सोच 3 पर ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी 22/09/2024


नदलेस की वार्षिकी सोच के तीसरे अंक पर ऑनलाइन परिचर्चा

                 नवदलित लेखक संघ, दिल्ली द्वारा प्रकाशित एवं पुष्पा विवेक द्वारा संपादित वार्षिक पत्रिका 'सोच 3' पर दिनांक ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस परिचर्चा गोष्ठी की अध्यक्षता नदलेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष बंशीधर नाहरवाल जी ने की तथा संचालन मामचंद सागर जी ने किया। 'सोच 3' की इस परिचर्चा गोष्ठी में देश के कोने-कोने से लोग जुड़े और अपने विचारों को प्रस्तुत किया। गोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. रामहेत गौतम, डॉ. रंजू राही, कबीर विद्रोही, सुनीता वर्मा 'सांध्य', बाबूलाल तोंदवाल तथा मंजू किशोर रश्मि जी ने 'सोच 3' में प्रकाशित लेखों, कहानियों, कविताओं आदि पर विस्तृत वक्तव्य प्रस्तुत किए। इसके साथ ही तेजपाल सिंह तेज, डॉ. कुसुम वियोगी, डॉ. अमित धर्मसिंह, एस. एन. प्रसाद, कश्मीर सिंह और डॉ. नरेश सागर आदि ने इस पर विशेष टिप्पणियां प्रस्तुत की। इनके अलावा देश भर से जुड़े नदलेस के अन्य कई सदस्यों ने भी सोच 3 में प्रकाशित सामग्रियों पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिकियाएँ प्रस्तुत की। गोष्ठी में देशभर से जुड़े सदस्यों में क्रमश सुषमा भास्कर, हेमलता, हुमा खातून, मदनलाल राज, लक्ष्मीनारायण कुम्भकार 'सचेत', सलीमा, ज्ञानेंद्र सिद्धार्थ, अरुण कुमार पासवान, अजय यतीश, जालिम प्रसाद, फूल सिंह कुस्तवार, जयराम कुमार पासवान, चितरंजन गोप लुकाटी, तेजपाल सिंह 'तेज़', डॉ. गीता कृष्णागी, डॉ. चौहान, डॉ. नाविला सत्यादास, जोगेंद्र सिंह, लोकेश कुमार, अशोक कुमार, प्रमोद कुमार मारोती, ई. रूप सिंह रूप, रामसूरत भारद्वाज, प्रो. कश्मीरी, बौद्ध, कश्मीर सिंह, डॉ. विपुल कुमार भवालिया, खगेन्द्र पांडल, डॉ. धीरज वणकर, डॉ. उषा सिंह, जसवंत सिंह जनमेजय, डॉ. घनश्याम दास, अमित रामपुरी, डॉ. नरेश सागर, हरिश्चंद पांडल, टेकचंद पांडल, ओमप्रकाश गौतम, आर एस आघात आदि गणमान्य साहित्यकार कार्यक्रम में शुरू से अंत तक बने रहे। अंत में सोच 3 के प्रधान संपादक डॉ. अमित धर्मसिंह ने सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया।
डॉ. रामहेत गौतम ने कहा कि "वास्तव में सोच का यह तीसरा अंक बहुत ही बढ़िया बन पड़ा है। अपने नाम के अनुरूप इसमें सामग्री देखने को मिलती है जो संबंधित समाज और साहित्य के लिए अति महत्वपूर्ण है।" रंजू राही ने कहा कि "जिस तरह से इस अंक में नदलेस से जुड़ी बारीक से बारीक जानकारी तक शामिल की गई है, उससे नदलेस की विश्वसनीयता और पारदर्शिता का पता चलता है। बाकी सामग्री भी पठनीय पठनीय होने से अंक संग्रहणीय है।" सुनीता वर्मा संध्या ने सोच में संकलित अनेक कविताओं और कहानियों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए बकरी के दो बच्चे कहानी की विशेष सराहना की। कबीर विद्रोही ने सोच में सभी को अवसर देने और उनकी रचनाओं में परिष्कार करने की भूरि भूरि प्रशंसा की। बाबूलाल तोंदवाल ने कुंडलियो के माध्यम से सोच के अंक की विलक्षण समीक्षा प्रस्तुत की, जिसे सभी रचनाकारों ने मुक्तकंठ से सराहा। मंजू किशोर रश्मि ने भी सोच के आकार प्रकार और संकलित की गई सामग्री की यथाताथ्य विवेचना प्रस्तुत की। कहा कि यह अंक वास्तव में ऐतिहासिक अंक बन पड़ा है। संपादक पुष्पा विवेक ने नदलेस के साथ-साथ, सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त किया। विशेषकर डॉ. गीता कृष्णांगी का आभार किया कि उन्होंने अपने स्थान पर मुझे संपादक दायित्व सौंपा। अध्यक्ष बंशीधर नाहरवाल ने सोच के संपादन सहित, परिचर्चा गोष्ठी को भी बेहद सार्थक बताया और उम्मीद जताई कि हम सब मिलकर इसी तरह नदलेस को समाज हित में रचनात्मक बनाए रखेंगे।

लोकेश कुमार
प्रचार सचिव, नदलेस 
25/09/2024

बाबूलाल तोंदवाल जी द्वारा प्रस्तुत की गई सोच 3 की कुंडली समीक्षा

नदलेस की सोच-3
पुष्पा जी ने सोच के, सम्पादन का काम।
किया बखूबी पूर्ण जो, चमकाया है नाम॥
चमकाया है नाम, आवरण सज्जा सुन्दर।
करके अथक प्रयास, ज्ञान का भरा समुन्दर॥
अमित धर्मसिंह यार, जीत डाली है बाजी।
संपादक अनमोल, ‘सोच’ की हैं पुष्पा जी॥

‘सोच’ बढ़ाती सोच को, लाये बड़ा निखार।
चार चाँद व्यक्तित्व पर, लग जाते हैं यार॥
लग जाते हैं यार, आपको अवसर मिलता।
जुड़ जाते नदलेस, पुष्प ज्यों जीवन ख़िलता॥
कह बाबू कविराय, नाम आकाश चढ़ाती।
बांध एकता सूत्र, सोच फिर सोच बढ़ाती॥

गतिविधियां नदलेस की, लिखी अमित ने खास।
कैसे पाया नाम यह, कैसे हुआ विकास॥
कैसे हुआ विकास, साल दर साल निखारा।
कभी मृदुल अहसास, कभी अनुभव था खारा॥
जीवन के संताप, जोड़ कड़ियों से कड़ियाँ।
दो वर्षी नदलेस, लिखी सारी गतिविधियां॥
 
बड़े सलीके से सजे, हैं पांचों सोपान।
पहला नाम विमर्श का, भरा हुआ है ज्ञान॥
भरा हुआ है ज्ञान, कुरील आर. जी. कहते।
कपट ढोंग पाखंड, भूत भय अब भी सहते॥
गांधी पूना पैक्ट, रहे थे अनुभव फीके।
पुष्पा बहन विवेक, लिखा है बड़े सलीके॥

पोथी अपनी सोच में, बड़ा काव्य सोपान।
कविताएँ जिनकी छपी, सभी बड़े विद्वान॥
सभी बड़े विद्वान, ज्ञान की बातें सारी।
इन कविताओं बीच, दलित की पीर उभारी॥
सारे भरे विमर्श, बात बिलकुल ना थोथी।
आडंबर पाखंड, विरोधी है यह पोथी॥

सबसे उत्तम जो लगा, यार कथा सोपान।
‘बकरी के बच्चे’ पढ़ो, या चाहे ‘ईमान’॥
या चाहे ‘ईमान’, कथाएँ सब कह पाती।
बाबा साहब त्याग, जाति फिर भी ना जाती॥
लगे ‘लाश का बोझ’, तमन्ना इज्जत जब से।
यार कथा सोपान, पढ़ो उत्तम है सबसे॥

रखा हमारे गाँव में, क्या अपना है यार।
आत्मकथा कवितामयी, ‘शोध’ अनीश कुमार॥
शोध अनीश कुमार, लिखी जो अमित कहानी।
किया दूध का दूध, और पानी का पानी॥
अवलोकन ‘दो-सोच’, किया धीरज वणकारे*।वणकर
करना सोच विचार, गाँव क्या रखा हमारे॥

नारनौल, हरियाणा

22/09/2024



























































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