डॉ. पूनम तुषामड़ की कहानी ठोकर पर परिचर्चा एवं काव्य पाठ गोष्ठी




डॉ पूनम तुषामड़ की कहानी 'ठोकर' पर परिचर्चा एवं काव्य गोष्ठी

          नव दलित लेखक संघ द्वारा डॉ पूनम तुषामड़ की कहानी 'ठोकर' पर परिचर्चा गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी पुष्पा विवेक के रोहिणी, सेक्टर -16, दिल्ली स्थित आवास पर रखी गई। गोष्ठी दो चरणों में विभक्त रही। प्रथम चरण में डॉ पूनम तुषामड़ द्वारा कहानी ठोकर का प्रभावी वाचन किया गया जिस पर उपस्थित साहित्यकारों में से मुख्यतः पुष्पा विवेक, डा. गीता कृष्णांगी, मामचंद सागर, डॉ. अमित धर्मसिंह, श्रीलाल बौद्ध और मामचंद सागर आदि ने अपने विचार प्रस्तुत किए। दूसरे चरण में उपस्थित रचनाकारों में डॉ. पूनम तुषामड़, श्रीलाल बौद्ध, राजपाल सिंह राजा, डॉ. गीता कृष्णांगी, हुमा खातून, महिपाल, डॉ. अमित धर्मसिंह, लोकेश कुमार, पुष्पा विवेक, मामचंद सागर, धनदेवी, शेखर पंवार और डॉ. कुसुम वियोगी आदि का सशक्त काव्य पाठ हुआ। डिंपल विवेक और आर. सी. विवेक भी गोष्ठी में उपस्थिति रहे। गोष्ठी के प्रथम चरण की अध्यक्षता नदलेस के सक्रिय सदस्य मामचंद सागर और दूसरे चरण की अध्यक्षता नदलेस के वर्तमान अध्यक्ष डॉ. कुसुम वियोगी ने की। दोनों चरणों का संचालन नदलेस के वर्तमान महासचिव डा. अमित धर्मसिंह ने किया। सभी उपस्थित साहित्यकारों का धन्यवाद ज्ञापन गोष्ठी की संयोजक पुष्पा विवेक ने किया।
         सर्वप्रथम डॉ पूनम तुषामड़ ने अपनी कहानी ठोकर का संप्रेषणीय वाचन किया। कहानी मोंटी नामक स्त्रैण युवक की सामाजिक त्रासदी और संघर्ष से संबंधित रही। पुष्पा विवेक ने कहा कि "समाज में अभी भी वह जागृति नहीं आई, जिसके चलते वह ट्रांसजेंडर जैसे युवक को समाज में आराम से रहने और जीने दे। मोंटी जैसे युवक युवतियों का समाज में जीना दूभर हो जाता है। पूनम ने कहानी को बहुत अच्छी तरह से लिखा और पढ़ा है। यह एक जरूरी और अनछुआ पहलू है, जिस पर लिखे जाने से समाज की संकीर्ण सोच को बदलने के प्रयास किए जा सकते हैं।" डा. गीता कृष्णांगी ने कहा कि " कहानी अत्यंत मार्मिक है। जब पूनम तुषामड़ कहानी को पढ़ रही थी तो मैं कहानी से इस तरह जुड़ गई कि जैसे सबकुछ मेरे सामने घटित हो रहा हो। कहानी में कहानीकार की जगह मैं खुद को देख रही थी। कई बार मन भावुक हुआ। कहानी मोंटी की स्थिति और संघर्ष के प्रति पाठकों का ध्यान आकर्षित करती है। परिवार, रिश्तेदार और समाज के ठेकेदारों के प्रति तीखा आक्रोश जगाती है।" डॉ. अमित धर्मसिंह ने कहा कि "कहानी का मुख्य किरदार मोंटी अपनी परिस्थितियों और समाज से हार न मानकर अपने स्तर से सर्वाइव करता है और जीवन यापन के लिए स्पा चलाता है। मोंटी शारीरिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक रूप से स्त्रैण है। उसे परिवार और समाज की मोरल सुपोर्ट तथा साइकोलॉजिस्ट की काउंसलिंग ठीक कर सकती थी। मोंटी जैसे डिफरेंट युवक युवतियों की समाज में सहज स्वीकृति होनी चाहिए। उन्हें जीने तथा आजीविका के संवैधानिक, सामाजिक तथा मानवीय अधिकार दिए जाने चाहिए। यही कहानी का प्रमुख संदेश है।"
          श्रीलाल बौद्ध ने कहा कि "कहानी निश्चित तौर से बढ़िया है। मैं इसे बतकही के बाद नदलेस की इस गोष्ठी में दुबारा सुन रहा हूं। इस बार कहानी पहले से भी अधिक प्रभावी और संप्रेषणीय लगी। कहानी में मोंटी का केस फिजिकल नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक है। जिसका समय रहते उपचार संभव था। लेकिन परिवार की नासमझी और समाज के दंश से यह संभव नहीं हो सका। सच बात तो यह है कि अभी भी हमारे समाज में इस तरह के केसों के विषय में लोग जागरूक नहीं। ना ही इस विषय में उनकी कोई समझ है। लिहाजा कितने ही मोंटी रात दिन इस त्रासदी का शिकार होते हैं। यह अत्यंत विचारणीय है।" डॉ. पूनम तुषामड़ ने कहानी के विषय में बताया कि यह कहानी कई वर्ष पूर्व हंस में छप चुकी है। यह एकदम सच्ची घटना पर आधारित है। मेरी अपनी जानकारी में मोंटी नाम का पात्र रहा है। मैंने उसकी दारुण दशा अपनी आंखों देखी और कानों सुनी है। लैंगिक परेशानी के चलते वह अपनी बहन मीना की शादी तक में शामिल नहीं हो पाता। मामा, बुआ सहित सभी रिश्तेदार उसे ताने मारते हैं। समाज उसे हर स्तर पर ठुकराता है। इसलिए परिवार और समाज से तंग आकर आखिर मोंटी भी अपने परिवार और समाज को ठोकर मार देता है।" अध्यक्षता कर रहे मामचंद सागर ने कहा कि "कहानी में देश काल और परिवेश का अभाव कुछ खटकता है। लेकिन कहानी का विषय और कथ्य इतना प्रभावी है कि कहानी कौशल की छुटपुट कमियों की ओर ध्यान नहीं जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि समाज में मोंटी जैसे व्यक्तियों के लिए जीना दूभर हो जाता है। समाज में तो क्या, वे परिवार तक में अपनी जगह नहीं बना पाते हैं। हर जगह से उपेक्षा और उपहास का विषय बनना पड़ता है। मोंटी के साथ तो लैंगिक और जातीय, दोहरी परेशानी है। ऐसे में उसका शोषण भी दोहरा हो जाता है। कहानी मोंटी जैसे लोगों के साथ खड़ी होती है। परिवार तथा समाज को भी इनके साथ खड़ा होने का सार्थक सन्देश देती है।"
         कहानी वाचन और परिचर्चा के बाद उपस्थित कवियों का काव्य पाठ हुआ। सर्वप्रथम डॉ. पूनम तुषामड़ ने तीन छोटी कविताएं प्रस्तुत की। उसके बाद श्रीलाल बौद्ध ने अपनी कविता कुछ यूं पढ़ीं- "बेसुध इंसान सब/दिशाएं भूल चुका था/उसकी तलाश/धरती का महज एक ऐसा टुकड़ा/जो देस का अहसास दिला दे।" राजपाल सिंह राजा ने बदलाव, डॉ. गीता कृष्णांगी ने मौन ही मुखर प्रतिरोध है मेरा, हुमा खातून ने एक आग लगाई थी शीर्षक से उत्कृष्ट कविताएं प्रस्तुत की। तत्पश्चात महिपाल ने उसके बाद डॉ. अमित धर्मसिंह ने जातीय अहम से भरा घड़ा कविता प्रस्तुत की। लोकेश कुमार ने सुमधुर गजल गायन किया। पुष्पा विवेक ने हिंसा की आग कविता में कुछ यूं पढ़ा- "हिंसा की आग सुलगती रही/चलतीं रहीं गोलियां/आग के बवंडरों में/झुलस गईं सैंकड़ों/जिंदगियां।" मामचंद सागर ने प्रतिकार कविता में कुछ यूं पढ़ा- "तुम स्वार्थ लक्ष्य पर होकर सवार/चमचमाते दफ्तरों से/पंचसितारा होटलों से/राष्ट्र भवनों की बुर्जियों से /बिगुल फूंकते, छेड़ते हो/स्वच्छ भारत अभियान।" धनदेवी ने हास्य व्यंग्य की कई छोटी-छोटी कविताएं और कई लोक गीत सुमधुर गाकर प्रस्तुत किए। शेखर पंवार ने भारतीय राजनीति की पोल खोलने वाली सशक्त कविता प्रस्तुत की। अंत में अध्यक्षता कर रहे डॉ. कुसुम वियोगी ने शृंगार के कई गीतों का सुमधुर गायन किया। एक कविता गीत में उन्होंने पढ़ा - "सविता सोई !/अस्मत कोई!!/जनमत जागा/कविता रोई!!" अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि नदलेस की गोष्ठियां कार्यशाला की तरह होती हैं। नदलेस अपनी पूर्व पीढ़ी और अनुज पीढ़ी दोनों को एक साथ लेकर चल रहा है। यही कारण है कि आज नदलेस रचनाकारों की पहली पसंद बन गया है।

31/07/2023

- डॉ. अमित धर्मसिंह






































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