नदलेस की ग़ज़लशाला-दस, 23 नवंबर, 2025 को राम सनेही 'विनय' के ग़ज़ल संग्रह ठहरे हुए पानी में, पर संपन्न
नदलेस ने किया ग़ज़लशाला दस और स्वतंत्र रचनापाठ गोष्ठी का आयोजन
23 नवंबर,2025 को नदलेस ने अपनी मासिक गतिविधि के तहत राम स्नेही ‘विनय’ के गजल संग्रह ‘ठहरे हुए पानी में’ पर चर्चा की गई। नदलेस के कार्यकारी सदस्यों एवं अन्य साहित्यकार साथियों ने इस आयोजन में बड़े उत्साह के साथ बौद्ध वंदना से शुरू करते हुए गोष्ठी का आगाज किया। गोष्ठी को दो सत्रों में रखा गया। पहले सत्र में गजल संग्रह पर चर्चा की गई। जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में पुष्पा विवेक एवं लोकेश कुमार ने विस्तार से अपने अपने अभिमत रखे। दूसरे सत्र में रचनाकारों ने अपनी अपनी रचनाएं सुनाई। इस गोष्ठी की मेहमान नवाजी सलीमा अतरुबा ने लक्ष्मी नगर,नई दिल्ली स्थित बौद्ध विहार में की। गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. अमित धर्मसिंह ने की एवं संचालन जोगेन्द्र सिंह ने किया। गजल संग्रह पर विचार रखते हुए पुष्पा विवेक ने कहा इस गजल संग्रह का मूल स्वर यद्यपि प्रेम है बावजूद इसके कवि ने सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों को भी अपने मयार में समेटा है। गजल सामाजिक विद्रूपता का खाका खींचती हैं एवं पाठकों पर गहरा असर छोडती हैं। ये समय की धारा के साथ साथ बहती हुई बुनियादी सवालों को उठाती हैं यही कवि की गहरी संवेदनाओं का इजहार है। अगले वक्ता के रूप में लोकेश कुमार ने कहा-गजल संग्रह अपने रूमानियत में सराबोर होने के बाद भी सामाजिक, राजनीतिक विषयों को अंबेडकरी विचारधारा को प्रस्तुत करने में सफल रहा है। हम उम्मीद करते हैं आने वाले समय में अंबेडकारवादी विचारधारा को फैलाने में गजल विधा अपना अहम रोल निभाएगी। साहित्य की सभी विधाओं में दलित सरोकार अपने अनुशासन के साथ उभरकर आएंगी। अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. अमित धर्मसिंह ने कहा कि ग़ज़ल संग्रह में बेशक बहुत सी ग़ज़लें मुसलसल ग़ज़लें हैं लेकिन यह संग्रह अपने आप में ग़ैर मुसलसल संग्रह है। इसमें विषयों की विविधता है लेकिन विचार के संदर्भ में कई अंतर्विरोध भी देखने को मिलते हैं। बावजूद इसके यह संग्रह स्वागत योग्य है।
गोष्ठी के दूसरे सत्र में सभी रचनाकारों ने अपनी-अपनी रचनाओं से माहौल को साहित्यिक परिवेश में बदल डाला। लेखक एवं कवि डॉ पुरन सिंह ने लघुकथा ‘जहर’ से शुरुआत की। माम चंद सागर ने अपनी स्वरचित कविता ‘अनुभूति’ पेश की- ‘मन की गहन गुफाओं में, घने अँधियारे पलते हैं।‘ लोकेश कुमार ने गजल सुनाई-‘लोकतन्त्र के बाजार में इंसाफ बिकता है, सच्चाई का हर लम्हा नायाब बिकता है।‘ ‘बाबा साहब के संघर्षों की दास्तां साथ तो है, हकीकत में हो परोक्ष रूप में मुसीबत तो होगी’ कविता राजवीर सिंह निम ने सुनाई। सलीमा ने ‘ओ पंडत’ कविता का रचना पाठ किया। मदन लाल राज की कविता के बोल कुछ यूं थे –‘ये कवि ये लेखक, ये शायर जितने सारे होते हैं, सब के सब औरतों के मारे होते हैं।‘ राधेश्याम कांसोटिया ने डॉ अमित धर्मसिंह की काव्यात्मक आत्मकथा ‘हमारे गाँव में हमारा क्या है’ को आधार बनाकर लिखी गई क्षणिका कुछ यूं सुनाई-‘ तेरे व्यक्तित्व को यूं जाना- ‘तेरा ये कसूर है कि तू बेकसूर है...।‘ देवराज सिंह ने भीम हुंकार भरते हुए अपनी कविता के बोल यूं प्रस्तुत किए–‘तुम्हें छोड़ भीम कहाँ जाऊँ, और किसको आदर्श बनाऊँ, आज धोखेबाज हैं सब फिर किसके दर पर जाऊँ।‘ डॉ सैयद अली अख्तर नक़वी ने सुनाया- ‘दिल्ली में बसने के लिए, बस यूं ही मत चले आइए, पहले यहाँ कुछ दिन बिताइए, तब ही यहाँ बसने का मन बनाइए।‘ पुष्पा विवेक ने स्त्रीवादी कविता ‘फिर चीख उठी’ एवं ‘कलम’कविता का पाठ किया। पदम प्रतीक ने तरन्नुम से ग़ज़ल कुछ सुनाई-‘जब भी जी चाहा वो मुझको ये सजा देते हैं, नाम आते ही मेरा बज्म से उठा देते हैं।‘ राजपाल सिंह राजा ने सुनाया- ‘हर इक दिल में प्यार हो लाज़मी, यह चाहता हूँ, तुम समझो आदमी को आदमी यह चाहता हूँ।‘ गौतम प्रकाश की कविता- ‘कब तक तुम निरीह जनता के अधिकारों को छीनोगे, क्या अन्न से भूख नहीं मिटती जो मानवता को लीलोगे।‘ ‘चाहने वालो की भीड़ से मिलता नहीं है निर्वाण एकांत का आनंद उठा और सब भूल जा’ ये बोल जोगेन्द्र सिंह के थे। ‘तुम्हारे जाने के बाद और चलता है वह’ दो कविताओं का पाठ डॉ अमित धर्म सिंह ने अपने अध्यक्षीय भाषण के साथ किया। मदन लाल राज ने कवियों का आभार प्रकट करते हुए धन्यवाद ज्ञापन दिया।
रिपोर्ट-
माम चंद सागर (24 नवंबर,2025)
प्रचार सचिव, नदलेस, दिल्ली।
































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