डॉ.नसीमा निशा के ग़ज़ल संग्रह परवाज़ पर, 28/07/2024 को हुई ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी की संक्षिप्त रिपोर्ट और फोटो





डॉ. नसीमा निशा के ग़ज़ल संग्रह परवाज़ पर हुई परिचर्चा 

          दिल्ली। नदलेस ने अपने द्वारा की जा रही परिचर्चाओं के क्रम में इस माह डॉ. नसीमा निशा के ग़ज़ल संग्रह पर ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी आयोजित की। परिचर्चा में भाग लेने वाले वक्ताओं में डॉ. मो. शाकिर शेख, डॉ. रवि निर्मला सिंह, सलीमा अली और हुमा ख़ातून उपस्थित रहे। विशेष टिप्पणीकारों में आर पी सोनकर, बंशीधर नाहरवाल और डॉ. अमित धर्मसिंह के नाम उल्लेखनीय रहे। लेखकीय मंतव्य और रचनापाठ के लिए परवाज़ ग़ज़ल संग्रह की शाइरा डॉ. नसीमा निशा भी उपस्थित रहीं। अध्यक्षता पुष्पा विवेक ने की और सफल संचालन डॉ. गीता कृष्णांगी ने किया। गोष्ठी में उक्त के अतिरिक्त क्रमशः प्रहलाद दास, डॉ. सुमन धर्मवीर, मदनलाल राज़, जोगेंद्र सिंह, डॉ. खन्नाप्रसाद अमीन, मामचंद सागर, अजय यतीश, जयराम कुमार पासवान, डॉ. राजन कुरुमसरे, आमिर उल्लाह, देवप्रसाद पातरे, जालिम प्रसाद, चितरंजन गोप लुकाटी, जलेश्वरी गेंदले, ज्ञानेंद्र कुमार सिद्धार्थ, बशीर अहमद, बी एल तोंदवाल, फूलसिंह कुस्तवार, समृद्धि सुर्वे, शमीम गाजीपुरी, सुनीता वर्मा और डॉ. विपुल कुमार भवालिया आदि गणमान्य रचनाकार उपस्थित रहे।
          सर्वप्रथम डॉ. अमित धर्मसिंह ने शाइरा डॉ. नसीमा निशा सहित उपस्थित सभी वक्ताओं का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया। तत्पश्चात हुमा ख़ातून ने कहा कि नसीमा की ग़ज़लें रिश्तों को संभालने वाली गहरे अहसास की ग़ज़लें हैं। सलीमा ने कहा कि इस पूरे ग़ज़ल संग्रह में प्यार मोहब्बत की ग़ज़लें अधिक हैं, इन ग़ज़लों में सामाजिक सरोकार अथवा पे बैक टू सोसाइटी वाली भावना कम ही दिखाई पड़ती है। डॉ. रवि निर्मला सिंह ने कहा कि बेशक ग़ज़ल संग्रह में इश्क़ मज़ाजी की ग़ज़लें अधिक हैं लेकिन शाइरा स्त्री के संघर्ष, रिश्तों की अहमियत और सामाजिक चिंताओं से जुड़े अशआर भी अपनी ग़ज़लों में शामिल करती हैं। डॉ. मो. शाकिर शेख ने ग़ज़ल संग्रह की विवेचना करते हुए कहा कि वास्तव में नसीमा जी की ग़ज़लें गहरे अहसास की तो ग़ज़लें हैं ही, साथ ही ये विचार के विस्तार की ग़ज़लें भी हैं। इनका उचित मूल्यांकन होना अभी शेष है। आर पी सोनकर ने कहा कि डॉ. नसीमा निशा पूर्वांचल में काफी मशहूर शाइरा है जो कि इनकी ग़ज़लों से ही संभव हुआ है। बंशीधर नाहरवाल ने कहा कि ग़ज़लें अब प्यार मोहब्बत से आगे बढ़कर सामाजिक मुद्दों को भी उठाने लगी है, जो कि अच्छी बात है। डॉ. अमित धर्मसिंह ने कहा कि सभी लेखकों की अपनी सीमाएं होती हैं इसलिए अपनी सीमाओं का अतिक्रमण न करते हुए भी ये ग़ज़लें साहित्यिक और सामाजिक महत्त्व रखती हैं। डॉ. नसीमा निशा ने नदलेस का आभार प्रकट करते हुए कहा कि सभी वक्ताओं ने संग्रह पर बहुत ही खूबसूरती से बात रखी है, इसके लिए मैं सभी की बहुत शुक्रगुजार हूं। उन्होंने तरन्नुम से एक ग़ज़ल भी प्रस्तुत की। अध्यक्षता कर रही पुष्पा विवेक ने कहा कि संग्रह की अधिकतर ग़ज़लों में एकतरफा प्यार, त्याग और समर्पण जैसे भाव उभरकर सामने आएं हैं, साथ ही बहुत सी ग़ज़लें स्त्री के अधिकार और सामाजिक न्याय की आवाज भी उठाती हैं। उपस्थित सभी रचनाकारों का धन्यवाद ज्ञापन मदनलाल राज़ ने किया।

डॉ. अमित धर्मसिंह
29/07/2024













































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