सोच 3 का लोकार्पण एवं काव्य पाठ गोष्ठी 25/08/2024
प्रेस विज्ञप्ति
नदलेस ने किया सोच का लोकार्पण एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन
दिल्ली। नव दलित लेखक संघ, दिल्ली ने सोच वार्षिकी के तीसरे अंक का लोकार्पण एवं काव्य पाठ का आयोजन दिल्ली के मंडोली स्थित महामानव बुद्ध विहार में किया। गोष्ठी का संयोजन नदलेस के सक्रिय सदस्य फूलसिंह कुस्तवार ने किया। अध्यक्षता नदलेस की वर्तमान अध्यक्ष और सोच थ्री की संपादक पुष्पा विवेक ने की एवं संचालन नदलेस की वर्तमान सचिव हुमा खातून ने किया। मंच पर आसीन वक्ताओं और लोकार्पण करने वाले अतिथियों में सोच के प्रधान संपादक डॉ. अमित धर्मसिंह, सहसंपादक मामचंद सागर, डॉ. गीता कृष्णांगी, संपादन सहयोगी सलीमा और लोकेश कुमार, नदलेस के पूर्व अध्यक्ष डॉ. कुसुम वियोगी, बुद्ध विहार समिति के संरक्षक रामलाल मौर्य, साहित्यकार डॉ. सूरजपाल सितम, बौद्धाचार्य अतरसिंह बौद्घ, समाज सेविका धनदेवी, शायर आर. पी. सोनकर एवं कवि देवराज सिंह देव आदि उपस्थित रहे। इनके अलावा गोष्ठी में साहित्यकार मदनलाल राज़, दिनेश आनंद, जोगेंद्र सिंह, बंशीधर नाहरवाल, बृजपाल सहज, श्रीलाल बौद्ध, विजेंद्र सिंह, एम. पी. सिंह, संतराम बौद्ध, प्रेमपाल माथुर, मामराज भारती, शर्मिष्ठा, सविता, भूदा देवी, सीमा देवी, शीला देवी, रामभूली, पुष्पा देवी, जयभगवानसिंह, शकुंतला देवी, अनिता देवी, चंद्रावती, सीमा देवी, धनेश देवी, विक्रांत कुमार, शोभा देवी, पूनम बौद्ध, पद्मा मौर्य, करुणा मौर्य, प्रतिभा देवी, राजेंद्र कुमार, सुनील कुमार, काकी सिंह, सोहन लाल, बुद्ध प्रकाश मौर्य, राजा राम निगम, राजवती देवी, रवि गौतम, सिद्धार्थ मौर्य, पवन कुमार, जिले सिंह, संजय बौद्ध, सोहनलाल बौद्घ, सुरेश चंद्र, संजय रिया, श्रीपाल भारती, विजेंद्र सिंह, मोनू कुमार, अमन कुमार, निम्मी कुमारी, रामसिंह, ज्ञान देवी, हार्तिक कुमार, डूगरसिंह, सुरेंद्र सिंह, चरण सिंह सुमन, प्रेम सिंह मौर्य, पप्पू ठेकेदार, एल. आर. गौतम लाखन और के. लादेवेनी आदि उपस्थित रहे।
गोष्ठी में सर्वप्रथम बुद्ध वंदना की गई, तत्पश्चात सोच का लोकार्पण किया गया। प्रधान संपादक डॉ. अमित धर्मसिंह ने सोच में सम्मिलित सामग्री और सोपानों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सोच का मकसद अपने सभी सदस्यों को समान रूप से छपने के अवसर मुहैया करवाना है। संपादक पुष्पा विवेक ने कहा कि सोच में स्त्रियों की रचनाओं को भी पर्याप्त अवसर दिया जाता है। बात चाहे विमर्श की हो, काव्य की हो, कहानियों की हो, सभी में रचनाकारों ने एक से बढ़कर एक रचना लिखी है। डॉ. कुसुम वियोगी ने कहा कि नदलेस ने और इसकी वार्षिकी सोच ने देश भर के साहित्यकारों को जोड़ने और अवसर देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वहन की है। सहसंपादक मामचंद सागर ने कहा कि सोच में शामिल की गई रचनाएं सिर्फ रचनाएं नहीं बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। सलीमा ने कहा कि नदलेस नवोदित रचनाकारों को अवसर देकर और उन्हें सोच में प्रकाशित करके साहित्यिक रूप से उन्हें बहुत समृद्ध कर रहा है। मेरे खुद के लिए भी नदलेस से जुड़ना रचनात्मक रूप से हितकर रहा है। तत्पश्चात, दिनेश आनंद, जोगेंद्र सिंह, मदनलाल राज़, श्रीलाल बौद्घ, बृजपाल सहज, बंशीधर नाहरवाल, मामचंद सागर, संतराम मौर्य, धनदेवी, डॉ. सूरजपाल सितम, देवराज सिंह देव, अतरसिंह बौद्घ, चरण सिंह सुमन, डॉ. कुसुम वियोगी, पुष्पा विवेक, फूलसिंह कुस्तवार आदि ने बेहतरीन कविताएं प्रस्तुत की। सभी उपस्थित साहित्यकारों और श्रोतागणों का हार्दिक धन्यवाद ज्ञापन गोष्ठी के संयोजक फूलसिंह कुस्तवार ने किया।
लोकेश कुमार
26/08/2024
88023 98441
"नदलेस (नवदलित लेखक संघ) संस्था ऑनलाइन तथा ऑफलाइन रूप में साहित्यिक गोष्ठियों का सफलतापूर्वक आयोजन करती हुई अपने तीन वर्ष पूरे करने जा रही है। इन तीन वर्षों में अपनी "सोच" नामक वार्षिक स्मारिका भी प्रकाशित की है जिसका सोच-3 का चित्र यहां प्रस्तुत है। पूरा प्रयास रहा है कि सभी इच्छुक साहित्यकारों की कृतियों को इसमें स्थान मिले। इस सोच-3 में मेरी दो कविताएं - है नफरत की रीत जहां, तथा मानव वर्गीकरण शीर्षक से प्रकाशित हुई हैं। सोच-2 में मेरी एक लघु कहानी "काल-चक्र" प्रकाशित हुई थी।इसके लिए सम्पादक मंडल को भूरि भूरि साधुवाद।
संस्था के संयोजक डा. अमित धर्मसिंह डा. गीता कृष्णांगी के साथ इस संस्था के संचालन में पूर्ण रूपेण समर्पित हैं। वर्तमान की अध्यक्ष माननीय पुष्पा विवेक तथा संस्था सचिव हुमा खातून जी का भी पूरा सहयोग मिला है। सोच-3 के संपादन के सहयोगी मामचंद सागर जी, सलीमा जी, लोकेश जी को भी बहुत ही साधुवाद। इस संस्था का आरंभ से ही मार्ग निर्देशन करने में वरिष्ठ साहित्यकार डा. कुसुम वियोगी को भी बहुत ही धन्यवाद व साधुवाद।
आने वाले समय में नदलेस ऐसे ही देश भर के साहित्यकारों को समन्वित कर समाज को सही दिशानिर्देश देने का कार्य करती रहे, मेरी कामना रहेगी।"
- बंशीधर नागरवाल
27/08/2024
1.
अमित जी की नई सोच को सलाम।
सशक्त कलम की सोच।
अर्वाचीन कलमकारों की सोच।
सड़ी - गली परम्पराओं को छोड़,
वैज्ञानिक विचार- धारा की सोच।
-मदनलाल राज़, 12/09/2024
2.
सोच ने एक सोच को आकार दिया।
सोच ने सोचने वालों को साथ किया,
सोच की सोच से पाठक वृंद तैयार हुआ
सोच की सोच को कलमकारों ने विस्तार दिया।
-सोरन सिंह बौद्ध, 12/09/2024
3.
शोषक से भिड़ जाना है!
नई "सोच" को फैलाना है!!
कौन कहता है सूटेबल नहीं हम?
दक्ष हैं, ये जमाने को दिखाना है!! -जोगेंद्र सिंह, 12/09/2024
4.
हमारा ,सोच ,एक हो मंजिल हासिल होगा
वरिष्ठों के सानिध्य में कनिष्ठ काबिल होगा
हरीश पांडल, 12/09/2024
5.
सोच सोचकर बनी है यह सोच।
अब अमित इसके आगे की सोच।
बधाई हो। -बंशीधर नाहरवाल, 12/09/2024
6.
नदलेस का सोच-3
++++++++++++
प्रबुद्ध समाज में सोच का बहुत महत्त्व है।और जब सोच रुक जाए तो समाज की गति ही रुक जाती है। अब सोच में अनेक भिन्नताएं भी तो हैं,क्योंकि हर स्तर पर सोच बंटा हुआ है।सोच की निरंतरता ही सही सोच है।दिल्ली से संचालित देशव्यापी साहित्यिक संस्था 'नदलेस' अपने सोच को समय-समय पर प्रकाशित कर उससे प्रबुद्ध समाज को अवगत रखता है।
इस कड़ी में इसका तीसरा प्रकाशन आज मुझे डाक से प्राप्त हुआ।रचनाकार प्रकाशन,वहलना,मुज़फ्फरनगर से प्रधान संपादक डॉक्टर अमित धर्मसिंह,संपादक पुष्पा विवेक,सह संपादक मामचंद सागर और डॉ गीता कृष्णांगी तथा सहयोगी संपादक सलीमा और लोकेश कुमार द्वारा संपादित यह अंक विमर्श,काव्य,कथा,जनमत और नदलेस सोपान में अपने सोच को लेकर आया है। सोचप्रिय पाठकों को इसे पढ़ना अवश्य ही रुचिकर और आवश्यक लगेगा;मेरी तरह।
-अरुण कुमार पासवान
13/09/2024



































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