ग़ज़लशाला-दो, 30/11/2024 को हुई ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी की रिपोर्ट एवं फोटो


(1)          "नव दलित लेखक संघ. दिल्ली के बैनर तले प्रसिद्ध गज़लकार एवं दलित चिंतक इं रूप सिंह रूप के ग़ज़ल हालत ए हाजिरा पर पर शनिवार 30नवंबर 2024 को एक ऑनलाइन गोष्ठी आयोजित की गयी.. गोष्ठी की अध्यक्षता नव दलित लेखक संघ के वर्तमान अध्यक्ष श्री वंशीधर नाहर वाल जी ने की एवं संचालन नद लेस के वरिष्ठ साहित्यकार मामचंद सागर जी ने किया सर्वप्रथम डॉ अमित धर्मंसिंह जी ने इं रूपसिंह जी के विषय में बताते हुए अपनी बात कही उन्होंने बताया कि इं रूपसिंह जी का लेखन केवल ग़ज़ल तक ही सीमित नहीं है बल्कि अन्य हिंदी विधाओं में भी वे सिद्धाहस्त है.. उनका लेखन किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है.. उनकी ग़ज़ल ना केवल संवेदना के स्तर पर अपितु बहर आदि की दृष्टि से भी सही कही जा सकती है.. उनके बाद आर पी सोनकर जी ने प्रस्तुत संग्रह के विषय में एवं ग़ज़ल के विषय में कही अच्छी बाते अपने वक्तव्य में बताई.. एक तो उन्होंने कहा कि गुलाम हुआ करते थे जहां से ग़ज़ल आयी है लेकिन ऐसा नहीं था कि वे उसे छू नहीं सकते थे.. इससे पता चलता है कि दलित साहित्यकारों के लिए जो ग़ज़ल लिखना चाहते है परिस्थितियां कितनी भिन्न एवं चुनौतीपूर्ण है.. दूसरे उन्होंने कहा कि जो अच्छा व्यक्ति होगा या अच्छा व्यक्ति है वह निश्चय ही अच्छा शायर भी होगा और सवेदनशील भी होगा.. इसके बाद उन्होंने दलित साहित्यकारों के लिए शिल्प सम्बंधित आवश्यता एवं अनिवार्यता के विषय में बताया.. साथ ही यह भी कहा कि दलित साहित्यकार बहुत बढ़िया काम करने के बावजूद भी थर्ड क्वीलिटी में गिने जा सकते है. उनके बाद डॉ शिवताज सिंह ताज जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि कविता मात्र शब्दों का जोड़ तोड़ नहीं है वह सत्ता में समाज की जद्दोजहद के साथ अपनी बात कहती है. ग़ज़ल कोई बहर या फउ लून नहीं है बल्कि अपनी बात कहती है..एक बात और आपने बड़ी कमाल की कही है कि जहाँ तक तुम्हारी संवेदना जाती है पीड़ा जाती है वहां तक सवर्ण की बात कभी नहीं गयी।यह बात भवभूति से लेकर आज तक के कवियों के विषय में कही जा सकती है.. शायद जो मानवीय पक्ष दलितों के यहाँ आया है उनके साहित्य में उभरा है जिस पीड़ा और अपमान के कारण उनके अनुभव और संवेदना का निर्माण होता है. वैसी परिस्थितिया सवर्णो के लिए कभी नहीं रही।" -बृजपाल सहज

(2)          "आदरणीय मित्रो बीती रात प्रख्यात साहित्यकार, बेजोड़ नव गीतकार पूर्व ए.जी.एम. इंजिनियर रूपसिंह 'रूप' साहब (आगरा) के ग़ज़ल संग्रह 'हालात ए हाजिरा' पर विस्तार से एक परिचर्चा हुई। इसमें मुझे, सम्मान्य एस.एन. प्रसाद साहब (लखनऊ) तथा आर.पी. सोनकर जी को समीक्षक/ वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया। बहुत सुंदर व सार्थक परिचर्चा हुई। इस संगोष्ठी कीअध्यक्षता श्री बंशीधर नाहरवाल ने की व सुंदर संचालन श्री मामचंद सागर जी ने किया। नव दलित लेखक संघ, दिल्ली के अध्यक्ष डॉ अमित धर्मसिंह जी विशेष धन्यवाद व प्रशंसा के पात्र हैं, जिन्होंने हर विधा की उत्तम कृति के लिए परिचर्चा की सार्थक पहल की है।"
-डॉ. शिवराज सिंह 'ताज'

(3)       "नदलेस दिल्ली एक ऐसी साहित्यिक संस्था है जो निरन्तर अंबेडकरवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने हेतु प्रयासरत है। लगभग प्रत्येक माह किसी न किसी लेखक/पुस्तक की समीक्षा इनके द्वारा किया जाता है। आ0 ई0 रूपसिंह रूप द्वारा रचित गजल संग्रह हालात-ए-हाजिरा की समीक्षा की गई। निसन्देह आप की समीक्षा बेजोड़ रही। समीक्षा में साहित्यकारों की भारी भीड़ ने इस कार्यक्रम में चार चांद लगा दी। कार्यक्रम के मा0 अध्यक्ष एवं मा0 संचालक की कार्यवाही की जितनी प्रशंसा की जाय कम है।
       आ0 डॉ0 अमित धर्मसिंह जी के कुशल नेतृत्व में यह संस्था निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर है। अग्रज ई0 रूपसिंह रूप जी को उनके विशिष्ट गजल संग्रह तथा आप को गहन सार्थक समीक्षा के लिए हार्दिक साधुवाद।"
-एस एन प्रसाद

(4)           "नदलेस
कविताओं का मंच, एक पवित्र रिश्ता 
जहाँ शब्दों से सजती भावनाओं की धरा।  

न भीड़ का शोर, न दिखावे का खेल,  
यहाँ बस दिलों का संगम, सच्चे मेल।  

हर पंक्ति में छिपा है, जीवन का सार,  
हर शब्द में झलके, मन का प्यार।  

ना कोई छल, ना कोई कपट की छाया,  
सिर्फ स्नेह और समझ, हर दिल में समाया।  

जो सुनते हैं यहाँ, वो मन से सुनते हैं,  
भावों के रंग, आत्मा में बुनते हैं।  

हर कविता में दिखती, किसी की दास्तां,  
जो बाँध देती है, सबको एक समान।  

यह मंच नहीं, एक परिवार है जैसे,  
जहाँ हर दिल जुड़ता, एहसासों के धागे से।  

तो आओ यहाँ, सुकून का घर बसाएँ,  
कविताओं के संग, समाज में नया बदलाव लाएं।।"
-ममता अंबेडकर









































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