सरुप सियालवी की कहानी अंबेडकरी पर परिचर्चा गोष्ठी
रिपोर्ट
सरुप सियालवी की कहानी 'अंबेडकरी' पर नदलेस ने की परिचर्चा गोष्ठी
नव दलित लेखक संघ, दिल्ली के तत्वावधान में पंजाब के प्रतिष्ठित कहानीकार सरुप सियालवी की कहानी 'अंबेडकरी' पर ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी आयोजित की गई। यह कहानी उनके कहानी संग्रह 'नांगेली' में संग्रहीत है। कहानी प्रो. अंबरीश 'अंबेडकरी' और प्रो. लीलावती के प्रेम से आरंभ होती है। किंतु यह एक प्रेम कहानी न होकर, 'अंबेडकरी' मिशन पर आधारित कहानी है। प्रो. लीलावती प्रो. अंबरीश के संपर्क में आती है और अंबेडकरवाद के विषय में जानकारी प्राप्त करती है। जब प्रो. अंबरीश, लीलावती से शादी न करके धन लोलुपता को अधिक प्रश्रय देता है तो प्रो. लीलावती अविवाहित रहकर ही 'अंबेडकरी' मिशन को आगे बढ़ाने लगती है। वह विभिन्न सगठनों से जुड़कर दलित समाज के उत्थान के लिए कार्य करने लगती है। कहानी का पंजाबी भाषा में वाचन, हिंदी भाषी मूल की विदुषी डॉ. गीता कृष्णांगी ने किया। कहानी पर मुख्य वक्ता के तौर पर पंजाब के दो वरिष्ठ साहित्यकारों, आ. मदन वीरा और डा. नाविला सत्यादास ने विस्तृत विचार रखें। गोष्ठी की अध्यक्षता हिमाचल से जुड़े साहित्यकार डॉ. राजन तनवर ने की और संचालन डॉ. अमित धर्मसिंह ने किया। कहानी पर विशेष टिप्पणी हुमा खातून, डॉ. कुसुम वियोगी, बंशीधर नाहरवाल, पुष्पा विवेक और अशोक पाल सिंह ने की। गोष्ठी में देश भर से जुड़ने वाले प्रमुख रचनाकारों में धर्मवीर, डॉ. ईश्वर राही, सुरेंद्र अंबेडकर, अनिता कुमारी, डॉ. सुमन धर्मवीर, जसवंत राय, डॉ. मोहनलाल सोनल मनहंस, अरुण कुमार पासवान, सुरिंदर सिंह, ऋषि कुमार नरेंद्र, मामचंद सागर, फूलसिंह कुत्सवार, विभीषण कुमार, डॉ. घनश्याम दास, रामदास बरवाली और इंदु रवि आदि उपस्थित रहे।
सर्वप्रथम डॉ. गीता कृष्णांगी ने 'अंबेडकरी' कहानी का पंजाबी भाषा में प्रभावी वाचन किया। उसके बाद पंजाब से जुड़े मुख्य वक्ता मदन वीरा ने कहा कि "साहित्य में पंजाबी दलित कहानी बिल्कुल उसी तरह आती है जैसे हिंदी सिनेमा में पंजाबियों की भूमिका। यानी कोई खास उपस्थिति नहीं। यह बड़ी बात है कि नदलेस द्वारा पंजाब के वरिष्ठ कहानीकार सरुप सियालवी की कहानी पर परिचर्चा गोष्ठी आयोजित की गई। सरुप सियालवी लंबे अरसे से अंबेडकरी मूवमेंट से जुड़े रहे हैं। इस नाते उनकी ज्यादातर कहानी अंबेडकर मिशन को आगे बढ़ाने वाली हैं। 'अंबेडकरी' कहानी भी इसका अपवाद नहीं। इस कहानी में प्रो. लीलावती, प्रो. अंबरीश अंबेडकरी से मिशन की जानकारी हासिल कर मिशन को आगे बढ़ाती है। कहानी के कई फलक हैं। कहानी एक दलित स्त्री को मिशन का नायक बना देती है। 'अंबेडकरी' मिशन को आगे ले जाने के लिए स्त्रियों की बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है। यह कहानी का प्रमुख संदेश है। इसके अतिरिक्त मुझे लगता है कि पंजाबी कहानी को ठीक से समझा जाना अभी बाकी है। क्योंकि पंजाबी कहानियों का अभी तक जो मूल्यांकन हुआ है, वह बड़े ही परंपरागत ढंग से हुआ है, जबकि इसके लिए अब कुछ नए टूल्स की जरूरत है। आज की गोष्ठी इस संदर्भ में कुछ कदम बढ़ाती नजर आई, इसलिए नदलेस परिचर्चा आयोजित करने के लिए, डॉ. गीता कृष्णांगी सुंदर वाचन के लिए और कहानीकार मिशनरी कहानी लिखने के लिए बधाई के पात्र हैं।"
गोष्ठी में जुड़ी दूसरी मुख्य वक्ता डॉ. नाविला सत्यादास ने कहा कि मैंने सरुप सियालवी को अधिक नहीं पढ़ा इसलिए मैं अपनी बात इसी कहानी पर फोकस करूंगी। यह कहानी प्रेम कहानी तो बिल्कुल नहीं है। कहानी में मुख्य पात्र प्रो. अंबरीश 'अंबेडकरी' ज्ञान से तो अंबेडकरवादी होने की पुष्टि करता है लेकिन व्यवहार में वह अंबेडकरवादी नहीं है। वह प्रो. लीलावती से प्रेम होने या शादी न कर पाने का अफसोस जाहिर तो करता है लेकिन असल में उसकी ख्वाहिश बड़ा आदमी बनने की ही होती है। यानी बहुत अधिक रुपया पैसा कमाने की, इस कारण वह प्रो. लीलावती से शादी नहीं करता है। समाज में स्त्री के साथ ऐसा अक्सर होता रहता है कि पुरुष अपने मतलब के लिए उसके पास आता है और अपननी इच्छा से जब चाहे उसे छोड़ देता है। कहानी में लीलावती के साथ भी ऐसा ही कुछ होता है। लेकिन यह लीलावती की खूबी होती है कि वह हार नहीं मानती। भले ही उसने प्रो. अंबरीश 'अंबेडकरी' से अंबेडकरवाद के बारे में जाना हो, लेकिन अंबेडकरवाद की असली संवाहक प्रो. लीलावती ही बनती है। वह विभिन्न अंबेडकवादी सगठनों से जुड़कर दलित समाज के लिए कार्य करती है। चूंकि कहानी की मुख्य नायक लीलावती है तो अंबरीश के उपनाम से कहानी का शीर्षक असंगत लगता है। अंबेडकरवाद शब्द को 'अंबेडकरी' लिखना भी न्यायोचित प्रतीत नहीं होता। बाकी कहानी संप्रेषण और परिचर्चा की दृष्टि से काफी अच्छी कहानी है। इसके लिए कहानीकार को हार्दिक बधाई।"
डॉ. अमित धर्मसिंह ने कहा कि "इस तरह की गोष्ठी से अनुवाद कार्यों को बढ़ावा मिलेगा जो देश भर के रचनाकारों को एक दूसरे को समझने में मदद करेगा। नदलेस ने इसकी पहल सरुप सियालवी की सफल कहानी अंबेडकरी से की है। कहानी का अंबेडकरी शीर्षक गुणवाचक संज्ञा है। यह पहले मेल पात्र प्रो. अंबरीश अंबेडकरी के उपनाम का प्रतिनिधि होता है। बाद में यह फीमेल पात्र के गुणों का प्रतिनिधित्व करने लगता है। चूंकि कहानी का शीर्षक शाब्दिक तौर पर अब चलन में है इसलिए कुछ खास बुरा नहीं लगता है।" हुमा खातून ने अपनी टिप्पणी में "डॉ. गीता कृष्णांगी के पंजाबी में कहानी वाचन को बेहद खूबसूरत बताया और कहा कि अंबेडकरी कहानी वास्तव में बहुत कुछ सिखाने वाली है।" डॉ. कुसुम वियोगी ने कहा कि "ऐसा पहली बार हुआ कि हिंदीतर कहानी पर इतनी शानदार गोष्ठी आयोजित हुई। यह नदलेस की खूबसूरती है कि वह केवल हिंदी भाषी और दिल्ली के रचनाकारों को ही नहीं बल्कि देश भर से सभी भाषा-भाषियों को साथ लेकर चल रहा है। सरुप सियालवी की कहानी निश्चित ही प्रशंसनीय है।" बंशीधर नाहरवाल ने डॉ. गीता के कहानी वाचन की तारीफ की और कहा कि "अंबेडकरी बाबा साहब अम्बेडकर के मिशन से जुड़ी कहानी है। सुनकर अच्छा लगा कि पंजाब में भी उत्कृष्ट दलित कहानियां लिखी जा रही हैं।" पुष्पा विवेक ने कहानी वाचन में खो जाने की बात कही और कहा कि "वैसे तो कहानी अपने उद्देश्य में एक सफल कहानी है। मगर कुछ छोटी लगी। अच्छा होता यदि कहानी को थोड़ा और विस्तार दिया जाता।"
कहानीकार सरुप सियालवी ने अपनी बात रखते हुए नदलेस का हार्दिक आभार व्यक्त किया। अपनी रचनाशीलता पर विस्तार से प्रकाश डाला। अंबेडकरी कहानी पर भी विस्तार से बात रखी। उन्होंने सभी वक्ताओं के विचारों को कहानी की विशेष उपलब्धि बताया। कहा कि "उन्होंने इतनी अच्छी परिचर्चा की कल्पना भी नहीं की थी। पंजाब में दलित साहित्य को पसंद करने वाले बहुत कम हैं। वहां इस तरह का मूल्यांकन भी नहीं हो पाता। मेरे लिए गर्व की बात है कि नदलेस जैसे बड़े मंच पर मेरी कहानी पर परिचर्चा गोष्ठी आयोजित हुई। इसके लिए मैं डॉ. अमित धर्मसिंह सहित उनकी पूरी टीम का हृदय से शुक्रगुजार हूं।" शिमला से जुड़े, अध्यक्षता कर रहे साहित्यकार डॉ. राजन तनवर ने कहा कि कहानी भले ही पंजाबी में पढ़ी गई हो लेकिन जिस अंदाज से पढ़ी गई, अमूमन कहानी समझ में आई। कहानी वास्तव में बेजोड़ दलित कहानी है। कई तरह के सवाल खड़े करती है। अंबेडकरवादी मिशन की सच्ची पैरवी करती है। मैं इस तरह के आयोजनों को बहुत महत्त्वपूर्ण मानता हूं। इस तरह के आयोजन देश भर में होते रहने चाहिए। अनुवाद कार्य भी खूब किया जाना चाहिए ताकि एक दूसरे को समझने में मदद मिल सके। सरुप सियालवी की कहानी का पंजाबी में वाचन और हिंदी में परिचर्चा एक बड़ी पहल है। सभी वक्ताओं और टिप्पणीकारों ने जिस तरह से कहानी का सर्वांग विश्लेषण किया, वह काबिले तारीफ है। कहानीकार को बधाई और मुझे अध्यक्षीय सम्मान देने के लिए डॉ. अमित धर्मसिंह और नदलेस की पूरी टीम का हार्दिक आभार।" सभी उपस्थित वक्ताओं और श्रोताओं का अनौपचारिक धन्यवाद ज्ञापन नदलेस के सक्रिय सदस्य डॉ. घनश्याम दास ने किया।
-डॉ. अमित धर्मसिंह
09/08/2023































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