मजदूर दिवस की पूर्व संध्या पर 30/04/2023 को हुई नदलेस की ऑनलाइन गोष्ठी : संक्षिप्त रिपोर्ट

 रिपोर्ट



मजदूर दिवस के उपलक्ष्य में नदलेस ने की काव्य गोष्ठी

        मजदूर दिवस की पूर्व संध्या पर नव दलित लेखक संघ ने ऑनलाइन काव्य गोष्ठी का आयोजन किया। काव्य गोष्ठी का विषय स्वतंत्र काव्य पाठ रहा जिसमें देश भर के गणमान्य कवियों ने बेहतरीन काव्य पाठ किया। तहत और तरन्नुम से प्रस्तुत की गई कविताएं और गजलें श्रोताओं ने खूब पसंद की। काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता नदलेस के वर्तमान उपाध्यक्ष मदनलाल राज़ ने की और संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। गोष्ठी में दिल्ली से डा. गीता कृष्णांगी, ईश कुमार गंगानिया, डा. हंसराज सुमन, डा. कुसुम वियोगी, डा. घनश्याम दास, समय सिंह जोल, बंशीधर नाहरवाल, विशाखापत्तनम से डा. सुमन धर्मवीर, मथुरा से सुनील कर्दम, डा. बुद्धिराम बौद्ध, सिद्धार्थ प्रकाश, हिमाचल से जगदीश कश्यप, डा. राजन तनवर, गाजियाबाद से जोगेंद्र सिंह, ममता अंबेडकर, इंदु रवि, पटना से बिभाष कुमार, महाराष्ट्र से राजकुमार वालवंटे, सत्य आनंदविभू , आगरा से रूप सिंह रूप, बिहार से पवन कुमार, जौनपुर से आर पी सोनकर, छत्तीसगढ़ से हरीश पांडल और मुजफ्फरनगर से सुमित कुमार आदि प्रतिष्ठित कवि उपस्थित रहे। इनमें से अधिकांश ने काव्यपाठ भी किया।

          काव्य गोष्ठी की शुरुआत सुनील कर्दम की ग़ज़ल के सुमधुर पाठ से हुई। उन्होंने एक मतला और एक शेर कुछ यूं पढ़ा- "भूख गरीबी लाचारी की बात करेगा कौन यहां/गर्दन पर चलती आरी की बात करेगा कौन यहां/होली राखी और दिवाली पर ही जब रौनक होगी/रोजे ईद व इफ्तारी की बात करेगा कौन यहाँ।" इसके बाद जोगेंद्र सिंह ने औजस्वी काव्य पाठ किया। सिद्धार्थ प्रकाश ने भी अपनी उम्दा रचना का औजस्वी पाठ कुछ यूं किया- "संविधान का दर्द सुनाने आया हूँ/भीमराव का कर्ज़ चुकाने आया हूँ/सच्ची हों यदि बात तो मन में रख लेना/मैं तो अपना फ़र्ज निभाने आया हूँ।" डा. सुमन धर्मवीर ने नारी, प्रकृति और भीम पर अपने हाइकु प्रस्तुत किए। उनके तीन हाइकु कुछ यूं रहे- "1.पढ़ किताब/आसमां मुट्ठी में/कर बिटिया। 2. तुम मानव!/बिगाड़ो प्रकृति/संवारे कौन?, 3. जगमगाए/हैं तारामंडल में/अंबेडकर।" डा. बुद्धिराम बौद्ध ने मां पर गंभीर कविता प्रस्तुत की और समय सिंह जोल ने अपनी उत्कृष्ट रचना 'लिखता हूँ' इस प्रकार प्रस्तुत की-"समाज में हो ऐसा बदलाव लिखता हूं/मोहब्बत आए मुल्क में वो सैलाब लिखता हूं/टूटती चुप्पियों की बन आवाज लिखता हूं/वंचित और मजदूरों के जज्बात लिखता हूं।" ममता अंबेडकर ने नारी चेतना की कविता इस प्रकार प्रस्तुत की- "नारी तू कमजोर नहीं/ बच्चो की तू भाग्य विधाता है/नारी तू हर रूप में पूजी जाती है/बेटी बनकर मां के आंचल को खूब महकाती है/अपने कदमों की आहट से फूलों-सी खुशबू बिखराती है।" डा. राजन तनवर ने प्रेम पर उत्कृष्ट कविताएं प्रस्तुत की। उन्होंने निस्वार्थ प्रेम कविता में पढ़ा- "प्रेम करने लग जाती हैं/माताएं अपने गर्भ में पल रहे शिशु को/मां का प्रेम नहीं होता कभी कम।" 

          रूप सिंह रूप की ग़ज़ल और गीत खूब पसंद किए गए। उनके द्वारा पढ़ा गया नवगीत कुछ इस प्रकार रहा- "ढा रहीं हैं ग़ज़ब वक्त की आँधियाँ/दीप हैं कुछ कि जलने की ज़िद कर रहे/तेल के लाख दीपक जले घाट पर/प्यार का एक दीपक तरसता रहा।" जगदीश कश्यप ने अपनी गंभीर कविता बादल कुछ इस प्रकार प्रस्तुत की- "नदी में, बाढ़ में बहते/प्लास्टिक के डिब्बे-बोतल और थैलियां पोलीथीन/फ़ास्ट -फूड के लिफ़ाफे/गले-सड़े चीथड़े और मॉबलींचिंग किए/शरीर के अंग-प्रत्यंग मानव शरीर पर/भाले-तलवारों के वार, पानी में सड़ांध फैलाती लाशों/मरे हुए ढोरों के कंकाल जो गंगाजल बनकर/हमें पावन बनाने का/ढोंग रचाते/वे लोगआचमन तीन बार करवाते।" बंशीधर नाहरवाल ने अपनी व्यंग्यात्मक कुंडलिया इस प्रकार प्रस्तुत की- "अंधातुओं की लूट है, लूट सके तो लूट/अंत समय पछताएगा जब कुर्सी जाएगी छूट।" आर पी सोनकर द्वारा तहत और तरन्नुम से पढ़ी रचनाएं खूब पसंद की गई। उन्होंने पढ़ा- "मुखालिफ जुल्म के खामोश रहने की रवायत को/बदल डालो बदल डालो सितम सहने की आदत को।" तत्पश्चात ईश कुमार गंगानिया ने स्त्री अस्मिता और अस्तित्व पर तथा समाज के नाखुश रहने वाले नजरिए पर दो बेहतरीन कविताएं प्रस्तुत की। पवन कुमार पवन ने कविता कुछ यूं प्रस्तुत की- "नमन करो बाबा साहब को/नमन करो उस महानायक को/जिसने सबको सम अधिकार दिए/ दयनीय स्थिति नारियों की थी/ आपने उनके जीवन सवार दिए।" 

          डा. अमित धर्मसिंह ने रास्ते कविता में पढ़ा- "...परंतु आदमी ढूंढता रहता है हमेशा बने बनाए रास्ते/भले ही वे रास्ते किसी के रास्ता भटकने से ही क्यों न बने हों/ यही कारण है/ जब गलती से भी निकल आता है कोई रास्ता/तो उसी से होकर गुजरने लगती है/अंधानुकरण करने वालों की भीड़। फलस्वरूप जन्म लेने से पहले ही दम तोड़ देते हैं कुछ नए रास्ते/ और उक्त रास्ते की भी छित जाती है पैड़।" डा. कुसुम वियोगी ने बेहतरीन मुक्तक प्रस्तुत किये। उन्होंने तरन्नुम से कुछ यूं पढ़ा- "कैसे सुनाए तुमको, हम अपनी करुण कहानी!/कई बार पी चुका हूं, आंखों का खारा पानी/वैसे तो मैं हूं राजा, स्वयं के चमन का/फिर भी मिली है मुझको, पीड़ा की राजधानी।" अध्यक्षता कर रहे मदन लाल राज़ ने अपनी व्यंग्यात्मक क्षणिकाएं कुछ इस प्रकार प्रस्तुत की- "विषैला विषधर विषदंत विहीन हो, अब असहाय हो गया/क्योंकि आज के माहौल में नेता नाग का पर्याय हो गया/अपना ईमान क्यों खोते हो तुम हमारा इम्तिहान लेकर/तलवार की धार पर चलते हैं हम तुम्हारा ही नाम लेकर।" अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने सभी कवियों के काव्य पाठ की भूरि भूरि प्रशंसा की और गोष्ठी को पूर्णतः सफल बताया। सभी उपस्थित रचनाकारों का हार्दिक धन्यवाद ज्ञापन डा. अमित धर्मसिंह ने किया।

डा. गीता कृष्णांगी

01/05/2023



































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