डॉ.अमित धर्मसिंह की काव्यात्मक आत्मकथा : 31/10/2023 को हमारे गांव में हमारा क्या है! पर परिचर्चा गोष्ठी की प्रेस विज्ञप्ति और रिपोर्ट

 







प्रेस विज्ञप्ति

डॉ. अमित धर्मसिंह की काव्यमय आत्मकथा 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' पर नदलेस ने की परिचर्चा गोष्ठी  

          दिल्ली। नव दलित लेखक संघ द्वारा आयोजित डॉ. अमित धर्मसिंह की काव्यमय आत्मकथा 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' पर परिचर्चा गोष्ठी बेहद सफल रही। इसकी सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शाम के ठीक सात बजे शुरू हुई गोष्ठी रात्रि के करीब साढ़े ग्यारह बजे तक चली। आमंत्रित वक्ताओं में से डॉ. नीतिशा खलखो, डॉ. खन्नाप्रसाद अमीन, श्रीलाल बौद्ध, ई. रूप सिंह रूप, डॉ. सीमा माथुर, डॉ. मुकेश मिरोठा, डॉ. नाविला सत्यादास और प्रो. दामोदर मोरे ने विस्तारपूर्वक उत्कृष्ट वक्तव्य दिए। एस. एन. प्रसाद, चितरंजन गोप लुकाटी और आर पी सोनकर ने सारगर्भित टिप्पणियों से परिचर्चा को समृद्ध किया। गोष्ठी की अध्यक्षता पुष्पा विवेक ने की और संचालन व धन्यवाद ज्ञापन हुमा खातून ने किया। गोष्ठी के आरंभ में डॉ. गीता कृष्णांगी ने 'हमारे गांव में हमारा क्या है! काव्यमय आत्मकथा के लेखक डॉ. अमित धर्मसिंह का बिंदुवार संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया। तत्पश्चात, आमंत्रित वक्ताओं और टिप्पणीकारों ने विचार प्रस्तुत किए। डॉ. नीतिशा खलखो ने कहा कि "प्रस्तुत आत्मकथा में दलित बचपन की इतनी घनीभूत पीड़ा दर्ज हुई है कि एक-एक कविता को पढ़कर ठहरकर सोचना पड़ता है। मेरे लिए इस आत्मकथा से गुजरना एकदम अलग अनुभव रहा।"

         डॉ. खान्नप्रसाद अमीन ने कहा कि "अमित जी की आत्मकथा में इतने मार्मिक दृश्य हैं कि पढ़कर दिल कांप जाता है। यह केवल डॉ. अमित धर्मसिंह जी की काव्यमय आत्मकथा नहीं बल्कि भारत भर के दलित शोषित, वंचितों की आत्मकथा है।" श्रीलाल बौद्ध ने कहा कि "डॉ. साहब ने आत्मकथा के रूप में हमें एक ऐसा दस्तावेज दिया है जो आने वाले वर्षो में तात्कालिक समय और समाज को समझने में साहित्यकारों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और इतिहासकारों की भरपूर मदद करेगा।" ई. रूप सिंह रूप ने कहा कि "विद्वान लेखक डॉ. अमित धर्मसिंह जी की यह ऐसी काव्यमय आत्मकथा है, जिसमें दर्ज संघर्ष से प्रेरणा लेकर आने वाली पीढ़ी निश्चित ही सफलता की ओर अग्रसर हो सकेगी। इसमें दर्ज बहुत सी चीजों जैसे देशी नुस्खे और घास इत्यादि का इतिहास जीवित रह सकेगा।" डॉ. सीमा माथुर ने कहा कि "सच में यह आत्मकथा हमें बहुत सी ऐसी चीजों से जोड़ने वाली है जिन्हें आज हम भूल चुके थे। इसे पढ़कर मुझे अपने ही बचपन की बहुत सी चीजें याद हो आई, इसलिए इसकी प्रत्येक कविता से मैं अच्छे से रिलेट कर पाई।" डॉ. मुकेश मिरोठा ने कहा कि "हमारे गांव में हमारा क्या है! का फलक वाकई बहुत बड़ा है, इसके बहाने ग्रामीण परिवेश से लेकर दलित जीवन पर बहुत सी बातें की जा सकती हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि डॉ. अमित धर्मसिंह, न सिर्फ उत्कृष्ट साहित्य सृजन कर रहे हैं बल्कि करियर तक को दांव पर लगाकर निरंतर साहित्य और समाज को महत्त्वपूर्ण सेवाएं दे रहे हैं।" 

         डॉ. नाविला सत्यादास ने कहा कि "डॉ. अमित धर्मसिंह की आत्मकथा को पढ़कर निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि अमित जी बेहद प्रतिभावान साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके हैं और इनकी आत्मकथा न सिर्फ दलित साहित्य की बल्कि संपूर्ण साहित्य की पहली काव्यमय आत्मकथा के रूप में दर्ज हो चुकी है।" प्रो. दामोदर मोरे ने कहा कि "डॉ. अमित धर्मसिंह जी की यह काव्यमय आत्मकथा, आत्मकथा के मानक रूप पर भी पूरी तरह खरी उतरती है। इसमें अंबेडकरी चेतना है, चरित्र चित्रण है, संवाद है, प्रकृति चित्रण है, देशकाल और परिवेश का चित्रण है, व्यक्ति चित्र के उत्कृष्ट उदाहरण हैं और हैं दलित जीवन और गांव की यथार्थ कथा। ये सब बातें इसे अपनी ही तरह की अनूठी आत्मकथा बनाती हैं।" इनके अलावा एस. एन. प्रसाद, चितरंजन गोप लुकाटी और आर. पी. सोनकर ने भी सारगर्भित टिप्पणी की। तत्पश्चात, डॉ. अमित धर्मसिंह ने वक्ताओं के प्रति आभार ज्ञापन किया और 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' में से 'खामोशी' कविता का पाठ किया। 

          अध्यक्षता कर रही पुष्पा विवेक ने कहा कि "निश्चित ही अमित जी की यह काव्यमय आत्मकथा काबिले तारीफ है। अमित जी न सिर्फ अच्छे कवि और साहित्यकार हैं बल्कि बहुत अच्छे संगठनकर्ता भी है। इनकी कविता, कार्य और व्यवहार सभी कुछ आकर्षित करने वाला है। देश भर से जुड़े साहित्यकारों ने इतनी देर रात तक उपस्थित रहकर और आत्मकथा की भूरि भूरि प्रशंसा करके साबित कर दिया कि सिर्फ अमित जी की आत्मकथा ही अत्यंत सफल नहीं है बल्कि यह गोष्ठी भी बहुत कामयाब गोष्ठी रही। अमित जी को उनकी आत्मकथा की अपार सफलता के हार्दिक बधाई।" गोष्ठी में उक्त के अलावा क्रमशः दीक्षांत सागर, मामचंद सागर, शीतल डागे, ईश कुमार गंगानिया, नयन सिंह नयन, मदनलाल राज़, अनूपा. एस. एस., डॉ. प्रकाश धुमाल, अरुण कुमार पासवान, डॉ. रविन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. विक्रम कुमार, विक्रम सिंह, डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह, डॉ. धीरज वनकर, बिभाष कुमार, राजेंद्र कुमार राज़, डॉ. सुमन धर्मवीर, ज्ञानेंद्र सिद्धार्थ, बी. एल. तोंदवाल, जोगेंद्र सिंह, बंशीधर नाहरवाल, सीताराम रविदास, राकेश कुमार धनराज, एडवोकेट राधेश्याम कांसोटिया, शकुंतला दीपांजली, ममता अंबेडकर, डॉ. कुसुम वियोगी, जालिम प्रसाद, डॉ. ईश्वर राही, राजेंद्र सिंह, अजय कुमार, अजय यतीश, प्रमिला सोरन, डॉ. सोरन सिंह, यजवीर सिंह विद्रोही, अनिल कुमार गौतम, रेनू गौर, सुनीता वर्मा, अखिलेश कुमार पासवान, सलीमा, सुनील कुमार कर्दम, उमेश राज़, हरीश पांडल, मिस पूजा, नैना प्रसाद, योगेंद्र प्रसाद अनिल, जयराम कुमार पासवान, प्रवीना, डॉ. आशीष दीपांकर, डॉ. मीनाक्षी धोजिया, जोबा मुर्मू, शकुंतला मुंडा, डॉ. उषा सिंह, डॉ. राधा, प्रमोद दास, डॉ. मोहनलाल सोनल मनहंस, बृजपाल सहज, तारा परमार, इंदु रवि, सरोज प्रसाद, सत्येंद्र प्रसाद, डॉ. राजन तनवर, रेखा सिंह, ज्योति पासवान, दिव्याना (...), सेवरल प्रैक्टिनर (...), डॉ. मुकुंद दास, शिवशंकर ओराण, फूलसिंह कुस्तवार, अमित रामपुरी, जितेंद्र चौधरी, हरितोष मोहन, पवन कुमार इंदु, प्रदीप सागर और नीरज सौदाई आदि गणमान्य रचनाकार व साहित्यकार उपस्थित रहे।

- डॉ. गीता कृष्णांगी

01/11/2023



पूरी रिपोर्ट

डॉ. अमित धर्मसिंह की काव्यमय आत्मकथा 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' पर परिचर्चा गोष्ठी
          
          नव दलित लेखक संघ द्वारा आयोजित डॉ. अमित धर्मसिंह की काव्यमय आत्मकथा 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' पर परिचर्चा गोष्ठी बेहद सफल रही। इसकी सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शाम के सात बजे शुरू हुई गोष्ठी रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे तक चली। आमंत्रित वक्ताओं में से डॉ. नीतिशा खलखो, डॉ. खन्नाप्रसाद अमीन, श्रीलाल बौद्ध, ई. रूप सिंह रूप, डॉ. सीमा माथुर, डॉ. मुकेश मिरोठा, डॉ. नविला सत्यादास और प्रो. दामोदर मोरे ने हमारे गांव में हमारा क्या है! पर विस्तारपूर्वक विचार रखे। एस. एन. प्रसाद, चितरंजन गोप लुकाटी और आर. पी. सोनकर ने सारगर्भित टिप्पणियों से परिचर्चा को समृद्ध किया। गोष्ठी की अध्यक्षता पुष्पा विवेक ने की। संचालन व धन्यवाद ज्ञापन हुमा खातून ने किया। गोष्ठी में उक्त के अलावा क्रमशः दीक्षांत सागर, मामचंद सागर, शीतल डागे, ईश कुमार गंगानिया, नयन सिंह नयन, मदनलाल राज़, अनूपा. एस. एस., डॉ. प्रकाश कृष्णदेव धुमाल, अरुण कुमार पासवान, डॉ. रविन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. विक्रम कुमार, विक्रम सिंह, डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह, डॉ. धीरज वणकर, बिभाष कुमार, राजेंद्र कुमार राज़, डॉ. सुमन धर्मवीर, ज्ञानेंद्र सिद्धार्थ, बी. एल. तोंदवाल, जोगेंद्र सिंह, बंशीधर नाहरवाल, सीताराम रविदास, राकेश कुमार धनराज, एडवोकेट राधेश्याम कांसोटिया, शकुंतला दीपांजली, ममता अंबेडकर, डॉ. कुसुम वियोगी, जालिम प्रसाद, डॉ. ईश्वर राही, राजेंद्र सिंह, अजय कुमार, अजय यतीश, प्रमिला सोरन, डॉ. सोरन सिंह, यजवीर सिंह विद्रोही, अनिल कुमार गौतम, रेनू गौर, सुनीता वर्मा, अखिलेश कुमार पासवान, सलीमा, सुनील कुमार कर्दम, उमेश राज़, हरीश पांडल, मिस पूजा, नैना प्रसाद, योगेंद्र प्रसाद अनिल, जयराम कुमार पासवान, प्रवीना, डॉ. आशीष दीपांकर, डॉ. मीनाक्षी धोजिया, जोबा मुर्मू, शकुंतला मुंडा, डॉ. उषा सिंह, डॉ. राधा वाल्मीकि, प्रमोद दास, डॉ. मोहनलाल सोनल मनहंस, बृजपाल सहज, तारा परमार, इंदु रवि, सरोज प्रसाद, सत्येंद्र प्रसाद, डॉ. राजन तनवर, रेखा सिंह, ज्योति पासवान, दिव्याना (...), सेवरल प्रैक्टिनर(...), डॉ. विपुल कुमार भवालिया, डॉ. मुकुंद दास, शिवशंकर ओराण, फूलसिंह कुस्तवार, अमित रामपुरी, जितेंद्र चौधरी, हरितोष मोहन, पवन कुमार, प्रदीप सागर और नीरज सौदाई आदि गणमान्य रचनाकार व साहित्यकार उपस्थित रहे।
          गोष्ठी के आरंभ में डॉ. गीता कृष्णांगी ने 'हमारे गांव में हमारा क्या है! काव्यमय आत्मकथा के लेखक डॉ. अमित धर्मसिंह का बिंदुवार संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि "डॉ. अमित धर्मसिंह का जन्म 18 जून 1986 को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर के कस्बई गांव ककरौली में हुआ। जब ये पांच वर्ष के थे तभी इनका परिवार ननिहाल में आ बसा। इस कारण इनके बचपन और शिक्षा-दीक्षा का अधिकांश हिस्सा मुजफ्फरनगर सिटी से लगे गांव वहलना में बीता। इनका अकादमिक नाम अमित कुमार है। कक्षा 9 में लगातार सत्रह अमित कुमार होने के कारण सबकी हाजिरी उनके पिता का नाम जोड़कर बोली जाती थी, यहीं से इनके नाम में इनके पिता का नाम धर्मसिंह आ जुड़ा और ये साहित्य में इसी नाम से लिखने-छपने लगे। इन्होंने गांव वहलना से आठवीं तक और सिटी मुजफ्फरनगर के एस. डी. इंटर कॉलेज से नवीं से ग्यारहवीं सन 2001 में रेगुलर और राजकीय इण्टर कॉलेज से सन 2006 में बारहवीं प्राइवेट बेसिस से पास की। चौधरी छोटूराम डिग्री कालेज, मुज़फ्फरनगर से सन 2009 में बी. ए. प्राइवेट तथा एस. डी. डिग्री कॉलेज मुजफ्फरनगर से सन 2011 में एम. ए. हिंदी रेगुलर बेसिस से पास की। एम. ए. फाइनल के एग्जाम के साथ ही इन्होंने नेट/जेआरएफ किया और 2012-13 में दिल्ली यूनिवर्सिटी, दिल्ली से पीएच. डी. के लिए प्रवेश किया और सन 2018(जमा)-19 (एलॉट) में पीएच. डी. की डिग्री प्राप्त की। इन्होंने कविता की तुकबंदी कक्षा पांच (1995) से शुरू कर दी थी। कक्षा आठ (1998) से इनकी पहली कविता उपदेश शीर्षक से जनपद के लोकल अखबार सूरज केसरी साप्ताहिक में प्रकाशित हुई। 2003 में ये जनपद की अग्रणी साहित्यिक संस्था वाणी से जुड़े और पहली बार इनकी कविताएं काव्य संकलन उन्नयन (2005) नामक पुस्तक में प्रकाशित हुईं। 2002 में इन्होंने 131 मौलिक छंद वाली पुस्तक लिखी जिसका प्रकाशन 2007 में हुआ। यानी इनकी पहली पुस्तक 2007 में प्रकाशित हुई। 2009 में इस पुस्तक की स्मारिका कवि तुलसी नीलकंठ के संपादन में प्रकाशित हुई। 2009 में ही इन्होंने अपने कवि मित्र तुलसी नीलकंठ के साथ मिलकर रचनाकार प्रकाशन की स्थापना की। सन 2022 तक इससे तीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई। वर्तमान में प्रकाशन कार्य पूरी तरह स्थगित है। इस दौरान ये लोकल कवि सम्मेलन और लोकल मुशायरों में भी कविता और ग़ज़ल प्रस्तुत करने लगे थे। यह क्रम 2003 से 2013 यानी पीएचडी के लिए दिल्ली आ जाने तक चला। 2013 में इन्होंने वाणी संस्था के उन्नीसवें वार्षिक संकलन समन्वय का संपादन किया। पीएच. डी. करने के दौरान भी इनका अतिरिक्त लिखना पढ़ना और थोड़ा बहुत छपना भी जारी रहा। रचनाधर्मिता के विविध आयाम (2017), साहित्य का वैचारिक शोधन (2018), विरले दोस्त कबीर के : एक मूल्यांकन (संपादित, (2018) नामक इनकी तीन पुस्तकें पीएच.डी. के दौरान ही प्रकाशित हुईं। 2016 में इन्होंने 'खेल जो हमने खेले' (लोक खेल और क्रिकेट पर आधारित संस्मरण और वैचारिकी की गद्य पुस्तक) लिखी। दो हजार सत्रह में 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' (दलित बचपन पर आधारित काव्यमय आत्मकथा) लिखी। उक्त दोनों पुस्तकों का प्रकाशन उल्टे क्रम यानी 2019 और 2021 में हुआ। 2020 के लॉकडाउन दौरान इन्होंने कोरोना त्रासदी पर आधारित काव्य संकलन 'कोरोना काल में दलित कविता' संपादित किया। 2021 में दलित लेखक संघ की स्मारिका लिखी जो उसी वर्ष प्रकाशित भी हुई। 14 सितंबर, 2021 को नव दलित लेखक संघ दिल्ली की स्थापना की और 2022 में नव दलित लेखक संघ की वार्षिकी सोच के प्रवेशांक का संपादन किया। इस प्रकार अभी तक ये एक दर्जन से अधिक पुस्तकों का लेखन व संपादन कर चुके हैं। फिलहाल ये दिल्ली विश्वविद्यालय के अतिथि प्रवक्ता के पद को त्यागकर पूरी तरह स्वतंत्र लेखन और नदलेस की रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय हैं।"
         तत्पश्चात उपस्थित वक्ताओं ने एक एक करके अपने विचार व्यक्त किए। सर्वप्रथम डॉ. नीतिशा खलखो ने कहा कि "प्रस्तुत आत्मकथा में दलित बचपन की इतनी घनीभूत पीड़ा दर्ज हुई है कि एक-एक कविता को पढ़कर ठहरकर सोचना पड़ता है। मेरे लिए इस आत्मकथा से गुजरना एकदम अलग अनुभव रहा। सर्वप्रथम मैं इस किताब के डेडीकेशन पर बात करना चाहूंगी, क्योंकि किताब खोलते ही मुझे सबसे पहले इसी ने प्रभावित किया। मुझे लगा कि जिस किताब का डेडीकेशन इतना गहरा और पीड़ादायक है तो उस किताब को तो पढ़कर देखा ही जाना चाहिए। और मैंने किताब को पढ़ना शुरू किया लेकिन मैं किताब पर बोलने से पहले किताब के डेडीकेशन को आपके साथ पहले साझा करना चाहूंगी। डॉ. अमित धर्मसिंह ने इस किताब के डेडीकेशन में लिखा है - "उन तमाम बच्चों को जिनका बचपन किसी उत्सव की तरह नहीं गहरे शोक की तरह बीतता है।" इस डेडीकेशन मात्र से कवि के दुख और उसकी चेतना का अंदाजा लग जाता है। यह सोचते हुए ही मैंने पुस्तक को पढ़ना आरम्भ किया। लेकिन अभी तक भी मैं इसे पूरा पढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाई हूं, क्योंकि डॉ. अमित धर्मसिंह की काव्यमय आत्मकथा में ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े दलित बचपन की इतनी घनीभूत पीड़ा दर्ज हुई है कि एक साथ पूरी पुस्तक को पढ़ना दूभर हो जाता है। एक-एक कविता को पढ़कर रुकना पड़ता है। बहुत-बहुत देर तक सोचना पड़ता है। पढ़ते-पढ़ते मन इतना द्रवित और बेचैन हो उठता है कि पुस्तक बंद करके उस दुनिया में उतरना पड़ता है, जिस दुनिया का ज़िक्र कवि ने अपनी प्रत्येक कविता में किया है। लगता है कि कोई इतना त्रासद जीवन कैसे जी सकता है, और जो कि हकीकत है। एक शब्द का भी झूठ या मिलावट नजर नहीं आती। मैं आदिवासी समाज और जमीन से जुड़ी हुई हूं। मगर मैंने भी अपने जीवन और समाज के लोगों को कम से कम मूलभूत आवश्यकताओं से इस कदर वंचित नहीं देखा और ना ही इतने जटिल संघर्ष से गुजरते देखा है। संग्रह की टाइटल कविता जो 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' प्रश्न खड़ा करती है, उसकी पुष्टि संग्रह की एक-एक कविता करती दिखाई देती है। ज़मीन कविता को लीजिए, लेखक के पिता के नाम ग्रामीण विकास योजना के अंतर्गत अनुदान का मकान तो आता है, मगर वह अपनी निजी जमीन न होने के कारण किसी और के नाम चढ़ा दिया जाता है। जब थोड़ा बहुत जमीन खरीदने की बात चलती है तो उसे लेने से नाना आदि इसलिए इनकार कर देते हैं कि वह प्लॉट तो कब्रिस्तान के समान है। जहां मरे हुए बच्चे और कटड़े दबा करते हैं। सही में कितनी भयावह है, यह स्थिति। भयावह मैं इसलिए कह रही हूं कि हम आदिवासियों को कम से कम जमीन की ऐसी दिल दहला देने वाली तंगी तो कभी नहीं रही। 'नुस्खें' शीर्षक की कविता में कपड़ों में भूरे रंग की जुएं हो जाने का जिक्र आया है। मेरी जानकारी में सिर में जुएं होने की तो बात थी मगर कपड़ों में जुएं मैंने कभी नहीं देखी। बात की प्रामाणिकता के लिए मैंने मां से जब इस बारे में जानकारी मांगी तो उन्होंने कहा कि हां कपड़ों में जुएं हो जाती थीं। मुझे जैसे धक्का सा लगा। यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं अस्सी और नब्बे के दशक की ही तो बात है। इसका मतलब यह हुआ कि अभी भी गांव और देहातों में दलितों के हालत कुछ खास नहीं बदल पाए हैं। क्यों नहीं बदल पाएं हैं, मैं अभी इसकी गहराई में जाना नहीं चाहती। मुझे इसी संग्रह में एक कविता और मिली जो मेरे लिए जानकारी बढ़ाने और दुखद आश्चर्य का विषय रही। वह कविता है 'घास'। इसमें कवि ने एक नहीं पूरे सैंतालीस घासों के नाम गिनाए हैं। मुझे कवि की स्मृति कमाल की लगी। इन घासों के नामों की पुष्टि भी मैंने अपनी मां से पूछकर की। इनमें दर्जनों घासों के नाम तो उन्हें ही याद निकले लेकिन वह भी इतने नाम नहीं गिना पायी जितने कि इस अकेली कविता में कवि ने गिनवाए हैं। इसका मतलब यह हुआ कि कवि का इनसे सीधा रिश्ता रहा है, तभी वह अरसे बाद भी इन्हें याद रख पाया है। मैं बहुत ईमानदारी के साथ कहना चाहती हूं कि अमित जी की कविता दलित साहित्य में ही नहीं बल्कि संपूर्ण साहित्य में बिलकुल नए भावबोध की कविताएं हैं। काव्यमय आत्मकथा लिखने का साहित्य में यह बिलकुल नया और पहला प्रयोग है, जो कि बेहद सफल है। मैं यह भी पूरी ईमानदारी से कहना चाहूंगी कि इस काव्यमय आत्मकथा की एक-एक कविता विस्तृत कैनवास लिए हुए है, जिन्हें शिद्दत से महसूस करने, समझने और उन पर अभी बहुत काम करने की पुरजोर आवश्यकता है।"
         डॉ. खान्नप्रसाद अमीन ने कहा कि "अमित जी की आत्मकथा में इतने मार्मिक दृश्य हैं कि पढ़कर दिल कांप जाता है। यह केवल डॉ. अमित धर्मसिंह जी की काव्यमय आत्मकथा नहीं बल्कि भारत भर के दलित शोषित, वंचितों की आत्मकथा है। इस  काव्यमय आत्मकथा में दलित कविता का एकदम नया मुहावरा प्रयोग हुआ है। काव्य में आत्मकथा इससे पहले देखने में नहीं आई है। जैसा कि मैंने कहा कि इसमें इतने मार्मिक दृश्य हैं कि पढ़कर दिल कांप जाता है। बहुत सारे ऐसे प्रसंग हैं जिन्हें पढ़कर आँखें भर आती हैं। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस गांव में कवि रहता है उसमें अपना कहने के लिए कुछ भी नहीं, और यह हालात केवल कवि के गांव के ही नहीं देश भर में दलितों की कमोबेश यही स्थिति है। आज भी उनके पास रहने को घर की तो क्या खाने तक की भी कोई व्यवस्था नहीं; शिक्षा की तो बात ही छोड़ दीजिए। देश के अधिकतर गांवों मे दलितों के पास, न खेत खलियान है और न रहने खाने की अच्छी सुविधा है। डॉ. अंबेडकर के समय में भी बहुत हद तक यही हालात थे, तभी उन्होंने दलितों से कहा था कि शहरों की ओर बढ़ों। बावजूद इसके, आजादी के इतने वर्षों बाद भी दलितों के हालात कुछ अधिक बदले नहीं हैं। तभी तो अमित धर्मसिंह (जो कि अस्सी नब्बे के दशक में बच्चे थे) भी इतनी जटिल परिस्थितियों से गुजरे। आत्मकथा की एक-एक कविता इसका जीता जागता उदाहरण है। पीड़ा का एक समंदर इन कविताओं में मौजूद है। बचपन के पकवान में मां के रोटी न बनाने की समस्या हो या स्कूल में भूखे पेट जाने की विडंबना हो, स्कूल में ड्रेस पूरी न होने पर प्रार्थना में छुपकर खड़े होना हो या समय से फीस न जमा होने पर स्कूल से निकाल दिया जाना हो, सभी कुछ बहुत हृदय विदारक दृश्य उत्पन्न करने वाला है। वैसे तो संग्रह की सभी कविता हृदय को छूने वाली हैं लेकिन काली नदी, किस्से और सिकंजा कविता के संदर्भ मैं अलग से कहना चाहूंगा। काली नदी में नदी के प्रदूषित होने की बात कवि ने बड़े ही बेहतरीन ढंग से उठाई है। वो कहते हैं कि जो नदी पहले नहाने-धोने और पानी पीने के काम आती थी, अब इसमें लेट्रिंग के सख्त गुल्ले और नारियल पानी के खाली खोके तैरते रहते हैं। किस्से में जो तीन चार किस्से दर्ज किए गए हैं, उन्हें पढ़कर रूह कांप जाती है। बात चाहे भट्टे के आवे में लड़के का सरका दिये जाने की हो, नाली के पानी में डूबकर मरने वाले बेद्दू की हो, शिकंजे में पैर फंसा चुके राहगीर की हो, सभी बड़ी भयावह घटनाएं हैं। सिकंजा कविता में राहगीर के पैर में फंसे शिकंजे के बारे में कवि का कहना एकदम उचित है कि यह सिकंजा हमें अपने पांव में फंसा महसूस होता। बरसात कविता के साथ-साथ प्रलाप कविता भी दिल दहला देने वाली कविता है। कवि ने जिस प्रकार अपनी अपाहिज बहन और चार पांच साल के पिन्नू भाई के असमय मरने का शाब्दिक खाका खींचा है, यह मानिए कि दिल भीतर तक कराह उठता है। डॉ. अमित धर्मसिंह ने वास्तव में दलित कविता को बहुत ऊंचाई प्रदान की है, काव्य में आत्मकथा लिखने का उनका यह प्रयोग अत्यंत सफल और प्रेरणा देने वाला है; ऐसा इसलिए कि यह सिर्फ भाई अमित धर्मसिंह की ही आत्मकथा नहीं देश भर के दलितों बहुजनों की आत्मकथा है।" 
          श्रीलाल बौद्ध ने कहा कि "डॉ. साहब ने आत्मकथा के रूप में हमें एक ऐसा दस्तावेज दिया है जो आने वाले समय में संबंधित समय और समाज को समझने में साहित्यकारों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और इतिहासकारों की भरपूर मदद करेगा। यह आत्मकथा अपने आप में बिलकुल नए किस्म का प्रयोग है। इसमें किसी प्रकार का शैल्पिक आडंबर नहीं रचा गया है। दिल से निकली सीधी सपाट कविताएं पाठक के दिल में सीधे उतर जाती हैं। मुझे इन कविताओं की भाषा ने बहुत प्रभावित किया है। इनकी भाषा असल में उस क्षेत्र या उस जमीन की भाषा है जिसे मैं दोआबा कहता हूं। पश्चिम उत्तर प्रदेश यानी दोआबा का यह क्षेत्र कृषि और साहित्य दोनों के लिए ही बखूबी जाना जाता है। पश्चिम उत्तर प्रदेश के प्रमुख जिले मुजफ्फरनगर के दो गांवों (ककरौली में जन्में और ननिहाल गांव वहलना में पले बढ़े) में कवि अमित का बचपन बीता। वहीं के सामाजिक परिवेश और दलित जीवन की त्रासदी का उत्कृष्ट और मार्मिक चित्रण हुआ है इन कविताओं में। वैसे तो यह चित्रण, कहने के लिए कवि अमित धर्मसिंह के बचपन से संबधित रहा है लेकिन कविताओं में यह इस तरह अभिव्यक्त किया गया है कि वह समस्त वंचितों, दलितों और शोषितों से संबंधित हो गया है। असल में, हमारे गांव में हमारा क्या है! के माध्यम से कवि केवल यह नहीं बताना चाहते हैं कि सिर्फ गांव में हमारा कुछ नहीं है बल्कि वह जीवन की हर सच्चाई से रूबरू कराते हैं कि कैसे भारतीय ग्रामीण परिवेश में विशेष जाति और वर्ग के लोग जीवन की मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहते हैं और वे पूरा जीवन विवशता में जीते हैं। कहना चाहिए कि भारत में सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक, शैक्षिक रूप से वंचित समुदाय किस तरह हाशिए पर अपना जीवन व्यतीत करता है, इसका चित्रण कवि ने पूरे काव्य में व्यक्त किया है। संग्रह की प्रत्येक कविता में वंचित वर्ग की जो दुर्दशा जो दिखाई गई है वह यथार्थ के करीब ही नहीं, बल्कि पूरी ईमानदारी से दर्ज की गई सच्चाई है। निश्चित रूप से 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' काव्य आत्मकथा एक दलित जीवन और सामाजिक त्रासदी का प्रतिनिधि दस्तावेज के रूप में जाना जायेगा।" 
          ई. रूप सिंह रूप ने लिखित समीक्षा का शब्दशः वाचन किया। उन्होंने कहा कि "विद्वान लेखक डॉ. अमित धर्मसिंह जी की यह ऐसी काव्यमय आत्मकथा है, जिसमें दर्ज संघर्ष से प्रेरणा लेकर आने वाली पीढ़ी निश्चित ही सफलता की ओर अग्रसर हो सकेगी। इसमें दर्ज बहुत सी चीजों जैसे देशी नुस्खे और घास इत्यादि का इतिहास जीवित रह सकेगा। बचपन में ऐसी विषम एवं बाधा व कठिनाइयों से भरी परिस्थितियों से गुजरते हुए भी लेखक ने अपना अध्ययन बखूबी जारी रखा और पूर्ण किया। आज आप पीएचडी करके दिल्ली विश्वविद्यालय में अस्थायी अध्यापन और स्वतंत्र लेखन से जुड़े हैं। कहा जाता है कि सोना तपकर निखरता है। वही दशा लेखक के साथ रही। आप दलित वर्ग के गरीब-गुरबों के बच्चों के लिए अनुकरणीय है। आदर्श हैं। मुझे विश्वास है कि कोई भी बच्चा जो विषम व कठिन हालातों में रह रहा होगा, आपकी आत्मकथा पढ़कर साहस व आत्मविश्वास से भर जायेगा तथा अपने कार्य में शत-प्रतिशत सफलता हासिल कर लेगा। इस काव्यमय आत्मकथा ने डा० अमित धर्मसिंह को दलित साहित्यकारों की अगली पंक्ति में खड़ा कर दिया है। ये एक विडम्बना ही है कि सवर्ण साहित्यकार प्रकृति पर, बादल-वर्षा पर, नायक-नायिकाओं पर, खूबसूरत वादियों पर, नदी-झरनों पर, चाँद-तारों इत्यादि पर ढेर सारा लिखने में व्यस्त रहते हैं। ये ऐसे विषय हैं जिनका ग़रीबी से, शोषण से, अन्याय से अत्याचारों से, उत्पीड़न से, ऊँचनीच व छुआछूत से, अभावग्रस्त ज़िंदगी से, ग़ुलामी से, बेगारी से, जुल्म-ज़्यादतियों से, अपमान व तिरस्कार इत्यादि बहुत से मसलों से कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि उन्होंने दलित जीवन को कभी जिया ही नहीं। इसलिए दलित साहित्यकारों ने इन विषयों पर कलम चलाने का बीड़ा उठाया है। वे इन विषयों से बुरी तरह प्रभावित हैं क्योंकि ये सीधे-सीधे उन्हीं के जीवन से सम्बंधित हैं। डा० अमित धर्मसिंह जी ने इन्हीं विषयों पर लिखना अपना कर्तव्य समझा है और लिखते रहते हैं। इसी कड़ी में अपनी काव्यात्मक आत्मकथा ‘हमारे गाँव में हमारा क्या है!’ लिखकर उन्होंने मील का एक पत्थर गाड़ दिया है।" 
          डॉ. सीमा माथुर ने कहा कि "सच में यह आत्मकथा हमें बहुत सी ऐसी चीजों से जोड़ती है जिन्हें हम आज भूल चुके थे। मैंने इस किताब को वाकई बहुत एंजॉय किया। इसे पढ़कर मुझे अपने ही बचपन की बहुत सी चीजें याद हो आई, इसलिए इसकी प्रत्येक कविता से मैं अच्छे से रिलेट कर पाई। वास्तव में, डॉ. अमित धर्मसिंह अपनी काव्यमय आत्मकथा पढ़कर हम अपने बचपन में पहुंच जाते हैं। बहुत सी ऐसी चीजें स्वयं ही याद आने लगती हैं, जिनसे हमारा भी सीधा संबंध रहा होता है। मुझे ऐसी कई कविताएं मिली जिनके माध्यम से मैं अपने बचपन में पहुंच गई। जैसे इसमें एक कविता है 'पढ़ाई के रौब' जिस तरह इस कविता में किताब के नीचे गिरने पर माथे से लगाना और किताबों में गुड्डी यानी मोर पंख या चिड़िया के पंख रखनकर विद्या के बढ़ने का इंतजार किया जाना अथवा बात-बात में विद्या की कसम खाई जाना आदि बातों का हुबहू उल्लेख किया गया है। ठीक वैसे ही, अपने बचपन में मैंने ही क्या, हम सभी ने अवश्य किया होगा। एक कविता इसमें 'अद्दा' शीर्षक से लिखी गई है। इसमें किराए पर साइकिल लेकर चलाने का बड़ा रौचक वर्णन किया गया है। वाकई उस समय किराए पर साइकिल लेकर चलाना सीखा जाता था। पचास पैसे में घंटे भर के लिए मिला करती थी साइकिल। 'शौक' कविता में वीसीआर के प्रति बच्चों के पागलपन का सटीक उल्लेख किया गया है। ऐसा ही होता था। उस दौर में सभी बड़े-छोटे लोग वीसीआर देखने के दीवाने होते थे। 'काली नदी' कविता प्रकृति के साथ हुई छेड़छाड़ को पूरी गंभीरता से दर्ज करती है। इस कविता में काली नदी के दिन प्रति बिगड़ते गए स्वरूप पर यथोचित प्रकाश डाला गया है। काली नदी में कवि ने लिखा है कि "कभी काली नदी में पड़ा हुआ पैसा भी दिखा करता था/ उस समय वह नाम की काली नदी थी।/ मगर अब इसमें सख्त लेट्रिंग के गुल्ले और नारियल पानी के खाली खोके तैरते रहते हैं।/ कहने का मतलब यह है/कि काली नदी का पानी अब/ पीने के तो क्या/नहाने या नदी पार करने तक के लायक नहीं रह गया है।" कहा जा सकता है कि कवि ने, न सिर्फ अपने बचपन की त्रासदियों का बखूबी वर्णन किया है बल्कि समाज और प्रकृति के बदलाव पर भी सटीक तौर से कलम चलाई है। कुल मिलाकर, 'हमारे गांव में हमारा क्या है!', ग्रामीण दलित जीवन, समाज और प्रकृति का वृहत आख्यान बन पड़ा है।" 
         डॉ. मुकेश मिरोठा ने कहा कि "हमारे गांव में हमारा क्या है! का फलक बहुत बड़ा है, इसके बहाने ग्रामीण परिवेश से लेकर दलित जीवन पर बहुत सी बातें की जा सकती हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि डॉ. अमित धर्मसिंह, न सिर्फ उत्कृष्ट साहित्य सृजन कर रहे हैं बल्कि करियर तक को दांव पर लगाकर निरंतर साहित्य, संगठन और समाज को भी महत्त्वपूर्ण सेवाएं दे रहे हैं। हम सब जानते हैं कि आज के समय में यह काम, कम जोखिम भरा नहीं है। फिर भी अमित धर्मसिंह पूरी मस्तैदी से साहित्य और समाज की सेवा के लिए क्षमता से बढ़कर रचनात्मक प्रयास कर रहे हैं। बल्कि यह कहिए कि एक नई यानी तीसरी पीढ़ी को बेहतरीन ढंग से तैयार कर रहे हैं। यह हम सबके लिए प्रेरणीय और ऊर्जा देने वाला है। जहां तक बात 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' की है तो यह बेहद प्रासंगिक कृति है। इसका इस कदर प्रासंगिक होना एक तरफ जहां खुशी की बात है वहीं दूसरी तरफ चिंता का विषय भी है। ऐसी हृदय विदारक रचनाओं का सामने आना दर्शाता है कि समाज में दलित तबका आज भी किस हालत में जीवन यापन करने को मजबूर है। उसे जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं तक के लिए रात-दिन जूझना पड़ रहा है। एक तरफ हम चांद पर चंद्रयान थ्री मिशन भेज रहे हैं और दूसरी तरफ दलित बच्चे रोटी तक को तरस रहे हैं। भारत में यह दो तरह के जीवन की बहुत बड़ी और गहरी खाई होने से अमित धर्मसिंह की काव्यमय आत्मकथा शब्दशः प्रासंगिक साबित हुई है जो चिंता का विषय भी है। हम नहीं चाहते कि जिस तरह के कारुणिक हालात 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' में दर्ज किए गए हैं, वे अब देश के किसी भी कोने में बने रहें। जिस दिन दलितों, शोषितों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हालात बदल जायेंगे। उस दिन अमित धर्मसिंह जैसे भावप्रवण कवि को यह नहीं कहना पड़ेगा कि 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' यह मानिए कि इसी के लिए तो हम सब लिख-पढ़ रहे हैं और अमित धर्मसिंह की ऐसी हृदय विदारक रचनाएं सामने आ रही हैं जो चीख चीख कर सामाजिक परिवर्तन की आवाज बुलंद कर रही हैं। मुझे उम्मीद है कि एक दिन दलितों की दशा व दिशा  में बदलाव जरूर होगा और उस दिन अमित धर्मसिंह की काव्यमय आत्मकथा 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' अप्रासंगिक हो जायेगी। और, यह इस कृति की सबसे बड़ी सफलता होगी।" 
         डॉ. नाविला सत्यादास ने कहा कि "डॉ. अमित धर्मसिंह की आत्मकथा को पढ़कर निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि अमित जी बेहद प्रतिभावान साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके हैं और इनकी काव्यमय आत्मकथा न सिर्फ दलित साहित्य की बल्कि संपूर्ण साहित्य की पहली काव्यमय आत्मकथा के रूप में दर्ज हो चुकी है। इस कृति में गांव का जो यथार्थ दिखाया गया है, वह रूह कंपा देने वाला है। मैं अपनी बात करूं तो मैं बहुत अधिक गांव में नहीं रही। गांव मैंने देखे जरुर हैं। ननिहाल के गांव में भी कुछ दिन बिताएं, मगर मेरा सामना इन जटिलताओं से कभी नहीं हुआ जो कि अमित धर्मसिंह ने अपने गांव में भोगी। लेकिन इस किताब को पढ़कर मैं गांव को ठीक ठीक समझ सकी। इसलिए इस कृति की सबसे खास बात यह है कि जो व्यक्ति कभी गांव न गया हो और न कभी उसका गांव से संबंध रहा हो, वह भी इसे पढ़कर गांव को बखूबी समझ सकता है। इतना ही नहीं, दलित जीवन की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी परेशानी को भी आसानी से समझ सकता है। यह इतने सुव्यवस्थित ढंग से लिखी गई है कि इसकी एक-एक कविता दलित जीवन की एक-एक विस्तृत कहानी कहती है। कविताओं में कथासूत्र बहुत मजबूती से उभरकर सामने आया है। ऐसा लगता है कि कोई हमें एक-एक कविता के माध्यम से गांव और दलित जीवन के बारे में एक-एक कहानी सुना रहा है। यह सुनाने वाला कोई और नहीं स्वयं इन कविताओं का कवि है, जो इन कहानियों को इस ढंग से सुना रहा है कि वह सुनाता तो अपनी कहानी है लेकिन सुनने वाले को अपनी कहानी लगने लगती है। कविता पढ़ते-पढ़ते पाठक का जैसे साधारणीकरण हो जाता है। प्रत्येक कविता का दर्द पाठक को अपना दर्द लगने लगता है। प्रत्येक कविता में दर्ज कवि की आपबीती उसे अपनी आपबीती लगने लगती है। कहिए कि हर कविता में पाठक कवि की जगह खुद को देखने लगता है। यह इन कविताओं की और कवि अमित धर्मसिंह की बहुत बड़ी उपलब्धि है कि उसने अपने बचपन के बहाने देश के असंख्य दलित शोषित जीवन और बचपन को मुखर आवाज दी है। मैं बहुत सी कविताओं का जिक्र करना चाहती हूं, लेकिन समयाभाव के कारण कुछ ही कविताओं का उल्लेख करना चाहूंगी। ईंधन, दो रंग की चप्पलें, खामोशी, प्रलाप सब एक से बढ़कर एक दलित दास्तान की बेहतरीन कविताएं हैं लेकिन एक कविता का खासकर मैं जिक्र करना चाहूंगी, वह कविता है 'घास'। इस कविता में कवि ने लिखा है कि उन्हें स्कूल जाने से पहले जंगल से घास लाना पड़ता था। इसमें उन्होंने बहुत से घासों के नाम तो गिनवाए ही हैं जो इस कविता की प्रामाणिकता को साबित करते है, साथ ही अंतिम पंक्तियों में कवि ने लिखा है कि "घास लाने के बाद/ स्कूल जाते तो पीठ पर बस्ता/ घास की गठरी की तरह ही महसूस होता/वजूद से भारी।" इन पंक्तियों को लिखकर कवि ने, न सिर्फ दलित संघर्ष की गाथा कही है बल्कि बाबा साहब की तरह, हर हाल में शिक्षित बनने का बेजोड़ संदेश भी दिया है। यह उन्होंने अपने जीवन में भी अपनाकर गांव से दिल्ली तक का और छात्र से साहित्यकार बनने तक का सफल सफर तय किया है। इसका जीता जागता सबूत 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' की भारी सफलता के रूप में आज हमारे सामने है।"
          प्रो. दामोदर मोरे ने कहा कि "सबसे पहले प्रस्तुत आत्मकथा के शीर्षक पर बात करते हैं। इसका शीर्षक अपनेआप में बहुत कुछ कहता है। इसके प्रथम आधे वाक्य में गांव से कवि का अटूट जुड़ाव परिलक्षित होता है और बाद के आधे वाक्य से गांव में अपना क्या की वाजिब चिन्ता जाहिर होती है। कवि चाहता तो शीर्षक में हमारा शब्द की जगह मैं और मेरा गांव जैसे पदों का भी प्रयोग कर सकता था। लेकिन इससे शीर्षक काफी संकुचित हो जाता। इसलिए कवि ने बहुत सोच समझकर हम और हमारा शब्दों का प्रयोग किया है। इससे कथ्य में बहुत अधिक विस्तार हो गया है। भारत के संविधान की प्रस्तावना भी हम शब्द से इसीलिए शुरू होती है ताकि उसमें देशभर के जनमानस के विचार और भावना आ जुडें। ठीक इसी प्रकार इस काव्यमय आत्मकथा के शीर्षक में ही देश भर के दलितों, शोषितों और वंचितों की अंतर्व्याप्ति हो गई है। डॉ. अमित धर्मसिंह की यह काव्यमय आत्मकथा, आत्मकथा के सभी मानक रूप पर भी पूरी तरह खरी उतरती है। इसमें अंबेडकरी चेतना है, समुचित चरित्र चित्रण है, संवाद है, प्रकृति चित्रण है, देशकाल और परिवेश है। व्यक्ति चित्र के उत्कृष्ट उदाहरण और दलित जीवन व गांव की यथार्थ गाथायें है। ये सब बातें इसे अपनी ही तरह की अनूठी आत्मकथा बनाती हैं। इसकी भाषा में खड़ी बोली के लोक शब्दोें का प्रयोग प्रसंग और पात्रानुकूल किया गया है। यह प्रयोग जहां इसे इसकी वास्तविक जमीन और पहचान से जोड़ता है वहीं हिंदीतर भाषी के लिए कुछ मुश्किलें भी पैदा करता है। यद्यपि इससे कथा और भाव के संप्रेषण में कुछ खास फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि कविता के प्रवाह और प्रसंग से सबकुछ सहजता से समझ में आता चला जाता है। फिर भी कुछेक ठेठ लोक शब्दों के शाब्दिक अर्थ समझने के लिए परिशिष्ट में उनका सामान्य हिन्दी अनुसार अर्थ दिया जाना भी समीचीन था। जहां तक बात आत्मकथा के मानकों के अनुसार एनालिसिस करने की है तो इसमें वह सबकुछ विद्यमान है जो किसी कृति को आत्मकथा होने का दर्जा देता है। हालांकि, काव्य में आत्मकथा लिखे जाने का यह प्रयोग बिलकुल नया प्रयोग है और जो कि पूरी तरह सफल है। इसमें वृहत कथा सूत्र मौजूद है। यह कथा सूत्र ग्रामीण और दलित जीवन की त्रासदी को सटीक रूप में सामने लाता है। इसमें पात्रों के संवाद हैं जो इसे रौचक बनाते हैं। गांव का यथार्थ परिवेश, वेशभूषा, खान पान, तीज त्योहार, मान्यताएं, परंपराएं, धार्मिक अंधविश्वास और ग्रामीण संस्कृति, सभी कुछ दर्ज हुए हैं। उदाहरण अलग-अलग कविताओं में देखने को मिल जाते हैं। प्रकृति चित्रण का श्रेष्ठ नमूना 'घास' और 'काली नदी' कविता में प्रस्तुत किया गया है। कई कविताओं में व्यक्ति के श्रेष्ठ शब्द चित्र खींचे गए हैं, जैसे मां और पापा के व्यक्ति चित्र। बाकी पात्रों के भी बेहतरीन चरित्र चित्रण प्राप्त होते हैं, जैसे डागडर कविता में माहराज्जी दाद्दी का चरित्र चित्रण, दो रंग की चप्पलें में मां का चरित्र चित्रण, किरडी और खामोशी कविता में पिता का चरित्र चित्रण, पढ़ाई के टोटके में घोल्लू मास्टर का चरित्र चित्रण, प्रत्येक पात्र का सम्यक चरित्र चित्रण किया गया है। देशकल की जहां तक बात है तो यह स्पष्ट है कि इन कविताओं का देश काल अस्सी से नब्बे के दशक का है जो भारत के गांव में दलित शोषित जीवन और बचपन से जुड़ा हुआ है। उद्देश्य स्पष्ट है कि गांव में रहने वाले जातीय और आर्थिक रूप से उपेक्षित और पिछड़े हुए दलितों के जीवन संघर्ष से समाज, देश व दुनिया को अवगत करवाना है। इसमें कोई संदेह नहीं कि डॉ. अमित धर्मसिंह की काव्यमय आत्मकथा दलित शोषित जीवन से जुड़ा बहुत बड़ा आख्यान लेकर हमारे सामने प्रस्तुत हुई है। इसके अगले संस्करण में कुछेक जटिल लोकशब्दों का समुचित अर्थ परिशिष्ट में दिया जाना नितांत जरूरी है ताकि इसके वृहत कैनवास पर हिंदीतर भाषा से जुड़े पाठकों की पाठकीयता से जरा सी भी रुकावट न आए। एक सफल काव्यमय आत्मकथा लिखकर डॉ. अमित धर्मसिंह ने दलित साहित्य में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण साहित्य में एक नया प्रयोग किया है और दलित साहित्य को हर तरह से प्रयोगधर्मी दृष्टिकोण से बिलकुल नए ढंग से समृद्ध किया है।"
          इनके अलावा एस. एन. प्रसाद, चितरंजन गोप लुकाटी और आर. पी. सोनकर ने भी सारगर्भित टिप्पणी की। एस. एन. प्रसाद ने कहा कि "डॉ. साहब की काव्यमय आत्मकथा इतनी बेहतरीन किताब है कि यह जबसे मुझे मिली है, मैं चार बार पढ़ चुका हूं। यह पहली ऐसी पुस्तक है जिसको मैंने न सिर्फ पूरा पढ़ा बल्कि एक-एक कविता को कई-कई बार पढ़ा। कमाल देखिए कि जिस कविता को जितनी बार पढ़ा, वह उतनी ही गहराई से समझ आती चली गई। जितनी समझ आती चली गई उतना ही प्रभावित करती चली गई। आलम यह रहा कि बेहद अल्प समय में ही मैंने इस पर अपनी वृहत समीक्षा भी लिख डाली, जो कि मैं कई दिन पहले ही डॉ. साहब को भिजवा चुका हूं। अब जब बहुत अधिक प्रतीक्षा के बाद मेरा बोलने का नम्बर आया है तो सच तो यह है कि मैं अकेले इस डेढ़ घंटे से भी अधिक बोल सकता हूं। लेकिन समयाभाव है और मुझे महज टिप्पणी रखने का ही आदेश हुआ तो जहां तक बात इन कविताओं की है तो इनका नाता गांव और उसकी पृष्ठभूमि से इतना गहरा और वास्तविक है कि आप एक-एक कविता के माध्यम से गांव के साथ-साथ दलित जीवन में उतरते चले जाते हैं। इतना ही नहीं डॉ. साहब का लिखने का तरीका और घटनाओं के वर्णन करने का तरीका ही इतना बढ़िया है कि बस पाठक एक बार पुस्तक उठाकर पढ़ना शुरू कर दें, फिर तो वह पूरी पढ़े बिना पुस्तक को रख ही नहीं सकता है। पढ़कर लगता है कि यह तो हमारे ही जीवन की या हमारे ही गांव की बात हो रही है। इस किताब को पढ़कर, एक बात और आश्चर्य में डालने वाली है और वो है डॉ. साहब की स्मृति। इनकी स्मृति इतनी समृद्ध और क्लियर है कि जो एक-एक चीज जो इन्होंने लिख दी वह इतने वर्षों बाद भी अपने पुराने और वास्तविक रूप में ही जीवंत हो उठी है। घास कविता में दर्ज किए गए घासों के सैंतालीस नाम पढ़कर ऐसा लगता है कि जैसे कोई बोटनी का प्रोफेसर इन नामों को गिनवा रहा है। ऐसी अनेक कविताएं हैं जिनमें इस तरह के बेजोड़ विवरण दर्ज किए गए हैं। जैसे, शौक कविता में अस्सी नब्बे के दशकों में प्रचलित रही फिल्मों के नाम अथवा एक ललक कविता में लोक खेलों के बीसियों नाम इस तरकीब से रखे गए हैं कि पढ़ने वाला भीतर तक मुतास्सिर होता चला जाता है। न सिर्फ इसे पढ़कर बल्कि आज की गोष्ठी में दलित साहित्य के गंभीर वक्ताओं को सुनकर यह आभास सत्य साबित हो चुका है कि डॉ. साहब की काव्यमय आत्मकथा 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' एक मील का पत्थर कृति है जो आने वाले पाठकों, साहित्य अध्यताओं, इतिहासविदों और शोधार्थियों के लिए बहुत काम आने वाली है। इस आत्मकथा का इतना सफल होने का एक बड़ा कारण यह भी है कि इसमें डॉ. साहब के जीवन की गहनतम पीड़ा और त्रासदी दर्ज हुई है, बावजूद इसके कहीं भी किसी भी कविता में, किसी के भी प्रति, किसी भी प्रकार की कुंठा, ग्रंथि या नफरत का भाव प्रकट नहीं हुआ है। यह विशेषता इसे औरों से बेहतरीन कृति तो बनाती ही है साथ ही डॉ. अमित धर्मसिंह को दलित कवियों में शीर्ष पर लाकर खड़ा कर देती है।" 
          चितरंजन गोप लुकाटी ने कहा कि "वाल्मीकि ने लिखा है- 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।' परंतु उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि किन लोगों के लिए जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। कुछ खास लोगों के लिए या फिर सभी लोगों के लिए? अगर सभी लोगों के लिए यह बात कही गई है, तो फिर बाबा साहब ने हताशा भरी ऐसी बात क्यों कही थी- "गांधीजी, मेरी कोई मातृभूमि नहीं है!"? बाद में, ओमप्रकाश वाल्मीकि ने भी सवाल दागा था-"फिर अपना क्या?/ गांव?/शहर?/ देश?"और अभी, अमित धर्मसिंह ने इन प्रश्न चिह्नों को लोप करते हुए सीधे लिखा- "हमारे गांव में हमारा क्या है!" मुद्दा गंभीर है, विचारणीय है और बहस की गुंजाइश भी खूब है। क्योंकि आजादी के इतने वर्षों बाद भी क्या कारण है कि देश और गांव में दलितों के हालात सुधरने में नहीं आ रहे हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? स्वयं दलित? देश का जातीय समाज या फिर देश की सरकार? आज दलित साहित्य में ये सवाल न सिर्फ उभरने लगे हैं बल्कि देश और समाज के ठेकदारों को सीधे-सीधे संबोधित किया जाने लगा है कि आखिर 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' और जब अमित धर्मसिंह यह संबोधन कर रहे हैं तो इसकी अंतर्व्याप्ति सिर्फ गांव तक है नहीं है, बल्कि देश दुनिया तक है। इस नाते यह सिर्फ अमित धर्मसिंह की आत्मकथा नहीं बल्कि हर एक दलित शोषित की आत्मकथा है। इस आत्मकथा के माध्यम से देश का हर एक दलित पूछ रहा है कि आखिर इस देश में उसका वजूद क्या है। क्या वह सिर्फ समाज के ठेकेदारों और पूंजीपतियों की भेंट चढ़ने के लिए ही जन्मा है? अमित धर्मसिंह की आत्मकथा इन्ही ज्वलंत प्रश्नों और मुद्दों को सफलतापूर्वक उठाने वाली बेहतरीन काव्यात्मक आत्मकथा है।" 
          आर. पी. सोनकर ने कहा कि "हमारे गांव में हमारा क्या है! अपने समय और काल का एक ज़िंदा ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। आज जब इस काव्य-संग्रह की कविताओं के कथ्य, तथ्य, शिल्प और गति पर मुझे अपनी बात कहने का अवसर मिला है तो सबसे पहले मैं साधुवाद ज्ञापित करना चाह रहा हूं उन सभी आलोचकों और समालोचकों को जिन्होंने दलित साहित्यकारों की पुस्तकों की समीक्षा करने का महत्त्वपूर्ण पूर्ण काम किया है। आज की गोष्ठी में जुड़कर अतिरिक्त खुशी मुझे यह देखकर मिली कि आज हमारे पास अपने समीक्षक हैं जो इतनी बढ़िया समीक्षाएं कर सकते हैं। समीक्षाएं सृजन की पूरक हैं जिनके बिना सृजन महत्त्वहीन-सा प्रतीत होता है। हमें याद है वर्ष 2010 में, प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में हमारे द्वारा इस बात पर बल दिया गया था कि दलित-विमर्श स्वमेव एक स्वतंत्र वैचारिकी है। यह वैचारिकी मानव-जीवन की स्वतंत्र एवं जीवंत अभिव्यक्ति है। यह सत्य और यथार्थ पर आधारित है। कोरी आस्थाओं, कल्पनाओं और ढपोरशंख का कोई भी स्थान नहीं है दलित विमर्श की वैचारिकी में। यह बात डॉ. साहब की आत्मकथा पढ़कर भी साबित हुई है। डॉक्टर अमित धर्मसिंह साहब हिंदी साहित्य के समर्थ कवि, लेखक, चिंतक और विचारक होने के साथ-साथ एक बेहद संवेदनशील व्यक्ति हैं। मैं इनसे मिला तो नहीं हूं पर जो कुछ दूसरों से जान पाया या जो इनसे गाहे-बगाहे बातचीत करके समझ सका वह इनके अच्छे व्यक्तित्व का प्रतिबिंब है जो आइने की तरह मेरे रूबरू खड़ा होकर इनकी सरलता, सहज उपलब्धता और मानवता के प्रति प्रतिबद्धता को परावर्तित करता है। 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' आत्मकथा का शीर्षक ही बहुत प्रभावशाली है तथा मन को उद्वेलित करने वाला है। एक जमीनी हकीकत से रूबरू कराती काव्य संग्रह की पहली ही रचना जो हमारी हैसियत बता देती है कि हमारा अपना क्या है गांव में। यूं तो 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' आत्मकथा में अधिकांश कविताएं बहुत मार्मिक एवं अंतः पटल को झकझोरने वाली हैं परंतु 'नुस्खे', 'दो रंग की चप्पलें', 'खामोशी' और 'प्रलाप' शीर्षक की कविताओं ने मुझे अत्यधिक प्रभावित किया। मानवीय संवेदनाओं का ऐसा सजीव चित्रण का सौंदर्य बहुत कम कविताओं में मिलता है, वह भी बगैर अलंकार और विशेषण के। पूरी कथा जैसे आपबीती घटनाएं हैं जो हममें से हर एक के साथ घटित हुई लगती है।"
          तत्पश्चात, डॉ. अमित धर्मसिंह ने वक्ताओं के प्रति अनौपचारिक आभार व्यक्त किया और 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' को लिखने की पृष्ठभूमि के विषय में, संक्षेप में बताया। उन्होंने बताया कि "दो हजार सोलह के लास्ट में अचानक पापा को पैरालिसिस अटैक आया और वे अशक्त होकर चारपाई पर आ गिरे। अभी घर ठीक से खड़ा भी न हुआ था और न ही हम छह बहन भाइयों में से कोई अपने पैरों ठीक से खड़ा हुआ था। हालांकि मुझसे छोटे दो भाई, चार पांच हजार रुपए की मासिक प्राइवेट नौकरी रोलिंग मिल आदि में कर रहे थे। मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएच.डी. करने दिल्ली आ बसा था। यहां रहने खाने और पीएच.डी. करने का एकमात्र जरिया जेआरएफ था। इस नाते घर की मूलभूत जिम्मेदारी यानी खाने-पीने की अधिकांश जिम्मेदारी पापा के कंधों पर थी। उनके अचानक खाट पर आ जाने से हम भीतर तक हिल गए। हम पापा के साथ बिताए लम्हें या बतियाए वाकए याद करने लगे। पता चला कि अभी तक भी जिंदगी की विविध जरूरतों और परेशानियों ने हम सबको इतना कसकर जकड़ रखा था कि किसी को भी किसी से भी फुरसत से बैठकर बात करने का अभी तक मौका ही नहीं मिला था। ऐसे में पापा से जुड़ी बहुत सी आशंकाओं ने घेर लिया। लगा कि उनके साथ ढेर-सा वक्त बिताना चाहिए। जीभरकर बतियाना चाहिए। लेकिन वही पहले वाली परेशानियों और अकादमिक जिम्मेदारियों के बीच ऐसा अभी तक भी संभव नहीं था। सोचा अपने मन में छिपे जज़्बात और घर परिवार से जुड़े हालात सबकुछ एक साथ बांधकर पापा के सामने प्रस्तुत कर दिए जाएं ताकि जीते जी उन्हें आभास हो सके कि उनके साथ बिताया एक-एक पल और एक-एक अहसास हमें अभी तक याद है। हम कुछ नहीं भूले, न उनके श्रम को और न अपनी जिम्मेदारी को। यह सब एक साथ करने का पुस्तक एकमात्र जरिया थी इसलिए दो हजार सोलह के जाते-जाते जैसे ही पापा को कुछ राहत मिली, वैसे ही दो हजार सत्रह के आरंभ में ही इस संदर्भ में पुस्तक लिखनी शुरू कर दी। इसका सबसे सरल माध्यम कविता लगी। क्योंकि पीएच.डी. के चलते भारी भरकम गद्य पुस्तक लिखने का अवकाश न मेरे पास था और न इतना विस्तृत पढ़ने व समझने का पाठकीय अभ्यास पापा के पास था। इसलिए काव्य में ही आत्मकथा लिखने का मन बना लिया। काव्य में आत्मकथा लिखने का अतिरिक्त साहित्यिक लाभ यह भी था कि अभी तक के साहित्य में केवल प्रोज में ही आत्मकथायें लिखी गई हैं पोएट्री में आत्मकथा लिखने का यह, सर्वथा नया प्रयोग होगा। काव्य में आत्मकथा लिखने का यह साहित्यिक प्रयोग यदि सफल रहा तो निश्चित ही यह साहित्य में कुछ नया जोड़ने में सार्थक साबित होगा। बहरहाल, आत्मकथा में अनावश्यक विस्तार से बचने के लिए इसके प्रथम भाग का क्राइट एरिया केवल बचपन को बनाया गया। इसकी भाषा, अनुभव और विचार का केंद्र भी बचपन को ही बनाया गया, ताकि कविताओं में वह बचपन आ सके जिसमें पापा ही हमारे एकमात्र हीरो थे। इस ख्याल से कि बाकी का जीवन बाद में, इसी श्रृंखला की कविताओं में यथासमय दर्ज कर लिया जाएगा, बचपन की स्मृतियों पर आधारित कविताओं को लिखना शुरू कर दिया। इसकी सबसे पहली कविता जो संग्रह की टाइटल कविता है 20 फरवरी, 2017 को लिखी गई। लिखने का माध्यम फेसबुक था। मेरी आदत है कि मैं अपनी किसी भी रचना को फेसबुक के ओनली मी ऑप्शन पर टाइप करके सेव करता रहता हूं। इसी तरह यह कविता 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' भी मुजफ्फरनगर से दिल्ली आती दो बजे वाली पसेंजर ट्रेन में लगभग दिल्ली पहुंचने के समय करीब साढ़े छह बजे के आसपास फेसबुक पर ही लिखकर सेव कर ली गई। उस दिन रात को मुझे, वसुंधरा में रह रहे अपने मित्र अनुराग पाठक के पास ठहरना था। देर रात वहां पहुंचकर फेसबुक ऑन किया तो मैं भीतर तक जैसे हिल गया। मेरे पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन ही खिसक गई। वह कविता जो मैंने ओनली मी पर सोचकर सेव की थी, गलती से वह पब्लिक वाले ऑप्शन पर पोस्ट हो चुकी थी। इतना ही नहीं, पोस्ट होने के साथ ही वह फेसबुक पर बुरी तरह वायरल हो चुकी थी। मेरी अपनी फेसबुक की बजाए यह कविता आचार्य रामपलटदास की फेसबुक से हजारों की संख्या में शेयर हो चुकी थी। उसके बाद तो जैसे इसे शेयर करने की बाढ़ सी आ गई। मेरे मित्रों में परमेंद्र सिंह, धीरेश सैनी, रोहित कौशिक, संतोष कुमार वर्मा आदि ने भी जैसे इस कविता को पंख लगा दिए थे। इसी से मुझे अहसास हुआ कि लिखने का यह माध्यम न सिर्फ सहज, सरल और मितव्ययीता की दृष्टि से समुचित है बल्कि साहित्यिक दृष्टि से भी एकदम नया और सफल प्रयोग है। बस फिर क्या था दो हजार सत्रह की आरंभिक त्रैमासिकी में ही 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' की करीब 60 कविताएं लिख ली गईं। मुश्किल से डेढ़ माह लगा होगा इन सबको लिखने में। संग्रह बहुत बड़ा न हो इसलिए इसके प्रथम भाग के लिए 41 कविताओं का चयन किया गया और पांडुलिपि प्रकाशन हेतु बोधि प्रकाशन को भेज दी गई। इस तरह, अनावश्यक विलंब के बाद, दो हजार उन्नीस की जुलाई में 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' का पहला संस्करण प्रकाशित होकर आया। मां पापा के हाथों में संग्रह सौंपकर लगा कि जैसे भीतर का भारीपन कुछ हल्का हो गया है। इसका अतिरिक्त लाभ यह मिला कि पाठकों ने भी इसे लगे हाथ लेना शुरू कर दिया। मेरे ग्रह जनपद मुजफ्फरनगर के साहित्यकारों ने साहित्य अनुशीलन मंच के बैनर तले आठ अक्टूबर, 2019 को इस पर परिचर्चा गोष्ठी आयोजित की। गोष्ठी में इस पुस्तक को मुक्तकंठ से सराहने वालों में नेमपाल प्रजापति, रोहित कौशिक, कमल त्यागी, बी. एस. त्यागी, आर.एम. तिवारी, मनु स्वामी, परमेंद्र सिंह, अश्वनी खंडेलवाल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। तबसे लेकर आज तक 'हमारे गांव में हमारा क्या है!' की कई सौ प्रतियां रिप्रिंट होकर पाठकों तक पहुंच चुकी हैं। मुझे खुशी है कि आम पाठकों से लेकर प्रतिष्ठित साहित्यकारों तक ने इसका अपेक्षा से बढ़कर रचनात्मक संज्ञान लिया है और आज भी लगातार ले रहे हैं। इसका जीवंत प्रमाण आज की यह गोष्ठी भी है। आज चार वर्ष बाद जब आप सब इसका इतना गहन और उत्कृष्ट मूल्यांकन कर रहे हैं तो मन वैसे ही, द्रवीभूत है जैसे इसको लिखते समय हुआ था। लग रहा है, जैसे भीतर से मैं, और अधिक समृद्ध हो रहा हूं। इसके लिए आप सबका आभार व्यक्त करना आपके दिए को कमतर आंकने जैसा है।" इसके अलावा डॉ. अमित धर्मसिंह ने मां-पापा को समर्पित करते हुए 'हमारे गांव में हमारा क्या है! से 'ख़ामोशी' कविता का पाठ भी किया।
          अध्यक्षता कर रही पुष्पा विवेक ने कहा कि "निश्चित ही अमित जी की यह काव्यमय आत्मकथा काबिले तारीफ है। अमित जी, न सिर्फ अच्छे कवि और साहित्यकार हैं बल्कि बहुत अच्छे संगठनकर्ता भी है। इनकी निर्देशन और मेहनत से ही नदलेस इतने कम समय में इतनी ऊंचाई छू सका है। इनकी कविता, कार्य और व्यवहार सभी कुछ आकर्षित करने वाला है। देश भर से जुड़े साहित्यकारों ने इतनी देर रात तक उपस्थित रहकर और आत्मकथा की भूरि-भूरि प्रशंसा करके साबित कर दिया कि सिर्फ अमित जी की आत्मकथा ही अत्यंत सफल नहीं बल्कि यह गोष्ठी भी बहुत कामयाब गोष्ठी रही है। इसका प्रमाण यह है कि शाम के सात बजे शुरू हुई यह ऑनलाइन गोष्ठी रात्रि के साढ़े ग्यारह बजे भी समाप्त होने का नाम नहीं ले रही थी। सभी लोग इस पर खुलकर बोले और बहुत से बोलने वाले अभी हैंड रेस किए हुए हैं। बावजूद इसके, गोष्ठी इस वादे के साथ समापन की ओर लाई गई कि नदलेस की कार्यकारिणी से जुड़े लोगों की समीक्षा और टिप्पणियां अगली किसी ऑफलाइन गोष्ठी में प्रस्तुत करवा दी जायेंगी। (नोट:- दिल्ली की अलीपुर रोड स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर स्मारक पर 19/11/2023 को हुई कार्यकारिणी की मीटिंग में प्रस्तुत भी करवाई गई। इसमें मुख्यतः मामचंद सागर, बंशीधर नाहरवाल, हुमा खातून, लोकेश कुमार, डॉ. गीता कृष्णांगी, जोगेंद्र सिंह और पुष्पा विवेक ने अपनी-अपनी समीक्षाओं का सार प्रस्तुत कर समीक्षाओं की हस्ताक्षरित प्रतियां डॉ. अमित धर्मसिंह को सौंपी।) ऑनलाइन गोष्ठी का इतना लंबा चलना सुखद आश्चर्य की बात है। इतनी देर रात भी कई दर्जन लोगों का गोष्ठी में बने रहना और मोबाइल की बैटरी डाउन होने पर भी मोबाइल को चार्जिंग पर लगाकर गोष्ठी में जुड़े रहना (जैसा कि मैं खुद बहुत देर से मोबाइल को चार्जिंग पर लगाकर गोष्ठी बिजली के बोर्ड के पास ही बैठकर गोष्ठी से जुड़ी हुई हूं।), कवि और उसके संग्रह की बहुत बड़ी उपलब्धि है। रही बात संग्रह की कविताओं की तो इसमें न सिर्फ दलित बचपन की त्रासदी उभरकर सामने आई है, बल्कि दलित स्त्री, पुरुषों और तमाम शोषित समाज की पीड़ा और संघर्ष भी बहुत अच्छे से सामने आया है। कवि ने अपने माता-पिता का जो संघर्ष दिखाया है, वह सम्पूर्ण दलित समाज का संघर्ष है। दलित समाज के बच्चों को अपने साथ-साथ मां-बाप के संघर्षों को भी इसी तरह याद करना और दर्ज करना चाहिए जैसे अमित धर्मसिंह ने हमारे गांव में हमारा क्या है! में दर्ज किया है। इसके अलावा संग्रह में दलित स्त्री का अथक संघर्ष भी कवि ने अपनी मां, बहन, महाराज्जी बुढ़िया, जगबीरी, सोनबिरी, जग्गो और बुगली बुढ़िया आदि के रूप में बड़ी शिद्दत से दर्ज किया है। इस नाते यह आत्मकथा न सिर्फ कवि के बचपन की कहानी है बल्कि यह दलित स्त्री और पुरुषों की भी यथार्थ दास्तान है। इस आत्मकथा का कथ्य बहुत ही विस्तृत और गहन है। इसमें गहरी अनुभूति से उपजी पीड़ाएं हैं। साथ ही बाबा साहब के पथ पर चलकर सफल होने का सार्थक सन्देश है। अमित जी को इस अद्भुत काव्यमय आत्मकथा की अपार सफलता के हार्दिक बधाई।" 

रिपोर्ट
-डॉ. गीता कृष्णांगी
20/11/2023
































































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