बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी के 70 वें महापरिनिर्वाण दिवस पर ऑनलाइन काव्य पाठ एवं विचार गोष्ठी, 06/12/2025 को हुई
महामानव बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर ऑनलाइन काव्य पाठ एवं विचार गोष्ठी
आज दिनांक 06 नवम्बर 2025 को महामानव बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर नवदलित लेखक संघ, दिल्ली द्वारा एक ऑनलाइन स्मरण विशेष काव्यपाठ एवं विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. अमित धर्मसिंह ने की तथा संचालन लोकेश कुमार ने किया। उपस्थित साथियों जलेश्वरी गेंदले, डॉ. पूरन सिंह, फूलसिंह कुस्तवार, आर एस मीना, बंशीधर नाहरवाल, अरुण पासवान, प्रो. बिपिन कुमार, चितरंजन गोप लुकाटी, डॉ. मोहनलाल सोनल, आरएस आघात, आर पी सोनकर, ओमप्रकाश गौतम, ऐदल सिंह, श्रीलाल बौद्ध, कश्मीर सिंह, जोगेंद्र सिंह, भूरी सिंह, जगदीश पंकज, देव प्रसाद पात्रे, राधेश्याम कांसोटिया, जयराम कुमार पासवान, श्यामलाल राही, गौतम प्रकाश, अंगद कुमार, पदम् प्रतीक, युगंधर गझल आदि साथियों ने डॉ. अम्बेडकर पर केंद्रित काव्यपाठ किया। अंत में डॉ. अमित धर्मसिंह ने अपना काव्यपाठ करते हुए अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि 'यह हमारे लिए अत्यंत सराहनीय है कि काव्यपाठ का विषय स्वतंत्र था परंतु फिर भी महामानव डॉ. अम्बेडकर जी के जीवन और उनके उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उपस्थित साथियों ने उनपर केंद्रित रचनाओं का पाठ किया'। आखिर में सभी उपस्थित साथियों का धन्यवाद ज्ञापन गौतम प्रकाश जी ने किया।
लोकेश कुमार
सचिव नदलेस
07/12/2025
"आज भारतीय संविधान के प्रखर शिल्पी बाबा साहब डॉक्टर भीम राव आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर नदलेस द्वारा आयोजित आभासी गोष्ठी में वक्ताओं,कवि/शायरों को सुनते हुए अपनी निम्नलिखित कविता उनके सम्मान में पढ़ते हुए संतुष्टि मिली :
कविता : सम्मान मंत्र
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आग में तप निखरता है सोना,
इसकी मिसाल हैं डॉ अम्बेडकर,
इनका रास्ता रोकते थे लोग,
इन्होंने दिखाया संविधान रचकर!
अपने कष्टों का कर के अनदेखा,
शिक्षार्जन पर केवल रखा ध्यान,
क्योंकि जानते थे शिक्षा का मोल,
हुए शिक्षित, विद्वान, हुए महान्।
मनुष्य और मनुष्य में होता था भेद,
इससे हृदय में भरा था जो खेद,
मिटाने को खाई उस भेदभाव की,
जोड़े संविधान में कई अनुच्छेद!
गहन अंधकार था चारों ओर,
स्वयं बने वे उसमें प्रकाश,
उनको भी दिलाई समानता,
जो होते थे केवल दास!
शिक्षित बनो, संगठित रहो,
संघर्ष करो का किया आह्वान,
क्योंकि जानते थे वे महापुरुष,
ऐसे ही मिल सकता है सम्मान!
सामाजिक और आर्थिक बराबरी,
कदम-कदम पर जो देती अपमान,
उसका खात्मा था उनका उद्देश्य,
उस महामानव को कोटिश: प्रणाम!"
(अरुण कुमार पासवान जी की फेसबुक वाल से साभार )












































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