'सोच' के हमसफर 'सोच' के साथ...




'सोच' के हमसफर 'सोच' के साथ...

समादृत :

डॉ. नरेश सागर जी, उत्तर प्रदेश
डॉ.धीरज वणकर जी, गुजरात
बाबूलाल तोंदवाल जी, हरियाणा
हरीश पांडल जी, छत्तीसगढ़
कांशीराम जी, हरियाणा
एस. एन. प्रसाद जी, लखनऊस

सरुप सियालवी जी, पंजाब
नंदलाल कौशल जी, मथुरा

कश्मीर सिंह जी, वर्नाकुलर
देव प्रसाद पातरे, छत्तीसगढ़

आर एस मीणा जी, राजस्थान
योगेन्द्र प्रसाद अनिल जी, बिहार

मोहन लाल सोनल मनहंस, राजस्थान
डॉ. अनीश कुमार, छत्तीसगढ़
राजेश कुमार बौद्ध, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
इ. रूप सिंह रूप, आगरा
रामसूरत भारद्वाज, छत्तीसगढ़
डॉ. प्रदीप कुमार गौतम, मध्य प्रदेश
जयराज जी, दिल्ली
आर जी कुरील, 
सम्पादक और प्रकाशक


कुछ संक्षिप्त किंतु सारगर्भित उद्गार-

'सोच'
"समता  का  सन्देश  दे, बड़ी  बनाये सोच |
दुनिया में सबसे जुदा, यार पत्रिका 'सोच' ||
यार  पत्रिका 'सोच', आपका  ज्ञान  बढ़ाये |
देकर अवसर खास, नाम  आकाश चढ़ाये ||
अमित सुधारस कुंभ, बहे कुनबे सी ममता |
अपनाओ नदलेस, बढ़े  सामाजिक समता ||"
                                  -बाबूलाल तोन्दवाल, हरियाणा

"सोच 2 के संपादक मंडल
का करता हूं आभार ।
नदलेस के कलमकार  करेंगे
सपनो को साकार।
विश्वास ही नहीं यकीं भी होगा
देख लेना साथियों।
भावी पीढ़ी के रचनाकारों के
वे बनेगे आधार ।
जनवादी साहित्य पढ़कर ना
होंगे कोई लाचार।
शोषण, अन्याय से लडने सब
रखेंगे नव विचार।
सोच 2 के सोच को एक दिन
सब करेंगे स्वीकार।"
                -हरीश पांडल, छत्तीसगढ़

"SOCH MAGAZINE of this month reapresents
different discourses of different people related to marginal group and  people suffering from social inequalities and exploitation in different aspect. This  issue of  Soch magazinge exposes the reality of unequal society and  looks beyond it,  and present solution to make a beautiful  and equal society, where everyone can get  justice and chances to explore itself. Thanks to Dr Amit Dharm Singh  Sir for this Beautiful Magazine Soch.
                         -Ajit Kumar Singh
                          Research scholar University
                          of Delhi

"नदलेस की वार्षिक प्रस्तुति- 
सोच -2
-----------------------------------------------
लब्ध प्रतिष्ठित दलित/आम्बेडकरवादी साहित्यकार डॉ0 कुसुम वियोगी( डॉ0 कबीर कात्यायन) द्वारा संपादित नदलेस की वार्षिक पत्रिका सोच-2 जो पुष्पांजलि प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित है, डॉ0 अमित धर्मसिंह जी प्रधान सम्पादक के सौजन्य  से  दिनांक 09 सितम्बर 2023 को मुझे प्राप्त हुई। बहुप्रतीक्षित 264 पृष्ठ की पत्रिका पुस्तक के रूप में पाकर वास्तव में बहुत प्रसन्नता हुई। इसके लिए नदलेस के समस्त पदाधिकारी गण, पत्रिका के सम्पादक और विशेष रूप से महासचिव/ प्रधान संपादक आदर तथा सम्मान के आस्पद हैं। इस पत्रिका के काव्य सोपान के पृष्ठ 44,45 पर मेरी तीन गजलों को स्थान देकर मुझे  प्रोत्साहित करने के लिए  आ0 सम्पादक एवं आ0 प्रधान संपादक को बहुत बहुत बधाई -
कुछ अलग करने की सोच
"सोच" से  सम्भव लगता है।
करती  है सावधान सोच ही
बंचित जन को जो ठगता है।

कुसुम वियोगी के संग होकर
मित्र  मंडली  का  संग लेकर
अमित धर्मसिंह  प्रीति बढ़ाते
सोच  नई  दुनिया  को देकर।

****

"सोच" एक समझ है

स्वीकार कीजिये

समझ आ जाये तो

विचार दीजिये।

अपनी सोच को मित्रों

नित साझा कीजिये

करता जो सम्मान

उसे प्यार दीजिये।

सोच की यात्रा को

जन जन तक पहुंचाइये

लोगों से जुड़ कर

पहचान इक बनाइये।

"सोच" में क्रांति की

ऊर्जा अपार है

सोच में समाहित

सम्पूर्ण संसार है।

- एस.एन.प्रसाद

           लखनऊ।"                        

                       -एस एन प्रसाद, लखनऊ"                       

"सभी आदरणीय मित्रों को नमस्कार !
आज सोच -2, की प्रति सधन्यवाद प्राप्त हुई, जिसमें मेरी भी एक कहानी "काश यही सच होता !" भी प्रकाशित हुई है । मैं सम्पादकगण और नदलेस के सभी पदाधिकारियों का हृदय से आभारी हूँ !"
                                 -कश्मीर सिंह, वर्नाकुलार

लेखिकाओं द्वारा लिया गया 'सोच 2' का संज्ञान-

1. कविता

"इंडिया" दैट इज "भारत"  की सोच

एक अमीर गौतम बुद्ध,
एक गरीब डॉक्टर अंबेडकर।

एक अमीर से गरीब बने।

एक गरीब से अमीर बनकर भी गरीब बने रहे।

एक अमीर ने अमीर से गरीब बनकर,
दुनिया को अपने कदमों पर झुकाया,
दुनिया का इतिहास बदला।

एक गरीब ने भी गरीब बने रहकर,
दुनिया को अपने कदमों पर झुकाया।
दुनिया का इतिहास बदला।

मतलब
जरूरी नहीं बनना,
अमीर या गरीब।

जरूरी है नेक 'सोच'।
जरूरी है समानतावादी सोच
जरूरी है मानवीय सोच।

इस व्यापक सोच को
इस शाश्वत सोच को
यानी
"इंडस" वैली सभ्यता की सोच को
फिर से
"इंडिया" दैट इज  "भारत" की
भावी सोच बनाने में
अग्रणी भूमिका निभाती
पत्रिका "सोच"।
                 -डॉक्टर सुमन धर्मवीर, विशाखापट्टनम

2.
कहा जाता है कि साहित्य ही समाज का दर्पण होता है उस दर्पण में समाज की हर अच्छाई - बुराई नजर आती है जिससे हम समाज को सुधारने  एवं संवारने का प्रयास करते हैं और यह प्रयास हम पत्रिका , कहानी , नाटक और उपन्यास के माध्यम से समाज को जागृत करके कर सकते हैं। ऐसा ही एक पत्रिका "सोच" नामक पत्रिका है जो वाकई हमारी आपकी हर एक नागरिक के सोच पर आधारित पत्रिका है। हम जैसा सोचेंगे वैसा उस पत्रिका के माध्यम से लिखते जाएंगे। समाज की सच्चाई को अपनी लेखनी के माध्यम से उतारते जाएंगे  और नये सोच, विचार के साथ समाज को विकसित करने का तरीका ढूंढेंगे । सोच पत्रिका से जुड़े सभी लेखक एवं पाठक गढ़ को अपनी सोच रखने का एक ऐसा मंच है जहाँ पर सभी को सामान भाव से साथ लेकर चलने की सोच है। इसी प्रकार नव दलित लेखक संघ अथवा नदलेश नाम से सोच पत्रिका का गठन 14 सितंबर 2021 को  हुई। यह पत्रिका वार्षकी संकलन के रूप में  प्रकाशित हुई । यह सोच पत्रिका 14 सितंबर 2023 को पूरे 2 वर्ष पूरे कर   दो वर्षों से हमारे सामने उपस्थित हो रही है। सोच  पत्रिका के रूप में नदलेश की रचनात्मक  प्रस्तुति अत्यंत प्रसंशनिय एवं प्रेरणादाई है । दलित साहित्य पत्रिका के इतिहास में अपने इस नव दलित लेखक संघ  परिवार एवं सोच पत्रिका के संपादक मंडल विशेष रूप से संपादक- संस्थापक डॉ अमित धर्म सिंह सर बधाई के पात्र हैं। संकल्प पूर्ति के प्रति यह तत्परता सोच पत्रिका का प्रकाशन  निरंतर कई उम्मीदों को मजबूत करती है कि  अंबेडकरवादी सामाजिक समानता सोच वादी पत्रकारिता का यह साहित्यिक सफर अभिलंब चलता रहे।
           पत्रकारिता जनसंपर्क का सशक्त माध्यम माना जाता है। पत्रकारिता  के माध्यम से ही भारतीय जनमानस की हर एक समस्याओं से हम अवगत होते हैं और लोगों को अवगत कराते हैं । हम अपनी परेशानियों और कारणों का निवारण करने की कोशिश करते हैं ।  और यही  हर पत्रिका, लेखनी का दायित्व भी है । दलित पत्रकारिता इसी अवहेलना , उपेक्षा के प्रति आक्रोश, विरोध  संघर्ष की पत्रकारिता मानी जाती है । विचार, तार्किक उद्बोधन और बौद्धिकता ही व्यक्ति की पहचान को चिन्हित करती है। यह पहचान ही उसके  अस्मिता, अस्तित्व और स्वाभिमान का आधार बनती है। सदियों से चली आ रही  छोटी  - बड़ी व्यवस्था , अलगाववादी सोच , समाज में ऊंच-नीच की रीति -नीति की जंजीरों को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है। संवैधानिक व्यवस्था के बावजूद दलित शोषित बहुजन समाज आज भी सदियों की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक विषमताओं से पीड़ित  है। अतः आज सोच पत्रिका एक सजग प्रहरी की भूमिका के रूप में हमारे सामने उपस्थित है। इस पत्रिका के माध्यम से संपादक डॉ. कुसुम वियोगी महोदय ने हमें जागृत और सचेत करते हुए दलित लेखकों की अवसरवादी मानसिकता से ग्रसित  रचनाओं से भी सजक रहने  के लिए विशेष बताया है । अंबेडकरवादी वैचारिकता से  किसी भी तरह का  मतभेद और समझौता स्विकार्य नहीं। यही सोच पत्रिका का स्वरूप है इस पत्रिका में अनेक  लोगों ने अपनी अपनी लेख और रचनाओं के द्वारा समाज के हर रूप हर व्यवस्था को दिखाया है। जिसमें से राजेश कुमार बौद्ध जी हैं "हासिये पर अनुसूचित जाति' को दिखाया है जिसमें  अनुसूचित जाति की पीड़ा - शोषण को दिखाया है जो  आज  अनुसूचित जाति धीरे-धीरे अपने घर- बार जंगल -जमीन से विमुख होकर दूसरे शहरों में  विस्थापित हो रहे हैं । और दूसरी रचना उनकी है "हिंदी साहित्य में गोरख, रविदास, कबीर की उपेक्षा क्यों है"? इसको बड़े ही सत्यता के आधार पर  लिखा है। डॉक्टर राजेंद्र तंवर का हिमाचली सामाजिक अर्जुन की व्यवस्था प्रश्नों के घेरे में इन्होंने दिखाया है कि जो सामाजिक आयोजन होते हैं उसकी व्यवस्था कैसी होनी चाहिए उसे पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं उन्होंने को दर्शाया है । डॉक्टर ईश्वर रही है उनकी रचना है "आरक्षण एक ज्वलन मुद्दा है" जो आरक्षण के विषय में इन्होंने लिखा है मुख्य डॉक्टर मुकुंद रविदास जी हैं " अंबेडकर दर्शन की प्रासंगिकता" को इन्होंने दर्शाया है कि डॉक्टर अंबेडकर का जो दर्शन की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी ।  डॉक्टर राधा वाल्मीकि की रचना है "कुमाऊं कोकिला कबूतरी देवी" अचूक कुमाऊं की रहने वाले और मधुर आवाज देने वाले कबूतरी देवी हैं उनके विषय में बताया है । पुष्पा विवेक जी हैं उनकी रचनाएं "हासिये पर महिलाएं " हैं जो महिलाएं घरों में कैद है। घर से निकलकर ऑफिस में कामकाज करते हुए कामकाजी महिलाएं हैं। सबके साथ भेदभाव आर्थिक, मानसिक शोषण  हो  रहे हैं जिनसे महिलाएं भी हमारे समाज की एक जालंत मुद्दा के रूप में  आ रही है । इस प्रकार देखा जाए तो इन सभी महानुभावों की जो सुंदर-सुंदर लेखनी और रचनाएं हैं उसी तरह लिखने के लिए लेख को बार-बार तराशा जाना जरूरी है । इस तरह विचारों को परिमार्जित करने के लिए  बौद्धिक खुराक जरूरी है। सोच पत्रिका अपनी पहचान का संघर्ष सफलता निरंतर जारी रखेगी। इसी उम्मीद के साथ में दलित लेखक संघ और सोच पत्रिका की संपूर्ण संपादक मंडल को पुनः पुनः हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !
                                    -शकुंतला दीपांजलि, कानपुर

3.
"एक नई  'सोच' के साथ जहां सभी को अपनी विचारधारा सांझा करने का पूर्ण अवसर मिलता है।  "सोच " की पूरी संपादकीय टीम व लेखक, कविजन को बधाइयां"
                                       -सुनीता वर्मा, राजस्थान

"हिन्दी दिवस के अवसर पर आज हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार एवं साहित्यिक समाज की अभिव्यक्ति का प्रखर मध्यम नव दलेश की नवीन 'सोच ' पत्रिका प्राप्त हुई। नव दलेस की पूरी टीम को ढेरो बधाई।"
                                        -डॉ. पूनम तुषामड, दिल्ली

"शुक्रिया अमित जी और वियोगी सर को बधाई ।"
                                   डॉ. सीमा माथुर, दिल्ली
"जय भीम जय संविधान।
नदलेश की वार्षिकी सोच -2 की प्रति प्राप्त हुई। इस हेतु भाई अमित धर्म सिंह जी का बहुत-बहुत आभार। अद्भुत पत्रिका के प्रकाशन के लिए मुख्य संपादक महोदय एवं संपादक मंडल सहित नदलेश के समस्त पदाधिकारियों को साधुवाद। अंतस हृदय से आभार ।"
"जय भीम भाई।
                          डॉ. राधा वाल्मीकि, उत्तराखंड

"नदलेस दिल्ली के मार्फ़त 'सोच 2 कल से कल तक के लिए 'की सफल संपादन व प्रकाशन वास्ते समस्त सम्पादक मंडली विशेष रूप से नदलेस के आदरणीय अध्यक्ष जी व सचिव आदरणीय डॉ.अमीत धर्म सिंह जी को उर तल से ढेरों बधाई व मुझे अकींचन द्वारा सृजित नदलेस सोपान के तहत नदलेस के विषय में बारह हाइकु को स्थान देने के लिए आपको मम सादर अभिवादनं।

संदेश मम

सोच टू है अनूठी

झील की मोती।

                सोच टू पढ़ें

             क्रांति की पर गढ़े

                उदय तय। अनूठी सोच

                                 खरोंच मनुवाद

                                     परोसे क्रांति। नई क़लम

                                                    जोर ज़ुल्म खिलाफ

                                                       भर्ती हुंकार।

फूंकती शंख

जागो मुर्दों भी आज

लूटती ताज। दलितों की मान

                            बाबा की संविधान 

                            उठा कमान। उठी कलमें

                                                    हंसुआ और कुदाल

                                                       हथौड़े मार।

इन्साफ चाहो

लिखो हथेलियों पे

 गुलामी नहीं। नई फसलें

                         बारूद बम हम

                       तख्त चाहिए। खंजरे छोड़ो

                                                मशीनगन खुद

                                                          नेस्तनाबूत।

कबीरा बुद्ध

आम्बेडकरवादी

 फूले की सोच। टूटी जंजीरें

                      मांगे एक चोट औ 

                         मनुवाद हौ। ज़ुल्म शोषण

                                              दफनेंगी औलादें

                                                 दोगली नस्लें।

स्याही की बूंदें

सिर्फ एक बूंद पी

खत्म गुलामी। नई फसलें

                    जा चांद पे काटेंगी

                     चांदी ही चांदी। सोच टू रोप

                                            अन्तर्मन में आज

                                               पुकारे ताज।

     योगेन्द्र प्रसाद अनिल

    स्वरचित व मौलिक रचना तेजपुरा, ओबरा, औरंगाबाद, बिहार

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बहुमूल्य वैचारिक पत्रिका सोच-2

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      सोच-2 नदलेस,दिल्ली की एक श्रेष्ठ पत्रिका है,जो मेरे पंद्रह दिवसीय बिहार भ्रमण के दौरान डाक से आ कर मेरी प्रतीक्षा में थी। कल,पहले मैं ने वह डाक खोली,जिसमें से सभी कवियों की एक-एक कविता,संपादक महोदय ने अपने फेसबुक पेज पर पढ़ दी थी,तो लगा कि पहले शेष से ही परिचित हो लूं।आज तो 'सोच-2' देखने की सोच स्वाभाविक थी।सोच-2 पर कुछ और कहने से पहले यह कह दूं कि इस पत्रिका में मेरी भी तीन कविताएं शामिल की गई हैं। हालांकि आज नदलेस की आमसभा में भी बुलावा था,जिसमें जा कर इसके सदस्यों में से अधिकांश से मिलने का सौभाग्य मिल जाता,पर अपरिहार्य कारणवश जाना संभव नहीं हो पाया। मैं कभी इस संस्था की किसी बैठक,या उसके जीवंत कार्यक्रम में नहीं जा पाया हूं,दो-चार बार आभासी गोष्ठियों में अवश्य ही शामिल हुआ हूं।हालांकि संस्था के अध्यक्ष डॉक्टर कुसुम वियोगी जी,महासचिव डॉक्टर अमित धर्मसिंह जी और हुमा खातून जी के साथ ही,कुछ अन्य सदस्यों से भी,संयोग से दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी के एक कार्यक्रम में भेंट हो चुकी है।

      'नदलेस' से जुड़ने से पहले मैं भी इसे नहीं समझ पाया था,क्योंकि यह एक साहित्यिक संस्था का नाम-संक्षेप है।तो पाठकों की सुविधा के लिए यह बता दूं कि इसका पूरा नाम है 'नव दलित लेखक संघ',जिसके सदस्य बिना जाति-भेद,सम्प्रदाय-भेद के,शोषण की पीड़ा समझने वाले और शोषण सहित हर प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले साहित्यकार हैं।वैसे भी साहित्यकार की प्रमुख भूमिका समाज के विद्रूप को आईना दिखाना और उसे आदर्श की ओर उन्मुख करना ही होता है।राष्ट्रकवि रामधारी सिंह जी कहते हैं :

          जय हो जग में जले जहां भी, नमन पुनीत अनल को,

          जिस नर में भी बसे,हमारा नमन तेज को बल को!

             किसी वृंत पर खिले विपिन में,पर नमस्य है फूल;

             सुधी खोजते नहीं गुणों का आदि,शक्ति का मूल!

        अब सोच-2 की सोच की बात करते हैं।यह अंक आजीवन सदस्य अंक है,जिसमें आजीवन सदस्यों की ही रचनाएं संपादित हैं।संपादक डॉक्टर कुसुम वियोगी जी ने संपादकीय में लिखा है,"जब कोई तरुण,युवा लेखक,जाति विहीन,समतामूलक,बौद्धमय भारत के निर्माण के लिए निरंतर लेखन में रत रहता है,तो वह सूर्य की भांति दैदीप्यमान हो कर वैश्विक समाज और साहित्य में चमकता है।" मुझे लगता है,उनका यह एक वाक्य ही नदलेस और सोच-2,दोनों की सोच को स्पष्ट करता है।

        पत्रिका को पांच सोपानों में विभक्त किया गया है।पहला सोपान विमर्श सोपान है,जिसमें प्रासंगिक विषयों पर पांच विमर्श संकलित हैं।दूसरा सोपान काव्य सोपान है जिसमें सैंतीस कवियों की कुछ-कुछ कविताएं शामिल की गई हैं।मेरी तीन कविताएं हैं 'बाबा साहब का मान', 'न्यायाधीश बताएं!' और 'मज़हब के नाम पर!' कथा सोपान में बारह कथाकारों की रचनाएं शामिल हैं। जनमत सोपान में तीन निबंधकारों ने मुद्दे व्याख्यायित किए हैं;जब कि अंतिम,नदलेस सोपान में दो समीक्षकों की नदलेस की गतिविधियों पर अभिव्यक्ति है,एक कवि ने नदलेस के बारे में बारह हाइकु लिखे हैं।और आख़िर में संस्थापक और महासचिव डॉक्टर अमित धर्मसिंह जी ने सभी एक सौ पचहत्तर आजीवन सदस्यों की सूची,उनके स्थान और संपर्क नंबर के साथ में दी है। पुष्पांजलि प्रकाशन शाहदरा,दिल्ली से प्रकाशित दो सौ चौंसठ पृष्ठों की इस वार्षिक पत्रिका सोच-2 में,जिसका मूल्य मात्र तीन सौ रुपए है,बहुमूल्य सामग्रियों का संकलन है।देश और समाज के परिदृश्य को समझने के लिए यह एक उच्च कोटि की पत्रिका है।

                                - अरुण कुमार पासवान

"कविता

                 सोच

समय से आगे की सोच। 

समय के अनुकूल सोच। 

अब तू आजाद है, चाहे तो , 

विपरीत परिस्थितियों के प्रतिकूल सोच। 

बंजर खेतों की सोच। 

अपने खलिहानों की सोच। 

देश का अन्नदाता भूखा है, 

परिश्रमी किसानों की सोच। 

अब गरीबों की सोच। 

और फकीरों की सोच।।

 सीमाओं पर डटे इन, 

जांबाज वीरों की सोच। 

संसार में गुनाह करने वाले, 

सारे गुनहगारों की सोच। 

इन पर लगाम कैसे लगे? 

शोषक सितम गारों की सोच। 

शैतानों को दबोचने की सोच। 

हैवानों को नोंचने की सोच। 

दुनिया अय्यारों से भरी पड़ी है, 

इनमें भलामानस खोजने की सोच। 

नारी के बारे में सोच।

नारी के अधिकारों की सोच। 

समतामूलक समाज विकसित हो, 

देश में ऐसी सरकारों की सोच। 

निकट भविष्य की सोच। 

सुखद वर्तमान की सोच। 

जो भी हो बेहतर सोच, 

देश के नवनिर्माण की सोच। 

सशक्त कलम की सोच। 

अर्वाचीन कलम कारों की सोच।  

सड़ी-गली परम्पराओं को छोड़कर, 

वैज्ञानिक विचार धारा की सोच। 

कवि- मदन लाल राज"

******

"नदलेस दिल्ली की बेहतरीन प्रस्तुति

उम्दा कलमकारों का कलमकर्म सोच 

एक रचना 'संविधान दिवस ' मेरी भी 

पुस्तक रूप वार्षिकी हाथों में गई पहुंच 

डॉ कुसुम वियोगी जी की सफल अध्यक्षता

उन्ही के कुशल संपादन में 

डॉ अमित धर्मसिंह हैं मुख्य सूत्रधार

नदलेस मंच हैं सोच 2 आधार"

              -मोहनलाल सोनल मनहंस, राजस्थान


"नव दलित लेखक संघ की तरफ से प्रेषित किया गया पत्रिका हमें 13 सितम्बर 2023 को प्राप्त हुआ। उसके लिए आप सभी साथियो को तहेदिल से बहुत बहुत साधुवाद। 

 नव दलित लेखक संघ की रचनात्मक प्रस्तुति " सोच " वार्षिकी सितम्बर 2022 से अगस्त 2023 " वर्ष-2 अंक-2 में मेरा लेख :- 

1- हाशिए पर अनुसूचित जाति। 

 2- हिन्दी साहित्य में गोरख रैदास और कबीर की उपेक्षा क्यों ?

पेज संख्या- 11 से 18 पर प्रकाशित हुआ है। 

इसके लिए " सोच " के संस्थापक/ प्रधान संपादक - डॉ. अमित धर्मसिंह, संपादक- डॉ. कुसुम वियोगी/ कबीर कात्यायन जी का और नव दलित लेखक संघ- दिल्ली के सभी पदाधिकारियों को बहुत बहुत साधुवाद। 

नमोबुध्दाय जयभीम 

- राजेश कुमार बौद्ध 

संपादक 

हिन्दी मासिक पत्रिका " प्रबुद्ध विमर्श "

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।"


"नदलेस की वार्षिक पत्रिका ‘सोच-2’ की प्रति मुझे 18/09/2023 को प्राप्त हुई. इसमें मेरी दो कविताएँ- ‘अंधभक्ति व बैठकर चौमंजिले पर’ प्रकाशित हुई हैं. पत्रिका के प्रधान सम्पादक डा० अमित धर्मसिंह जी, सम्पादक डा० कुसुम वियोगी जी एवं अन्य सभी सहयोगी सम्पादकों का आभार व्यक्त करता हूँ. पत्रिका अपने आप में आकर्षक तो है ही, उत्तम विचारों का ख़ज़ाना भी है. यह वर्तमान में दलित-बहुजन सोच का प्रतिनिधित्व करती है. पत्रिका के उज्ज्वल भविष्य के लिए मेरी अनंत शुभ कामनाएँ" 

- ई. रूप सिंह रूप, आगरा


"नदलेस की तरफ से प्रेषित वार्षिक पत्रिका ' सोच ' का दूसरा अंक मुझे भी 21 सितंबर 2023 को हस्तगत हुआ..इसके लिए सोच के प्रधान संपादक डॉ अमित धर्मसिंह जी, संपादक डॉ कुसुम वियोगी सर एवम पत्रिका परिवार का अभिनंदन, आभार, शुक्रिया !

यदि डॉ कुसुम वियोगी सर को दलित साहित्य के संस्थापक सदस्य कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी...और ऐसे वरिष्ठ और अनुभवी साहित्यकार के संपादन में इस सोच पत्रिका की दूसरी अंक को संपादन करना पत्रिका की अपने आप में महत्व बढ़ जाती है !

प्रस्तुत अंक में लगभग डेढ़ दो पन्नों में संपादक महोदय की संपादकीय प्रेणादायक है...बाबा साहब डॉ आंबेडकर द्वारा स्थापित बौद्ध महासभा, आरपीआई, समता सैनिक दल सभी को छूते हुए नदलेस परिवार की यात्रा सभी को संक्षिप्त में शामिल की गई है !

संपादकीय के अलावा यह वार्षिक सोच पत्रिका 5 सोपानों से गुजरी है जिसमें....

पहला सोपान में कुल 6 कलमकारों द्वारा 7 ज्वालंतशील मुद्दों पर आधारित वैचारिकी लेख बेहद ही गंभीर है !

दूसरा सोपान यानी काव्य सोपान में कुल 37 कवियों की कुल 87 कविताएं प्रकाशित है..जिसमें मेरी भी तीन कविताओं को शामिल की गई है..जो पृष्ठ संख्या 108 से 110 पर अंकित है !

तीसरी सोपान माने कथा सोपान में कुल 11 कथाकारों की 14 कहानियां भी सम्मिलित है इस अंक में इस पत्रिका को चार चांद लगाती है !

चौथे सोपान में जनमत सोपान के माध्यम से 3 रचनाकारों के 3 अभिमत प्रस्तुत की गई है...जिसमें आदिवासी कवित्री वंदना टेटे जी की दूसरी कविता संग्रह ' किनीर ' का बहुत ही सहज और सटीक समीक्षा की गई है डॉ अनीश कुमार जी द्वारा जो गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं

और अंतिम पांचवा सोपान में नदलेस सोपान के अंतर्गत नदलेस की मासिक, वार्षिक बैठक की रिपोर्ट....हाइकु.. नदलेस परिवार की आजीवन सदस्यों की सूची..एवम नदलेस की पदाधिकारी और कार्यकारिणी की सूची दी गई है !

कुल मिलाकर सोच की यह दूसरा अंक आजीवन सदस्य विशेषांक पर ही आधारित है और लगभग उन्हीं सदस्यों की रचनाएं ही इस अंक में शामिल है.. जो प्रसंस्नीय है...काबिलेटरीफ है...क्योंकि देश की राजधानी दिल्ली से संचालित नव दलित लेखक संघ ने साहित्य के क्षेत्र में जो मुहिम छेड़ी है.. उन गांव, देहात में रहने वाले प्रतिभावान, गुमनाम, कलमकारों को एक मंच देने का, उनके रचनाओं को प्रकाशित करने का वाकई काबिलेतारिफ है !

हालांकि मेरा मानना ऐसा भी है कि पुराने वरिष्ठ साहित्यकारों का सम्मान और नए कलमकारों का स्वागत होना चाहिए..दोनों के बीच में संतुलन जरूरी है...क्योंकि वरिष्ठों के पास एक लंबा अनुभव होता है !

तो लीजिए आप लोग भी पढ़िए सोच वार्षिक पत्रिका को..जो पुष्पांजलि प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुई है!

पुनः शुक्रिया, आभार डॉ अमित धर्म सिंह सर का !"

- राम राम भारद्वाज

22/09/2023


"नव दलित लेखक संघ का वार्षिक संकलन सोच-2 कल प्राप्त हुआ. इस संकलन की विषय सूची बेहतरीन हैं, जिसमें नाम के अनुरूप कार्य किया गया है अर्थात् नये साहित्यकारों का मुकम्मल संकलन है. इस संकलन में आजीवन सदस्यों की सूची जारी की गयी है, जिसमें देश के तमाम साथियों के साथ हमारा भी नाम है. नव निर्माण की प्रक्रिया में यह ठोस कदम है. इस संगठन में कुसुम वियोगी सर व मुख्यतः डॉ. Amit Dharmsingh जी बहुत ही सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, इस हेतु आपका ह्रदय से धन्यवाद!

धन्यवाद मुख्यतः इसलिए क्योंकि अनेक युवा साथियों के साथ हमने भी साहित्य के क्षेत्र में बहुत-सी योजनाएँ बनाई थी, किन्तु वर्तमान संघर्ष के दौर में खासकर बेरोजगारी के दंश ने ऐसे हताहत किया कि सारी योजनाएं धरी की धरी रह गयीं, तब ऐसे संक्रमण काल में जो साथी महत्वपूर्ण कार्य में संलग्न हैं, वे सभी धन्यवाद के पात्र हैं. नव दलित लेखक संघ भी पूरी टीम को बधाई एवं मंगलकामनाएं"

डॉ. प्रदीप कुमार गौतम


"Aadarniya Mausa Ji (jogendra Singh) ...apka haardik dhanyawad...."soch" pustak ke is naveentam bhaag ko pahunchaane ke liye....aapki rachnaayein "santushti" aur "aao Holika se maafi maange" padhi dono hi bahut behtareen rachnaayein hain....abhi adhyaan jaari hain...... pustak ki sameeksha baad mein....saath hi Shri Amit Dharm Singh ji ka bhi hriday ki gehraai se aabhar vyakat kartaa hoon jo unhone pustak mujh tak pahunchne ka kasht Kiya...!"

Jairaj, Delhi

"नव दलित लेखक संघ का सराहनीय क़दम।

नव दलित लेखक संघ के सोच   1  और सोच  2 के दो अंक आज मिले।नदलेश के अध्यक्ष डॉ कुसुम वियोगी और सचिव  डॉ अमित धर्म सिंह  जी ने बहुत मेहनत और लगन से दोनों अंको का प्रकाशन कराकर देश की बहुजन जातियों को जागरूक बनाने मे अहम भूमिका निभाया है। यही नही इस संघ ने वेव पोर्टल और फिजिकल मंच पर कई कवि सम्मेलन कहानी परिचर्चाएं भी कराया है।सोच पत्रिका के दूसरे अंक में संघ से जुड़े आजीवन सदस्यों की सूची प्रकाशित की गई है।इन अंकों मे देश के चुनींदा साहित्यकारों के ज्वलंत  मुद्दों पर लिखे गए  लेख एवं कविताएं प्रकाशित की गई हैं। कुल मिलाकर  सोच पत्रिका के सम्पादक मंडल का कार्य उत्कृष्ट और प्रशंसनीय है।मै इसके उज्वल भविष्य की मंगल कामनाएं करता हूं।"

   आर.जी.कुरील

   सामाजिक चिंतक

09/10/2023


#आभार🙏💐🙏

(सोच के साथ आप भी अपना फोटो भिजवा सकते हैं...)

डॉ. नरेश सागर, हापुड़, उत्तर प्रदेश

कांशीराम, हरियाणा

              डॉ. धीरज वनकर, अहमदाबाद, गुजरात


बाबूलाल तोंदवाल, नारनौल, हरियाणा

                         सुनीता वर्मा, राजस्थान

                  डॉ. सीमा माथुर, दिल्ली

                 डॉ. पूनम तुषामड, दिल्ली

                         सरुप सियालाबी, पंजाब

             डॉ.  नंदलाल कौशल, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

               देव प्रसाद पाटरे, मुंगेली, छत्तीसगढ़

             शकुंतला दीपांजली, कानपुर, उत्तर प्रदेश

                     डॉ. राधा वाल्मीकि, उत्तराखंड

                     आर एस मीणा, राजस्थान

हरीश पांडल, छत्तीसगढ़

              कश्मीर सिंगर, एर्नाकुलम, केरल

एस एन प्रसाद, लखनऊ

योगेन्द्र प्रसाद अनिल, बिहार

                 मोहनलाल सोनल मनहंस, राजस्थान

              ई. रूप सिंह रूप, आगरा, उत्तर प्रदेश

               डॉ. प्रदीप कुमार गौतम, मध्य प्रदेश

                रामसूरत भारद्वाज, छत्तीसगढ़

                 रिछपाल विद्रोही की भांजी राजस्थान

                        सरिता भारत, राजस्थान

             राजेश कुमार बौद्ध, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

                     डॉ. अनीश कुमार, छत्तीसगढ़ 

                         जयराज जी, दिल्ली
                      ममता अंबेडकर, गाजियाबाद

उज्जैन में, भूतपूर्व केन्द्रीय समाज कल्याण मंत्री, राज्य सभा सांसद साहित्यकार डॉ.सत्यनारायण जटिया जी को नदलेस की कार्यकारिणी सदस्य एवं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ.उषा सिंह " सोच- 2 " का वार्षिक अंक भेंट करते हुए। साथ में पूर्वदेवा के संपादक प्रो.डा.हरि मोहन धावन।

राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष दुलाराम साहरन उपाध्यक्ष सुनीता घोघरा जी को उदयपुर में सोच पत्रिका भेंट करते हुए सरिता भारत जी।

       प्रकाशक, आर के यादव, सम्पादक, डॉ. कुसुम वियोगी,
    संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक, डॉ. अमित धर्मसिंह दिल्ली








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