डॉ. अमित धर्मसिंह के काव्य संग्रह कूड़ी के गुलाब का हुआ लोकार्पण 29/12/2024
डॉ. अमित धर्मसिंह के काव्य संग्रह कूड़ी के गुलाब का हुआ लोकार्पण
नव दलित लेखक संघ, दिल्ली के तत्वावधान में लोकार्पण एवं काव्यपाठ गोष्ठी का आयोजन हुआ। गोष्ठी दो चरणों में विभक्त रही। पहले चरण में डॉ. अमित धर्मसिंह के काव्य संग्रह कूड़ी के गुलाब का लोकार्पण हुआ। दूसरे चरण में उपस्थित कवियों का काव्यपाठ हुआ। शाहदरा स्थित संघाराम बुद्ध विहार में आयोजित, गोष्ठी का सफल संयोजन डॉ. गीता कृष्णांगी ने किया। अध्यक्षता बंशीधर नाहरवाल ने की। पहले चरण का संचालन सलीमा ने और दूसरे चरण का संचालन मामचंद सागर ने किया। गोष्ठी में उक्त के अतिरिक्त क्रमशः एदलसिंह, फूलसिंह कुस्तवार, राधेश्याम कांसोटिया, डॉ. ऊषा सिंह, पुष्पा विवेक, बृजपाल सहज, जोगेंद्र सिंह, डॉ. कुसुम वियोगी उर्फ़ कबीर कात्यायन, अरुण कुमार पासवान, शीलबोधि, दिनेश आनंद, डॉ. घनश्याम दास, मदनलाल राज़, राजपाल सिंह राजा, इंद्रजीत सुकुमार, भिक्षु अश्वगोष एवं तेजपाल सिंह तेज (ऑनलाइन) आदि उपस्थित रहे। सर्वप्रथम डॉ. अमित धर्मसिंह ने बताया कि "कूड़ी के गुलाब में दो हजार तीन से दो हजार सत्रह के बीच की एक सौ इक्कीस चुनिंदा कविताओं को संग्रहीत किया गया है। सभी कविताओं को दो चरणों में विभक्त करते हुए बढ़ते कालक्रम में रखा गया है ताकि कविता, कवित्व और विचार के विकासक्रम को आसानी से समझा जा सके। अपना कवि अपनी कविता के अंतर्गत बंधुआ मजदूरी से कविता तक, लिखे गए प्राक्कथन में भी इसका समुचित उल्लेख है।" उन्होंने कूड़ी के गुलाब, एक घर का जलना, देखो, उन्माद, हाथ एक, शीर्षक से कई कविताओं का पाठ भी किया। डॉ. गीता कृष्णांगी ने बताया कि "यह संग्रह दो हजार इक्कीस से प्रकाशनाधीन था। मुझे बेहद खुशी है कि देर से ही सही, आखिर, यह प्रकाशित हुआ। मुझे इसकी एक-एक कविता बहुत-बहुत पसंद है।" उन्होंने, हवा से भरे लोग, प्रेमालाप, ज़मीन का आदमी आदि कविताओं का प्रभावी पाठ किया।
अरुण कुमार पासवान ने कहा कि "मैंने अमित धर्मसिंह की कविताएं इससे पूर्व हमारे गांव में हमारा क्या है! में पढ़ी हैं। इनकी कविताएं पढ़कर मैंने जाना कि जमीन से जुड़ी कविताएं कैसी होती है। प्रस्तुत संग्रह भी उसी तरह की लाजवाब कविताओं का काव्य संग्रह है। अमित जी के काव्य-संग्रह का जो ये शीर्षक है, कूड़ी के गुलाब, इस शीर्षक से मेरी कुछ दोस्ती है। दोस्ती ये है कि मेरा जो पहला काव्य-संग्रह आया, उसका शीर्षक है, अल्मोड़ा के गुलाब। जब वह प्रकाशित और लोकार्पित हुआ तो अल्मोड़ा के कुछ मित्रों ने मुझसे पूछा कि क्या अल्मोड़ा में गुलाब भी होते हैं? मैने कहा कि हां! ये सच्चाई है। मैंने देखा है, लेकिन अल्मोड़ा का गुलाब लिखने का मेरा औचित्य उस सच्चाई से नहीं है, बल्कि मेरा औचित्य उसके प्रतीक से है। उसी तरह ये कूड़ी के गुलाब एक प्रतीक है, जैसा कि लेखक महोदय ने खुद कहा। मुझे लगता है कि हंसने-हंसाने के लिए तो हम कुड़ी और कूड़ी मिला सकते हैं लेकिन जो कोई भी व्यक्ति साहित्य और कविता से जुड़ा हुआ है, वो अगर इसमें कुड़ी भी होता, तो उसे लगता कि यह गलत छप गया है। ये शब्द कूड़ी ही होगा। क्योंकि कुड़ी गुलाब हो सकता है लेकिन जब कूड़ी के है, तो ये कूड़े से ही संबंध रखता है। अमित धर्मसिंह जी का मेरे पास जब नदलेस में आने के लिए आमंत्रण मिला था तो इनकी भाषा से मुझे आकर्षण हो गया था। जब-जब इनके द्वारा संपादित या इनके द्वारा लिखित कुछ भी आता है तो मुझे लगता है कि मैं एक बहुत ही अच्छी जगह से जुड़ा हूं। जहां विचार सिर्फ पनपते नहीं, उनका पल्लवन, पुष्पपण भी बहुत बढ़िया से होता है। उसकी देख रहे भी बहुत अच्छी तरह से होती है। जैसा कि निर्धारित है कि गोष्ठी में कविता भी सुनानी है लेकिन मुझे कुछ जल्दी जाना है, बावजूद इसके कविता सुनाने का मोह, मेरा गया नहीं। इसलिए मैं अमित जी की एक कविता जो कि इसी संग्रह के पृष्ठ बयालीस पर है, उसे सुनाकर विदा लूंगा। कविता शीर्षक से वह कविता है- 'कविता, नहर के उस पानी के समान नहीं, जिसे खुदाई करके निकाला जाता है, वांछित मार्ग से। कविता, झरने के उस पानी के समान है, जो बिना किसी पूर्व सूचना के, फूट पड़ता है, पहाड़ के सीने से, और बह निकलता है, अनिर्धारित मार्ग से।"
शीलबोधि ने कहा कि "मैंने अमित धर्मसिंह जी की कुछ कविताएं पहले भी पढ़ीं थीं और अभी भी पढ़ीं हैं। मुझे उनकी कविताएं मेरी अपनी ही कविताएं लगती हैं। मुझे लगता है कि जो कुछ मुझे लिखना था, वह अमित धर्मसिंह पहले ही लिख चुके हैं। और खुले शब्दों में कहूं तो मुझे ऐसा लगता है, जैसे मेरी ही कविताएं उन्होंने अपने नाम से छपवा ली हों। भला इससे ज्यादा, मैं इन कविताओं के विषय में और क्या कह सकता हूं। वास्तव में अमित जी की कविताओं में जिन प्रतीकों के माध्यम से बातें कही जा रही हैं अगर उन्हें, आदमी कविताओं को पढ़ते हुए देख रहा है तो उसे बड़ा ही आनंद आएगा। और जहां ये कविताएं खत्म होंगी, वहां आदमी आश्चर्य और विस्मृत से खड़ा रह जायेगा कि वाह! क्या बात है। ऐसा उसके मुंह से निकलेगा ही। कविताओं में जिस तरह से बिम्ब बनाया जाता है और जिस तरह शब्दों का विधान खड़ा किया जाता है, वो मुझे एकदम आश्चर्य में डालता है। मुझे लगता है कि कल जब हम न रहेंगे, तब भी ये कविताएं रहेंगी। तब ये इतिहास का एक बड़ा दस्तावेज बनेंगी। और जैसा कि सुनने में आया कि हर एक कविता का एक वास्तविक बिंदु है, जहां से उसकी यात्रा शुरू हुई है तो इन्हीं कविताओं के माध्यम से कल इतिहास लिखा जायेगा कि आज के समय में क्या-क्या घटनाएं हुई थीं। लोग चीजों को कैसे देख रहे थे, कैसे समझ रहे थे। इस दौर की समस्याएं क्या थीं। अमित धर्मसिंह जी ने अपनी कविताओं में जिन बिम्बों और प्रतीकों के विधान की रचना की है, मैं उसके लिए उनको बहुत-बहुत बधाई देता हूं।" उन्होंने एक कविता विमर्शों की लड़ाई का पाठ भी किया।
डॉ. कुसुम वियोगी ने कहा कि "अमित धर्मसिंह जी का ये जो नया कविता संग्रह आया है, निःसंदेह ये एक बेहतरीन काव्य संग्रह है। दरअसल, हम लोग उन्मुक्त कविता को बहुत सहज कविता समझ लेते हैं, जबकि उन्मुक्त कविता या छंदमुक्त कविता इतनी सहज नहीं है, जितना कि हम समझकर चलते हैं। इनकी भी कुछ परंपराएं हैं, कुछ सिद्धांत हैं। आजकल हम बतकही ज्यादा कह रहे हैं, उन्मुक्त कविता के नाम पर। बतकही कविता में बातें ही बातें हैं। लेकिन, जब हम अमित धर्मसिंह की कविताएं देखते हैं या अभी-अभी जो हमने कुछ रचनाएं सुनी, उनसे ज्ञात होता है कि उनकी कविताएं वैसी बतकही नहीं हैं। भगवान बुद्ध ने कहा है कि दो तरह के विचार होते हैं, सांथेटिक और प्रामाणिक। जो सांथेटिक हैं, वो परंपरा से चले आ रहें है, उन्हीं को लिख देना कि जैसे लाल किला, ऐसा है, लाल है, पीला है, काला है, उसके गुम्बद नहीं है, कह दिया और लिख दिया कि ये कविता है। कविता ये नहीं है। कविता के पीछे जो लेखक का मंतव्य होता है वो, कविमन की भावना और यथार्थ के साथ-साथ सार्थक अभिव्यक्ति कविता है। कविता है, जैसे एक झरना। वो नहीं कि नदी की तरह काटा, फीटा और निर्धारित मार्ग से बहा दिया। कविता वह है जो झरने की तरह स्वयं फूटती है। वही वास्तव में कविता होती है जो दिल से फूटकर आती है। अमित जी की कविताएं ऐसी ही हैं। अमित जी का जो ग्राम्य परिवेश है, वो बहुत नजदीक से देखा, परखा और भोगा हुआ है। अन्यथा बहुत सारे लोग गांव में रहकर आते हैं, हम भी गांव में रहकर आएं, लेकिन उस दृष्टि को नहीं पकड़ पाए जिसको अमित जी ने पकड़ा है। यही कारण है कि उनकी कविताओं में भाव, अनुभव, दृष्टि, और अधिक सूक्ष्म रूप में उभरकर सामने आती है। भाषा का, शब्दों का और कविता के शिल्प का जितना सफल प्रयोग अमित धर्मसिंह कर लेते है, वैसा हर किसी के वश की बात नहीं। निश्चित ही, कूड़ी के गुलाब की एक-एक कविता, भाव सिंधु से मथकर निकाले गए मोती के समान है जो संग्रहणीय, पठनीय और विचारणीय हैं।"
तेजपाल सिंह तेज ने ऑनलाइन अपनी टिप्पणी देते हुए कहा कि "ये जो कूड़ी के गुलाब नाम का शीर्षक है, मैं उसको लेकर बहुत ज्यादा उत्सुक रहा। यानी, कूड़ी के गुलाब शीर्षक ने मुझे बहुत प्रभावित किया। यह शीर्षक मुझे इसलिए भी प्रभावी लगा कि मैं तो खुद गांव का रहने वाला हूं। मेरे घर के पीछे एक कूड़ी थी, जिस पर मैं छत से कूद पड़ता था। हमारे घर के पास ही ऊर्जाघर बना रखा था। कूड़ी पर कूदने से कई बार मेरी पिटाई भी हो जाती थी। कूड़ी के गुलाब शीर्षक को अगर व्यापक दृष्टि से लें तो यह पूरे गांव की परिभाषा खोल देता है। पूरे ग्रामीण परिवेश का सबकुछ सामने लाकर रख देता है। मैंने एक बार गांव पर एक ग़ज़ल लिखी थी। (हालांकि गांव पर मैंने काफी कविताएं भी लिखी हैं लेकिन ग़ज़ल मुझे कुछ ज्यादा अच्छी लगती है।) मैंने उस ग़ज़ल में लिखा था कि 'गांव जब-जब भी शहर आता है, मेरा बचपन भी साथ लाता है।' गांव में जब किसी से छेड़खानी हो जाती थी तो भाभी की बड़ी झाड़ पड़ती थी। प्यार में भाभी की झिड़की भी मिलती थी, क्योंकि मैं थोड़ा नटखट था। खैर, ये जो शीर्षक है, मेरे ग्रामीण परिवेश की भी बहुत सारी चीजें सामने रख देता है। जैसे, गांव की रहट है। वह खेती करने की पूरी प्रक्रिया को खोल देती है। इसी तरह ये बहुत बढ़िया शीर्षक मुझे लगा। उसके पीछे मेरी सोच ये थी कि पूरा ग्रामीण परिवेश, इसमें समाया हुआ लगता है। अगर कविता, न भी पढ़े, तो भी अपनेआप में ये शीर्षक पूरी कविता है। जब स्कूल टाइम में हम पढ़ते थे तो मुझे, लेजेंडरी (...) पढ़ने का बड़ा शौक था, जैसे उपन्यास आदि पढ़ना। उस समय एक नाम आता था, संतराम बीए का। संतराम बीए, अपने नाम के साथ बीए इसलिए लिखते थे कि उस समय बीए करना अपनेआप में बहुत बड़ी बात होती थी। उनके एक उपन्यास में एक दृष्टांत पढ़ने को मिला था कि उन्हें अंग्रेजी में एक एस्सेय... लिखने को मिला था। जिसमें उन्होंने सिर्फ एक लाइन लिखी थी कि पॉलिसी इज डिवाइड एंड रूल। उस एक लाइन में ही पूरा एस्सेय समाया हुआ था। ठीक इसी तरह किताब के अकेले शीर्षक में पूरी किताब समाई हुई है। इसलिए, बहुत ज्यादा लिखना जरूरी नहीं। मैं तो कहता हूं कि कविता में ढंग की कोई एक लाइन भी है जाए तो वह कविता मुकम्मल हो जाती है। अच्छा लगता है जब अमित जी जैसे कवि नए-नए बिंबों का खुलासा करते हैं। मैंने भी अपनी एक पुस्तक में अपने ग्रामीण परिवेश के बारे में लिखा था कि किस तरह गांव की गलियों में पानी वानी छिड़का जाता था। ये सब चीजें आज साहित्य में आ रही हैं, लेकिन हम लोग एक-दूसरे की बहुत ज्यादा बुराई करते हैं। कोई किसी की एक लाइन भी सुधारने की कोशिश नहीं करता। दूसरों में गलती ढूंढना बड़ा इजी होता है लेकिन अपनेआप को साहित्य में उतरना बहुत मुश्किल। अमित जी ने यह कार्य बहुत ही सुंदर ढंग से किया है। वे निश्चित ही बधाई के पात्र हैं।"
अध्यक्षता कर रहे बंशीधर नाहरवाल ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि अमित धर्मसिंह एक मंजे हुए कवि है। उनकी पहली कृतियों से भी दलित साहित्य बहुत समृद्ध हुआ है, और आज कूड़ी के गुलाब नाम का भी काव्य संग्रह एक बेशकीमती नग की तरह दलित साहित्य में आ जड़ा है। कहा जाता है कि एक चावल चेक करके पता कर लिया जाता है कि चावल पके हैं, कि नहीं। इसी तरह, कविताओं और वक्तव्यों से जो सैंपल यहां प्रस्तुत किए गए हैं, उनसे सहज ही अंदाजा हो जाता है कि संग्रह बहुत ही उत्कृष्ट बन पड़ा है। जैसा कि कविता के विषय में अरुण पासवान जी ने अमित जी की एक कविता, कविता शीर्षक से ही पढ़कर बताया है कि कविता झरने के उस पानी के समान है जो पूर्व सूचना के फूट पड़ता है, पहाड़ के सीने से। ऐसा मानिए कि अमित जी की ये कविताएं भी ऐसी ही हैं। आज दलित साहित्य अपनेआप में एक महासागर की तरह है, इसमें बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जा रहा है। उसमें कितना पठनीय है, यह सोचने की बात है। संदेह नहीं कि अमित जी का यह संग्रह भी पूर्व के संग्रहों की तरह, कुछ अलग ढंग से दलित साहित्य को समृद्ध करने में सफल होगा। लोग इससे सीखकर दलित साहित्य की रेंज को समझेंगे। सीखेंगे और समाज हित में कुछ करने को प्रेरित होंगे।" इनके अलावा सलीमा ने हाथ-दो शीर्षक से एक कविता का पाठ करते हुए कहा कि कविताओं की एक-एक पंक्ति, इतनी गहरी और लाजवाब है कि उनकी कितनी ही व्याख्या करते चले जाओ। डॉ. ऊषा सिंह ने लानत है शीर्षक से और डॉ. घनश्याम दास ने खाना शीर्षक से भी अमित धर्मसिंह की कविताओं का प्रभावी पाठ किया। तत्पश्चात, पुष्पा विवेक, दिनेश आनंद, इंद्रजीत सुकुमार, एदलसिंह, फूलसिंह कुस्तवार, बृजपाल सिंह, मामचंद सागर, मदनलाल राज़, जोगेंद्र सिंह, आदि ने संग्रह के प्रकाशन की अमित धर्मसिंह जी को बधाई देते हुए, अपनी-अपनी कविताओं का उम्दा पाठ किया। सभी उपस्थित साहित्यकारों का धन्यवाद ज्ञापन गोष्ठी संयोजक डॉ. गीता कृष्णांगी ने किया।
बृजपाल सहज
प्रचार सचिव, नदलेस।
30/12/2024
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प्रेस विज्ञप्ति
डॉ. अमित धर्मसिंह के काव्य संग्रह कूड़ी के गुलाब का हुआ लोकार्पण
नव दलित लेखक संघ, दिल्ली के तत्वावधान में लोकार्पण एवं काव्यपाठ गोष्ठी का आयोजन हुआ। गोष्ठी दो चरणों में विभक्त रही। पहले चरण में डॉ. अमित धर्मसिंह के काव्य संग्रह कूड़ी के गुलाब का लोकार्पण हुआ। दूसरे चरण में उपस्थित कवियों का काव्यपाठ हुआ। शाहदरा स्थित संघाराम बुद्ध विहार में आयोजित गोष्ठी का सफल संयोजन डॉ. गीता कृष्णांगी ने किया। अध्यक्षता बंशीधर नाहरवाल ने की। पहले चरण का संचालन सलीमा ने और दूसरे चरण का संचालन मामचंद सागर ने किया। गोष्ठी में उक्त के अतिरिक्त क्रमशः एदल सिंह, फूलसिंह कुस्तवार, राधेश्याम कांसोटिया, डॉ. ऊषा सिंह, पुष्पा विवेक, बृजपाल सहज, जोगेंद्र सिंह, डॉ. कुसुम वियोगी उर्फ़ कबीर कात्यायन, अरुण कुमार पासवान, शीलबोधि, दिनेश आनंद, डॉ. घनश्याम दास, मदनलाल राज़, राजपाल सिंह राजा, इंद्रजीत सुकुमार, भिक्षु अश्वगोष एवं तेजपाल सिंह तेज (ऑनलाइन) आदि उपस्थित रहे। सर्वप्रथम डॉ. अमित धर्मसिंह ने बताया कि "कूड़ी के गुलाब में दो हजार तीन से दो हजार सत्रह के बीच की एक सौ इक्कीस कविताओं को संग्रहीत किया गया है। सभी कविताओं को दो चरणों में विभक्त करते हुए बढ़ते कालक्रम में रखा गया है ताकि कविता, कवित्व और विचार के विकासक्रम को समझा जा सके।" उन्होंने कूड़ी के गुलाब, एक घर का जलना, देखो, उन्माद, हाथ एक आदि कई कविताओं का पाठ भी किया। डॉ. गीता कृष्णांगी ने बताया कि "यह संग्रह दो हजार इक्कीस से प्रकाशनाधीन था। मुझे बेहद खुशी है कि देर से ही सही, आखिर, यह प्रकाशित हुआ। मुझे इसकी एक-एक कविता बहुत पसंद है।" उन्होंने हवा से भरे लोग, प्रेमालाप, जमीन का आदमी आदि कविताओं का प्रभावी पाठ किया।
अरुण कुमार पासवान ने कहा कि "मैं अमित धर्मसिंह की कविताएं, इससे पूर्व हमारे गांव में हमारा क्या है! में पढ़ चुका हूं। इनकी कविताएं पढ़कर मैंने जाना कि जमीन से जुड़ी कविताएं कैसी होती है। प्रस्तुत संग्रह भी अमित जी की लाजवाब कविताओं से समृद्ध है।" उन्होंने कविता शीर्षक से एक कविता का पाठ भी किया। डॉ. कुसुम वियोगी ने कहा कि "गांव में तो हम भी रहे हैं और वे सारी चीजें हमने भी देखी, जो अमित धर्मसिंह ने देखी लेकिन जो दृष्टि अमित धर्मसिंह के पास है, वह हमारे पास नहीं है। तभी तो उनकी कविता में उनके भाव, अनुभव और दृष्टि बहुत अधिक सूक्ष्म और पैने रूप में सामने आती है।" शीलबोधि ने कहा कि मैंने अमित धर्मसिंह की कुछ कविताएं पहले भी पढ़ीं और अभी भी पढ़ीं। मुझे उनकी कविताएं मेरी अपनी ही कविताएं लगती हैं। मुझे लगता है कि जो कुछ मुझे लिखना था, वह अमित धर्मसिंह पहले ही लिख चुके हैं।" उन्होंने संग्रह की एक कविता विमर्शों की लड़ाई का पाठ भी किया। तेजपाल सिंह तेज ने ऑनलाइन टिप्पणी देते हुए कहा कि "कूड़ी के गुलाब काव्य संग्रह का शीर्षक ही इतना लाजवाब है कि सिर्फ शीर्षक पढ़कर ही पूरी कविता समझ में आ जाती है। यानी अकेला शीर्षक ही गांव का पूरा परिवेश आंखों के सामने उभार देता है।" इनके अतिरिक्त सलीमा ने हाथ दो, डॉ. उषा सिंह ने उन्माद, डॉ. घनश्याम दास ने खाना आदि शीर्षकों से संग्रह की कविताओं का प्रभावी पाठ किया और उन पर सारगर्भित विचार व्यक्त किए। तत्पश्चात, पुष्पा विवेक, दिनेश आनंद, इंद्रजीत सुकुमार, एदलसिंह, फूलसिंह कुस्तवार, मामचंद सागर, मदनलाल राज़, जोगेंद्र सिंह आदि ने संग्रह के प्रकाशन पर अमित धर्मसिंह को हार्दिक बधाई देते हुए काव्यपाठ किया। अध्यक्षता कर रहे बंशीधर नाहरवाल ने कहा कि "इस बेहद लाजवाब संग्रह के लिए डॉ. अमित धर्मसिंह जी निश्चित ही सराहना और बधाई के पात्र हैं।" सभी साहित्यकारों का धन्यवाद ज्ञापन गोष्ठी-संयोजक डॉ. गीता कृष्णांगी ने किया।
प्रेषक :
बृजपाल सहज
प्रचार सचिव, नदलेस
30/12/2024
कुछ विशेष टिप्पणियां
1.
डॉ. पुष्पलता (अधिवक्ता) गाजियाबाद, 10/02/2025
खूबसूरत आवरण ,शीर्षक से सजी अमित धर्मसिंह की ' कूड़ी के गुलाब पुस्तक' मिली। आरंभ में 19पृष्ठ का पारिवारिक- व्यक्तिगत, आर्थिक- साहित्यिक संघर्ष और सफर का संस्मरणातक आत्मकथन है । उसमें लेखक ने स्वयं को ही कूड़ी के गुलाब की तरह अभिव्यक्त किया है। 212पृष्ठ की अतुकान्त रचनाओं में पिता, मां ,ताऊ ,के संघर्ष की अभिव्यक्ति है।पत्नी के समर्पण के प्रति कृतज्ञता है । जमीन के व्यक्ति की संघर्ष गाथा है।आज के अंबेडकर की उपेक्षा है। भीतर का खालीपन है। बंटवारे के बाद का बंटवारा है । छद्म सफलता की होड़ का परिदृश्य है। चिड़िया का गीत है। शब्द का जीवन चक्र है। कूपमण्डूक कवि है। इंसानी भेड़ें और गडरिया है। धुन का पक्का व्यक्ति है । नींव की ईंट है। मंदिर बनाम उद्योग है। भोंकम भोंक है। बात का बतंगड़ है। भगवान और इंसान और ग्लोबल दुनिया का पूरा खुला चिट्ठा सरल साधारण शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है । गुलाब तो गुलाब है चाहे बगिया में खिले या कूड़ी में मगर दोनों का संघर्ष तो सामान्य और सामान नहीं होता । जीवन संघर्ष एक धनाढ्य परिवार और निर्धन परिवार के बच्चे का जीवन संघर्ष जिस तरह भिन्न होता है । उसी प्रकार उच्च वर्ग और निम्न कहे जाने वाले वर्ग की पीड़ाएं संघर्ष अलग होता है। विचारधाराओं का टकराव भी व्यक्ति को अलग- थलग करता है, घुलने मिलने से रोकता है। इंसान को जीने के लिए कितनी बैसाखियां चाहिए होती हैं यही भाव बैसाखियां शीर्षक से अभिव्यक्त हुआ है। इंसान रिश्तों की परिधि के बाहर होते ही असमय मरने लगता है । धीरे - धीरे मर जाता है । बेमौत मरना शीर्षक से अभिव्यक्त हुआ है। ऐसा लगता है लेखक डायरी साथ लेकर चला है जो भी भाव उमड़े उन्हें डायरी में अंकित करता गया है । फिर पुस्तक के रूप में संजो लिया है।एक विद्वान् कवि का विचार भी रचना के रूप में ही अभिव्यक्त होता है। ऐसा ही हुआ है। जीवन के हर पहलू का ही नहीं हर वर्ग, वर्ण ,रंग ,स्तर सोच का खुला चिट्ठा पाठक के सम्मुख खुलता चला जाता है। कूड़ी के गुलाब की समूची आत्मकथा पढ़ने को मिलती है तो बहुरंगी दुनिया की उसके प्रति व्यवहार ,सोच की परतें भी परत दर परत खुलती जाती हैं । अधिकतर रचनाएँ अभिधा में अभिव्यक्त की गई हैं । कुछ व्यंजना में भी हैं । कूड़ी पर उगकर गुलाब निराश नहीं है । उसमें अदम्य जिजीविषा है।
कवि के शब्दों में -
फेंक दो अपने आप को
अपने आप से बाहर
यदि आप सोना हैं तो बीन लिए जाओगे
कूड़ेदान से भी ।
समय का सच भी उधेड़ा है
देखिए -
अपने ही सामने
अपने ही घर से
अपनी ही नेमप्लेट उतरती देख
भरभरा कर ढह गया है
बूढ़े शेर सिंह का अस्तित्व।
अनेक रचनाओं में जीवन का गूढ़ रहस्य और दर्शन छिपा है ।
आलोचक कवि खरपतवार की तरह उगे कवि को भी नहीं छोड़ता
कवि के शब्दों में
साहित्यिक जमीन पर
उपजी खरपतवार ,
भेष बदलता बहुरूपिया ,
ध्यान में बैठा बगुला भगत ,
प्रशंसा के कूप में उछलता मेंढक ,
बार - बार मल त्यागता पेचिस रोगी ,
सबके दर्द का हमदर्द,
न औरत न मर्द,
सच कहता हूं श्रीमान!
यहीं हैं झूठे कवि के सच्चे उपमान।।
समूची व्यवस्था जिस आईने में कच्चे चिट्ठे की तरह खुलती है उसी आईने का नाम है ' कूड़ी के गुलाब '
सहज सरल भाषा- शैली में लिखी गई पुस्तक जिसमें बहुत कुछ सोचने, समझने , संवरने, सुधरने,सुधारने की जद्दोजहद है , जिद है उसका नाम है कूड़ी के गुलाब। पुस्तक रोचक पठनीय है। पुस्तक में और भी बहुत कुछ है पढ़ने समझने को , झंझोड़ने विचारने को ।
लेखक को उसकी अदम्य जिजीविषा को खूबसूरती से अभिव्यक्त करती पुस्तक के लिए बधाई, शुभकामनाएं।"
2.
बंशीधर नाहरवाल, दिल्ली, 25/02/2025
"कूङी के गुलाब" डा.अमित धर्मसिंह का यह काव्य संग्रह है जिसे मुझे भी पढने का अवसर मिला।
एक माली गुलाब की अच्छी अच्छी डंडियों को चुनकर खाद पोषित क्यारी में जमाता है तो कुछ ही समय में वे ही डंडियां पौधा बनकर सुंदर सुंदर पुष्प खिला लेती हैं अपने ऊपर। यह तो होना ही होता है। इसी दरम्यान माली बेकार की डंडियों को कूङी अर्थात कूङे के ढेर में फेंक देता है और वही डांडिया स्वयं ही खाद पानी पा कर पुष्प खिला देती हैं तो आश्चर्य तो होता ही है। ना कोई माली उनकी देखभाल करता है और ना ही खाद पानी डालता है, पर फिर भी वे अपने ही बल बूते पर फूल खिला देती हैं। यही हाल है दलित वंचित समाज के बच्चों का। ना तो उन्हे घर में कोई मार्गदर्शन मिलता है और ना ही उनके गरीब मां-बाप उनके लिए अच्छे स्कूल, ट्यूटर की ब्यवस्था कर पाते हैं, पर फिर भी खङें हो जाते हैं सुविधाभोगी बच्चों के समकक्ष। यही संदेश दिया है डा.अमित ने अपने इस काव्य-संग्रह के माध्यम से। इस काव्य-संग्रह के शीर्षक 'कूङी के गुलाब' की सार्थकता इस कविता से स्पष्ट हो जाती है:
हम!
गमले के गुलाब की तरह नहीं,
कुकुरमुत्ते की तरह उगे।
माली के फव्वारे ने
नहीं सींची हमारी जङें।
हमारी जङों ने पत्थर का सीना चीर,
खोजा पानी कुटज की तरह।
कुम्हार के हाथों ने नहीं गढा,
वक्त के थपेड़ों ने संवारा हमें।
किसी की उंगली पकङने से ज्यादा
हम अपनी ठोकरों से संभले।
हमारी हड्डियों ने कैल्शियम
गोलियों या सीरप से नहीं,
मिट्टी खा कर प्राप्त किया।
जमीन पर नंगे पांव चलते
या तसले में 'करनी' की करङ करङ से
आज भी नहीं किटकिटाते हमारे दांत।
मिट्टी में जन्मे, मिट्टी में खेले,
मिट्टी खा कर पले बढे
इसलिए मिट्टी से गहरा रिश्ता है हमारा।
बेशक!
आसमान का इंद्रधनुष कोई हो,
जमीन पर गुदङी के लाल,
कूङी के गुलाब हम ही हैं।
सबसे बङी बात तो इस काव्य-संग्रह की भूमिका में ही है कि कैसे कैसे थपेडे झेलकर आज डा.अमित इस मुकाम पर हैं, और यही हम में से अधिकांश लोगों के साथ गुजरी है, यही कहानी असंख्य वंचितों व दलितों की है।
डा.अमित ने अपनी इस भूमिका में अपनी पारिवारिक स्थिति का भी उल्लेख किया है जो काफी दयनीय रही है पर अपने ताऊ जी व पिताजी की उस प्रगतिशील विचारों के बारे में भी बताया कि कैसे पुरानी बंधुआ मजदूरी की प्रथा से छुटकारा पा कर स्वतंत्र रूप से अपनी इच्छानुसार काम करना शुरू किया। ऐसी प्रगतिशील सोच से ही तो समाज में जागृति आती है और समाज आगे बढता है।
इस काव्य-संग्रह की हर कविता मार्मिक है, जैसे:
तुम्हारी छोटी बात इसलिए बङी है
क्योंकि तुम उसे ऐसे स्थान से कह रहे हो
जहां छींक मात्र से भी दौङ पङती है
सेवकों की लंगार।
मेरी बात इसलिए छोटी है
क्योंकि मैं उसे ऐसे स्थान से कह रहा हूं
जहां से मेरी उत्कट छींक भी
पत्थरों से टकरा कर
लौट आती है मुझी तक।
वैसे हम दोनों जानते हैं
किसकी बात बङी है
और किसका स्थान।
काव्य-संग्रह की हर कविता का उल्लेख करना तो यहां संभव नहीं है पर उनका हर वाक्य एक संदेश दे जाता है। कविताएं अतुकांत अवश्य हैं पर कविता की अंतिम कङी गहरी चोट कर जाती है और यही एक कविता की सार्थकता होती है। इस सब में डा. गीता कृष्णांगी के योगदान की भी सराहना करनी ही चाहिए और इन दोनों नव साहित्यकारों की जोङी के लिए बहुत बहुत साधुवाद व मंगल कामनाएं।"
3.
जगदीश कश्यप, हिमाचल, 22/04/2025
"यह बहुत सुन्दर, विचारोत्तेजक, भावमय तथा ज़िन्दगी के पड़ावों को उद्घाटित करता काव्य संग्रह है। इन कविताओं को बारम्बार पढ़ते रहने को मन करता है। भावाभिव्यक्ति का अनूठा बचपन से एक प्राध्यापक तक बना देने का कुतुहल छिपा है इन काव्यमय कविताओं में। आप भी पढ़कर देखेंगे तो पढ़ते ही रहेंगे। हार्दिक बधाई🎉🎊🎉🎊🎉🎊 हो एवं शुभकामनाएँ डॉ अमित धर्मसिंह जी। सब्भ मंगलं भवतु।"













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