डॉ.अमित धर्मसिंह द्वारा संपादित कहानी संकलन, क़िस्त (नदलेस द्वारा परिचर्चित कहानियों का संकलन) का लोकार्पण, 12/05/2024, संयोजक : हुमा खातून।

       

       

प्रेस विज्ञप्ति

परिचर्चित कहानियों के संकलन क़िस्त का हुआ लोकार्पण

नदलेस द्वारा परिचर्चित कहानियों के संकलन क़िस्त का लोकार्पण नदलेस के पदाधिकारियों और सम्मिलित कहानिकारों द्वारा शाहदरा स्थित संघाराम बुद्ध विहार में किया गया। गोष्ठी लोकार्पण, काव्य पाठ और सोच के तीसरे अंक को फाइनल करने हेतु रखी गई। अध्यक्षता पुष्पा विवेक और डॉ. कुसुम वियोगी ने संयुक्त रूप से की। संचालन डॉ. गीता कृष्णांगी और हुमा खातून ने संयुक्त रूप से किया। गोष्ठी में उपस्थित कवियों द्वारा काव्य पाठ तथा उपस्थित पदाधिकारियों द्वारा सोच के तीसरे अंक की सामग्री को भी फाइनल किया गया। गोष्ठी में क़िस्त के संपादक डॉ. अमित धर्मसिंह, सहसंपादक डॉ. गीता कृष्णांगी और लोकेश कुमार के अतिरिक्त क्रमशः जोगेंद्र सिंह, आदित्य बौद्ध, मदनलाल राज़, बंशीधर नाहरवाल, फूलसिंह कुस्तवार, हरि प्रकाश बौद्ध, सलीमा अली, भंते जी थीरो ज्योति, राहुल नागपाल, सूबेदार, जितेंद्र कुमार बौद्ध, पवन कुमार गौतम, मदन मोहन, आदित्य सिंह और सिद्धार्थ सिंह आदि गणमान्य रचनाकार उपस्थित रहे।

          कार्यक्रम के आरंभ में डॉ. गीता कृष्णांगी ने कहानी संकलन का संपादकीय पढ़कर सुनाया। तत्पश्चात, पुष्पा विवेक, डॉ. कुसुम वियोगी, संपादक, सहसंपादक, उपस्थित कहानिकारों एवं पदाधिकारियों द्वारा क़िस्त का लोकर्पण किया गया। लोकेश ने संपादकीय श्रम और कहानियों की विशेषता पर संक्षिप्त प्रकाश डाला। डॉ. अमित धर्मसिंह ने संपादकीय दायित्व, विजन और दूरदर्शिता को केंद्र में रखते हुए कहा कि "प्रस्तुत संकलन में दर्ज प्रत्येक कहानी संबंधित कहानीकार द्वारा 'पे बैक टू सोसायटी' की एक क़िस्त है। इसे चुकाने के लिए प्रत्येक कहानीकार अपने-अपने अनुभव की भट्टी में तपा है, अनुभूति और सहानुभूति के तीरों से बिंधा है, विचार शृंखला के दुरूह मार्ग पर चला है, तब कहीं जाकर यह क़िस्त अदा हो पायी है। इन कहानियों में समकालीन कई विमर्श आ समाएं हैं। किन्नर विमर्श, जेंडर विमर्श, ट्रांसजेंडर विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श और इन सबसे बढ़कर दलित विमर्श इन कहानियों का केंद्रीय भाव अथवा 'स्थायी भाव' है। वैसे भी, दलित विमर्श में उक्त तरह के विमर्श समाए ही होते हैं। कहा भी जाता है कि 'दलित विमर्श एक अंबरेला (छाता) है जिसके नीचे अधिकांश विमर्श आ समाते हैं।' यह संकलन भी एक अंबरेला के समान है जिसमें अनेक प्रकार की भावभूमि और विमर्श वाली कहानियां आ समायी हैं। प्रत्येक कहानी संबंधित कहानीकार की रचनाधर्मिता और सामाजिक दायित्वबोध की एक सुगढ़ क़िस्त है। और, इन्हीं बारह परिचर्चित कहानियों की किस्तों को नत्थी कर, नदलेस के साहित्यिक अवदान की यह वृहत और समृद्ध क़िस्त (यानी पुस्तक) तैयार हुई है।" पुष्पा विवेक और डॉ. कुसुम वियोगी ने क़िस्त कहानी संकलन की सभी को बधाई देते हुए संकलन को बहुत ही महत्त्वपूर्ण कार्य बताया। बंशीधर नाहरवाल, फूलसिंह कुस्तवार, जोगेंद्र सिंह, लोकेश कुमार, हुमा खातून, अमित धर्मसिंह, कुसुम वियोगी, पुष्पा विवेक आदि ने काव्यपाठ किया। तदुपरांत सोच के तीसरे अंक की सामग्री को फाइनल किया गया। सभी उपस्थित रचनाकारों का हार्दिक धन्यवाद ज्ञापन गोष्ठी की संयोजक हुमा खातून ने किया।

लोकेश कुमार

सदस्य, नदलेस

13/05/2024









































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