24/09/2023 को हुई सोच 2 पर ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी

 


नदलेस की वार्षिकी सोच 2 पर परिचर्चा 

          नव दलित लेखक संघ, दिल्ली की वार्षिकी (नदलेस का वार्षिक संकलन या मुखपत्र) सोच 2 पर ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी रखी गई। सोच के इस दूसरे अंक का संपादन डॉ. कुसुम वियोगी ने किया। परिचर्चा हेतु एस. एन. प्रसाद, डॉ. राधा, डॉ. धीरज वनकर, डॉ. सुमन धर्मवीर, कश्मीर सिंह, सुनीता वर्मा, डॉ. अनीश कुमार और सरिता भारत प्रमुख वक्ता आमंत्रित रहे। गोष्ठी की अध्यक्षता पुष्पा विवेक और बंशीधर नाहरवाल ने की। संचालन हुमा खातून ने किया। गोष्ठी में डॉ. अमित धर्मसिंह, डॉ. गीता कृष्णांगी, पवन सागर, योगेंद्र प्रसाद अनिल, श्रीकला, जालिम प्रसाद, फूलसिंह कुस्तवार, ज्ञानेंद्र कुमार, आर. एस. मीणा, बी. एल. तोंदवाल, अनुपा एस. एस., सुरेश कुमार सौरभ, सरुप सियालवी, रामदास बरवाली, अनिल कुमार गौतम, डॉ. उषा सिंह, ममता अंबेडकर, डॉ. घनश्याम दास, भीष्म देव आर्य, चितरंजन गोप लुकाटी, शैलेंद्र कुमार, राकेश कुमार धनराज, सिद्धार्थ कुमार, डॉ. पूनम तुषामड, पवन कुमार, डॉ. खन्नाप्रसाद अमीन, ज्योति पासवान, आर. पी. सोनकर, सत्यानंद विभू (सत्यप्रकाश), अनुज कुमार, डॉ. राजन तनवर, अमित रामपुरी, कांशीराम, मामचंद सागर, श्रीलाल बौद्ध, डॉ. धर्मेंद्र कुमार, मोहन लाल सोनल मनहंस, मंजू गौतम, राष्ट्रपाल गौतम, सुषमा सिद्धार्थ और जोगेंद्र सिंह आदि उपस्थित रहे।
          डॉ. सुमन धर्मवीर ने कहा कि "सोच का यह दूसरा अंक बहुत ही सुंदर बना है। देश भर से रचनाकार इसमें छापे गए हैं। स्त्री और पुरुष रचनाकारों को समान प्रतिनिधित्व दिया गया है। अंक में संकलित की गई सामग्री भी उत्कृष्ट एवं सारगर्भित है। सभी कविताओं, कहानियों में दलित स्वर मुखर हुआ है। सभी में सामाजिक चेतना का भाव समान रूप से दिखाई देता है। अच्छी बात यह है कि दलित स्त्रियां भी अब काफी मुखर दिखाई दे रही हैं, सोच 2 में भी देश भर से कई स्त्री लेखिकाओं की लेख, कविताएं और कहानियां संकलित की गई हैं। सोच का संपादन मंडल इस हेतु समान रूप से बधाई का पात्र है।" सरिता भारत ने कहा कि " सोच के इस अंक में जो लेख संग्रहीत किए गए हैं, सभी महत्त्वपूर्ण हैं। ये लेख न सिर्फ सामाजिक स्वर को मुखर करते हैं बल्कि इसमें स्त्री स्वर भी मुखर हुआ है। लेखों में दलित समाज और किसानों की दारुण दशाएं तो दर्ज हुई ही हैं साथ ही आरक्षण जैसे गंभीर मुद्दे पर भी कलम चलाई गई है। कबूतरी देवी जैसी अदाकारा का ऐतिहासिक परिचय एक लेख के माध्यम से ही प्राप्त होता है। इनके अलावा कहानियां और कविताएं भी अपने अपने उद्देश्यों में पर्याप्त सफल दिखाई पड़ती हैं। जनमत सोपान और नदलेस सोपान के अंतर्गत भी महत्त्वपूर्ण सामग्री प्रकाशित की गई है जिसमें आजीवन सदस्य सूची का अपना ही महत्त्व है।"
      एस. एन. प्रसाद ने अपने वक्तव्य का आरंभ करते हुए कहा कि "टूटती सांसों में फिर से दम आ गया, नदलेस की सोच का अंक हरसू छा गया।' वास्तव में नदलेस और इसकी सोच ने देश भर के दलित साहित्यकारों में आई उदासीनता को छांट दिया है। उनमें फिर से उत्साह का रचनात्मक संचार कर दिया है। दशकों से देखने में आ रहा था कि दलित लेखक व्यक्तिवाद के और संगठन मठों के वशीभूत होकर रह गए थे। लेकिन नदलेस की कार्यशैली और सोच के इतने लाजवाब प्रकाशन ने सबकी जैसे बोलती बंद कर दी है। देश भर के रचनाकारों को सोच में संकलित कर और उन्हें नदलेस की गोष्ठियों में समान प्रतिनिधित्व और अवसर देकर नदलेस ने साबित कर दिया है कि यदि कोई संगठन वाकई लोकतांत्रिक और पारदर्शी ढंग से काम करें तो उसकी ख्याति अल्प समय में ही चहुंओर हो सकती है। सोच का यह अंक उसका जीवंत उदाहरण है। इसके लिए नदलेस की पूरी टीम और संपादन मंडल को हृदयतल की गहराई से कोटिशः धन्यवाद और बधाई।" सुनीता वर्मा ने कहा कि नदलेस की एक बात जो मुझे सबसे अच्छी लगती है वह यह है कि इसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं बरता जाता है। न जाति या उपजाति का, न स्त्री या पुरुष का और न भाषा या क्षेत्र का, किसी भी प्रकार का भेदभाव नदलेस में नहीं है। अवसर की समानता इसमें सभी के लिए समान है। यही आदर्श सोच में भी दिखाई पड़ता है। इसमें देश भर से तो रचनाकार सम्मिलित हैं ही, साथ ही वरिष्ठ, कनिष्ठ, स्त्री, पुरुष की सभी विषयों पर आधारित रचनाएं सोच में संकलित की गई हैं। बड़ी बात यह भी है कि सभी की रचनाएं एक बेहतर समाज बनाने के लिए छटपटाती सी नजर आती हैं। सभी ने समाज की विभिन्न विसंगतियों पर कलम चलाई है और गलत के खिलाफ आवाज उठाई है। नदलेस और इसकी सोच वाकई बहुत अच्छा कार्य कर रही है। इसके लिए पूरा नदलेस परिवार बधाई का पात्र है।"
       कश्मीर सिंह ने कहा कि "निश्चित रूप से सोच का यह अंक संग्रहणीय बन पड़ा है। सामग्री, आकार-प्रकार, आवरण सज्जा, सभी कुछ स्तरीय है। फिर भी कुछेक लिपि संबंधी त्रुटियां (जो कि अधिक नहीं हैं फिर भी) अखरती हैं। इसके अलावा यह भी महसूस हुआ कि सोच 2 में दर्ज कुछेक कवियों को भी अपनी भाषा और कविता दोनों को निखारने की आवश्यकता है। बाकी नदलेस द्वारा किए जा रहे प्रयास और सोच का प्रकाशन काबिले तारीफ है। इस समय जबकि सामाजिक और राजनीतिक परिस्थियां और अधिक जटिल हुई हैं, ऐसे में दमित और शोषितों की आवाज़ का रचनात्मक संवाहक बनना कोई आसान कार्य नहीं है, किंतु नदलेस और इसकी टीम इसे बखूबी कर रही है। इसके लिए सभी बधाई के पात्र हैं।" डॉ. धीरज वनकर ने कहा कि "नदलेस के संपादक मंडल ने बहुत सोच समझकर पत्रिका के जो चारों सोपान बनाए हैं, वे काबिले तारीफ है। सभी तरह की रचना सामग्री इनमे आ समायी है। जनमत सोपान और नदलेस सोपान में जो सामग्री रखी गई है उससे न सिर्फ लोगों के नदलेस के प्रति विचार प्राप्त होते हैं अपितु नदलेस की पारदर्शिता के विषय में भी पता चलता है। प्रधान सम्पादक डॉ अमित धर्मसिंह और संपादक डॉ कुसुम वियोगी के रचनात्मक प्रयासों से पत्रिका को इतना सुंदर और आकर्षक रूप प्राप्त हुआ है कि अंक निश्चित ही संग्रहणीय बन गया है।" इनके डॉ. कुसुम वियोगी, जालिम प्रसाद, फूलसिंह कुस्तवार, पुष्पा विवेक, हुमा खातून, चितरंजन गोप लुकाटी, डॉ. पूनम तुषामड, डॉ. खन्नाप्रसाद अमीन, डॉ. राजन तनवर और श्रीलाल बौद्ध आदि ने भी सोच 2 के विषय में अपने सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए। अध्यक्षता कर रहे बंशीधर नाहरवाल ने कहा कि "एक बात जो नदलेस को सबसे अलग करती है वह है इसकी प्रतिबद्धता। समय से वर्ष भर गोष्ठी करने की बात हो या सोच का समयावधि में प्रकाशन हो सबमें नदलेस और इसकी टीम पूरी लगन और प्रतिबद्धता से कार्य करती है। अवसर भी सबको समान रूप से दिए जाते हैं। इस अंक में भी रचनाएं करीब करीब सभी भेजने वाले सदस्यों की समाहित की गई हैं। रही बात रचना सामग्री कि तो वह जितनी विविधता लिए हुए है उतनी है महत्त्वपूर्ण भी है। यही कारण है कि देश भर से इस अंक की प्रशंसाएं प्राप्त हो रही हैं।" सभी वक्ताओं और उपस्थित रचनाकारों का यथायोग्य आभार डॉ. अमित धर्मसिंह ने लिया।

डॉ. गीता कृष्णांगी
25/09/2023





























































Comments

Popular posts from this blog

राम मेश्राम के ग़ज़ल संग्रह 'शोलों के फूल' पर नदलेस ने की परिचर्चा : 28/02/2026

नदलेस की ऑनलाइन काव्य पाठ मासिक गोष्ठी हुई, 26/10/2025 को

वर्ल्ड बुक फेयर 2026 में हुई नदलेस की गोष्ठी, 15/01/2026 को