मणिपुर महिला उत्पीड़न के विरोध में महिला काव्य गोष्ठी
मणिपुर महिला उत्पीड़न के विरोध में 23/07/2023 को शाम छह बजे से ऑनलाइन हुई महिला काव्य गोष्ठी की संक्षिप्त रिपोर्ट और पढ़ी गई कुछ कविताएं-
मणिपुर-महिला-उत्पीड़न के विरोध में नदलेस ने महिला काव्य गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन किया। इसकी अध्यक्षता पुष्पा विवेक ने की और संचालन हुमा ख़ातून ने किया। देश भर से, डॉ. गीता कृष्णांगी, पुष्पा विवेक, इंदु रवि, हुमा ख़ातून, डा. नाविला सत्यादास, कविता डूमोलिया, ज्योति पासवान, जलेश्वरी गेंदले, डॉ. राधा वाल्मीकि, ममता अंबेडकर, डॉ. मनोरमा गौतम, शकुंतला दीपांजली, सुनीता वर्मा, रंजू राही, डॉ. पूनम तुषामड़, पल्लवी प्रियदर्शिनी, डॉ. प्रेरणा उबाले, डॉ. नीतिशा खलखो, डॉ. सुमन धर्मवीर, सलीमा, मंजू सिंह, सुषमा सिद्धार्थ, डॉ. सुमित्रा मेहरोल, मंजू गौतम, आशा चंद्रा, डॉ. सीमा माथुर, बबिता कुमारी, रजनी बौद्ध, सुनीता कुमारी, गुलफ्शा सिद्दीकी आदि कवयित्रियां आमंत्रित रहीं। गोष्ठी में क्रमश: डॉ. सुमन धर्मवीर, शकुंतला दीपांजली, डा. रचना सिंह, मंजू सिंह, डा. नाविला सत्यादास, डा. गीता कृष्णांगी, रंजू राही, डा. राधा वाल्मीकि, रेनू गौर, डा. प्रेरणा उबाले, इंदु रवि, डा. नीतिशा खलखो, कविता डुमोलिया, डा. सुषमा गोरियाल, डा. सीमा माथुर, जलेश्वरी गेंदले, डा. पूनम तुषामड़, हुमा ख़ातून और पुष्पा विवेक आदि कवयित्रियों ने सशक्त और प्रभावी काव्य पाठ किया। सभी ने एक से बढ़कर एक कविता प्रस्तुत की और मणिपुर की शर्मनाक घटना की जमकर निंदा की। उक्त के अतिरिक्त गोष्ठी में देश भर से क्रमशः डा. अमित धर्मसिंह, रेखा दुग्गल, पवन तारा, रजनी बौद्ध, आर. डी. गौतम, धर्मवीर सिंह, अंजली दुग्गल, अरुण कुमार पासवान, डा. ईश्वर राही, गीता शर्मा, फूलसिंह कुत्सवार, प्रदीप कुमार गौतम, मदनलाल राज़, डा. राजन तनवर, सुदेश तनवर, डा. सुमित्रा मेहरोल, सुरेंद्र अंबेडकर, वर्षा वर्मा, रामसूरत भारद्वाज, कमलेश माधोलिया, डा. मनोरमा गौतम, मामचंद सागर, आर. एस. मीणा, शंभू कुमार, लोकेश कुमार, डा. खन्नाप्रसाद अमीन, राजपाल सिंह राजा, जय कुमार पासवान, शैलेंद्र वंशिक, जय प्रकाश वाल्मीकि, राजबाला भगत, आनंद भगत, डा. गुलाब सिंह, डा. सुनीता मंजू, डा. विजय कुमार भारती, सुषमा सिद्धार्थ, प्रवीण मुंडा, डा. विक्रम कुमार, प्रवीण एक्सेस, चितरंजन गोप लुकाटी, बिट्टू टुडू, रितांजलि राव, बी. एल. तोंदवाल, मिस पूजा, राजकुमार माड़वी, बिपिन जोओ, सुमंती ट्रिके, विनोद शर्मा, जोगेंद्र सिंह, माईग्रेट टिग्गा, भुवनेश्वर कोले, पवन कुमार, घोषिया प्रवीण, श्रीलाल बौद्ध, रविकांत मीणा, वाल्मीकि अख्तर, कपूरचंद, डा. धीरज वनकर, मनोज मरांडी, नितेश कुमार, जस्ट हिंदी, मनोनीत रेवटो, रिछपाल विद्रोही, दिनेश्वर गेंदले, मनीष पाल, जोबा मुर्मू, रमेश शरण, अंजली कुमारी, सेवरल प्रैक्टिकल, रूपाल सिंह, डा. पप्पू कुमार रजक, प्रीति बौद्ध, सुरभि झा, द बीस्ट, निशा भंडारे और बिल्किस पन्ना आदि गणमान्य रचनाकार श्रोता स्वरूप उपस्थित रहे। अध्यक्षता कर रही पुष्पा विवेक ने मणिपुर की घटना को सम्पूर्ण नारी जाति के विरुद्ध बताया। कहा कि "इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। नदलेस द्वारा, विरोध स्वरूप रखी गई गोष्ठी जरूरी प्रतिरोध है। आज की गोष्ठी के जैसे आयोजन देश भर में होते रहने चाहिए। सबको एकजुट होकर गलत के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। इसके लिए हमें सुधार की शुरुआत बाहर के साथ-साथ अपने भीतर से भी करनी चाहिए। तभी हम बेहतर समाज बनाने में कामयाब हो सकेंगे।" सभी काव्यपाठ करने वाली कवयित्रियों और उपस्थित कवि कवयित्रियों का अनौपचारिक धन्यवाद ज्ञापन डा. अमित धर्मसिंह ने किया।
काव्यपाठ करने वाली कुछ कवयित्रियों की कविताएं इस प्रकार रहीं-
1 डा. सुमन धर्मवीर -
वो
अपनी चीटिंगों को, षड्यंत्रों को ,
चालों को, सेलफिशनेस को, स्मार्टनेस का नाम दिए चले गए।
हमारी ईमानदारी को ,
समझदारी को, पेशेंस को ,
नोट स्मार्टनेस का नाम दिए चले गए।
अपनी ओवर क्लेवरनस को, छिछोरेपन को, रिजिड्नेस को, हॉटनेस का नाम दिए चले गए।
हमारी सरलता को,
सादगी को ,
शांति को ,
बहुत होशियारी से भंग किए चले गए।
अपनी भूलों को, झूठों को, नाकामियों को लड़खड़ाते कदमों को ,
बेनाम रिश्तो को, जाम ए नशा का नाम दिए चले गए।
हमारी अच्छाई को सच्चाई को
कोमल भावनाओं को
इमोशनल फूल का नाम दिए चले गए।
अपनी ज्यादतियों को
जबरदस्तीयों को वहशीपन को
प्यार का नाम दिए चले गए।
हमारी कर्मठता को क्षमता को स्वतंत्रता को
शिक्षा को
मेल ईगो में फीमेल को दबाते चले गए।
बड़ाकर अपनी दुनिया को
बच्चों को
मां ,बहन को दोस्तों को
हम से ही संभल वाकर हमें ही घर में कैद करते चले गए।
हमारे मान को
सम्मान को स्वाभिमान को सेंसटिविटी को
लो कॉन्फिडेंस को ओवरकॉन्फिडेंस में बोसिज्म के नाम पर एबयूज़ करते चले गए।
हमारे नाम को काम को
फेम को
छल कपट से अपने नाम करते चले गए।
और हम
हम उन्हें
खामोशी से
अपने दिल से दू..र बहुत दू...र करते चले गए।
*****
2. शकुंतला दीपांजली -
हम लड़ेंगे !
हर बार लड़ेंगे
जाति से लड़ेंगे
धर्म से लड़ेंगे
और लड़ेंगे छुआछूत से
कि हम लड़ेंगे
बार-बार लड़ेंगे
पाखंड और अंधविश्वास से
दुनिया के हर दकियानूसी
रीति-रिवाजों से।
हम लड़ेंगे ...!
हर बार लड़ेंगे
हक और अधिकार के लिए
अपने प्रति हो रहे
अन्याय के लिए
इज्जत और सम्मान के लिए
अपनी खुद की पहचान के लिए
भारतीय संविधान और कानून से।
हम लड़ेंगे ...!
तब तक लड़ेंगे
कि जब तक ...!
दम में दम और
अंतिम सांस है
हां! हम तब तक लड़ेंगे
जब तक मिल ना जाए।
हमें आजादी ...!
भेद-भाव , यौन हिंसा,
अपहरण और अत्याचार से
सुनो ऐ मनुवादी इंसानो
हमें भी देनी होगी आजादी
निडर और निर्भय होकर
जीने की आजादी
हां! आजादी ...!
हम तब तक लड़ेंगे
जब तक हमे मिल ना जाए
इंसान बनकर जीने की आजादी
हम तब तक लड़ेंगे
अपनी सुरक्षा और संरक्षा के लिए।।
*****
3. डा. रचना सिंह-
(1) मजबूर बेटियां
कितनी !मजबूर बेटियां
दंरिदगी को झेलती
शर्मिंदगी से गुजरती
लहूलुहान होती हैं
बेटियां
करके निर्वस्त्र
नोचते हैं छातियां
देते हैं गालियां
कितनी! बेबस
लाचार बेटियां
रोती बिलखती
हाथ जोड़ती
देकर दुहाई
इंसानियत की
चीखती हैं बेटियां
जिस्म नहीं रुह तक
हैवानियत झेलती
इतना सब सहकर
कैसे ! जी पायेंगी
ये बेटियां
कहां !हैं वो
जो देखते हैं
मंजर ऐसा
जहां इंसानियत
होती है रूसवा
पूछती ? हैं बेटियां।।
*****
4. मंजू सिंह -
सबक
अस्मिता पर नजर उठाये,
उसको सीधा सबक सिखाओ।
कब तक यूं बर्दाश्त करोगी,
फूलन जैसी तुम बन जाओ।।
निरीह दुर्बल जानकर तुमको,
छेड़े जो निर्लज्ज कमीना।
तरस न खाओ उस जाहिल पर,
चीर कर रख दो उसका सीना।
दुस्साहस वह कर ना पाये,
विध्वंशक ज्वाला बन जाओ।।
कब तक यूं बर्दाश्त करोगी,
फूलन जैसी तुम बन जाओ।।
हाथ भी जोड़े और गिड़गिड़ाये,
शायद कुछ ये दया दिखा दें।
अबला समझ कर इज्जत लूटें,
ये हैं कायरों की औलादें।
सबक सिखाने का जज्बा रख,
घातक सिंहनी तुम बन जाओ।।
कब तक यूं बर्दाश्त करोगी,
फूलन जैसी तुम बन जाओ।।
समता का ये भाव न समझें,
मानवता से बहुत दूर हैं।
दम्भी, कपटी, छलबाज हैं,
पशुता से ये भरपूर हैं।
मत डरो "ऐसिड" फेंकेगा,
तुम खुद ही "ऐसिड" बन जाओ।।
कब तक यूं बर्दाश्त करोगी,
फूलन जैसी तुम बन जाओ।।
निम्न समझ करते हैं हमले,
धूर्तों से लेने हैं बदले।
सहने पर अब विराम लगा दो,
ऐसों का "जीने का हक़" ले।
पीढ़ियां इनकी याद रखें,
ऐसा कुछ करके दिखलाओ।।
कब तक यूं बर्दाश्त करोगी,
फूलन जैसी तुम बन जाओ।।
*****
5. डा. नाविला सत्यादास -
6. डा. गीता कृष्णांगी -
7. रंजू राही -
(1) मैं शर्मिन्दा हूं
मैं अपनी वजूद पर शर्मिन्दा हूं
कि मैं औरत हूं।
वो सिहरन, वो लाचारी
हजारों की भीड़,दो नंगी नारी
ये ताउम्र की जिल्लत है
कि मैं औरत हूं।
नफरतों की आग में
झुलसता है मेरी अस्मत
जैसे जलती है
बरसात में भीगीं लकड़ियां
अब जीने की कौन करें हिम्मत
हूं शर्मिन्दा कि मै औरत हूं।
दो समुदायों के झगड़ों में
कहां है औरत
हर झगड़े में मे शामिल है
जाति और वोट
फिर क्यों न हो
सम्मान पर चोट
हूं शर्मिन्दा अपने वजूद पर
कि औरत हूं।
ये आज नयी नहीं
सदियों से चली आ रही
परम्परा है जिसे भेड़ियों ने
बखूबी निभाया है
मेरी छाती और योनि को
नापाक करने की एवज में
कल वो होगें सम्मानित
अपने वजूद पर शर्मिन्दा हूं
कि मैं औरत हूं।
समुंदर से गहरा वेदना
हिमालय से ऊंचा है
हमारा आक्रोश
अनंत काल तक का क्षोभ
भला कैसे हो ऐसे ज़िन्दगी से मोह
आंखें बंद और भीड़ का अट्टहास
अपने वजूद पर शर्मिन्दा हूं
कि मैं औरत हूं।
हर अपराध की सजा नहीं होती
ग़र होती तो नपुंसक किया जाये
भीड़ में शामिल सारे मर्दों को
काटे जायें उनके गुप्तांग
हो उनकी भी जिंदगी जिल्लत
भीख मांगे मौत की
अपने कुकर्मों के बाद भी जिंदा हूं
अपने वजूद पर शर्मिन्दा हूं
कि मैं औरत हूं।
रंजु राही
(2) मणिपुर को समर्पित
बाबुल नहीं रहना इस देस में
बाबुल नहीं रहना इस देस में
सगरे देस हुए जंगल अब
भुखे भेड़िए दौड पड़े जब
नर -नारी के भेष में
बाबुल नहीं रहना इस देस में।
अपराधी घूमें शेर के माफिक
मैं अबला हिरणी के जैसी
नोच - खसोट धरम बस इनके
कैसे बचाएं अब देह रे
बाबुल नहीं रहना इस देस में।
घर जला, अब छीने सहारे
गांव वीराना,देस वीराने
वीराने हुए सब लोग
सरेआम जब इज्ज़त लूटी
जीते जी मर गयी तेरी दुलारी
कहां रहा अब शेष रे
बाबुल नहीं रहना इस देस में।
पुजनीय है भारत की नारी
कहां लिखा है बाबुल प्यारे
पुछती अब तेरी दुलारी
झूठा है तेरा वेद रे
बाबुल नहीं रहना इस देस में।
हम भारत के लोग है सारे
कैसे कहूं मै अब तुम्हीं बता रे
गंगा जमनी तहजीब कहां है
कहां है शाइनिंग इंडिया के नारे
बनाया कैसा परिवेश रे
बाबुल नहीं रहना इस देस में।
कानून के प्रपंच बड़े है
पग पग पर षड्यंत्र खड़े हैं
व्यवस्था भी उनकी कब्जा
सरकार भी उनके
खाली पड़ी है माई के गठरी
खाली बाबू के जेब रे
बाबुल नहीं रहना इस देस में।
आंखों में अंगार भरो अब
मन में बड़ा अवसाद भरे जब
जीने का मकसद नही हो
चूड़ियॉं नहीं हथियार अब देना
ओढ़नी नहीं धार अब देना
यही फूलन का संदेश रे
बाबुल नहीं रहना इस देस में।
*****
8. डा. राधा वाल्मीकि -
9. रेनू गौर -
(1) हम औंरते
हम औरतें
तूफानों की ठोकरों तलें
चट्टान सी कठोर
पड़ी रहती हैं
किनारों पर
बैठे-बैठे
खाती हैं घातें
फिर भी
टस से मस नहीं होती
हम औरतें !
रूढ़ियों के रंग-बिरंगे ओढ़ने
बालपन से ही
एक महंगी कसक
कई गांठें बांध जाती हैं
मन में
जिसकी फाँस में
जीवन भर
मरती हैं
हम औरतें !
सजाती हैं पिंजरे
अपने ही पंखों से
भूल कर व्योम की रंगिनियां
जलाती हैं सपने
चांदी के दियो में
बटकर मखमली
यादों की बत्तियां
मन भर अपमान को
थूंक देती है बीड़े सा चबाकर
दिन भर करती हैं जुगालियाँ
निगल जाती हैं ज़हर
शीरे में मिला कर
हम औरतें
कोई बात छोटी या बड़ी नहीं होती
जब तक वो उसे खींच ना दे
लकीर नहीं होती
लगाती है लाल मिर्च का छौंक
बात बात में
हम औरतें !
सामाजिक तंत्र के
व्यूह में फंसी हम औरतें
भेदने के साथ
सीख जाती हैं
चक्रव्यूह बनाना
औरतों के खिलाफ ही
हम औरतें !
बनाए हैं तहखाने हमने
घरों के भीतर ,
हर मोर्चे पर
करती हैं तैनात
पुरुषों की टुकड़ियों को
सजा मुंडियां चितर
हम औरतें
और फिर कभी
जब बैठ जाती हैं एक साथ
तब एक प्रश्न को
लट्टू की तरह
चलाकर छोड़ देती हैं
औरतों के बीच
आखिर क्या गुनाह है हमारा ?
क्यों सज़ायाफ़्ता ;
जीती हैं
हम औरतें !
*****
10. डा. प्रेरणा उबाले -
(1) मैं और तू सखी
दलितों में दलित
मैं और तू सखी
हाँ!
मैं और तू सखी !
रीत जगत की पालन करो
भरे घर में आधे पेट रहो
या बासी खाओ दिन-रात !
"अरे, तुम काहे
पाँव पसारे बैठी हो?"
" इहाँ न जइयो
उहाँ मत देखियो"
"पढ़-लिख क्या करेगी तू ...
अरे जा तू चूल्हा फूँक ...
चौंका देख...
पुस्तक काहे हाथ लियो?....
आँगन बुहारा के नहीं?
देख, बबुआ रोए हैं,
खाना खिलाइयो,
चटनी बना,
आटा गुंथ,
लत्ते धोओ,
मसीन के जइसन
काम करो,
हम बिरली
कामकाजी महिला !
बन गई बहुत तेज ज्यों
गृहस्थी कौन संभालेगा ?
अकड़ गई तो हाय राम!
ठाठ इसके न बढ़ाइयो
कह गया जमाना !
ढोर-गवार-नारी
ताड़न के अधिकारी,
इसको माने सब आदर्श l
लताडो चाहे जितना,
विवश करो,
ताने दो,
नोच लो,
है पूरा अधिकार!
दलितों में दलित
मैं और तू सखी!
मान लीज्यों
ये सब उल्टा होवे तो,
खूब परीक्षा होवेगी l
दिखा पाएँगे क्या
सबर हजार बरसों का
हमरे जइसन
हमरे जइसन !
(2) जीना मुझे सिखाया
जीना मुझे सिखाया
मेरी जीत ने नहीं ,
जीना मुझे सिखाया
हर पल की उस
ठोकर ने
जिससे मुझे
लगती रही ठेंस
एक के बाद एक
एक के बाद एक l
भौतिकता का सुख
न होना
दुःख की बात नहीं
अपनों का गैर बनना
जीने को वास्तव बनाता है।
ईमान को बेईमान
बनते देख
ह्रदय का हर स्पंदन
टूटता, खीझता है
तब आप
सच्चे रूप में जीने लगते हैं।
बुद्धि से नहीं
भावना से
विवेक से नहीं
संवेदनाओं से l
बेईमानी की दुनिया में
हर रोज एक हार
पचाती गई,
अनुभव को लेकर नहीं
अनुभूतियों से जीती गई l
जीना मुझे सिखाया
मेरी जीत ने नहीं
मेरी हार ने
साथी बनकर
राही बनकर।
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11. इंदु रवि -
12. डा. नीतिशा खलखो -
13. कविता डुमोलिया -
(1) जीने दो
जीने दो हमें जीने दो
हमें भी जीने का हक हैं।
क्या मिलता हैं तुम्हें?
जो तुम बार-बार हमे
लहू-लुहान करते हो।
तुम भी बने हो उस मिट्टी से
जिस मिट्टी से हम बने है।
फिर क्यूँ हमारी जिंदगी
तुम बर्बाद करते हो।
अपनी दो पल की खुशी के लिए
जिस रास्ते पर तुम चल दिये।
ना ही सोचा ना ही समझा
ना ही दर्द का एहसास किया।
क्या कुसूर था मेरा
क्या मैंने छोटे कपड़े पहने थे।
जो मेरी हँसती खेलती जिंदगी को
तुम तार-तार कर गए।
उलझने बहुत है जिंदगी में
कुछ राहत के पल हमे भी
चैन से तुम रहने दो।
उड़ना है मुझे भी बेफिक्र होकर
इन खुले आसमानों में
मुझको भी सैर करने दो।
ना छेड़ मुझे तू अपने
इन नापाक इरादों से
ये मेरी जिंदगी तेरी
कोई मोहताज नहीं है।
जो बार-बार सरेआम मुझे
तुम बदनाम करते हो।
शर्म करो शर्म करो!
कुछ तो शर्म करो !
मुझ नन्ही सी जान पर
कुछ तो रहम करो।।
(2) बदलता हुआ वक्त
ये वक्त कुछ ऐसा
हैं बदल गया कि
इंसान ही इंसान ना रहा -2
चंद पैसों की खातिर
क्यूँ खुद को बेचते हो
एक वक्त ऐसा भी था
एक रूपए में भी हम
खुशियाँ ढूंढ लेते थे
खाते थे एक ही थाली में
एक दूसरे से बहुत बातें
किया करते थे
अब ये वक्त कुछ ऐसा
है बदल गया कि
एक दूसरे के लिए
मान सम्मान ही ना रहा
ढूँढते हैं खुशियाँ गैरों में
परिवार-परिवार ना रहा
करते है सब बड़ी बड़ी बातें
पर खुद को अंदर से
खोखला हैं बना रहा
ना शर्म हैं ना ही हया
खुद को खुद से ही
दूर है किए जा रहा
अब ये वक्त कुछ ऐसा
है बदल गया कि
इंसान ही इंसान ना रहा।।
*****
14. डा. सीमा माथुर -
15. जलेश्वरी गेंदले -
(1) कैसे करूं मैं गुमान कि मेरा भारत महान
हुआ नहीं तब , नही होता अब भी सम्मान
जहां होती हो खुलेआम
नारी का अपमान
कैसे करूं मैं गुमान
कि मेरा भारत महान।
झूठे हो तुम कहते हो कि
नारी पूजनीय है ,नारी देवी है,
ममता की मूरत है ,
हां है तो पर तुम नहीं समझे उसके मन को ,
किया नीलाम बीच बाजार, निर्वस्त्र भी किया ,
त्याग दिया उसे भटकने को बीच वन
स्वार्थ देख अपना किया उसका इस्तेमाल
कैसे करूं मैं गुमान
कि मेरा भारत महान।
इतना करो रहम
मार दो जान से ,होगा न एहसास
दर्द ये मौत का ,भरी बाजार में नंगा कर जो
शान अपना दिखा इतराते हो
हुए जो हो तुम पैदा बिना इज्जत लिए
इस बात पर मूंछ में ताव क्यों दिखाते हो? इतना बेरहम हो ,अपनी मां के ही स्वरूप का किया तूने हलाल ,
कैसे करूं मैं गुमान
कि मेरा भारत महान।
मन में आया मेरा एक सवाल
सुन रहे हो सब ,देश बनेगा हिंदू राष्ट्र किया जा रहा है ऐलान
सोचो क्या होगा ??महिलाओं का हाल
दहल गया दिल देख - सुनकर
मनीषा बाल्मिकी, बानू, जैसी कई बहनों साथ हुआ अशोभनीय व्यवहार ,
कैसे करूं मैं गुमान ,
कि मेरा भारत महान।
किए जा रहे है कमजोर के मुंह पर पेशाब
कितना हो रहा है बड़े बूढ़े - बच्चों पर अत्याचार एक बूंद भर पानी खातिर ली जाती है जान
जिसका नहीं हो रहा हैं कोई उपचार,
ऐसा ना हो कि हमें ही लेना पड़ जाए न्याय पाने
अपने हाथों में हथियार
रक्षा हम खुद करेंगे यही लो अब मन में ठान
आओ नारी मैदान में बचा लो अपना मान - सम्मान
मणिपुर के हृदयविदारक, शर्मनाक दहशत भरी कांड
किये है वो जंगली वो खूंखार,उन्हें मिला होगा यही संस्कार,
खामोशी बता रही है कि कोई नहीं है अपना मददगार
ना ही रहा किसी पर हमें ऐतबार ,खुद कमर कस लो पकड़ लो तीर - कमान अब तो बना लो अपना अस्तित्व और बचा लो मान।
कैसे करूं गुमान
कि मेरा भारत महान।।
*****
16. डा. पूनम तुषामड़ -
(1) लड़की और लकड़ी
लड़की और लकड़ी
उसने बड़ी माफी के साथ कहा
अरे माफ कीजिए
गलती से लड़की का लकड़ी
हो गया।
खैर...अभी ठीक किए देता हूं
'शब्द' ही तो है
मैंने उसकी ओर देखा ।
फिर शब्द की ओर
एक लम्बी उसांस...और कहा
हां सिर्फ 'शब्द' ही तो है।
लकड़ी हो या लड़की
दोनो की नियति आखिर
जलना ही तो है।
कभी लकड़ी लड़की को
जलाती है ,तो कभी लड़की
लकड़ी को
दरअसल वे दोनो
ये कभी जान ही नहीं पाती
कि वे एक साथ दोनो जल रही हैं।
व्यवस्था की ये क्रूर साजिश
उनके किलाफ सदियों से
चल रही है ।
(2) मणिपुर -1
देश में इन दिनों बहुत कुछ
चल रहा है।
मेरे घर की बालकनी में
तमतमाया
लाल-लाल सूरज
बेबस-सा ढल रहा है।
मेरे भीतर बहुत कुछ
चल रहा है, उबल रहा है।
मेरे घर की टी. वी. स्क्रीन पर
मची है चीख ओ पुकार
इस देश का एक हिस्सा
मणिपुर जल रहा है ।
मणिपुर जल रहा है।
(3) मणिपुर -2
शायद तुम्हे मालूम नही
मणिपुर की स्त्रियों के नंगे जिस्म
अब जिस्म नही रहे
वे इंसानियत के खिलाफ
जन प्रतिरोध के झंडे हो गए हैं।
लाखो करोड़ों स्त्रियों के सम्मान
और स्वाभिमान के लिए
गूंजता बिगुल हो गए हैं।
मणिपुर की बेटियों के नंगे
जिस्म फैल गए हैं विश्व पटल पर
लिखे स्त्री अस्मिता के नारे बनकर
इस क्रूर, बर्बर, आदमखोर
व्यवस्था के खिलाफ
वे हथियार बन गए हैं,
*****
17. हुमा ख़ातून -
मणिपुर – औरत की आवाज़ (हक़)
क्या यह देश मेरा देश नहीं
क्या मेरा अपना कोई अधिकार नहीं
मेरा कोई सम्मान नहीं
मैं सिर्फ़ एक जिस्म हूँ
घर की, परिवार की, संसार के
मर्यादा की बांध की
कुल के सम्मान की लाज हूँ |
मेरा शरीर नंगा कर
क्या देखा तुमने|
दूध पिलाती मां देखी
राखी बांधती, सुख-दुुःख बांटती
सिंदूर लगाये, आँगन सजाये
अब्बा, बाबा, पिता, पापा पुकारती
स्त्री देखी तुमने |
देखी मंदिर में देवी
पूज्ती मंदिर में देवी
घर की , परिवार की , पड़ोस की
एक आवाज़ उठाती नारी का
बोलना, अधिकार मांगना
अपनेअस्तित्व के लिए लड़ना
तुम्हारी मर्दानगी पर चोट लगी |
पौरुष के अहंकार की
आग भड़क उठी
इसलिए तुमने मुझे नगन किया
मेरेअस्तित्व का
मेरे आत्म सम्मान का
चीर हरण किया |
तुम बुज़दिल पुरुष हो
तुम बैग़ैरत निकम्मे
खुद से कुंठित, ख़ुद से परेशान
एक पशु से भी गये गुज़रे
किसी आत्मा से
विहीन तुम केवल एक
कमज़ोर, सिर्फ़ कमज़ोर
एक जगह इकट्ठा होकर
स्त्री को नंगा कर, ख़ुद को
पौरुष का गौरव देने वाले
कायर समाज के कायर पुरुष हो |
एक बात समझ लो
ख़ुद को भी समझा लो
मेरा सम्मान मेरे
वस्त्र उतारने से उतरा नहीं
किसी बाज़ार में नंगा घुमाने से
बिका नहीं
किसी पुरुष के कहने से भंग हुआ नहीं|
सुनो-सुनो और ग़ौर से सुनो
मैं स्त्री हूँ
मैं तुम्हारी जननी हूँ
मैं तुम्हारे वंश को, समाज को
बढाने वाली, सवारने वाली
औरत हूँ, कोई समान नहीं
इसलिए तुम कितना भी नंगा करो
करो मुझे वस्त्रहीन
मैं बिना कपड़ो के ही
रहना सीख लुंगी, अपने सम्मान
के लिए तुम्हारे बिना जीना सीख लूँगी।
मैं स्त्री हूँ एक पूरा संसार हूँ
मैं केवल एक शरीर नहीं
केवल भोगने की चीज़ नहीं |
मैं ज़बान वाली
सम्मान वाली
अधिकार वाली
पुरुष सत्ता को चुनौती देती |
एक औरत हूँ
मैं एक औरत हूँ
मैंएक औरत हूँ |
*****
18. पुष्पा विवेक -
(1) शैतानी शिकंजा
सिसक रही थी एक जिंदगी
शैतानी पंजों में जकड़ी थी
वस्त्र विहीन था शरीर उसका
बचाव में वह चीख रही थी
मौन साधे खड़ा था इन्सान
राह में खड़े पेड़ मौन थे
सड़क मौन थी, फिजा मौन थी
जिस पर वह घिसट रही थी
गश्त लगाती पुलिस मौन थी
मौन था शासन प्रशासन
जब तक टूट न गई
आखिरी डोर सांस की
शिकंजा शैतानों का कसा रहा
सिसकती रही निरीह बनी
एक अबला की जान
तमाशबीन बने थे सब
चीखों पर लगा रहे थे ठहाका
म्यूजिक की तेज आवाज में
चीखें भी होती रहीं गुम
ऊंचे रसूकदार थे वे
शासन भी उनका
प्रशासन भी उनका
न्याय व्यवस्था भी
गरीब के विरुद्ध थी
गरीब की जिंदगी उनकी नहीं
रसूखदारों की होती है
जैसे चाहें खेलें मसलें
चाहें तो माटी में दें मिला।
(नोट : - बाकी कवयित्रियों की कविताएं जैसे जैसे प्राप्त होती रहेंगी, उनके नाम के नीचे लगाई जाती रहेंगी।)
- नव दलित लेखक संघ, दिल्ली







































































































































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