31/03/2024 को हुई ऑफलाइन गोष्ठी की संक्षिप्त रिपोर्ट और फोटो, संयोजक : मदनलाल राज़।
नदलेस की 'नव सृजन नव उल्लास' मासिक गोष्ठी छतरपुर, दिल्ली स्थित, मदनलाल राज़ के संयोजन में उन्हीं के आवास पर सपन्न हुई। गोष्ठी की अध्यक्षता पुष्पा विवेक ने की और संचालन डॉ. अमित धर्मसिंह ने किया। गोष्ठी में डॉ. गीता कृष्णांगी, लोकेश कुमार, मामचंद सागर, बंशीधर नाहरवाल, राधेश्याम कांसोटिया, बृजपाल सहज, नेतराम ठगेला, आर डी गौतम, अरुण कुमार पासवान, गीता कुमारी गंगोत्री, वैभव राज़, इंद्रावती, हेमलता, कमलेश, परिक्षित, डॉ यशवना, काक्षी वाडिया, मेघना सिंह, कार्तिकेय सिंह, मयंक राज़, रेनू, परवीन, लीना, अवनी, मोनिका राज़, अंजली, भारती, रामजी लाल, प्रवीण कुमार, शंभूनाथ, प्रकाश चंद आदि शामिल रहे। मदललाल राज़ के पिताजी स्मृति शेष श्री ठंडी राम लोधवाल जी के निर्वाण दिवस की पूर्व बेला पर आयोजित हुई गोष्ठी में सर्वप्रथम सभी साहित्यकारों एवं परिवारजनों ने श्री ठंडीराम लोधवाल जी को आदर सुमन अर्पित किए। परिवारजनों ने उनकी स्मृति से जुड़े बहुत से अनुभव साझा किए। इस दौरान सभी भावुक रहे। अंत में, दो मिनट का मौन रखा गया। तत्पश्चात, लंच उपरांत काव्य गोष्ठी का आरंभ हुआ।
राधेश्याम कांसोटिया ने कई क्षणिकाएं प्रस्तुत की जिनमें से एक कुछ इस प्रकार रही -"तेरे प्यार के प्रचंड रूप को देखकर/हम इतने भ्रमित हुए कि हम/प्रणय गीत गाते-गाते प्रलय गीत गाने लगे।" बंशीधर नाहरवाल ने राजस्थानी भाषा में गीत कुछ यूं प्रस्तुत किया- "मैं थानै समझाऊं रै भाया/पर थारी समझ में कोनि आवै।" मामचंद सागर के सुगठित विरह गीत की बानगी कुछ इस प्रकार रही- "जो तुमसे छिपी है, वो गीतों में गुथी है/आंखों ने कहा है, कंठ से फूटी है।" गीता कुमारी गंगोत्री ने तरन्नुम से कई रचनाएं प्रस्तुत की। उनके गीत की पंक्तियां इस प्रकार रही- "अच्छे दिन का झांसा देकर, अच्छा फांस लिया है/तिनका-तिनका मारकर तुमने, जिंदा लाश किया है।" बृजपाल सहज ने कई मुक्तक सुनाए, उन्होंने एक मुक्तक में कुछ यूं कहा- "सच कह तो दूं, पर समझता कौन है/इसीलिए बुद्ध मौन है।" मदनलाल राज़ ने अपने पिताजी से जुड़े संस्मरण, कविता और माताजी से जुड़ी कवितायें प्रस्तुत की। उनकी कुछ काव्य पंक्तियां इस प्रकार रही- "मां तुम जब भी याद आती हो/तो आंखों में आसूं भर आते हैं/तेरे दोनों बेटे लेक्चरर हो गए/हम तुम्हें आंखों पर बैठाते हैं।" प्रवीण कुमार और लोकेश कुमार ने दो अन्य प्रतिष्ठित शायरों की गज़लें तरन्नुम से प्रस्तुत की।
डॉ अमित धर्मसिंह ने 'पीठ पर घर' और 'मृत्यु का इतिहासबोध' कविताओं के साथ-साथ चंद गजलों के चंद अशआर भी प्रस्तुत किए। उनकी एक ग़ज़ल का मतला और शेर इस प्रकार रहे- "जवाब जिसका न कोई सवाल कैसा है/मेरे नगर में ये बोलो बवाल कैसा है/ खुद अपनेआप ही फंसने लगे हैं सब पंछी/किसी शिकारी ने फेंका ये जाल कैसा है!" अरुण कुमार पासवान ने अपनी विचारवान और परिवर्तनकामी सशक्त कविताएं कुछ यूं प्रस्तुत की- "तालियां मत पीटना मेरे बोलों पर/क्योंकि किसी तमगे के लिए नहीं लिखता मैं कविताएं!" अध्यक्षता कर रही पुष्पा विवेक ने गोष्ठी के सफल और सार्थक होने पर समुचित प्रकाश डाला। तत्पश्चात 'औरत कमजोर नहीं' और 'मर जाते हैं' शीर्षक से दो कविताएं प्रस्तुत की। उनकी एक कविता की काव्य पंक्तियां कुछ इस प्रकार रही- "साब गरीब के सपने तो सपने ही रह जाते हैं/साब गरीब के सपने तो समय से पहले ही मर जाते हैं।" सभी उपस्थित रचनाकारों का हार्दिक धन्यवाद ज्ञापन संयोजक मदनलाल राज़ ने किया।
डॉ. अमित धर्मसिंह





































































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