29/08/2023 को हुई वार्षिक मूल्यांकन बैठक की रिपोर्ट और फोटो

 


नदलेस की वार्षिक मूल्यांकन की बैठक

दिल्ली। नव दलित लेखक संघ की दूसरी कार्यकारिणी के वार्षिक मूल्यांकन की बैठक का आयोजन नदलेस की ओर से कनॉट प्लेस, दिल्ली स्थित, इंडियन कॉफी हाउस पर किया गया। बैठक की अध्यक्षता नदलेस के उपाध्यक्ष मदनलाल राज़ ने की और संचालन महासचिव डॉ. अमित धर्मसिंह ने किया। बैठक में मदनलाल राज़ और डॉ. अमित धर्मसिंह के अलावा कार्यकारिणी के अंकेक्षक बंशीधर नाहरवाल, कोषाध्यक्ष लोकेश कुमार, सहसचिव बृजपाल सहज, प्रचार सचिव हुमा खातून, सम्मानित सदस्य डॉ. गीता कृष्णांगी, पुष्पा विवेक और जोगेंद्र सिंह उपस्थित रहे।
           बैठक में सर्वप्रथम महासचिव डॉ. अमित धर्मसिंह ने नदलेस द्वारा वर्ष भर में किए गए कार्यक्रमों और प्रमुख गतिविधियों पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि "नदलेस ने गत एक वर्ष यानी दूसरी कार्यकारिणी के कार्यकाल में लगभग पैंतीस ऑफलाइन और ऑनलाइन गोष्ठियां आयोजित कीं। इन गोष्ठियों में चौदह कहानीकारों की कहानियों पर परिचर्चाएं आयोजित की गईं। ये चौदह कहानियां क्रमशः परित्याग : डॉ. अमिता मेहरोलिया (पालम, दिल्ली), शांता : डॉ. मनोरमा गौतम (त्रिलोकपुरी, दिल्ली) अनोखेलाल चश्मे वाला : महिपाल (गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश), स्वतंत्र भाला : नितिन यादव (जयपुर, राजस्थान), सपनों का घर : सतीश खनगवाल (उत्तम नगर, दिल्ली), चमार का कुंआ : डॉ. खन्नाप्रसाद अमीन (गुजरात), इक्कीस पोस्ट : डॉ. संजीत कुमार (मयूर विहार, दिल्ली), एक रास्ता : हुमा खातून (दरिया गंज, दिल्ली), गद्दार : मामचंद सागर (राजोकरी, दिल्ली), आटे सने हाथ : डॉ. कुसुम वियोगी (शाहदरा, दिल्ली), अभिशप्त जीवन : पुष्पा विवेक (रोहिणी, दिल्ली), ठोकर : डॉ. पूनम तुषामड़ (शास्त्री नगर, दिल्ली), पंजाबी दलित कहानी- अंबेडकरी : सरुप सियालवी (पंजाब) और मॉडल : डॉ. अमित धर्मसिंह (नांगलोई, दिल्ली) की कहानियां रहीं। कहानियों पर ऑफलाइन और ऑनलाइन गोष्ठियां आयोजित करने के लिए हिंदी और हिंदीतर एवं दिल्ली तथा दिल्ली से बाहर के सभी वय के स्त्री-पुरुष कहानिकारों को शामिल किया गया। यह पूरा साल कहानी की कार्यशाला और प्रयोगशाला की तरह रहा। इसका सुपरिणाम यह रहा कि कुछ रचनाकारों ने पहली-पहली बार भी कहानियां लिखीं, जिन पर नदलेस ने परिचर्चा गोष्ठियां रखी। इनके अलावा कार्यकारिणी के अध्यक्ष डॉ. कुसुम वियोगी के कविता संग्रह 'धारा के विरुद्ध' का लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया। बंशीधर नाहरवाल के उपन्यास 'गरीबा की तिजोरी' पर परिचर्चा गोष्ठी रखी गई। ऑनलाइन कार्यक्रमों में दर्जनों स्वतंत्र काव्य पाठ गोष्ठियों के अलावा एक लघुकथा वाचन एवं परिचर्चा गोष्ठी की गई। मणिपुर की निंदनीय घटना पर अखिल भारतीय महिला काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। नदलेस द्वारा आयोजित सभी ऑफलाइन और ऑनलाइन गोष्ठियां अप्रत्याशित रूप से सफल रहीं। वर्ष के समाप्त होते होते पुष्पांजलि प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली से 'सोच 2' की 200 प्रतियां प्रकाशित करवाई होकर आईं। नदलेस ने उक्त परिचर्चित कहानियों में से चयनित कहानियों का संकलन भी इसी वर्ष दिसंबर तक प्रकाशित करने की योजना बनाई। गत एक वर्ष में, देश भर से, डेढ़ सौ से अधिक रचनाकार नदलेस के आजीवन सदस्य बनें, जिन्होंने नदलेस को भरपूर रचनात्मक सहयोग दिया। इस प्रकार कार्यक्रमों, सदस्यों और प्रकाशन की दृष्टि से पूरा वर्ष काफी समृद्ध रहा।"
          कोषाध्यक्ष लोकेश कुमार ने वर्ष भर का आय-व्यय विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि "आजीवन सदस्यताओं और नदलेस की समस्त कार्यकारिणी से जो आर्थिक सहयोग प्राप्त हुआ उससे नदलेस के पास नकद 41953 ₹ (इकतालीस हजार नौ सौ तिरपन रुपए) जमा हुए। (मीटिंग के दस ग्यारह दिन बाद और रिपोर्ट लिखे जाने से पहले इसमें सम्मानित सदस्य डॉ. रामनिवास जी की वार्षिक सहयोग राशि- दो हजार रुपए शामिल की गई) इस तरह यह राशि बढ़कर 43953 (तितालिस हजार नौ सौ तिरपन रुपए) हुई। पूरे वर्ष में, सभी डॉक्यूमेंटेशन और सामग्री का रूटीन खर्च 12239 (बारह हजार दो सौ उनतालीस रुपए) रहा। इसे काटकर 31714₹ (इकत्तीस हजार सात सौ चौदह रुपए) बचे। आज की मीटिंग उपस्थित नौ लोगों का जलपान और खान-पान खर्च 1874 रुपए आया और बैरे को 126 रुपए टिप्स के दिए गए। इस तरह आज की मीटिंग में 2000₹ खर्च हुए। इन्हें काटकर शेष बचे 29714 ₹ ( उनतीस हजार सात सौ चौदह रुपए)। सोच 2 की 200 प्रतियां 22000₹ में छपवाई गई। इन 22000 रुपयों में नदलेस की ओर से 12000₹ दिए गए। (शेष दस हजार रुपए संपादक और अध्यक्ष रहे डॉ. कुसुम वियोगी ने व्यक्तिगत स्वेच्छिक तौर से सहयोग स्वरूप दिए)। तदुपरांत, नदलेस के पास 17714 (सत्रह हजार सात सौ चौदह रुपए) शेष बचे। इनमें से 17000₹ रुपए दिसंबर में प्रकाशित होने वाले परिचर्चित कहानी संकलन के प्रकाशन हेतु महासचिव डॉ. अमित धर्मसिंह के पास नकद संरक्षित किए गए और सात सौ चौदह रुपए अगले वर्ष की आय में सम्मिलित किए गए। इस प्रकार गत वर्ष, कार्यकारिणी के सम्मानित सदस्यों, पदाधिकारियों और आजीवन सदस्यों द्वारा किए गए आर्थिक और रचनात्मक सहयोग से नदलेस वांछित प्रकाशन और कार्यक्रम आदि करने में पूर्णतः सफल रहा।" बैठक में गत वर्ष की सभी गतिविधियों से जुड़े डॉक्युमेंट्स जैसे अखबारों में प्रकाशित प्रेस रिपोर्ट, कार्यक्रम के पोस्टर, फोटोग्राफ्स और ईमेल पर उपलब्ध रिपोर्ट्स के प्रिंट्स का फोल्डर, कार्यक्रम संचालन रजिस्टर, आय-व्यय के रजिस्टर, सदस्यों के फॉर्म आदि से जुड़े फोल्डर्स, पंजीकृत सदस्यता वाला रजिस्टर आदि प्रत्यक्ष रूप से देखे व दिखाए गए। 
          तत्पश्चात कार्यकारिणी के उपस्थित पदाधिकारियों और सदस्यों ने गत वर्ष की संपूर्ण गतिविधियों पर अपने-अपने विचार रखे। डॉ. गीता कृष्णांगी ने कहा कि "नदलेस ने अभी तक जितने भी कार्यक्रम आयोजित किए, उन सबसे कुछ न कुछ सीखने को मिला। इसके सभी कार्यक्रम कार्यशाला और प्रयोगशाला की तरह आयोजित होते हैं, जिनमें किसी प्रकार की उत्सवधर्मिता या प्रदर्शनप्रियता का आग्रह नहीं रहता। बल्कि कुछ बेहतर सीखने व सिखाने का जज्बा रहता है। यही कारण है कि इतने कम समय में नदलेस ने देश व्यापी पहचान बना ली है। हर भाषा, हर उम्र और क्षेत्र के रचनाकार नदलेस से जुड़े हैं और लगातार जुड़ रहे हैं। सभी की सहभागिता से नदलेस साहित्य के नित नवीन प्रतिमान गढ़ रहा है।" बृजपाल सहज ने कहा कि "वाकई नदलेस बहुत अच्छा कार्य कर रहा है। अभी तक मेरी निगाह में जितने भी सामाजिक या साहित्यिक संगठन आए, उन्हें देखकर, मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उनमें सबसे बेहतर कार्य मुझे नदलेस का ही लगा। यह जितना युवाओं को प्रोत्साहन और स्पेस देने का कार्य कर रहा है, उतना कार्य, वर्तमान में कोई भी दूसरा संगठन नहीं कर रहा है। मुझे व्यक्तिगत तौर से भी नदलेस में बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। अगर मैं यह कहूं कि नदलेस ने मेरी विचार और भावभूमि दोनों पूरी तरह बदलकर रख दी है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। नदलेस आज की परिस्थितियों में युवा रचनाकारों की प्राथमिक जरूरत बनकर उभरा है। यह वरिष्ठों, कनिष्ठों, नए, पुराने, दिल्ली और दिल्ली से बाहर के सभी रचनाकारों को बराबर का सम्मान और स्पेस देता हुआ बेहतरीन कार्य कर रहा है।"
          जोगेंद्र सिंह ने कहा कि "मुझे तो नदलेस की कार्य प्रणाली और इसके द्वारा सहेजे जा रहे डॉक्यूमेंटेशन का तरीका बहुत ही अच्छा लगा है। यदि अन्य संगठनों ने भी काम करने का ऐसा ही रवैया और तरीका अपनाया होता तो आज वे जनता के सिरमौर होते। वास्तव में किसी संगठन द्वारा जुटाए एवं सहेजे गए डॉक्यूमेटेशन ही उस संगठन और उससे संबंधित समाज का इतिहास होता है। इसे बहुत ही अच्छे से और जिम्मेदारी से सहेजा जाना चाहिए। नदलेस यह जिम्मेदारी बहुत ही गंभीरता और सुंदर ढंग से निर्वाह कर रहा है, मुझे इसकी बेहद खुशी है। इतना ही नहीं नदलेस का यह कार्य दूसरे संगठनों के लिए भी एक प्रेरणा है। कुछ संगठन इसकी देखा-देखी ट्रैक पर आ भी रहे हैं। मैं खुद भी नदलेस से बहुत कुछ सीख रहा हूं और इसकी तर्ज पर सबरी आश्रम खड़ा करने की कोशिश में लगा हूं। मैं अन्य जिन संगठनों से जुड़ा हुआ हूं, उनमें भी मैंने सबकुछ लिखित में देने और सहेजने की प्रणाली पर जोर दिया तो उनके बिगड़े हुए स्वरूप में खुद ब खुद सुधार आने लगा है।" हुमा खातून ने कहा कि नदलेस आज जहां भी खड़ा है उसमें अमित धर्मसिंह जी का बहुत बड़ा हाथ है। ये ऐसे स्तंभ हैं जिनके सहारे से हम जैसे बहुत से छोटे बड़े पिलर खड़े हुए हैं। औरों की तरह मैंने भी नदलेस से बहुत कुछ सीखा है। नदलेस में सबकुछ इतने अच्छे ढंग से होता है कि इसमें किसी प्रकार के मतभेद की कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती है। एक-एक चीज इतने अच्छे ढंग से बतायी और समझायी जाती है कि इससे जुड़कर कोई भी रचनाकार आसानी से विकास कर सकता है। इसकी ऑनलाइन गोष्ठियों में देश भर से, एक से बढ़कर एक रचनाकार शामिल होते हैं, जिन्हें सुनकर हम सही मायने में, ठीक ढंग से लिखना-पढ़ना सीखते हैं। इस तरह, देश भर के कवि और कवयित्रियों को सुनकर ज्ञानवर्धन तो होता ही है, खुद को भी, बेहतर लिखने की प्रेरणा मिलती है। मुझे नहीं लगता कि कोई दूसरा संगठन इस तरह का उम्दा कार्य करते हुए नई पीढ़ी को तैयार करता होगा। नदलेस की एक और चीज जो मुझे बेहद पसंद है, वह यह है कि इसमें छोटे-बड़े, किसी भी रचनाकार के प्रति कोई भी भेदभाव नहीं बरता जाता है। सबको एक समान समझा जाता है। सबकी तारीफ और आलोचना दोनों की जाती है। ये सब बातें नदलेस को दूसरों से अलग बनाती हैं और इसे एक खूबसूरत परिवार बनाती हैं।"
          पुष्पा विवेक ने कहा कि "मैं पहले भी कहती रही हूं कि नदलेस इस समय दूसरे सभी दलित संगठनों से बढ़िया काम कर रहा है। इसमें जितनी पारदर्शिता, सक्रियता, सकारात्मकता और लोकतांत्रिकता से काम होता है, उतना मैंने तो किसी भी संगठन में नहीं देखा है। मैं आज से नहीं तीसियों साल से सामाजिक और साहित्यिक संगठनों से जुड़ी हुई रही हूं। लेकिन किसी में भी रचनाकार या अपने कार्यकर्ता को इतना स्पेस और सम्मान नहीं दिया जाता, जितना कि नदलेस में दिया जाता है। यही कारण है कि महज दो साल में ही नदलेस पूरे देश में फैल चुका है। इतना ही नहीं सबके सम्मान और विश्वास का पात्र भी बन गया है। लोगों ने नदलेस पर बहुत भरोसा किया है, तभी देशभर से इतनी बड़ी संख्या में साहित्यकार इससे जुड़े हुए हैं। मुझे नहीं लगता कि आज, जितने आजीवन सदस्य नदलेस के हैं उतने किसी दूसरे दलित संगठन के होंगे। इसके अलावा, नदलेस एक साल में जितने प्रोग्राम देता है, उतने किसी भी दूसरे संगठन के बूते की बात नहीं है। वरिष्ठों को साथ लेकर, कनिष्ठाें को प्रोत्साहित करके नदलेस आज दलित साहित्यकारों की, न सिर्फ एक पूरी पीढ़ी तैयार कर रहा है बल्कि देशभर के दलित साहित्यकारों की यथोचित अगुवाई भी कर रहा है।" बंशीधर नाहरवाल ने कहा कि "नदलेस ने हम जैसे वृद्धों को भी एक तरह से काम।पर लगा दिया है, वो भी राष्ट्रीय स्तर पर। कहां तो हम गुमनाम से लिख पढ़ रहे थे और कहां नदलेस से जुड़कर देशभर के साहित्यकारों से जुड़ने का मौका मिल रहा है। सेवा निवृत्ति के बाद तो जैसे टाइम काटना मुश्किल ही हो जाता है। इसलिए खाली बैठकर टाइम काटने से अच्छा होता है कि कुछ लिखा-पढ़ा जाए। लिखने-पढ़ने की प्रेरणा हमें लिखने-पढ़ने वालों से ही मिलती है। बात चाहे अध्यक्ष डॉ. कुसुम वियोगी जी की हो, मदनलाल राज़ जी की हो, जोगेंद्र सिंह जी को हो अथवा हाल ही में सेवानिवृत्त होने वाले मामचंद सागर जी की हो, सभी को नदलेस से जुड़कर जैसे पुनर्जीवन मिला है। सभी का साहित्यिक सफर, सेवा निवृत्ति के बाद तो जैसे और भी परवान चढ़ रहा हो। देशभर से और भी न जाने कितने हमारे जैसे लिखने-पढ़ने वाले सेवानिवृत्त साहित्यकार जुड़े हैं जो अपने-अपने दायरों में सिमटकर रह गए थे। नदलेस ने उन सभी को राष्ट्रीय स्तर के साहित्य और साहित्यकारों से जोड़ दिया है। एक-दूसरे से जुड़कर लिखने-पढ़ने से, न सिर्फ समय का सही यूटिलाइज होता है बल्कि पे बैक टू सोसाइटी का दायित्व भी पूरा होता है। इस संदर्भ में नदलेस बहुत अच्छा काम कर रहा है।"
          बैठक की अध्यक्षता कर रहे उपाध्यक्ष मदनलाल राज़ ने कहा कि नदलेस के पदाधिकारियों द्वारा सहेजे गए सभी डॉक्युमेंट्स देखकर ऐसा लगा जैसे यह कार्य संस्था के पदाधिकारियों ने नहीं बल्कि किसी सीए ने किया हो। सभी कुछ इतनी बारीकी से दर्ज किया गया है कि इस तरह का हिसाब-किताब और दस्तावेजीकरण करना हर किसी के वश की बात नहीं है। नदलेस की शायद इसी में जीत है कि इसका सारा कार्य सभी सदस्यों के सम्मुख होता और किया जाता है। कोई भी, कभी भी, किसी भी बारे में जानकारी हासिल कर सकता है। इतना ही नहीं इसके हिसाब-किताब रखने की जिम्मेदारी और ईमानदारी की तो मिसाल दी जानी चाहिए, क्योंकि सभी साथी इतने करीने और जिम्मेदारी से अपना कार्य करते हैं कि किसी भी संगठन में ऐसा देखने को नहीं मिलता है। कहना चाहिए कि जिस संगठन में जितनी पारदर्शिता, जिम्मेदारी और ईमानदारी से कार्य किया जाता है वह संगठन उतना ही तेजी से विकास करता है। नदलेस के विषय में बात की जाए तो इसकी कार्य प्रणाली पर तो उंगली रखने की जगह ही नहीं बचती है। डॉक्यूमेटेशन से लेकर गोष्ठियों तक, सभी कुछ बहुत बढ़िया तरीके से व्यवस्थित और अनुशासित तरीके से किया जाता है। यही कारण है कि आज देशभर से बड़ी संख्या में रचनाकार, नदलेस से जुड़कर रचनात्मक सहभागिता कर रहे हैं। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि नदलेस से जुड़े एक-एक रचनाकार के यथायोग्य प्रयास से ही नदलेस आज, अग्रणी साहित्यिक, सामाजिक संगठन से बढ़कर, देशव्यापी परिवार में रूपांतरित हो सका है। उम्मीद है सभी साथी रचनाकारों और नदलेस की यह देश व्यापी रचनात्मक, साहित्यिक और सामाजिक जुगलबंदी इसी तरह बनी रहेगी और हम सब मिलकर जरूरतमंद समाज के लिए कुछ और बेहतर करने की ओर इसी तरह अग्रसर रहेंगे।

रिपोर्ट
डॉ. अमित धर्मसिंह
महासचिव, नदलेस
15/09/2023
























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