30/07/2023 को हुई काव्य गोष्ठी

 


संक्षिप्त रिपोर्ट

नदलेस ने की नव सदस्य सम्मिलन काव्य पाठ गोष्ठी

           नदलेस ने नव सदस्य सम्मिलन काव्य पाठ गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन किया। गोष्ठी की अध्यक्षता पुष्पा विवेक ने की और संचालन डॉ अमित धर्मसिंह ने किया। गोष्ठी में सुनीता कुमारी, फूलसिंह कुस्तवार, राधेश्याम कांसोटिया, डॉ. रवि निर्मला सिंह, गुलफशा सिद्दकी, सुनील कुमार कर्दम, अमित रामपुरी, रेनू गौर, धनदेवी, शेखर पंवार, सुनीता, शीलबोधि, डॉ. सुशीला टाकभौरे, वंदिता कमलेश्वर, डॉ. उषा सिंह, दिनेश आनंद और डॉ. रामप्रताप नीरज नदलेस नव सदस्य आमंत्रित कवि रहे। गोष्ठी में क्रमशः डॉ. गीता कृष्णांगी, जगदीश पंकज, डॉ. सुमन धर्मवीर, अमित रामपुरी, नयन सिंह नयन, ज्ञानेंद्र सिद्धार्थ, जलेश्वरी गेंदले, फूलसिंह कुस्तवार, कश्मीर सिंह, भीष्मदेव आर्य, बृजपाल सहज, कांशीराम, सतीश खनगवाल, रेनू गौर, बंशीधर नाहरवाल, सलीमा, हरीश पांडल, सब्बू मुंतजिर, आर पी सोनकर, सुनीता वर्मा, पवन सागर, योगेंद्र प्रसाद अनिल, चितरंजन गोप लुकाटी, आर एस मीणा, ओमप्रकाश गौतम, डॉ. उषा सिंह, मदनलाल राज़, हुमा खातून, आर एस आघात, जालिम प्रसाद, मामचंद सागर, रामसूरत भारद्वाज, डॉ. विक्रम कुमार, ममता अंबेडकर, प्रदीप कुमार सागर, डॉ. कुसुम वियोगी, राजेंद्र कुमार और दीक्षांत सागर आदि रचनाकार उपस्थित रहे। सभी रचनाकारों का धन्यवाद ज्ञापन मामचंद सागर ने किया।
          डॉ. सुमन धर्मवीर की लोकतंत्र कविता से गोष्ठी का आरंभ हुआ। उन्होंने पढ़ा - "हे! मेरे देशवासियों चाहिए तुम्हें क्या?/मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा और विहार? या शांति, चैन, अमन खुशहाली और हरियाली?/हे! मेरे देशवासियों चाहिए तुम्हें क्या?/हिंदू मुस्लिम दंगे और जाति-पांति में लिपटे डंडे/या रोजी रोटी और काम धंधे?" अमित रामपुरी ने अदम गोंडवी की शैली में कथात्मक कविता कुछ यूं पढ़ी जेड "देखिए तुम गौर से अन्तर, यहाँ इंसानों का/हो व्यवस्था पर गया है, कब्जा तो हैवानों का/राकेश ठाकुर, नत्थू के लड़के, जन्मे थे एक साथ में/खुर्पी, पल्ला, फावड़ा, रहा नत्थू वाले के हाथ में/बैठ ऐसी में शनि बादाम किसमिस खा रहा/गोलू खाये रूखी सूखी, संग खेत पर भी जा रहा।/दूजे किस्म के नागरिक हैं बहुजन इस देश में/फर्क नहीं है कल और आज के परिवेश में।" इनके बाद रेनू गौर ने अपनी कविताएं पढ़ीं। जलेश्वरी गेंदले ने कविता मेरा अभिमान भारतीय संविधान कुछ यूं पढ़ी- "सुबह चिड़ियों की पहली चहकान में/मेरी हर मुस्कान में/मेरे सारे अरमान में/मेरे ठाठ- बाट शान में/बच्चों की बेफिक्री खेल के मैदान में/प्यास के लिए मिले एक बूंद पानी में/भूख लगे तो स्वादिष्ट भोजन में/उड़ने के लिए खुले आसमान में/सांस के लिए मिले ताजी हवा में/मेरी गीत ,गजल स्वतंत्र कविता में/सफर के हर सुविधा में।" इनके बाद फुलसिंह कुस्तवर, कश्मीर सिंह, नयन सिंह नयन ने अपनी कविताएं पढ़ीं।
          बंशीधर नाहरवाल की कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार रहीं -"प्रजा ने राजा को चुना/बङे ही गुरूर से/पर सत्ता मिलते ही राजा ने/प्रजा को ही बना दिया।" इनके बाद सतीश खनगवाल और कांशीराम ने कविताएं पढ़ीं। हरीश पांडल ने पढ़ा -"मंदिरों को चंदा देकर हम/लाठी को तेल पिला रहे हैं/सर पर हमारे ही मारे/उनके हाथों को बल दिला रहे हैं।" इनके बाद सब्बू मुंतजिर और आर पी सोनकर की ग़ज़लें पसंद की गईं। आर पी सोनकर की ग़ज़ल के आसार कुछ इस प्रकार रहे -"दिल वालों के दिल हैं बंजर देखा है/ज़ुल्म का दरिया और समुंदर देखा है।/जूठन ख़ातिर इंसां कुत्ते लड़ते हैं/उफ़ मैंने सौ बार ये मंज़र देखा है।" इनके बाद सुनीता वर्मा की कविता और जगदीश पंकज के नवगीत, योगेंद्र प्रसाद अनिल के हाइकु, ओमप्रकाश गौतम की ग़ज़लें, मदनलाल राज़ की हास्य वयंग्य की कविताएं पसंद की गईं। चितरंजन गोप लुकाटी ने 'गर हम मूतते तो?' कविता कुछ यूं पढ़ी - "मैं पूछता हूँ.../ तुम्हें इतनी बेहयाई और इतनी हिम्मत/ कहाँ से मिलती है?/सत्ता से? विरासत से ? या फिर.../ (नहीं, मैं जाति का नाम नहीं ले रहा है)" इनके बाद आर एस आघात ने कविता पढ़ी। ममता अंबेडकर ने लोक गीत कुछ यूं पढ़ा -"भटकता क्यों फिरे वन वन अरे नादान परदेसी?/ के मां की दूध ने पाला पिता की प्यार ने पाला/बहन की गोद में खेला अरे नादान परदेसी।/ टूट गई बाग की डाली बगीचा हो गया खाली। रो रहा बाग का माली अरे नादान परदेसी।/भटकता क्यों फिरे बन बन अरे नादान परदेसी?" इनके बाद कुसुम वियोगी ने गीतिका पढ़ी। डॉ. अमित धर्मसिंह ने भीड़ एक प्रशिक्षित सेना और पंचों की झुकी हुई कलम शीर्षक से दो कविताएं प्रस्तुत की। अंत में, अध्यक्षीय वक्तव्य के साथ पुष्पा विवेक ने भी स्त्री चेतना की सारगर्भित कविताएं प्रस्तुत की।

डॉ. गीता कृष्णांगी
05/06/2023



































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