08/01/2023 को हुई कार्यकारिणी की समीक्षा बैठक की संक्षिप्त रिपोर्ट और कुछ फोटो
2023 में नदलेस कार्यकारिणी की प्रथम समीक्षा बैठक
दिल्ली। 2023 में नदलेस की कार्यकारिणी की प्रथम समीक्षा बैठक नदलेस के वर्तमान अध्यक्ष डा. कुसुम वियोगी के संयोजन में शाहदरा स्थित उन्हीं के आवास पर 8 जनवरी को संपन्न हुई। बैठक का विषय नववर्ष सम्मिलन, गत कार्यक्रमों की समीक्षा, आगामी कार्यक्रमों की योजना और सोच के आगामी अंक का संपादन व प्रकाशन रहा। गोष्ठी की अध्यक्षता डा. कुसुम वियोगी ने की और संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। बैठक में कार्यकारिणी के सदस्य और पदाधिकारी डा. गीता कृष्णांगी, समय सिंह जौल, बृजपाल सहज, हुमा खातून, डा. अमिता मेहरोलिया और लोकेश कुमार के अतिरिक्त नदलेस के आजीवन सदस्य डा. मनोरमा गौतम और डा. घनश्याम दास उपस्थित रहे। साथ ही, बैठक में कुसुम वियोगी की पुत्रवधु मंजू प्रभाकर के अलावा ओमप्रकाश गौतम और मेहर सिंह भी उपस्थित रहे। बैठक में सर्वप्रथम अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों द्वारा नदलेस की गोष्ठियों का कॉमन बैनर (4/3 फुट) और नदलेस का कॉमन विजिटिंग कार्ड (जिसकी बैकसाइड में 2023 का सामान्य कैलेंडर प्रकाशित है) को जारी किया गया। तत्पश्चात अध्यक्ष डा. कुसुम वियोगी द्वारा उपस्थित महिला रचनाकारों हुमा खातून, डा. मनोरमा गौतम, डा. अमिता मेहरोलिया और डा. गीता कृष्णांगी का शॉल ओढ़ाकर सम्मान किया और नववर्ष की बधाई व शुभकामनाएं दीं। इस प्रकार नववर्ष की हार्दिक बधाई और शुभकामनाओं के आदान-प्रदान के साथ बैठक की कार्यवाही शुरू हुई।
बृजपाल सहज ने नदलेस के गत कार्यक्रमों के विषय में कहा कि नदलेस ने एक डेढ़ साल में जितने प्रोग्राम किए हैं, मुझे नहीं लगता कि देशभर में किसी भी साहित्यिक संस्था ने इतने प्रोग्राम किए होंगे। आगे भी हम बेहतर कार्य करेंगे। डा. घनश्याम दास ने कहा कि हम साहित्य के विद्यार्थी हैं इसलिए हमें अपने कथ्य के साथ-साथ भाषा, लिपि आदि पर भी ध्यान देने की जरूरत है ताकि हमारी बात और अच्छे ढंग से लोगों तक पहुंच सके। नदलेस की पिछली गतिविधियों को मैंने फेसबुक आदि माध्यमों से देखा है, कहा जा सकता है कि नदलेस और संगठनों से काफी बेहतर कार्य कर रहा है। समय सिंह जौल ने माना कि वे कार्यकारिणी सदस्य होते हुए भी नदलेस के कार्यक्रमों में उतना नहीं आ पाते हैं, जितना कि उन्हें आना चाहिए। इससे उनका अपना भी नुकसान है, क्योंकि नदलेस बहुत कुछ सीखने का बेहतरीन माध्यम है। इसलिए वे आगे से सभी कार्यक्रमों में उपस्थित रहा करेंगे। डा. गीता कृष्णांगी ने कहा कि नदलेस ने कुछ ही समय में सशक्त पहचान बनाई है, इसका कारण है कि दलित साहित्य की तीसरी यानी युवा पीढ़ी ने इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया है। देश भर से जुड़ने वाले साहित्यकार भी नदलेस में पर्याप्त भरोसा रखते हैं। नदलेस भी अपने प्रत्येक सदस्य के लिए समान सम्मान और स्थान रखता है। हुमा खातून ने कहा कि हमें बाबा साहब अम्बेडकर को भगवान बनाने के बजाए उनके विचारों को अपनाकर चलने की जरूरत है। तभी हम सामाजिक न्याय और समानता की ओर आगे बढ़ सकेंगे। इसमें कोई शक नहीं कि नदलेस इस दिशा में औरों से काफी बेहतर काम कर रहा है। डा.मनोरमा गौतम ने कहा कि निश्चित ही नदलेस दूसरे सगंठनों से बेहतर कार्य कर रहा है, तभी इससे देश भर से लोग जुड़ रहे हैं। अच्छी बात यह भी है कि इसकी गोष्ठी कार्यशाला की तरह काम कर रही है जिससे नए रचनाकारों को बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। मैं भले ही नदलेस की दूसरी या तीसरी गोष्ठी में शामिल हुई हूं लेकिन मुझे लगता है कि नदलेस दूसरे संगठनों से वाकई बढ़िया काम कर रहा है।
डा. अमिता मेहरोलिया ने कहा कि नदलेस ने बहुत सारी नई शुरुआत की हैं। दूसरे संगठन के लोग लगातार नदलेस से सीख रहे हैं। भले ही कुछ लोग नदलेस की कॉपी पेस्ट भर कर रहे हैं लेकिन यह नदलेस के लिए कोई बुरी बात नहीं कि आज दूसरे संगठन नदलेस को फॉलो करके आगे बढ़ रहे हैं। सही मायने में नदलेस ने दलित साहित्य की तीसरी पीढ़ी लगभग तैयार कर दी है जो बेहतर काम कर रही है तथा आगे और भी बेहतर काम करेगी। मुझे नदलेस से जुड़े लगभग एक वर्ष हो गया है, इस दौरान मैंने व्यक्तिगत तौर से बहुत कुछ सीखा है। चूंकि नदलेस हक़ से पढें हक़ से लिखें हक़ से छपें, सबको जोड़ें और सबसे जुड़ें में विश्वास रखता है इसलिए मुझे लगता है कि नदलेस से जुड़कर कार्य करना किसी के लिए भी घाटे का सौदा नहीं हो सकता है। लोकेश कुमार ने कहा कि हमें नदलेस के फॉर्म, रशीद आदि को डिजिटल बनाने की आवश्यकता है, जिससे कि लोगों को जुड़ने में और हमें जोड़ने में सुविधा हो सके। नदलेस का यूट्यूब चैनल आदि भी बनाया जाना चाहिए ताकि नदलेस का और अधिक प्रचार प्रसार हो सके। डा. अमित धर्मसिंह ने सोच पत्रिका के विषय में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सोच का यह अंक आजीवन सदस्य विशेषांक है। काफी सदस्यों की रचनाएं, ईमेल पर आ चुकी हैं। संभवतः मार्च अप्रैल तक अंक प्रकाशित कर दिया जायेगा। उन्होंने बताया कि नदलेस का यह कार्यकाल एक तरह से कहानी सत्र की तरह से काम कर रहा है। वर्ष भर की परिचर्चित कहानियों का संकलन भी प्रकाशित करने का प्रयास किया जाएगा। अध्यक्षता कर रहे डा. कुसुम वियोगी ने कहा कि साठ के बाद से दलितों के अनेक संगठन अस्तित्व में आए और लगातार आ रहे हैं लेकिन कोई भी नदलेस के जैसा काम नहीं कर रहा है। किसी ने भी इतने लोगों को नहीं जोड़ा, जितने कि नदलेस ने जोड़े हैं। उसका कारण यह रहा कि संबंधित संगठनों से जुड़े लोगों ने संगठन को मजबूत करने पर नहीं बल्कि अपने व्यक्तिगत संबंधों को मजबूत करने पर अधिक ध्यान दिया। लोगों में महत्त्वाकांक्षा और यशेषणा इतनी कूट-कूटकर भरी है कि वे दूसरे साहित्यकारों को तो क्या बल्कि संगठन तक को कुछ मानकर नहीं चलते हैं। यही कारण है कि नदलेस इतने कम समय में देश भर में चर्चित हो गया है। आज नदलेस से जुड़ना सभी को हर्ष और गौरव का विषय लगता है। देश भर से लोग इसकी गोष्ठियों में जुड़ते हैं और काव्यपाठ करते हैं। मुझे उम्मीद है कि हम सब इसी तरह मिलकर काम करते रहेंगे और नदलेस इसी तरह लोगों की प्राथमिक पसंद बना रहेगा। अंत में अध्यक्ष द्वारा डा. घनश्याम दास और डा. मनोरमा गौतम को नदलेस की आजीवन सदस्यता का पत्र और पैन दिए गए। उपस्थित सभी साथियों का धन्यवाद ज्ञापन डा. अमिता मेहरोलिया ने किया।













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