डॉ. राजन द्वारा संपादित पुस्तक का, 04/08/2024 को हुई लोकार्पण और काव्य गोष्ठी की संक्षिप्त रिपोर्ट और कुछ फोटो





नदलेस ने की लोकार्पण एवं काव्य गोष्ठी

           दिल्ली। नव दलित लेखक संघ ने दिल्ली शाहदरा स्थित संघाराम बुद्ध विहार में लोकार्पण एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया। डॉ. उषा सिंह द्वारा संयोजित गोष्ठी में डॉ. राजन तनवर द्वारा संपादित 'डॉ. अमित धर्मसिंह की कवायमय आत्मकथा हमारे गांव में हमारा क्या है! के विविध पाठ, भाग एक, समीक्षा संकलन' नामक पुस्तक का लोकार्पण एवं काव्य पाठ, उपस्थित साहित्यकारों द्वारा किया गया। पुस्तक के सहसंपादक डॉ. गीता कृष्णांगी और लोकेश कुमार और मूल पुस्तक 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' के लेखक डॉ. अमित धर्मसिंह उपस्थित रहे। गोष्ठी की अध्यक्षता नदलेस के पूर्व अध्यक्ष डॉ. कुसुम वियोगी ने की एवं संचालन लोकेश कुमार ने किया। उक्त के अतिरिक्त गोष्ठी में क्रमशः बृजपाल सहज, राधेश्याम कांसोटिया, भंतेजी थीरो ज्योती, मामचंद सागर, भंते आनंद मेत्रैयी, फूलसिंह कुस्तवार, पवन कुमार गौतम, इंद्रजीत सुकुमार, राष्ट्रपाल गौतम, अखिल कुमार, राजपाल सिंह राजा, हुमा खातून, आर के बौद्ध, सुरेंद्र कुमार बौद्ध, सागवा सिंह और रामखिलारी आदि गणमान्य साहित्यकार उपस्थित रहे।

           गोष्ठी में सर्वप्रथम लोकार्पित पुस्तक पर सहसंपादक लोकेश कुमार ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि किसी भी पुस्तक की सफलता इस बात में अंतर्निहित होती है कि उसे पाठक लगे हाथ ले और मूल पुस्तक को पाठकों ने लगे हाथ लिया है। इसी का सुपरिणाम यह समीक्षित पुस्तक है। डॉ. गीता कृष्णांगी ने कहा कि 2019 से लेकर अभी तक मूल पुस्तक खूब पढ़ी गई है और उस पर लिखा भी बहुत गया है, तभी हमें समीक्षाओं के संकलन के दो भाग बनाने पड़े हैं। डॉ. अमित धर्मसिंह ने काव्यमय आत्मकथा 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' के लिखे जाने की पृष्ठभूमि पर विस्तार से प्रकाश डाला। मामचंद सागर ने कहा कि मूल पुस्तक में लेखक ने बहुत ही गहरी पीड़ा को बड़ी सहजता से उकेरा है। डॉ. कुसुम वियोगी ने कहा कि मूल पुस्तक तो शान और मान का मानक थी ही, उस पर प्रकाशित समीक्षा पुस्तक भी बेहतरीन बन पड़ी है। तत्पश्चात, इंद्रजीत सुकुमार ने एक गजल और एक गीत प्रस्तुत किया- "जिसको अपना सर्वस्व चाहा सौंपना, उनसे ही अस्वीकार मिला।" डॉ. उषा सिंह ने गीत यूं सुनाया - "सच्चा है संविधान देश का आजमाकर देख लो, मिलता सब अधिकार यहां पर आजमाकर देख लो।" डॉ. अमित धर्मसिंह ने दो गज़लें और कुछ टप्पे कुछ यूं सुनाएं - 'फिरता मारा-मारा/ढूंढ रहा तुझको, दिल बनकर बनजारा।, दिल मुझसे ना माने/ तू ही आ जा रे, दिल मेरा समझाने।' सुरेंद्र कुमार बौद्ध ने गीत सुनाया - "बुद्ध की राह पर एक दिन, सारी दुनिया को चलना पड़ेगा। शांति पाना है तो दुख मिटाना है तो पंचशीलों में ढलना पड़ेगा।" इनके अलावा मामचंद सागर ने विरह गीत, बृजपाल सहज ने भाषा की सीमा कविता, राधेश्याम कांसोटिया ने क्षणिका, फूलसिंह कुस्तवार, राजपाल सिंह राजा और राष्ट्रपाल गौतम ने गांव पर आधारित कविताएं, हुमा खातून और लोकेश कुमार ने ग़ज़लें तथा डॉ. कुसुम वियोगी ने श्रृंगार और हरियाली तीज के गीत सुनाकर समा बांध दिया। उपस्थित सभी कवियों और वक्ताओं का यथायोग्य आभार गोष्ठी की संयोजक डॉ. उषा सिंह ने किया।

लोकेश कुमार

05/08/2024


















































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