गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर काव्य एवं विचार गोष्ठी, 25/01/2026
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर नदलेस द्वारा ऑनलाइन गोष्ठी
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या (25/01/2026) पर नदलेस द्वारा ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी अपने नियत समय पर शुरू हो गई। जिसकी अध्यक्षता डॉ अमित धर्मसिंह जी ने की और संचालन मदनलाल राज़ और लोकेश कुमार ने किया। गोष्ठी भी इस उपलक्ष में देश प्रेम की कविताओं,रचनाओं से ओत प्रोत रही। मदन जी ने सुंदरता से कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए सुश्री पूजा को आमंत्रित किया। पूजा जी ने स्त्री विमर्श पर अपनी सुंदर कविता प्रस्तुत की। फिर उन्होंने गणतंत्र टूट रहा था कविता सुनाई जिसमें आजकल घट रही घटनाएं जो लोकतंत्र पर सीधा प्रहार हैं, उनपर अपनी रचना प्रस्तुत की। फिर ममता आंबेडकर जी ने अपनी कविता ,देश में व्याप्त कुसंगतियों और विसंगतियों के खिलाफ सुनाई। किस प्रकार आज भी हमारे देश में छुआछात,जातिवाद की बीमारी फैली है जो देश को खोखला कर रही है। उन्हीं के शब्दों में,” छुआछात की बीमारी ने आग देश में लगाई थी, न जाने कितने बच्चों को मौत की नींद सुलाई थी।”
अगले कवि श्री बंशी धर नाहरवाल को आमंत्रित किया उन्होंने भारत के संविधान के रचनाकार बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर पर "भीम चौपाई " सुनाई। इसी क्रम में पुष्पा विवेकजी ने अपनी दो कविताएं प्रस्तुत की । भारत में मौजूद जात –पात, सांप्रदायिकता और अन्य कुरीतियों पर लिखी उनकी रचनाएं काबिले तारीफ़ रहीं। पहली कविता में उन्होंने हमारे संविधान के रचयिता,गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों के मसीहा बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का गुणगान कर जिसकी पंक्तियां कुछ ऐसी थीं , " दे श्रद्धांजलि बाबा को मानकों संतोष आया।” दूसरी रचना मौजूदा सरकार की पॉलिसीज और उनके निर्णयों पर थी। जिसमें कवयित्री के अनुसार इन पॉलिसीज से लोकतंत्र समाप्त हो रहा है।
अगले आमंत्रित कवि जनाब मामचंद सागर थे। उन्होंने भी अपनी दो सुंदर कविताएं कह सुनाई जिनमें से एक आज कल के मौसम के अनुरूप थी, 'अरिहंत बसंत '। कविता में बसंत का वर्णन सुंदरता से किया गया।किस तरह से वन उपवन में डाली डाली पर पुष्प खिल रहे होते हैं पूरी बगिया मुस्काती सी प्रतीत होती है और पूरे आलम में खुशबू फैली होती है। बसंत ऋतु की छठ के बाद मदन लाल राज जी ने एक यथार्थवादी कविता के सुनाई जिसके शब्द यूं थे,"आजादी से पूर्व जिन्होंने किसी भी अपराध में जेल काटी। आजादी के बाद उन्होंने खूब मलाई चाटी।” इसकेबाद क्रम को न तोड़ते हुए मान्यवर आर.डी गौतम ने एक कविता और एक गीत प्रस्तुत किया जिनके बोल थे,”भर रहे नाजुक नसों में जहर चारों ओर हैं।” और " बहुजन मसीहा है मेरे बाबा साहेब।" कवि के अनुसार आजाद देश में भी हमारे हक मांगने से भी नहीं मिल रहे हैं तो अपने हकों के लिए संघर्षरत रहते हुए उनको छीनना पड़ेगा।
गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में देशप्रेम के भाव को अधिक बढ़ाते हुए फूल सिंह कुशवाहा जी ने अपनी दमदार आवाज में दो तड़कती भड़कती गीत प्रस्तुत करे। एक," तिरंगा "और दूसरा लोकगीत की शक्ल में," भारत है महान चलो भैया पूजन करें।" इसके बाद मोहन लाल सोनल जी की रचना में संविधान को जलाने पर इस कुर्कृत्य की घोर निंदा की। अंगद जी ने भी अपनी सुंदर आवाज में भारत की शान में एक गीत प्रस्तुत किया।जिसके बोल थे," जगत में भारत देश महान,लहर लहर लहराए तिरंगा हम सब की है शान।" आर एस आघात जी ने आज की सत्ता धारी सरकार पर व्यंग्यात्मक गीत प्रस्तुत किया। सत्ता द्वारा लिए गए फैसलों पर कटाक्ष किया और उनके द्वारा रचे गए कानूनों पर व्यंग्यात्मक गीत गाया। उनके द्वारा रचे गए दूसरे गीत में उन्होंने कहा कि चाहे तुम लाख हमसे नफरत करो मगर हम सिर्फ तुमको ही चाहेंगे,” बस यही सोचकर मुस्कुराएंगे हम,लाख नफरत करो तुमको चाहेंगे हम।” राजबीरबजी ने इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए इसको एक नई दृष्टि दी कि, यह संविधान न सिर्फ ओबीसी , एस टी, एस सी के ही अधिकारों का मसीहा नहीं है बल्कि इसे महिलाओं का स्वतंत्र दिवस भी कह सकते हैं। बाबा साहेब द्वारा रचे गए संविधान में नारी को पहली बार अधिकार दिए गए जीने के ,काम के और उन्हें स्वतंत्रता दी गई।मनु के संविधान के अधीन जब तक भारत था न बहुजनों न स्त्रियों को सम्मान से जीने का हक था,एक सोचे समझे षडयंत्र के तहत यह सब अपने अधिकारों से वंचित थे। जिन्हें आजाद भारत के संविधान में हक मिले। राजपाल जी ने भी भारत में मौजूद कुरीतियों पर टिप्पणी की और पासा नमक कविता में वर्ण द्वेष पर कविता कह सुनाई।
" दोस्ती का यदि हाथ आया भी तो मेरी ओर वो भी छलने के लिए।" राम अवतार जी ने भी सम सामयिक स्थिति पर अपनी बेहतरीन कविता " बुल्डोजर" शीर्षक से कह सुनाई,जिसके बोल थे,"एक बुल्डोजर चला दो इन नफरतों की दुकानों पर जिससे फैल सके सहिष्णुता।" और एक बुल्डोजर चला दो जातियों सांप्रदायिकता पर बिहार अमीरों के बैंक खातों पर भी। राम अवतार जी की दूसरी कविता " सहिष्णुता" थी जिसमें उन्होंने शिक्षा को ही विकास का गुरुमंत्र बताया। एदल सिंह ने भी देशप्रेम से ओत प्रोत दो कविताएं कह सुनाई," न करेंगे विलंब मां हिन्द की कसम निज सीमा पर" और " जननी जन्म भूमि तेरे हैं हम।" फिर लोकेश के शब्दों ने समा बांधा,उनकी कविता," एक दिन का जश्न है फिर सालभर इंतजार है।" कार्यक्रम का समापन नदलेस के वर्तमान अध्यक्ष के उदबोधन और उनकी कविता पर हुआ।
रिपोर्ट
सलीमा
सह प्रचार सचिव, नदलेस
25/01/2026











































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