलेस की गोष्ठी विश्व पुस्तक मेले में लाखों उत्कृष्ट पुस्तकों की छांव में संपन्न की गई। उक्त गोष्ठी भी नदलेस की अन्य गोष्ठियों की तरह अति सफल रही। इसमें कई नामी ग्रामी हस्तियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। मेले के हॉल नम्बर दो के आगे हम निश्चित समय से पहुंच गए और अपनी महफिल वहीं पर सजा दिए। आहिस्ता-आहिस्ता हमारे और सदस्यगण इस दायरे में सम्मिलित होते गए और इसी तरह हमारा दयरा आसमन में चमकते जनवरी माह के सूर्य की तरह बढ़ता चला गया। जनाब आर पी सोनकर जी जौनपुर से तशरीफ़ लाए थे, खास इस गोष्ठी के वास्ते। वह अपने साथ प्रख्यात कवि बी आर विप्लवी जी और अमित कामराज जी को भी साथ लाए थे। कई गणमान्य हस्तियां पीछे चल रहे प्रसिद्ध मेले का मोह छोड़कर हमारे रचनाकारों के दायरे में सम्मिलित होती रहीं। इस तरह हमारा हौंसला बढ़ाते हुए अपनी उत्कृष्ट रचनाएं नदलेस के वर्तमान अध्यक्ष डॉ. अमित धर्मसिंह की अध्यक्षता में और लोकेश के सुगठित संचालन में पेश की। 

सबसे पहले महिला प्रथम के क्रम में सलीमा ने अपने शेर कहे," दानाई उसकी ,उसको न बचा पाई, जब एक आतिश ने मिट्टी को सजदे से मना किया।" इसी क्रम में नदलेस से ताज़ा तरीन जुड़ी कवयित्री यशोदा ने अपनी एक रचना पढ़कर सुनाई, " जिस दिन मैं थी बनी याचिका नैनों से छलका था मधुरस, उस दिन तुमने बैर निभाया बने बेवफा बदली करवट।" जिसमें एक स्त्री के मन की टीस साफ झलक रही है। जब उसका होनेवाला वर शादी वाले दिन ही उसको छोड़कर चला गया। इस मार्मिक कविता के बाद बंशीधर नाहरवाल ने अपनी कविता "मुझसे मत पूछो मेरा पता” सुनाई जिसमें गांव से शहरों में रोजगार के लिए आए लोगों का मर्म है साथ ही बुढ़ापे की कगार पर खड़े उस बंदे का दर्द है जिसका पर्मानेंट पता नहीं है। डॉ. विजयेंद्र पाल सिंह मयंक ने अपनी कविता सुनाई जिसके बोल थे "जिसे देखो उसी के हाथ में पत्थर लगा है, मुक़ाबिल आईने के जब गया हूं डर लगा है।" इसी तरह नदलेस की गोष्ठी स्त्री विमर्श और हाशिए पर पड़े लोगों पर कविताएं कहते सुनते आगे बढ़ी। मदन लाल ने अपनी कविता कुछ यूं सुनाई- "यह जो हौंसला किसी गरीब के अरमानों को काटकर आया है, अहंकार बोल रहा है इसका यह किसी रसूखदार के तलवे चाटकर आया है।”

बी आर सुधाकर की कविता जिसकी पंक्तियां कुछ ऐसी थीं "अपनी मुठ्ठी बांधो अब ,अपने हक में बोलो अब।" ने दलित समाज को चेताने का काम किया। बहुत हौसला देनेवाली कविता के बाद बी आर विप्लवी की कविता आई" जमीन का हमसफर आकाश है क्या, तुम्हें इस बात का विश्वास है क्या" जिसने हमारे दिलों में हौसलों को और बुलंद किया। इंद्रजीत सुकुमार ने एक गीत पेश किया जिसके बोल थे "दलित की बेटियों की चीख सुनकर चुप नहीं रहना, लड़ोगे जब तलक है सांस सीना तानकर कहना।" एदल सिंह की कविता भी आंबेडकरवाद से ओतप्रोत थी- "जय भीम हमारा नारा है, हमें जान से प्यारा है"

जनवरी मास की धूप और ठंडी हवा का कॉम्बिनेशन प्रगति मैदान के प्रांगण में बैठकर सभी सदस्यों ने लिया। जोगेंद्र सिंह अपनी कविता यूँ पढ़ी- "हमने ग़ज़लें पीं हैं कविताएं खाई हैं, तब जाकर यह जिंदगी मुसकाई है।" इसी तरह मामचंद सागर ने कुछ कविता- "चलो चमन से बाहर लाएं, गुलों से मांग दुलार लाएं।" रही। डॉ. लाल रत्नाकर ने तड़कती हुई व्यंग्यात्मक कविता सुनाई, "अंग्रेजों से आजादी के बाद भारत में शासन था, अब विकास के कारण सुशासन की बारी है।" अमित कामराज ने अपनी ग़ज़ल में कहा- "फकीरों को अब है वजीरी का चस्का, वजीरों को है झूठी फकीरी का चस्का।" उसके बाद। आर पी सोनकर ने तरन्नुम से ग़ज़ल पढ़ी-"उधर तो जुल्म का लड़ना है क्या किया जाए, इधर भी खौफ का मंजर है क्या किया जाए।" राजपाल सिंह की कविता ने भी वर्तमान समाज पर कटाक्ष करते हुए कहा "मजे-मजे में कही बात जब पलड़े नंग के पड़ जाती, बढ़ते-बढ़ते वही बात, बतंगड़ बन जाती।" लोकेश कुमार के चंद रोमानी अशआर से माहौल थोड़ा हल्का किया" आरज़ू में तेरी ए शमा परवाना यूं ही जलता रहेगा, एक तेरे प्यार में ए हसीन दीवाना यूं ही मरता रहेगा।"

इसी प्रकार गोष्ठी अपने समापन के करीब आती रही और पुष्पा विवेक ने नारी-विमर्श पर अपनी लंबी कविता कह सुनाई जिसका शीर्षक था- "असंगठित औरतें" जिसकी कुछ पंक्तियां थीं - सभी तो संगठित हैं, मजदूर किसान, टैंपो रिक्शाचालक यूनियन बनाकर, पंडित मौलवी मठाधीश अपने मठों में, संगठित हों करते हैं बैठकें, मगर भारतीय स्त्रियां हर जगह रहती हैं असंगठित।" गोष्ठी डॉ. अमित धर्मसिंह जी के अध्यक्षीय वक्तव्य उनकी कविता और ग़ज़ल से संपन्न हुई। उनकी एक ग़ज़ल के कुछ यूं रही- "ऐसा जादू वो कर नहीं सकता, पेट बातों से भर नहीं सकता, जिसकी जाँ को हज़ार आफ़त हों, इक तिरे ग़म से मर नहीं सकता।" धूप अब मुलायम और हवा तीखी ठंडी हों चली थी पर हमारे सदस्यों का हौसला अब भी गर्म था। इस प्रकार नदलेस की यह मासिक गोष्ठी भी कामयाब रही। उक्त के अतिरिक्त गोष्ठी में आर सी विवेक, सुरेश चंद्रा, रूपचंद गौतम, सुदेश कुमार तनवर, सुशील कुमार, मोहनदास नैमिशराय और रजनी आदि भी उपस्थित रहे। सभी का धन्यवाद ज्ञापन मामचंद सागर ने किया। इस अनोखी गोष्ठी के लिए सबने एक-दूसरे को बधाई दी और अपने-अपने घरों की ओर प्रस्थान किया।

रिपोर्ट 

सलीमा

सह प्रचार सचिव, नदलेस 

15/01/2026     















































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