20/08/2023 को हुई वार्षिक समीक्षा और काव्य पाठ गोष्ठी

नदलेस की वार्षिक समीक्षा एवं काव्य गोष्ठी 

         नव दलित लेखक संघ की दूसरी कार्यकारिणी के एक वर्षीय कार्यकाल की आखिरी काव्य गोष्ठी ऑनलाइन आयोजित की गई। गोष्ठी में नदलेस की गत एक वर्षीय गतिविधियों की समीक्षा के साथ-साथ काव्य पाठ भी किया गया। गोष्ठी की अध्यक्षता नदलेस के वर्तमान अंकेक्षक बंशीधर नाहरवाल ने की और संचालन डॉ. अमित धर्मसिंह ने किया। समीक्षा और काव्य पाठ करने वालों में डॉ. धीरज वनकर, सुरेश गाजीपुरी, अरुण कुमार पासवान, डॉ. सुमन धर्मवीर, हुमा खातून, मामचंद सागर, फूलसिंह कुस्तवार, डॉ. घनश्याम दास, अनिल बिडलान, जालिम प्रसाद, पुष्पा विवेक, अशोक जांभुलकर, रेनू गौर, कश्मीर सिंह, सुनीता वर्मा, डॉ. मनोरमा गौतम, शकुंतला दीपांजली, आर. एस. आघात, डॉ. पूनम तुषामड, डॉ. मोहन लाल सोनल मनहंस, चितरंजन गोप लुकाटी, इंदु रवि, जोगेंद्र सिंह, डॉ. अमित धर्मसिंह और बंधीधर नाहरवाल आदि के नाम प्रमुख रहे। इनके अलावा गोष्ठी में डॉ. गीता कृष्णांगी, रामदास बरवाली, भीष्म देव आर्य, अजीत कुमार सिंह, बीरसेन कटारिया, श्रीकला, ज्योति पासवान, जावेद आलम खान, राष्ट्रपाल गौतम, सिद्धार्थ प्रकाश, ममता अंबेडकर, सरिता भारत, शीलबोधि, अनिल कुमार गौतम, अरविंद भारती, बिभाष कुमार, दीपक सरोहा, प्रदीप कुमार गौतम, प्रमोद कुमार मारोती, अनिता भारती, डॉ. खन्नाप्रसाद अमीन और डॉ. राजन तनवर आदि गणमान्य साहित्यकार उपस्थित रहे। सर्वप्रथम नदले  से जुड़े सभी सदस्यों एवं गोष्ठियों में सहभागिता करने वाले सभी साहित्यकारों के प्रति हार्दिक आभार ज्ञापित किया गया। तत्पश्चात नदले  की गत वर्षीय गतिविधियों पर उपस्थित सदस्यों एवं साहित्यकारों के समीक्षात्मक विचार आमंत्रित किए गए।      
          डॉ. धीरज वनकर ने कहा कि "नदलेस ने बहुत कम समय में अपनी देश व्यापी पहचान बनाई है। यह बेहद प्रतिबद्धता से कार्य कर रहा है। इसकी पूरी टीम अपने कार्यों के प्रति बेहद जिम्मेदार नजर आती है। इस कारण यह निरंतर गोष्ठियां आयोजित करता रहता है। इसकी सभी गोष्ठियां महत्त्वपूर्ण होती हैं।" सुरेश गाजीपुरी ने कहा कि "नदलेस न सिर्फ वरिष्ठों को साथ लेकर चल रहा है बल्कि हम जैसे युवाओं को भी पर्याप्त प्रोत्साहन देते हुए स्पेस दे रहा है। मुझे इससे जुड़कर बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है।" अरुण कुमार पासवान ने कहा कि "नदलेस एक ऐसा मंच है जो सबके लिए खुला स्पेस मुहैया करवाता है। इसकी गोष्ठियां एक तरह की कार्यशाला होती हैं, जिनमें बहुत कुछ सीखने व सिखाने का अवसर सहज ही मुहैया हो जाता है। यहां किसी भी प्रकार के देख-दिखावे वाली जैसी कोई बात नजर नहीं आती है।" डॉ. सुमन धर्मवीर ने कहा कि "नदलेस बहुत ही अच्छा कार्य कर रहा है। खासकर महिलाओं को आगे लाने और बढ़ाने में इसकी महती भूमिका नजर आ रही है। यहां न स्त्री पुरुष का, न भाषाओं का, न क्षेत्र का और न जातिविशेष का कोई भेदभाव है। सभी इस एक मंच पर आकर समानता का अनुभव करते हैं।" हुमा खातून ने कहा कि युवाओं और स्त्रियों को आगे बढ़ाने में नदलेस बहुत बड़ी भूमिका निबाह रहा है। यहां जिस लोकतांत्रिकता और पारदर्शिता से काम होता है, पिछले एक वर्ष से मैं खुद उसकी गवाह रही हूं। सच में नदलेस का हर साथी बहुत ही कॉपरेटिव है। बिलकुल एक परिवार की तरह है नदलेस।" मामचंद सागर ने कहा कि "मैं जबसे नदलेस से जुड़ा हूं तबसे मेरी कोशिश रहती है कि मैं एक भी गोष्ठी मिस न करूं। नदलेस में सबकुछ इतना व्यवस्थित ढंग से होता है कि अन्य किसी भी संगठन में ऐसा देखने को नहीं मिलता है। यही कारण है कि इसकी गोष्ठियों में देश भर के साहित्यकार बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं। हर कोई इससे जुड़ने के लिए लालायित रहता है।"
          फूलसिंह कुस्तवार ने कहा कि "मुझे भले ही नदलेस से जुड़े हुए कुछ ही महीने बीते हैं लेकिन मैंने इससे जुड़कर जाना है कि वास्तव में हमें एक ऐसे ही साहित्यिक संगठन की जरूरत है, जिसमें हर प्रकार के साहित्यकार जुड़ते हों और बगैर भेदभाव के एक-दूसरे को सिखाते हों। मुझे यहां कविता पाठ करना गौरव का विषय लगता है।" डॉ. घनश्याम दास ने कहा कि "देश भर में आज नदलेस की बहुत बड़ी पहचान बन चुकी है। देश भर के साहित्यकार इससे जुड़ना पसंद करते हैं। इसके कार्य करने का अंदाज ही निराला है। यह किसी को भी उपेक्षित करके नहीं चलता है, बल्कि ढूंढ-ढूंढकर अवसर देता है। ऐसी प्रतिबद्धता और सक्रियता आज किसी भी दूसरे संगठन में दिखाई नहीं देती है। मेरे लिए यह हर्ष का विषय है कि मैं नदलेस से जुड़ा हुआ हूं।" अनिल बिडलान ने कहा कि "जिस वक्त मैं नदलेस से जुड़ा भी नहीं था उस वक्त नदलेस ने अपनी वार्षिकी सोच में मेरी प्रथम कहानी श्मशान घाट को प्रकाशित किया। इसके बाद तो जैसे मेरे अंदर लिखने का हौंसला जाग उठा। आज भले ही मैं नदलेस की प्रत्येक गोष्ठी में न जुड़ पाता हूं, लेकिन नदलेस की वजह से मेरे लेखन का अनवरत सिलसिला चल निकला है। यह बहुत बड़ी बात है कि नदलेस, न मेरे जैसे कितने युवा साहित्यकारों का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।" जालिम प्रसाद ने कहा कि "मैं आज पहली बार नदलेस की गोष्ठी में जुड़ा हूं। हालांकि मुझे पहले भी इसके निमंत्रण मिलते रहे हैं। आज जितनी अधिक संख्या में लोग गोष्ठी में जुड़े, उससे मुझे लग रहा था कि मेरा नंबर तो आएगा ही नहीं। लेकिन नदलेस ने मुझे अपनी बात रखने और कविता पढ़ने का अवसर दिया। इससे बढ़कर और क्या बात हो सकती है कि नदलेस वास्तव में सबका अपना मंच है। आज पहली बार जुड़कर ही मुझे लग रहा है कि मैं पहले इससे क्यों नहीं जुड़ा। मुझे जिंदगी भर अब इससे जुड़े रहना है।" पुष्पा विवेक ने कहा कि "मैं नदलेस के गठन से ही इससे जुड़ी हुई हूं। मैं इसके फाउंडर मेंबर में से एक हूं। मैंने नदलेस को बहुत करीब से जाना है। यह जितनी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक ढंग से काम करता है, अन्य किसी भी संगठन में ऐसा काम नहीं होता है। मैं पहले से कई और संगठनों से जुड़ी रही हूं। मुझे नदलेस जैसी व्यवस्थित कार्य प्रणाली किसी में भी देखने को नहीं मिली है। सब अपने-अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के पीछे भागते हैं। मेरी नजर में नदलेस एकमात्र ऐसा संगठन है जो सबको साथ लेकर चलता है और सही मायने में दलित समाज की चिंता करता है। वरिष्ठों को सम्मान देता है और युवाओं को आगे बढ़ाता है।"
          अशोक जांभूलकर ने कहा कि "मैं आज नदलेस की गोष्ठी में पहली बार जुड़ा हूं, लेकिन ऐसा लग ही नहीं रहा कि पहली बार जुड़ा हूं। इतनी बढ़िया काव्य गोष्ठी और नदलेस के विषय में जानकर बहुत हर्ष की अनुभूति हो रही है। आजीवन सदस्यता लेकर, मुझे अब इससे जीवन भर जुड़े रहना है। मात्र आज की गोष्ठी का हिस्सा बनकर मुझे लग रहा है कि नदलेस साहित्य, समाज और साहित्यकारों के लिए बड़ा मंच है जो बहुत ही प्रतिबद्ध होकर कार्य कर रहा है। देश भर से जुड़े साहित्यकार इसका जीवंत उदाहरण हैं।" रेनू गौर ने कहा कि "नदलेस की जो एक बात मुझे सबसे अच्छी लगती है, वह यह है कि इसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता है। सबको समान सम्मान और अवसर दिया जाता है। ऐसा नहीं होता है कि कोई एक दो वक्ता रखे जाएं और बाकी को श्रोता रख लिया जाए। नदलेस की प्रत्येक गोष्ठी में जुड़ने वाले, प्रत्येक रचनाकार को रचना पढ़ने का अवसर दिया जाता है। फिर चाहे रचनाकार कहीं से भी जुड़ा हो, किसी भी भाषा का हो, या कि वरिष्ठ या कनिष्ठ हो। सबको समान समझने की बेहतरीन परिपाटी सिर्फ नदलेस में ही नजर आती है।" कश्मीर सिंह ने कहा कि "एक वर्ष में छत्तीस गोष्ठियों का आयोजन करना बहुत बड़ी बात है। एक महीने में औसत तीन गोष्ठियां, वो भी विविध तरह की। काव्य गोष्ठी हो, परिचर्चा गोष्ठी हो या कहानी वाचन गोष्ठी हो सब एक से बढ़कर एक होती है। वह इसलिए कि इसकी हर एक गोष्ठी एक कार्यशाला की तरह आयोजित होती है। पिछले दिनों पंजाबी दलित कहानी वाचन और परिचर्चा गोष्ठी आयोजित हुई। मुझे यह जानकर बड़ा हर्ष हुआ कि नदलेस हिंदीतर साहित्यकारों को भी पर्याप्त स्पेस देता है। यानी, नदलेस ने सभी सीमाओं को तोड़कर साहित्य जगत में बेहतरीन रचनात्मक कार्य किया है।" सुनीता वर्मा ने कहा कि "नदलेस हर जाति-वर्ग के स्त्री-पुरुष रचनाकारों को साथ लेकर चल रहा है। इससे जुड़कर कभी अहसास ही नहीं होता कि कौन किस वर्ग, जाति या क्षेत्र से है। ना ही इस बात का पता चलता है कि कौन कितने बड़े पद पर कार्यरत है। बड़े-छोटे सभी कर्मचारियों को समान सम्मान और अवसर दिया जाता है। यहां सिर्फ रचनाकार के साहित्य पर बात होती है, न कि किसी जाति या वर्ग पर। इससे जुड़ने पर कभी, किसी भी तरह से अलग होने का अहसास नहीं होता है। नदलेस सामाजिक और साहित्यिक समानता का बहुत बड़ा उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।"
          डॉ. मनोरमा गौतम ने कहा कि "नदलेस जो परिचर्चाएं गोष्ठी आयोजित करता है, उनकी सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इनमें बगैर किसी भेदभाव के स्वस्थ आलोचनाएं होती हैं। इस माध्यम से बहुत कुछ सीखने को भी मिलता है। इसमें चेहरा, जाति या पद देखकर कार्य नहीं किया जाता। चाहे कोई वरिष्ठ हो या कोई कनिष्ठ, सबको समान समझा जाता है। किसी को भी छोटा या बड़ा होने का अहसास नहीं होने दिया जाता। नए रचनाकारों को जितना प्रोत्साहन नदलेस में दिया जाता है, अन्य किसी भी संगठन में देखने को नहीं मिलता। दूसरे संगठनों में सबको अपनी-अपनी पड़ी होती है जबकि नदलेस में सभी सदस्य एक-दूसरे को प्रॉपर स्पेस देकर चलते हैं।" शकुंतला दीपांजली ने कहा कि मुझे इसके सभी कार्यक्रम बहुत अच्छे लगते हैं। हालांकि मैं निजी व्यस्तताओं के कारण सभी कार्यक्रमों से जुड़ नहीं पाती। लेकिन जिनसे जुड़ती हूं, मुझे हमेशा ही उचित अवसर और प्रोत्साहन दिया जाता है। यह गर्व की बात है कि नदलेस ने बहुत कम समय में ही मेरे जैसे न जाने कितने रचनाकारों को लिखने के लिए प्रेरित किया और कविता पढ़ने का अवसर दिया। मैं नदलेस से जुड़कर वाकई बहुत कुछ सीख रही हूं।" डॉ. पूनम तुषामड़ ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि नदलेस बहुत अच्छा काम कर रहा है। इतने कम समय में देश-भर के रचनाकार नदलेस से जुड़ गए हैं और लगातार जुड़ रहे हैं। सिर्फ दिल्ली और हिंदी भाषी ही नहीं, प्रत्येक राज्य और प्रत्येक भाषा से साहित्यकार नदलेस से जुड़कर अपनी साहित्यिक और सामाजिक प्रतिबद्धता निबाह रहे हैं। नदलेस सबको अवसर दे रहा है। बड़ो और छोटो को साथ लेकर चल रहा है। इस कारण नदलेस देश-भर के साहित्यकारों की पहली पसंद बनता जा रहा है।" डॉ. मोहनलाल सोनल मनहंस ने कहा कि "मैं नदलेस की करीब-करीब सभी गोष्ठियों में शामिल होने के लिए प्रयत्न करता हूं। मुझे इसके सभी प्रोग्राम पसंद आते हैं। बड़े ही व्यवस्थित और अनुशासित प्रोग्राम होते हैं। नदलेस की सभी ऑनलाइन गोष्ठियां, कम से कम दो से तीन घंटे चलती हैं। इन गोष्ठियों में हर कोई अपनी रचनाएं प्रस्तुत करने के लिए लालायित रहता है। नदलेस में मौका भी सभी को दिया जाता है। सब एक दूसरे को बड़ी गंभीरता से सुनते हैं और हौसलाफजई करते हैं। साथ ही उचित मार्गदर्शन और प्रोत्साहन भी दिया जाता है।"
           चितरंजन गोप लुकाटी ने कहा कि "मैं नदलेस की ज्यादातर ऑनलाइन गोष्ठियों में सम्मिलित रहता आ रहा हूं। नदलेस सामाजिक प्रतिबद्धता से काम कर रहा है। इतना सक्रिय आज, कोई दूसरा संगठन नजर नहीं आ रहा है। बाकी सभी संगठनों में लोग अपनी-अपनी इतिश्री करने में लगे हुए हैं। कोई भी अपनी परवर्ती पीढ़ी को तैयार नहीं कर रहा है। इसके विपरीत नदलेस, बाबा साहब अम्बेडकर, बुद्ध, पेरियार, फूले के विचारों का सच्चा संवाहक बनकर कार्य कर रहा है। आज नदलेस से बढ़कर कोई दूसरा नहीं संगठन काम नहीं कर रहा है। एक वर्ष में इतने सारे आयोजन करना और देश-भर साहित्यकारों को उसमें आमंत्रित करना, सबको अवसर देना, सबके बूते की बात नहीं है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि नदलेस की यह सक्रियता ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण है।" इंदु रवि ने कहा कि "नदलेस से जुड़कर मेरे जैसी कवयित्रियों को बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। आज देश भर में नदलेस की स्वतंत्र पहचान है। इसमें प्रतिष्ठित और युवा, सभी तरह के साहित्यकारों के विचार और कविता आदि सुनने को मिलते हैं। इससे नए रचनाकारों को लिखने की प्रेरणा मिलती है। न सिर्फ देश-भर के रचनाकार एक दूसरे के बारे में जान रहे हैं बल्कि नए रचनाकारों की संख्या भी बढ़ रही है।" जोगेंद्र सिंह ने कहा कि "नदलेस बहुत ही सराहनीय कार्य कर रहा है। नदलेस में जुड़कर ही हम बड़े-बड़े साहित्यकारों को देख, पढ़ व सुन पा रहे हैं। यह साहित्यिक रूप से तो फायदेमंद है ही, साथ ही सामाजिक रूप से भी लाभकारी है। इस घोर जटिल समय में हमारा एकजुट होना अनिवार्य है, तभी आने वाली पीढ़ी को हम सामाजिक और राजनीतिक जटिलताओं से बचा पाएंगे। इस वक्त सांगठनिक एकता और वैचारिक प्रतिबद्धता की बेहद जरूरत है। नदलेस इस संदर्भ में बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहा है।"
          संचालन कर रहे डॉ. अमित धर्मसिंह ने जानकारी दी कि नदलेस ने गत वर्ष में करीब छत्तीस गोष्ठियां आयोजित की। यह पूरा साल कहानी वाचन, परिचर्चा और कहानी की कार्यशाला की तरह रहा। इस दौरान जहां कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों की कहानियों पर परिचर्चा गोष्ठी आयोजित की गई, वहीं कुछ नए कहानीकारों की कहानियों पर भी परिचर्चा गोष्ठी हुई। कुछ नए रचनाकारों ने तो इन गोष्ठियों से प्रेरित होकर, पहली-पहली बार कहानी लिखी। नदलेस ने उन पर परिचर्चा की। इनसे नए रचनाकारों को कहानी लिखने और कहानी के विषय में बहुत कुछ सीखने के अवसर प्राप्त हुए। नदलेस के मंच से परिचर्चित कहानियों का शीघ्र ही, कहानी संकलन प्रकाशित किया जायेगा। उसमें कहानियों के साथ-साथ, कहानी पर हुई परिचर्चा गोष्ठी की रिपोर्ट भी शामिल की जाएंगी। इसके अलावा जल्दी ही नदलेस का मुख पत्र (वार्षिक संकलन) सोच का दूसरा अंक भी प्रकाशित होकर आने वाला है। यह अंक नदलेस के आजीवन सदस्यों की रचनाओं पर आधारित है।" अध्यक्षता कर रहे बंशीधर नाहरवाल ने कहा कि "मेरे लिए तो यह गौरव की बात है कि मैं नदलेस से जुड़ा हुआ हूं। नदलेस के सभी कार्यक्रम और डॉक्यूमेंटेशन के कार्य बहुत ही व्यवस्थित और अनुशासित होते हैं। वास्तव में सामाजिक और साहित्यिक संगठनों को नदलेस की तरह ही कार्य करना चाहिए। नदलेस ने बहुत ही कम समय में, पूरे देश में अपनी सामाजिक और साहित्यिक पहचान बनायी है। दूसरे छुटपुट के संगठन भी आज नदलेस से बहुत कुछ सीखने को मजबूर हो रहे हैं। वे नदलेस की देखादेखी ही इसकी कार्य प्रणाली और शैली को अपना रहे हैं। यह नदलेस और इससे जुड़े प्रत्येक रचनाकार के लिए हर्ष और गौरव का विषय है। उम्मीद है सभी साथी, इसी तरह मिलकर काम करते रहेंगे और नदलेस तथा इससे जुड़े रचनाकार नित नई ऊंचाई छूते रहेंगे।" गोष्ठी में नदलेस की वार्षिक समीक्षा के अतिरिक्त सभी समीक्षाकारों ने अपनी-अपनी कविताएं भी प्रस्तुत की। इन कविताओं में सामाजिक न्याय, समता और बंधुता की आवाज बुलंद हुई। कविताओं के माध्यम से सभी कवियों ने वीर, करुण, वियोग शृंगार आदि रस और अलंकार की मंत्रमुग्ध करने वाली कविताएं प्रस्तुत की। गोष्ठी में स्त्री स्वर भी काफी मुखर रहा। सभी उपस्थित कवियों और श्रोताओं का हार्दिक धन्यवाद ज्ञापन हुमा खातून ने किया।

डॉ. अमित धर्मसिंह
22/08/2023
                  


















































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