गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर नदलेस ने की स्वतंत्र काव्य पाठ गोष्ठी
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर नदलेस ने की स्वतंत्र काव्य पाठ गोष्ठी
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर नदलेस की स्वतंत्र काव्य पाठ गोष्ठी ऑनलाइन संपन्न हुई। गोष्ठी की अध्यक्षता हिमाचल से जुड़े वरिष्ठ कवि जगदीश चंद कश्यप ने की और संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। गोष्ठी में आमंत्रित कवि डा. नीतिशा खलखो, डा. रवींद्र प्रताप सिंह, डा. संजीत कुमार और डा. सुनीता धर्मवीर के अलावा सरिता भारत, डा. मनोरमा गौतम, अमित कुमार, अजय यतीश, जावेद आलम खान और जगदीश चंद कश्यप आदि ने सशक्त कविताओं का पाठ करके गोष्ठी को नई ऊंचाई प्रदान की। इनके अतिरिक्त सुरेश सौरभ गाजीपुरी, पुष्पा विवेक, चंचल (अंग्रेजी कविता), इंदु रवि, आर एस मीणा, ममता अंबेडकर, जलेश्वरी गेंदले, बंशीधर नाहरवाल, मोहन लाल सोनल मनहंस, योगेंद्र प्रसाद अनिल आदि ने भी गोष्ठी में प्रभावी काव्य पाठ किया। गोष्ठी में एल सी जैदिया, डा. गीता कृष्णांगी, हुमा ख़ातून, रॉक्सी कुमारी, जितेंद्र कुमार, अनिल कुमार गौतम, सोमी सैन, रविकांत मीणा, ज्योत्सना तिर्की, बृजपाल सहज, डा. अनिल कुमार, डा. हरकेश कुमार, मामचंद सागर, डा. रंजन, आलोक यादव, दीपांकर राव, डा. घनश्याम दास, अनिल कुमार, डा. कुसुम वियोगी, बी पी निदारिया, अजीत कुमार सिंह, लोकेश कुमार, आर एस आघात, अरुण कुमार पासवान, चितरंजन गोप लुकाटी, जॉन डेनिस, विनय कुमार, सुरेंद्र अंबेडकर, हर्ष किंगर, साहिल परमार, डा. अमिता मेहरोलिया, राजेंद्र पंवार, श्रीलाल बौद्ध, पवन कुमार, योगेंद्र सिंह और शिवांगी आदि साहित्यकार उपस्थित रहे।
गोष्ठी की शुरुआत डा. सुमन धर्मवीर के हाइकु से हुई। उनके द्वारा पढ़े गए हाइकु में से कुछ हाइकु इस प्रकार रहे - "हम सहेली/अंबेडकरवादी/आजाद पंछी। ए बहुजन/सत्ताविहीन वर्ग/आखिर क्यों? वंचित वर्ग/शासन_सत्ता कहां?/बताओ पता। बहन भाई/अंबेडकरवादी/कुरीति मुक्त। नारी हैं सब/सास बहू ननद/बहनापा न।" डॉ रवींद्र पीएस की की कविताएं कुछ इस प्रकार रहीं- 'पेट का आयतन'/सुबह-सुबह पास के पार्क में टहलने निकला/कुछ मोटे-मोटे लोग/चमकदार सफेद कुर्ता पायजामा पहने/दौड़ते हुए पार्क की परिधि नाप रहे थे/और कुछ ऐसे ही लोग/पार्क के ठीक बीचो-बीच तिरपाल पर बैठे/कपाल भांती कर रहे थे/ये जो दौड़ रहे थे/जो योग कर रहे थे/दोनों समूहों की समस्याएं एक थी/ ये लोग दुबले होने के चक्कर में मोटे होते जा रहे थे/पेट के बढ़ते आयतन से आतंकित थे!/वहीं कुछ चाय की चुस्की के साथ डायटिंग की चर्चा में मशगूल थे/कोई एक रोटी कोई दो/बस इतना ही खातें हैं/अपनी दिनचर्या बता रहे थे।" इनकी दूसरी कविता रही - बसंत के आने का मतलब मेरे राशन के कनस्तर का खाली होना है! "जब मेरे घर में राशन का/ आखिरी बार भरा गया कनस्तर खाली होने को है/बटाई के खेतों में/गेंहू की बालियां कुछ-कुछ सुनहरी हो/सुनहरे भविष्य की गारंटी सी दे रही होती हैं बच्चों का एक वक्त/स्कूली खिचड़ी से कटता है और खुद का एक वक्त फांके से/ठीक इसी कंगाली के समय आता है/पेट भरों का प्यारा मादक बसंत/जिससे ब्याकुल हो कवि पछुवा पवन के झोंके से/झूमते लहराते गेहूँ की तरह मदमस्त हो/ कविताएं सुनाते और कभी फाग राग गाते हैं।" डा. संजीत कुमार ने ठाकुर का नाड़ा शीर्षक से सशक्त कविताएं पढ़ीं। अजय यतीश की कविताएं कुछ इस प्रकार रहीं -"कविता/जागरूकता की आंच में/दंभी विचारों का दहन तय है/पवित्रता के मिथक पुरानी दिवारों की तरह/भहराने लगे हैं/जिन्हें कुटिल बुद्धिजीवियों ने गढ़े थे। 2. बदल रही है/अस्पतालों की परिभाषा/उन कांच की दीवारों के पीछे/ज़हरीले नाखूनों वाले बैठे हैं/क्या करुं/दर्द ही जिन्दगी का/आखिरी सच है ढो रहा हूं इसे/सलीब की तरह ज़ख्मी कंधों पर/फटी जेब और बीमार जिस्म लिए मौत आने तक।"
डा. बुद्धप्रिय सुरेश सौरभ ग़ाज़ीपुरी कविताएं इस प्रकार पढ़ीं- "1-घण्टा खूब बजा रहे, खोज रहे भगवान मंदिर-मस्जिद भटक रहा, आज सभी इंसान ।। 2-दिखने में हृष्ट-पुष्ट मगर हो बीमार तुम। अपनों से कमजोरों से खाते मार तुम।।" इंदु रवि ने कविता कुछ इस प्रकार पढ़ी -"मानवता का मान हो/मानवता का मान हो/मानव मानव में ना खींचातान हो/सभी मानवता अपना सकें/सच्चा बन ना कोई सजा पा सके।" जलेश्वरी गेंदले की कविता इस प्रकार रही- "आखिर क्यों?/जिनकी वजह से लोग तुम्हें जानते हैं तुम उन्हीं को जानना छोड़ दिए क्यों?/जिनकी वजह से तुम्हें स्थान मिला/आज उन्हें स्थान देना तुम भूल गए क्यों?/जिनके नाम लेना नहीं तुम्हें पसंद/तुम उन्हीं के नाम चंदा बटोर, उन्हें किए बदनाम क्यों?" मोहनलाल सोनल मनहंस की कविता इस प्रकार रही -"सावित्रीबाई की महिमा अपार/सावित्रीबाई जन्मजयंती/आओ दिव्य चरण छू ले/सामाजिक बदलाव के अग्रदूत/क्रांति जनक ज्योति बा फूले/जाति-वर्ण की मजबूत दीवार/करने धराशायी पहला वार/शिक्षित करने नारी को/सावित्री बाई की महिमा अपार।" योगेंद्र प्रसाद अनिल के हाइकु कुछ इस प्रकार रहे -"लूटे न तंत्र/संसद के अंगने/मनु वंशज/1/ बंदर बैठे/बांटने को रोटियां/बिल्लियों म्याऊं।/2/ गूंगे गुलामों/इन्कलबिया बनो/आजादी बचा।/3/ नमन मंच/सादर अभिवादनं/नूतन वर्षे/4/" गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे जगदीश चंद कश्यप ने कहा कि नदलेस की काव्य गोष्ठियों में देश भर से कवि जुड़ते हैं और कविता पाठ करते हैं। मुझे आज इस महत्त्वपूर्ण गोष्ठी की अध्यक्षता करने का अवसर दिया इसके लिए मैं डा. अमित धर्मसिंह और नदलेस का आभारी हूं। आज गोष्ठी में एक बढ़कर एक कविता प्रस्तुत की गई। खासकर नीतिशा खलको, रवींद्र प्रताप सिंह और डा. सुमन धर्मवीर, सरिता भारत, जावेद आलम आदि कविताएं बहुत उत्कृष्ठ रहीं। बाकी साथियों ने भी महत्त्वपूर्ण कविता पाठ किया। सभी कवियों श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन पुष्पा विवेक ने किया।




































































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