डॉ. अमित धर्मसिंह की कहानी 'मॉडल' पर परिचर्चा गोष्ठी








डॉ. अमित धर्मसिंह की लंबी कहानी 'मॉडल' पर परिचर्चा गोष्ठी

          नव दलित लेखक संघ, दिल्ली द्वारा लोनी रोड, शाहदरा स्थित संघाराम बुद्ध विहार में डॉ. अमित धर्मसिंह की लंबी कहानी 'मॉडल' पर परिचर्चा गोष्ठी रखी गयी। यह कहानी, मॉडल बनने की प्रबल इच्छा रखने वाली दलित लड़की साक्षी धीरान के इर्द-गिर्द घूमती है। कहानी में दूसरा मुख्य पात्र नवल है। वह गीत लेखन के फील्ड में नाम कमाना चाहता है। इस संदर्भ में उसकी भेंट म्यूजिक एलबम बनाने वाले डॉ. बलवान वर्मा से होती है। वह मॉडल बनने के सिलसिले में साक्षी धीरान को भी उससे मिलवाता है, ताकि उसके गीत और साक्षी धीरान की मॉडलिंग परवान चढ़ सके। मगर डॉ. बलवान वर्मा का फोटोग्राफर सालू, नवल के सामने, डॉक्टर के फ्रोड होने का पर्दाफाश कर देता है। साक्षी और नवल समय रहते, डॉ. बलवान वर्मा के चंगुल से बच जाते हैं, किंतु सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक और जातीय जटिलताओं से नहीं बच पाते। नवल के पास तो संघर्ष करने की फिर भी संभावना बची रहती है, किंतु साक्षी धीरान के सपने तो पूरी तरह, पितृसत्तात्मक और पुरुष प्रधान समाज की भेंट चढ़ जाते हैं। कुल मिलाकर कहानी दुखांतक है। भारतीय समाज में जातिगत, आर्थिक और स्त्री-शोषण का वास्तविक मॉडल प्रस्तुत करने वाली है। गोष्ठी का संयोजन डॉ. उषा सिंह ने किया। अध्यक्षता डॉ. कुसुम वियोगी ने और संचालन बृजपाल सहज तथा हुमा खातून ने संयुक्त रूप से किया। परिचर्चा गोष्ठी में सम्मिलित होने वाले समादृत साहित्यकारों में डॉ. बृजपाल सिंह 'संत', राष्ट्रपाल गौतम, डॉ. गीता कृष्णांगी, बृजपाल सहज, डॉ. राम प्रताप नीरज, निक्षुक मिश्वू नागा, मामचंद सागर, मदनलाल राज़, नयन सिंह नयन, डॉ. घनश्याम दास, डॉ. मनोरमा गौतम, बंशीधर नाहरवाल, धनदेवी, राधेश्याम कांसोटिया, जोगेंद्र सिंह, पुष्पा विवेक, सलीमा, शीलबोधि, बीरबल बौद्ध और डॉ. चंद्र सैन आदि उपस्थित रहे।
          सर्वप्रथम डॉ. अमित धर्मसिंह ने अपनी लंबी कहानी मॉडल का संप्रेषणीय पाठ किया। उसके बाद उपस्थित साहित्यकारों ने एक-एक करके कहानी पर अपने विचार व्यक्त किये। मामचंद सागर ने कहा कि "कहानी लंबी है, किंतु कसी हुई है। कहानी पात्रों का यथायोग्य चरित्र चित्रण हुआ है। कहानी सुनने में प्रभाव छोड़ती है। एक बात जो मुझे अस्वाभाविक लगी, वह यह कि नवल जैसे किशोर की दोस्ती पचास बावन के ओमी गुर्जर से कैसे हो सकती है। बहरहाल, ऐसा नहीं कि हो नहीं सकती। पर थोड़ा अस्वाभाविक लगती है।" डॉ. घनश्याम दास ने कहा कि "कहानी पूर्णतः संप्रेषणीय है। स्त्री शोषण को केंद्र में रखकर लिखी गई है। यह कहानी स्त्री विमर्श की एक बड़ी बढ़िया कहानी है। इसमें साक्षी के माध्यम से कहानीकार ने समाज में स्त्री के यथार्थ को बखूबी प्रस्तुत किया है।" जोगेंद्र सिंह ने कहा कि कहानी में स्त्री का संघर्ष बहुत कम दिखाया गया है। अच्छा होता कि कहानी में साक्षी धीरान को जीतते हुए दिखाया जाता। इससे समाज में एक सार्थक सन्देश जाता। वैसे, कहानी सुनने में बेहद रुचिकर लगी और कहानीकार अपनी बात कहने में सफल हुआ है।" बंशीधर नाहरवाल ने कहा कि कहानी भले ही लंबी है लेकिन इससे इसकी संप्रेषणीयता में कोई फर्क नहीं पड़ा है। कहानी में एक लघु उपन्यास बनने की बहुत अधिक संभावना दिखाई पड़ती है। पात्र और संवाद बहुत कसे हुए हैं। कहानी सहज ही समझ में आती चली जाती है।" बृजपाल सहज ने कहा कि "कायदे में इसे टीनेजर के मनोविज्ञान की एक सफल कहानी मानना चाहिए। टीनेजर के जैसे सपने और संघर्ष कहानी में दिखाया गया है, वास्तव में ऐसा ही होता है। नवल की तरह मैंने खुद ने भी म्यूजिक कंपनियों के चक्कर काटे हैं। इसलिए मुझे नवल के संघर्ष का व्यक्तिगत अनुभव है। इसलिए मैं कह सकता हूं कि कहानी में सभी पात्रों का सामाजिक यथार्थ हू ब हू प्रस्तुत हुआ है" मदनलाल राज़ ने कहा कि "कहानी बहुत ही रुचिकर है। बहुत ही सटीक और बहुत ही कसी हुई है। कहानी के सभी तत्त्व कहानी में सुदृढ़ रूप से दिखाई पड़ते हैं। कथ्य इतना स्पष्ट और सहज है कि ऐसा लगता है कि कहानीकार पूरी कहानी में एक दर्शक की भूमिका में उपस्थित रहा है। उसने सबकुछ अपने सामने घटित होता देखा है। तभी वह घटनाओं और पात्रों का इतना यथार्थ चित्रण कर पाया है।" राष्ट्रपाल गौतम ने कहा कि "मुझे कहानी बहुत बढ़िया लगी। कहानी लंबी होने के बाद भी बोझिल नहीं लगी। शीर्षक के बारे में मुझे लगा कि शायद इसका शीर्षक अधूरी इच्छा जैसा भी कुछ हो सकता था। बहरहाल, कहानी में पात्रों की भाषा की भाषा को ज्यों का त्यों रखे जाने से कहानी और भी अधिक सुंदर लगी है।"
           सलीमा ने कहा कि "कहानी वास्तविकता के इतने नजदीक है कि हम सुनते- सुनते कहीं खो से गए। कहानी में कुछ भी काल्पनिक नहीं लगा। जो कुछ कहानी में दर्शाया गया है, समाज में ऐसा ही होता है। अस्सी से नब्बे फीसदी स्त्रियां साक्षी धीरान की तरह ही शोषित होती हैं और चाहकर भी आगे नहीं बढ़ पाती है। उनके सामने अनेक चुनौतियां होती हैं। वे अपने करियर और परिवार में से किसी एक को ही चुन पाती है। बहुत कम ऐसी होती हैं जो दोनों को संभाल पाती हैं। वो भी केवल वो जिनका कोई गॉडफादर होता है, साक्षी धीरान जैसी नहीं।" हुमा खातून ने कहा कि "स्त्री चाहे कामकाजी हो या गृहिणी, ज्यादातर का हाल कहानी की साक्षी धीरान जैसा ही होता है। उन्हें कामकाजी होकर भी घर संभालना पड़ता है। घर की ज़िम्मेदारी हमेशा एक स्त्री के कंधों पर ही थोप दी जाती हैं। कितनी महिलाएं हैं जो घर में पितृसता और समाज के पुरुष प्रधान होने के कारण आगे बढ़ पाती हैं? हममें से भी कितने हैं जो अपनी घर की महिलाओं को आगे बढ़ाते हैं। या कार्यक्रमों आदि में लेकर जाते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि कहानी ने भारतीय समाज की ज्यादातर स्त्रियों के शोषण को मुखर आवाज दी है।" डॉ. गीता कृष्णांगी ने कहा कि कहानी में शोषण के कई तरह के शेड्स दिखाई पड़ते हैं। कहानी में ओमी गुर्जर अपनी जगह शोषित और पीड़ित है, नवल अपनी जगह और साक्षी धीरान अपनी जगह। कहानी में साक्षी धीरान से किसी भी तरह, कम संघर्ष नवल का नहीं। कहानी कई तरह के शोषणों की प्रतीकात्मक कहानी है। मॉडल शीर्षक केवल मॉडलिंग के प्रोफेशन को ही नहीं बताता बल्कि कई तरह के शोषणों का मॉडल प्रस्तुत करता है। इनमें साक्षी का सामाजिक और शारीरिक शोषण प्रमुख है, जिसे महज एक बार सुनने या पढ़ने से भर से नहीं समझा जा सकता है।" डॉ. मनोरमा गौतम ने कहा कि "कहानी तीन प्रकार की होती हैं। लघु कथा, कहानी और लंबी कहानी। मॉडल कहानी 'लंबी कहानी' श्रेणी की सफल कहानी है। सफल इसलिए कि बात चाहे पात्रों के चयन की हो चाहे उनके संवाद की। हर तरह से यह एक कसी हुई बढ़िया कहानी है। बस इसका दुखान्तक अंत अखरता है। कहानीकार चाहता तो उसका विवाह रेलवे में नौकरी लगे प्रवीण से भी करवा सकता था। ताकि साक्षी धीरान को कुछ राहत मिलती और कहानी का अंत भी सुखांतक लगता।" डॉ. उषा सिंह ने कहा कि "कहानी में निम्न मध्यम वर्गीय स्त्री की त्रासदी को बखूबी उभारा गया है। समाज में आज भी स्त्री पर, बहुत सी सामाजिक और परिवारिक पाबंदियां हैं। कदम-कदम पर डॉ. बलवान वर्मा, वकील जोतीलाल शर्मा और विधायक दिलनवाज राणा जैसे पुरुष रूपी भेड़िए स्त्री का शोषण करते ही हैं। कहानी एकदम सच्ची कहानी जान पड़ती है।" पुष्पा विवेक ने कहा कि "कहानी पूर्णतः सौद्देश्य और सफल कहानी है। रही बात स्त्री के संघर्ष को दिखाने की तो कहानी में साक्षी धीरान का पर्याप्त संघर्ष दिखाया गया है। वह मॉडल बनने के लिए जो कर सकती थी, वो करती है। यह बात और है कि जुगमिंदर यादव, वकील और विधायक के शोषण से वह टूट जाती है। वह अपने जीवन से सेक्रीफाई करती है। क्योंकि मां और बाप के मरने के बाद, उस पर अपने साथ-साथ, अपने छोटे भाई की भी जिम्मेदारी आ जाती है। ऐसी हालत में वह सही निर्णय लेती है कि एक नौकरीपेशे वाले दहेजू से शादी कर लेती है ताकि आदमखोर समाज से खुद को और छोटे भाई को बचा सके।" 
          धनदेवी ने कहा कि "मैंने कहानी को बड़े ध्यान से सुना। कहानी में एक शब्द भी झूठ नहीं लिखा गया है। धरातल से जुड़ी हुई एकदम वास्तविक कहानी है। चाहे आप इसकी घटना देखें, चाहे लोक बोली में लिखे गए इसके संवाद देखें। सभी कुछ मिलकर कहानी को वास्तविक और जीवंत बनाते हैं। कथाकार ने बहुत ही बेहतरीन ढंग से कहानी को रचा है। पूरी कहानी संप्रेषणीय है और प्रभाव छोड़ने वाली है।" डॉ. चंद्र सैन ने कहानियों की परंपरा में कहानी का आकलन करते हुए कहा कि "भले ही मैं कहानी मॉडल का वाचन नहीं सुन पाया लेकिन मैंने स्त्री चेतना की कहानियों पर ही शोध किया है। इसलिए, कवियों की विशद टिप्पणियों और कहानी को सरसरी निगाह से देखने के बाद, मैं कह सकता हूं कि कहानी कृष्णा सोबती की लंबी कहानी 'मितरो मरजानी' की तरह लंबी और प्रभाव छोड़ने वाली है। कहानी में संवाद और कथ्य बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किए गए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बोलचाल में लिखे गए संवाद कहानी को लोक तत्त्व से जोड़कर विषेश बनाते हैं। कहानी के मजबूत कथ्य और शिल्प के आधार पर यही कहा जा कि मॉडल कहानी अपनेआप में परिपूर्ण कहानी है।" नयन सिंह नयन ने कहा कि "सबसे पहले हमें लेखक की हिम्मत की दाद देनी चाहिए कि समाज की इतनी ज्वलंत सच्चाई को उसने बड़ी शिद्दत से कहानी में पिरोया है। कहानी घटना दर घटना, जिस तरह खुलकर सामने आती है। वह कहानीकार का अद्भुत कौशल है। मैं तो यही कहूंगा कि युवा कहानीकार डॉ. अमित धर्मसिंह बहुत ही संभावनाओं से भरे कहानीकार हैं। इतना ही नहीं इनके भीतर एक समर्थ उपन्यासकार छुपा हुआ है। निश्चित ही निकट भविष्य में, साहित्य समाज को उसके दर्शन होंगे।" डॉ. बृजपाल सिंह संत ने कहा कि "कहानी में पात्रों की बहुलता होने के बाद भी कहानी उबाऊ नहीं लगी और न ही लंबी होकर बोझिल लगी। कहानी सहज रूप से विकास करती है। पात्रों के संवाद यानी उनकी बोली में प्रयुक्त हुए बोली के हूबहू प्रयोग किए गए शब्द, कहानी को रुचिकर बनाते हैं। लोक मुहावरों का भी सटीक प्रयोग हुआ है। कहानी में एक मुहावरा प्रयुक्त हुआ जिसमें कहानीकार ने बिल्ली के भाग से छींका फूटा का प्रयोग किया। यह मुहावरा ...फूटा की जगह टूटा से शुद्ध होता है। चूंकि अधिकांश कहानी फ्लैश बैक के रूप में लिखी गई है इसलिए कहानी की आत्मा आखिरी के आधे पेज में आ समायी है। कहानीकार का कहानी कहने का शिल्प और अंदाज दोनों बेजोड़ हैं।" 
          गोष्ठी में विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे डॉ. राम प्रताप नीरज जी ने कहानी को कहानी के परंपरागत तत्त्वों के अनुसार परखते हुए कहा कि "कहानी के आधार पर कहानी अधिकांशतः मजबूत कहानी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि थोड़े बहुत परिष्कार और संशोधन से कहानी और भी सुंदर और सटीक बन सकती है। कहानी से कुछेक अंश को निकाल देने पर भी कहानी के कथ्य पर कोई असर नहीं पड़ेगा। वैसे कहानीकार की भाषा, शिल्प और प्रस्तुति तीनों ही लाजवाब हैं। हां, कहानी का विस्तार कुछ अधिक हो गया है, जिसे यदि थोड़ा प्रयास किया जाए तो घटाया भी जा सकता है। आजकल मॉडर्न कहानी का साइज कुछ घट गया है। युवा लेखक में एक अच्छा कथाकार मौजूद है। इसे कहानी के माध्यम से अपनी बात कहनी बखूबी आती है। कहानी में साक्षी धीरान, नवल और ओमी गुर्जर का अलग-अलग ढंग से संघर्ष दिखाया गया है। डॉ. बलवान वर्मा, वकील और विधायक के शोषणों का बेखौफ खुलाशा किया गया है। यह बड़े जज्बे और साहस की बात है। यह सब युवा कहानीकार डॉ. अमित धर्मसिंह में दिखाई पड़ता है। कह सकते हैं कि कहानी मॉडल और कहानीकार अपनी अपनी जगह संपूर्णता लिए हुए हैं।" कहानीकार डॉ. अमित धर्मसिंह ने परिचर्चा में भाग लेने वाले सभी साहित्यकारों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि "मैं तो ग़ज़ल सुनाकर अकेला खड़ा रहा, लोग अपने अपने चाहने वालों में खो गए।' अच्छा लगा कि सबने अपने-अपने ढंग से कहानी की व्याख्या की। जहां तक कहानी लिखने की मेरी बात है मेरे लिए मेरी कहानी के पात्र बिसात पर बिछे मोहरों की तरह नहीं हैं कि जिसे जैसे चाहे मैं वैसे इस्तेमाल करूं। न ही कहानी लिखना


मेरे लिए फिक्शन लिखने जैसा मनोरंजन है। मेरी कहानी समाज की हकीकत हैं। जिसमें रत्ती भर भी मैं छेड़छाड़ नहीं करता हूं। ऐसा करने से समाज का यथार्थ सामने नहीं आता है। मेरा लिखा एक-एक शब्द सच्चा होता है। फिर चाहे वह कहानी में लिखा गया हो अथवा कविता में। कला के लिए कला अथवा यथार्थ के साथ साहित्यिक कलाकारी और चमत्कारी करना मेरे लेखन से बाहर की चीज है। इस कहानी में प्रयुक्त हुए पात्र भी समाज की कड़वी सच्चाई हैं और मैं उनके उसी रूप के साथ हूं जिस रूप में वे समाज में मुझे मिले हैं।" गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे डॉ. कुसुम वियोगी ने नदलेस की ओर से विशेष अतिथि डॉ. राम प्रताप नीरज जी का शॉल औढ़ाकर सम्मान किया। सभी उपस्थित साहित्यकारों का अनौपचारिक धन्यवाद ज्ञापन बृजपाल सहज ने किया।

डॉ. गीता कृष्णांगी
14/08/2023















































 



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