आंबेडकरवादी ग़ज़लों के स्वरूप निर्धारण की आखिरी ग़ज़लशाला डॉ. अमित धर्मसिंह के ग़ज़ल संग्रह ‘बग़ैर मक़्ता’ पर संपन्न, 28/12/2025


रिपोर्ट 

आंबेडकरवादी ग़ज़लों के स्वरूप निर्धारण की आखिरी ग़ज़लशाला ‘बग़ैर मक़्ता’ पर संपन्न

नव दलित लेखक संघ, दिल्ली ने 28 दिसंबर 2025 को डॉ. अमित धर्मसिंह के ग़ज़ल संग्रह ‘बग़ैर मक़्ता’ पर ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी आयोजित की। यह नदलेस की बारहवीं और अंतिम ग़ज़लशाला थी। इसकी अध्यक्षता आर पी सोनकर ने की एवं संचालन लोकेश कुमार ने किया। गोष्ठी में इंद्रजीत सुकुमार, अरुण कुमार पासवान और मामचंद सागर बतौर मुख्य वक्ता रहे। विशेष टिप्पणीकार के रूप में तेजपाल सिंह ‘तेज’, राजपाल सिंह ‘राजा’ और पुष्पा विवेक रहीं। लेखकीय अभिमत एवं ग़ज़लपाठ हेतु बग़ैर मक़्ता के ग़ज़लकार डॉ. अमित धर्मसिंह उपस्थित रहे। बग़ैर मक़्ता के प्रकाशन में अहम भूमिका अदा करने वाली डॉ. गीता कृष्णांगी उपस्थित रहीं। इनके अलावा गोष्ठी में पवन धीमान, ममता अंबेडकर, डी. एल. धांधव, बी. एल. तोंदवाल, जीवंत नीलकंठ, बंशीधर नाहरवाल, अंगद कुमार, भूरी सिंह, मदनलाल राज़, ओमप्रकाश गौतम, ज्ञानेंद्र सिद्धार्थ, राधेश्याम कांसोटिया, बिजेंद्र पाल सिंह, डॉ. कुसुम वियोगी, जालिम प्रसाद, डी. बी. सिंह, एदल सिंह, खगेन्द्रमोहन पाण्डल, डॉ. हरकेश कुमार, जोगेंद्र सिंह, अर्का समानता, श्याम लाल राही, पदम प्रतीक, एस. एन. प्रसाद, डॉ. रवि प्रकाश, गौतम रावत, हरपाल सिंह, भजन सिंह, बृजपाल सहज, चितरंजन गोप लुकाठी, गौतम प्रकाश, नीरज कुमार नेचुरल, आज़ाद सिंह शहरावत, अनित कुमार, कुंवर नाज़ुक और रूप सिंह ‘रूप’ आदि, देश भर से सैकड़ों गणमान्य साहित्यकार उपस्थित रहे। गोष्ठी में सर्वप्रथम संचालक लोकेश कुमार ने डॉ. अमित धर्मसिंह का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि डॉ. अमित धर्मसिंह 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' (काव्यमय आत्मकथा), कूड़ी के गुलाब (काव्य संग्रह), खेल जो हमने खेले (लोक खेल और क्रिकेट की गद्य पुस्तक) जैसी दर्जनों पुस्तकें लिख चुके एवं संपादित कर चुके हैं। इनकी पुस्तकों पर भी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। फिलहाल ये नदलेस में बतौर अध्यक्ष साहित्य और समाज को अपनी अमूल्य सेवाएं दे रहे हैं। उसके बाद क्रमशः मामचंद सागर, इंद्रजीत सुकुमार और अरुण कुमार पासवान ने बग़ैर मक़्ता पर अपने-अपने वक्तव्य दिए। राजपाल सिंह ‘राजा’, पुष्पा विवेक और तेजपाल सिंह ‘तेज’ ने अपनी-अपनी सारगर्भित टिप्पणियां प्रस्तुत की। डॉ. अमित धर्मसिंह ने लेखकीय अभिमत रखते हुए तहत और तरन्नुम से एक-एक ग़ज़ल प्रस्तुत की। तत्पश्चात् आर पी सोनकर का अध्यक्षीय उद्बोधन हुआ। सभी उपस्थित वक्ताओं, टिप्पणीकारों और साहित्यकारों का धन्यवाद ज्ञापन मदनलाल राज़ ने किया। 

ज्ञात हो कि अक्टूबर 2024 में अंबेडकवादी ग़ज़लों के स्वरूप निर्धारण के लिए डॉ. अमित धर्मसिंह के प्रस्ताव पर, नदलेस की चौथी कार्यकारिणी जिसके अध्यक्ष बंशीधर नाहरवाल रहे, उनकी अध्यक्षता और डॉ. अमित धर्मसिंह के पूर्ण निर्देशन में यह ग़ज़लशाला शुरू की गई थी। चौथी कार्यकारिणी के एक वर्षीय कार्यकाल में सात ग़ज़लशाला और पांचवी कार्यकारिणी जिसके वर्तमान अध्यक्ष डॉ. अमित धर्मसिंह हैं के अध्यक्षीय काल में अभी तक पांच ग़ज़लशालाएं आयोजित हुईं। इस तरह कुल बारह ग़ज़लशालाएं आयोजित हुईं। ये ग़ज़लशालाएं तेजपाल सिंह ‘तेज’ कृत ‘कौन दिशा में उड़े चिरै’या, रूप सिंह ‘रूप’ कृत ‘हालात ए हाजिरा’, राजेंद्र कुमार राज़ कृत ‘उम्मीदों की किरण तुम्हारे लिए’, डॉ. रामगोपाल भारतीय की ‘प्रतिनिधि ग़ज़लें’, रामश्रेष्ठ दीवाना कृत ‘आदमी के वेष में आदमखोर को देखा है’, डॉ. रामावतार मेघवाल की ‘प्रतिनिधि ग़ज़लें’, कुंवर नाज़ुक कृत ‘कंवारे सजदे’, डी एल धांधव कृत ‘जाएं तो जाएं कहां’, श्यामलाल राही कृत ‘धनक’, राम सनेही विनय कृत ‘ठहरे हुए पानी में’, प्रमोद कुमार वालके का मराठी ग़ज़ल संग्रह ‘प्रश्नांची गझल’ और डॉ. अमित धर्मसिंह कृत ‘बग़ैर मक़्ता’ ग़ज़ल संग्रहों पर परिचर्चा गोष्ठियों के रूप में आयोजित हुईं। परिचर्चाओं के माध्यम से तमाम ग़ज़ल संग्रहों पर भाव, भाषा, कथ्य, विचार, शिल्प आदि हर दृष्टिकोण से विस्तृत विचार-विमर्श किया गया और साथ ही आंबेडकरवादी विचारधारा के तत्वों की तलाश की गई। खासकर, ग़ज़ल के शिल्प में बहुत अधिक छेड़छाड़ न करते हुए भाव, कथ्य, उद्देश्य, संदेश और विचार आदि को आधार मानकर आंबेडकरवादी ग़ज़लों की पहचान की गई। पूरी ग़ज़लशाला में पूर्ण रूप से तो कोई ग़ज़ल संग्रह पूर्णतः आंबेडकरवादी नहीं पाया गया लेकिन ग़ज़लों के कहन में आंबेडकरवादी विचार काफी मात्रा में परिलक्षित हुए। यह बात तेजपाल सिंह ‘तेज’ से लेकर डॉ. अमित धर्मसिंह तक अक्षरशः लागू हुई। परन्तु इन्हीं में आंबेडकरवादी ग़ज़लों के पर्याप्त तत्व भी मौजूद मिले। इन्हीं के माध्यम से डॉ. अमित धर्मसिंह की अध्यक्षता, निर्देशन और संपादन में शीघ्र ही आंबेडकरवादी ग़ज़लों का एक साझा संकलन तैयार किया जाएगा जो निश्चित ही दलित समाज के आंबेडकरवादी ग़ज़लकारों का मार्ग प्रशस्त करेंगे। 

‘बग़ैर मक़्ता’ ग़ज़ल संग्रह भी इसका अपवाद नहीं। इसमें संकलित कुल एक सौ पचपन ग़ज़लों में, जहां 70 ग़ज़लें प्रेम के उदात्त स्वरूप पर हैं, वहीं करीब 85 ग़ज़लें दलित जीवन के अभाव, वेदना, त्रासदी, संघर्ष, समाजार्थिक स्थिति, सरोकार और आंबेडकरवादी समतामूलक विचार में पली-पगी हैं। संग्रह में सभी ग़ज़लें कालक्रमानुसार रखी गईं हैं, इस कारण संग्रह में अमित धर्मसिंह की रचनाधर्मिता और ग़ज़ल दोनों का विकास-क्रम स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इस ग़ज़ल संग्रह की एक बड़ी विशेषता इसके शीर्षक में भी दिखाई पड़ती है। यद्यपि बहुत से शायरों ने बग़ैर मक़्ता की ग़ज़ल कही हैं लेकिन इससे पूर्व इस शीर्षक से संभवतः किसी भी शायर का कलाम प्रकाशित नहीं हुआ है। यह सर्वथा पहला घोषित और प्रकाशित नवीन प्रयोग है। इस संग्रह ने एक तरफ ग़ज़लों में मक़्ता की अनिवार्यता को दस्तावेजी तौर से नगण्य बना दिया है, दूसरी तरफ इसने ग़ज़लों को पाठकों से जोड़ने का बेजोड़ कार्य किया है। यानी, मक़्ता न लिखकर ग़ज़लकार ग़ज़ल और पाठक के बीच से निकल जाता है। बग़ैर मक़्ता के अर्थ को इस तरह भी समझा जा सकता है कि जिस तरह जीवन, विचार और साहित्य-सृजन का कोई अंत नहीं होता, उसी तरह ग़ज़ल की रवायत का भी कोई अंत नहीं और न ही किसी ग़ज़ल विशेष में आखिरी शेर मक़्ता जैसी कोई बंदिश अनिवार्य है। ग़ज़ल की परंपरा, सृजन, ज़मीन, मज़मून, बहर, वज़्न, नवीन प्रयोग यहां तक कि अशआर की संख्या तक सभी कुछ अंतहीन हैं। इसके और भी कई सार्थक अर्थ निकाले जा सकते हैं। बहरहाल, बग़ैर मक़्ता का यह अर्थ, बग़ैर मक़्ता ग़ज़ल संग्रह को और अधिक व्यापक और सार्वभौमिक बना देता है, जिस कारण बगैर मक़्ता की ग़ज़लें सिर्फ डॉ अमित धर्मसिंह की ही नहीं अपितु अलग-अलग संदर्भों में संबंधित पाठक और समाज की अपनी थाती बन जाती हैं। 

लगभग यही बात तमाम वक्ताओं और टिप्पणीकारों के विचारों में उभरकर सामने आयी। मामचंद सागर ने कहा कि “ग़ज़लों में उनकी कोई पकड़ न होने के बाद भी उन्हें ग़ज़लें बहुत पसंद आई हैं। इनमें एक युवा मन की बेचैनी, संघर्ष, प्रेम और जिंदगी के विविध अनुभव उभरकर सामने आए हैं। सभी ग़ज़लें बहुत करीने और ग़ज़ल की शैली में बड़े असरकारक तरीके से लिखी गई हैं। ग़ज़लों को पढ़कर लगता है लेखक इन ग़ज़लों में दर्ज अनुभव से सीधे तौर से जुड़ा है और यह बात इन ग़ज़लों को और बड़ा बनाती है। इनमें श्रृंगार का उदात्त स्वरूप विद्यमान है। इसे आप इस उदाहरण से परख सकते हैं कि ‘आंखों को उसके ख़्वाब दिखाते चले गए। इकतरफा उससे प्यार निभाते चले गए।।” इसके अलावा भी उन्होंने बहुत ग़ज़लों के उदाहरण देकर अपनी बातें स्पष्ट की। इंद्रजीत सुकुमार ने कहा कि “बग़ैर मक़्ता में एक से बढ़कर एक, कुल एक सौ पचपन ग़ज़लें हैं। सभी ग़ज़लें अलग-अलग ढंग से प्रभावित करती हैं। लगभग सारी ग़ज़लें ऐसी हैं, जिन्हें आप गुनगुना सकते हैं। कुछ ही ग़ज़लों के पद क्रम में कुछ बदलाव महसूस होता है। लेकिन बावजूद इसके इनकी कोई भी ग़ज़ल, ग़ज़ल के मयार का अतिक्रमण करती नजर नहीं आती। इनमें ज़िंदगी के इतने गहरे अहसास दर्ज है कि जो हमारी प्रेरणा और मार्गदर्शक बनकर उभरते हैं। ‘ज़िन्दगी मुझसे जवाब मांगे है। बीते पल पल का हिसाब मांगे है।’  और दर्द को भूलकर मुस्करा लीजिए। ज़ख्म जितने हैं दिल के भुला लीजिए।’ आदि सभी ग़ज़लें इसी प्रकार की ग़ज़लें हैं।” उन्होंने इसके अलावा भी कई और ग़ज़लें गुनगुनाकर ग़ज़लों की तह में पहुंचने और उपस्थित श्रोताओं को पहुंचाने की सार्थक कोशिश की। अरुण कुमार पासवान ने अपनी बात रखते हुए कहा कि “एक बात जो मैं अमित जी के विषय में पहले भी कहता रहा हूं, वो ही बात मुझे बग़ैर मक़्ता की ग़ज़लें पढ़ने के बाद महसूस हुई। और वो बात ये है कि अमित जी को जब हम देखते हैं तब ऐसा नहीं लगता लेकिन जब हम इन्हें सुनते हैं और इनकी कविताएं, ग़ज़लें आदि पढ़ते हैं तो ये हमें अपनी उम्र से हमेशा ही बहुत आगे दिखाई देते हैं। यह बात इस ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लों को पढ़कर भी निःसंकोच कही जा सकती है। वे इन ग़ज़लों में जिस मनोदशा, लोक और समाज का उद्घाटन करते हैं, वह हैरत में डाल देने वाला होता है। इनकी ग़ज़लें न सिर्फ ग़ज़ल की विधा के रूप बल्कि अपने कथ्य, अनुभव और सभी स्तर से प्रभावित करती हैं। ऐसी अनेक ग़ज़लें हैं जिनमें अमित जी बड़े ही साधारण तरीके से बहुत बड़ी बात कह जाते हैं। जैसे इस संग्रह में एक ग़ज़ल का एक शेर है कि ‘काफ़ी हो चुके बसर हम मात-पिता के सहारे। अब कांधे वजन उनका ढोने को जी चाहता है।’ एक युवा के गहरे दायित्वबोध से भर जाने की कहानी कहता है। ऐसे और भी बहुत से शेर हैं जो आपको गहरे तक सोचने पर विवश कर देते हैं।” उन्होंने विविध ग़ज़लों के विविध शेरों के माध्यम से इसके यथोचित उदाहरण भी प्रस्तुत किए। इनके अलावा, राजपाल सिंह ‘राजा’, पुष्पा विवेक, लोकेश कुमार, तेजपाल सिंह ‘तेज’ ने भी बग़ैर मक़्ता और ग़ज़लकार अमित धर्मसिंह से संबंधित सारगर्भित टिप्पणियां प्रस्तुत कर ग़ज़लकार को ‘बग़ैर मक़्ता’ ग़ज़ल संग्रह के लिए बधाई दी। 

लेखकीय अभिमत रखते डॉ. अमित धर्मसिंह ने कहा कि “बग़ैर मक़्ता में मेरी अर्ली एज की ग़ज़लें संकलित की गई हैं। मेरी लिखने की शुरुआत फिल्मी गीतों और तुक्कड़ कविताओं से हुई। इन्हीं के बीच में न जाने कैसे दो तीन रचनाएं ग़ज़ल जैसी भी आ फंसी। बाद एक विज्ञापन, जिसमें ग़ज़ल लेखक, म्यूजिशियन, मॉडल आदि को आमंत्रित किया गया था, उसने तो मुझे ग़ज़ल लेखन से ही जोड़ दिया। इसके बाद अपने शहर के शायरों की संगत और निदा फाजली, दुष्यंत कुमार जैसे शायरों को पढ़कर तो ग़ज़ल निखर और दमक उठी। उसी का परिणाम आज इस ग़ज़ल संग्रह बग़ैर मक़्ता के रूप में आपके हाथों में हैं।” ग़ज़ल की विधा की बेसिकी पर बोलते हुए उन्होंने कहा “ग़ज़ल ही नहीं हमें दूसरी विधाओं पर भी पर्याप्त ध्यान देने की जरूरत है ताकि हमारे लिखे को खारिज करने का कोई कारण मुख्य धारा के लेखकों के पास न रह सके।” उन्होंने दो ग़ज़लें क्रमशः ‘गिर जाने के बाद से फिर चलने की तैयारी है। क्या हुआ जो जिंदगी में क़दम क़दम दुश्वारी है।’ को तहत से और एक साथ हम कितने जीवन जीते हैं। वक़्त से पहले इसीलिए तो रीते हैं।’ को तरन्नुम से सुनाकर उपस्थित साहित्यकारों को अक्षुण्ण रूप से प्रभावित किया। अध्यक्षीय उद्बोधन में आर पी सोनकर ने ‘आगे कोई राह नहीं है। फिर भी कुछ परवाह नहीं है।’, ‘ बेवफ़ा महलों में रहकर कुछ दिनों/याद उसको मेरा छप्पर आ गया।’ आदि ग़ज़लों की ग़ज़लों की विविध बहरों के माध्यम से तकती प्रस्तुत करते हुए अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि अमित धर्मसिंह एक मंजे हुए शायर है। और शायर के बारे में जैसा कि कहा जाता है कि यदि आपने इश्क़ नहीं किया तो आप अच्छे शायर हो ही नहीं सकते हैं। इन ग़ज़लों के पढ़ने से ज्ञात होता है कि जनाब अमित धर्मसिंह एक इश्क़ और ग़ज़ल को बखूबी समझते है, तभी इन ग़ज़लों में वे दोनों हो भूमिका में खरे उतरते हैं। इन ग़ज़लों में मक़्ता न अपनाकर अमित धर्मसिंह ने इन ग़ज़लों को और भी बड़ा बना दिया है। इसीलिए इस महत्वपूर्ण ग़ज़ल संग्रह बग़ैर मक़्ता के लिए अमित जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। निश्चित ही, यह ग़ज़ल संग्रह दूसरे ग़ज़ल लिखने वालों के लिए एक बड़ी प्रेरणा साबित होगा।” अंत में मदनलाल राज़ ने अपनी सारगर्भित टिप्पणी रखते हुए सभी उपस्थित वक्ताओं, टिप्पणीकारों और साहित्यकारों का धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि “अमित धर्मसिंह नदलेस में एक अभिभावक की तरह हैं। वे सभी को समान रूप से साथ लेकर चल रहे हैं। उनके प्रस्ताव और निर्देशन में आज से लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व आरम्भ हुई ग़ज़लशाला, जो कि आंबेडकरवादी ग़ज़लों के लिए एक प्रयोगशाला की तरह रही, बेहद सफलतापूर्वक तरीके से संपन्न हो गई है। जल्दी ही इसके सार्थक परिणाम देखने को मिलेंगे।”

लोकेश कुमार 

सचिव नदलेस, दिल्ली।

29/12/2025































































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