नदलेस ने की ग़ज़लशाला -आठ, जाएं तो जाएं कहाँ, पर ऑनलाइन, 28/09/2025

     

        

डी एल धांधव के ग़ज़ल संग्रह जाएं तो जाएं कहाँ पर हुई परिचर्चा 

कल दिनांक 28 सितंबर 2025 ,नवदलित लेखक संघ द्वारा इसके नव निर्वाचित अध्यक्ष डॉक्टर अमित सिंह जी की अध्यक्षता में "जाएं तो जाएं कहां" ग़ज़ल संग्रह पर परिचर्चा रही। गूगल मीट द्वारा
ग़ज़लशाला 8 के इस सत्र में "जाएं तो जाएं कहां" के लेखक डी एल धाधाव "तारिक " के ग़ज़ल संग्रह पर परिचर्चा हुई जिसमें सदस्यों ने बढ़चढ़ कर भाग लिया।
"तारिक "जी की ग़ज़ल संग्रह पर वक्तागण रहे अब्दुल हक"सहर ",गौतम प्रकाश और अपेक्षित ने अपने अपने अमूल्य विचार रखे।विशेष टिप्पणीकार रहे अग्रणीय और दलित समाज पर लिखनेवाले ग़ज़लकार आर पी सोनकर और मामचंद सागर जी। कार्यक्रम का संचालन लोकेश कुमार के द्वारा हुआ।
धन्यवाद ज्ञापन मदन लाल जी ने किया।कुल मिलाकर यह ग़ज़लशाला भी सफल रही। सबसे पहले वक्तागण गौतम प्रकाश जी ने "तारिक"की जी खोलकर प्रशंसा की और उनके शेर " कौन कहता है मैं तुझसे खफा हूं" से शुरुआत की। गौतम जी ने कहा कि इस शेर पर कुर्बान होने को जी चाहता है। उनके अनुसार "तारिक" की ग़ज़लों में न सिर्फ प्रेम का पुट है बल्कि दर्शनशास्र भी है। उनकी ग़ज़लों में पूरी जिंदगी का निचोड़ है जो उन्हें सीधे अपने पाठकों से जोड़ता है।कवि का शब्द विन्यास और भाषा उम्दा है। इसी क्रम में उन्होंने 
" तारिक"के अन्य शेर भी कहे " दिले जाना ही तो है न जाने कब मचल जाए,
निगाहे करम ही तो है न जाने कब बदल जाए"
अपनी बात आगे बढ़ते हुए गौतम प्रकाश ने कहा कि "तारिक" ने श्रीमती इंद्रा गांधी पर जो ग़ज़ल लिखी है वो भी काबिले तारीफ है। उनके हत्याकांड अक्टूबर 1982 पर उन्होंने एक मार्मिक ग़ज़ल लिखी है जब इस कांड से पूरा देश थर्रा गया था। इस ग़ज़ल का एक शेर "कैसे पहचाने इन मासूम जल्लादों को" अपने में ही पूरी बात कह गया।
फिर एक शेर" फरेब हो दिल में जिनके इनकी नेक नियत नहीं होती" । यह आशायर बताते है कि इस हत्याकांड से वह भी कितने आहत हुए थे।
दूसरे वक्ता अब्दुल हक"सहर" ने अपनी राय बड़ी गूढता से दी। उन्होंने ग़ज़ल की बारीकियों से "जाएं तो जाएं कहां" का अवलोकन किया। "सहर" ने अपनी बात किसी भी रचना को लिखने में सीधे रास्ते से शुरू की। उनका कहना है कि लेखक को अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए टेढ़ा मेढ़ा रास्ता न अपनाकर सीधा रास्ता अपनाना चाहिए।" सहर " जी के अनुसार "तारिक" ने ग़ज़लें लिखते समय ग़ज़लों के पारंपरिक मापदंड का अनुसरण नहीं किया है। उन्होंने बहर अलग तरीके से लिखी हैं जिससे ग़ज़ल की पारंपरिकता खत्म हो गई है। कई ग़ज़लों में पहला शेर किसी विधा में है तो दूसरा शेर अलग विधा में लिखा गया है। तारिक जी को अपनी इस कला पे विशेष काम और मेहनत करनी होगी जिससे वह ग़ज़ल प्रेमियों तक डायरेक्ट पहुंचे। यह कहकर " सहर" ने अपनी बात पूरी की।
इस कड़ी में तीसरे वक्ता मामचंद जी ने अपनी बात बहुत उदारता से रखी।उन्होंने शुरुआत तारिक जी की एक ग़ज़ल से करते हुए उनकी सुगम भाषा को उर्दू हिंदी का संगम बताया।उनके सरल शब्द और सादापन प्रेम और फिर विरह और दर्द से ओत प्रोत हैं। सारी ग़ज़लों में प्रेम रस है पर फिर भी जीवन दर्शन का ज्ञान भी कई ग़ज़लों में सुगमता से दिख रहा है। तारिक जी की ग़ज़लों में ऱदिफ काफिया का संतुलन सुंदरता से किया गया है। लगभग सारी ग़ज़लें प्रेम चाशनी में पकी हुई हैं। "मैं नहीं कोई और है तुम्हारे दिल का शहजादा,
पहले बता देती तो यूं फजीहत न होती।"
इसमें प्रेम और उसकी विफलता का कितना मार्मिक चित्रण किया गया है।
ऐसे ही ग़ज़लों के पारंपरिक रूप प्रेम विरह और मिलन का चित्रण है। एक ग़ज़ल पृष्ठ 80 की उसमें ग़ज़ल स्मृतियों में है। इस ग़ज़ल में प्रेम,बेबसी, उल्फ़त और जुदाई का बेहतरीन संगम है।
इसी क्रम में जनाब आर पी सोनकर आए जिनके कई ग़ज़ल संग्रह छप चुके हैं और वह एक सफल ,वरिष्ठ गजलकार के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं। सोनकरजी ने अपनी बात गजलकार तारिक की हिम्मत और साहस भरे कदम से की। " तारिक" का जज्बा काबिले तारीफ है। उनकी सोच उम्दा है जो उनकी ग़ज़लों में दिखती है। सोनकर जी ने "हक" की बातों से सहमति जताते हुए कहा कि ग़ज़लों में मिस्रा सामी और मिस्रा उला में शेरों का सामंजस्य वजनी नहीं है। बहरों में कमी थी और उन्हें इस ओर काफी काम करना होगा। सोनकरजी ने आगे कहा कि तारिक जी में सुधार की काफी गुंजाइश है वो इस ओर मेहनत करके अपनी पहचान बना सकते हैं। उनका अपने शिल्प विन्यास पर काम जरूरी है। शिल्प के हिसाब से कुछ ग़ज़लें गाई नहीं जा सकती है तो इस ओर काम करे और आलोचनाओं को अन्यथा न लेते हुए उसे पॉजिटिव लें।
इसके पश्चात लेखक ने अपनी रचनाओं के संदर्भ में अपने विचार रखे और कहा कि वह ऐसी पृष्ठभूमि से आते है जहां दूर दूर तक किसी को लेखन में दिलचस्पी नहीं है। कोई उस्ताद या रहनुमा उन्हें आजतक नहीं मिल पाया जिससे वो इसलाह ले पाएं। वह उमर के इस पड़ाव 67 वर्ष में भी एक उस्ताद ढूंढ रहे हैं जो उन्हें और भी परिष्कृत करे। उनमें सुधार की संभावनाएं है और हर बीते वक्त के साथ वो और इंप्रूव करना चाहते हैं।

सलीमा
सह प्रचार सचिव, नदलेस
29/09/2025



































































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