31/08/2023 को सोच 2 छपकर आयी



संपादकीय

डा. कुसुम वियोगी

आजीवन सदस्य विशेषांक, सोच का यह अंक

          प्रिय पाठक एवं लेखक वृंद सोच वार्षिकी का दूसरा अंक आपके हाथों में सौंपते हुए हर्ष हो रहा है। इस अंक का उद्देश्य सृजनशील नव लेखकों के साथ वरिष्ठ लेखकों की रचनाओं को इस अंक में समाहित करना रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि दलित साहित्य आज अपनी वैश्विक पहचान स्थापित कर चुका है। तीसरी पीढ़ी दलित साहित्य की मूल अवधारणा को लेकर, मसलन बुद्ध, कबीर, फूले तथा डा. अंबेडकर के वैचारिक धरातल पर उतरकर अपने लेखन की सार्थकता सिद्ध कर रही है। तथागत बुद्ध के कथनानुसार "जब कोई तरुण भिक्कू बुद्ध शासन की सेवा में रत हो जाता है तो वह बादलों से मुक्त चंद्रमा की तरह इस संसार को प्रकाशित करता है।" साहित्य के संदर्भ में मेरी मान्यता है "जब कोई तरुण युवा लेखक जातिविहीन, समतामूलक बौद्धमय भारत के निर्माण के लिए निरंतर लेखन में रत रहता है; तो वह सूर्य की भांति दैदीप्यमान होकर वैश्विक समाज और साहित्य में चमकता है।" 
           प्रायः देखने में यह भी आ रहा है कि आज तक दलित साहित्य के भाष्यकार अधिकृत विद्वानों की समझ में यह भी नहीं आ पा रहा कि हम दलित साहित्य का छोर कहां से पकड़ें। मसलन बुद्ध से, आजीवक से, कबीर से, रैदास से, फूले या डा अंबेडकर से शुरू किया जाए, जो आज भी विचारणीय एवं शोध का यथार्थ धरातल ढूंढने में असमर्थ है। यह शोधार्थियों और विद्यार्थियों, साहित्य अध्यताओं व लेखकों के लिए अनिवार्य है। यूं तो मराठी दलित साहित्य की पूर्वपीठिका ने दलित साहित्य के प्रतिमान को स्थापित कर दिया था। किंतु उत्तर भारत का दलित साहित्य का विस्तार संघर्ष से न उपजकर, समाज सुधारक के रूप में उन्नीस सौ चौदह से दस्तक दे रहा था। जिसकी फुटकर आवाज यत्र-तत्र पत्रिकाओं में देखने को मिल रही थी। कालांतर में यही विचारधारा साहित्य में अस्सी के दशक में उभरकर सामने आई। जिसमें लोक कवियों एवं शिक्षित लोगों ने अंबेडकर और बुद्ध की विचारधारा का अनुकरण किया। बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में संविधान को समर्पित करते हुए कहा कि हमें राजनीतिक रूप से तो समता प्राप्त हुई परंतु सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में समता प्राप्त करने के लिए अभी बहुत संघर्षशील रहना पड़ेगा। समाज में सर्वहारा का समाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक शोषण के विरुद्ध शिक्षित लोगों का आक्रोश उभरकर सामने आया और साहित्य में संविधान की मूल प्रस्तावना समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता की पुरजोर मांग दलित साहित्यकारों ने उठाई। यही मांग दलित साहित्य का मूल विषय बनी।
           उन्नीस सौ चौसठ से ही बाबा साहब डॉ. अंबेडकर द्वारा स्थापित भारतीय बौद्ध महासभा, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, समता सैनिक दल, अंबेडकरी बौद्ध आंदोलन साहित्य, समाज एवं राजनीति में उतरा। फलस्वरूप डॉ. अंबेडकर की वैचारिकी को लेकर स्वतंत्र लेखन समाज के समक्ष आया। उन्नीस सौ अस्सी के दशक में इसकी अनुगूंज समस्त भारतीय भाषाओं में बड़ी शिद्दत के साथ गूंजने लगी। विभिन्न विधाओं में दलित साहित्य लेखन उभरकर आया। जिसे पढ़कर व देखकर परंपरावादी लेखकों ने भाषा व शिल्प को लेकर अनेक सवाल उठाए। जिसका डटकर मुकाबला पहली पीढ़ी के दलित लेखकों ने सेमिनारों और अधिवेशनों के माध्यम से किया। वहीं भाषा शिल्प को लेकर अपना सौंदर्य शास्त्र भी गढ़ा। सन उन्नीस सौ से दो हजार दस तक आते-आते दलित साहित्य पर देश-विदेश के विद्यालयों में अनेक शोध हुए। दलित साहित्य ने अपना ठोस आकार ले लिया। विश्विद्यालय के पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाने लगा। जिससे नव पीढ़ी की तीसरी फसल उभरकर आई जो आज निरंतर लेखनरत है। 
          परंतु बाद दिनों में दलित लेखक संघ की जातिगत मानसिकता उभरकर सामने आई जिससे संघ में टूट-फूट हुई जो कई धाराओं में बंट गई। इसमें भी कोई संदेह नहीं, जब कोई मूल विचारधारा को लेकर किसी संघ का बीजारोपण होता है तो उसके वृक्ष बनने के उपरांत उसकी शाखाएं फूटना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। अगर मूल विचारधारा को लेकर कोई और शाखा पनपती है तो उसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं। अगर वही जड़ से कटकर महत्त्वकांक्षी लोग संघ के तने को काटकर बोंशाई कलम रौपते हैं तो उन महत्त्वकांक्षी लोगों के लिए शीघ्र फल प्राप्त करने की लालसा के कारण फल तो प्राप्त होते हैं, तदुपरांत जल्द ही वह बोंशाई संगठन अपने अस्तित्व को खो देता है। क्योंकि उसकी जड़ में मूल वैचारिकी का अभाव होता है। नव दलित लेखक संघ के गठन से पूर्व नदलेस के संस्थापक और वर्तमान महासचिव डा. अमित धर्मसिंह ने बिखरे संगठनों को एक करने के लिए भरसक प्रयत्न किए। मगर कुछ पदलोलुप महत्त्वकांक्षी लोगों के कारण वह संभव न हो सका। तदुपरान्त नव दलित लेखक संघ अस्तित्व में आया, जो बुद्ध, कबीर, अंबेडकर, ज्योतिबा फूले की वैचारिकी को लेकर सबसे जुड़ें सबको जोड़ें की भावना के साथ अपनी योजना को क्रियान्वयन देने लगा। इस संघ ने उपेक्षित कनिष्ठ एवं वरिष्ठ लेखकों को एक नया सम्यक-वितान (स्पेस) दिया। जिसका सुफल परिणाम यह आया कि आज पूरे देश के लेखकों का जुड़ाव नदलेस से बना हुआ है। पूरे देश के विभिन्न राज्यों से साहित्यकारों ने नदलेस से जुड़कर सुखद अहसास की अनुभूति भी की है। नदलेस ने बहुत थोड़े समय में ही कवि गोष्ठी, परिचर्चा, कहानी पाठ और संगोष्ठियों आदि के माध्यम से अपनी राष्ट्रव्यापी पहचान बनाई। जिसका श्रेय नदलेस के संस्थापक/महासचिव तथा उनकी समस्त पदाधिकारी टीम को जाता है। यही नहीं मेरे आह्वान पर जब दलित लेखक संघ की स्थापना हुई तो उस समय 'सोच' निकालने का प्रस्ताव परवान न चढ़ सका। अंततः उसी मूल विचार को लेकर नदलेस ने सोच पत्रिका की वार्षिकी का आरंभ किया। जिसकी पाठकों द्वारा अति सराहना की गई। सोच वार्षिकी में नव लेखकों के साथ वरिष्ठों को भी समाहित किया जा रहा है। इस अंक से पूर्व, साहित्यकारों ने सोच पत्रिका के प्रथम अंक का खुले दिल से स्वागत किया और प्रसंशा के पुल बांध दिए। उम्मीद है यह अंक भी पसंद आएगा।
           इस अंक में सम्मिलित रचनाकारों की विभिन्न विधाओं की रचनाओं के माध्यम से आप फिर परिचित होंगे। यह पत्रिका मात्र पत्रिका ही नहीं, बल्कि दलित साहित्य आन्दोलन का उत्तरोत्तर दस्तावेज भी है। किसी खास रचना विशेष को संदर्भित करना संपादक के लिए संभव नहीं, क्योंकि रचनाकार अपने स्वयं के शब्द और शिल्प से ही पाठकों के बीच अपनी पहचान बनाता है। यूं तो बहुत कुछ कहा लिखा जा सकता है जो अस्वस्थता के कारण संभव नहीं हो पा रहा है। फिर भी दलित साहित्य आन्दोलन की मूल प्रवृत्ति और मुख्य बिंदुओं को छूने का प्रयास किया गया है। मुझे मुख्य संपादक डा. अमित धर्मसिंह एवं समस्त पदाधिकारियों पर पक्का यकीन है कि वे अनेक अवरोधों के बावजूद नदलेस और इसकी वार्षिक ज्योति सोच को निरंतर प्रकाशमान करते रहेंगे। सोच का यह अंक नदलेस के आजीवन सदस्य विशेषांक है। जिन भी सदस्यों ने निर्धारित समय में अपनी रचनाएं प्रेषित की, इस अंक में सबको शामिल किया गया। जो सदस्य रचनाकार किन्ही कारण इस अंक के लिए अपनी रचनाएं नहीं भेज पाएं हैं, उनकी रचनाओं को अगले अंक में प्रमुखता से प्रकाशित करने का प्रयास रहेगा। सोच के प्रकाशन के लिए जिन भी रचनाकारों ने रचनाएं प्रेषित की और कार्यकारिणी के जिन भी सदस्यों ने आर्थिक सहयोग दिया सबके प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया जाता है। जो रचनाकार देश भर से नदलेस के ऑफलाइन और ऑनलाइन कार्यक्रमों में जुड़कर कार्यक्रमों को सफल बनाने में महती भूमिका निर्वाह करते हैं, नदलेस की ओर से उनका भी स्थायी आभार व्यक्त किया जाता है। पत्रिका के इस अंक के लिए डा. गीता कृष्णांगी, पुष्पा विवेक, मामचंद सागर, बंशीधर नाहरवाल, मदनलाल राज़, हुमा खातून, बृजपाल सहज, जोगेंद्र सिंह, समय सिंह जोल आदि का विशेष आभार व्यक्त करता हूं जिन्होंने पत्रिका के संपादन और प्रकाशन करने में वांछित सहयोग दिया। इसी के साथ पुष्पांजलि प्रकाशन और इसके डायरेक्टर श्री आर. के. यादव जी का विशेष आभार कि उन्होंने वांछित समय और स्वरूप में सोच का प्रकाशन किया। आशा है आप सबका, नदलेस और सोच को इसी तरह यथायोग्य सहयोग प्राप्त होता रहेगा। इसी मंगलकामना के साथ...

डा. कुसुम वियोगी (कबीर कात्यायन)
पूर्व सदस्य, हिंदी अकादमी दिल्ली, कला संस्कृति भाषा विभाग, दिल्ली सरकार।
9911409360/931929279360
kusumviyogi@gmail.com







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