30/09/2022 को काव्य गोष्ठी की रिपोर्ट
रिपोर्ट
विराट वैभव, दिल्ली, 02/10/2022
नदलेस के मंच पर कवियों ने किया रिकॉर्ड तोड काव्य पाठ
नदलेस की ऑनलाइन मासिक गोष्ठी बेहद सफल रही। गोष्ठी सात बजे शुरू हुई और करीब साढ़े दस बजे संपन्न हुई। एक से बढ़कर एक कविता पढ़ी गई। करीब बीस कवियों का जोरदार काव्यपाठ हुआ। गोष्ठी में क्रमशः कश्मीर सिंह, धीरज वनकर, आर. पी. सोनकर, रामस्वरूप मीणा, डा. ईश्वर राही, मामचंद सागर, बंशीधर नाहरवाल, हुमा खातून, रॉक्सी कुमारी, रूप सिंह रूप, डा. विपुल भवालिया, डा. बुद्धिराम बौद्ध, रामदास बरवाली, योगेंद्र प्रसाद अनिल, मोहनलाल सोनल मनहंस, मदनलाल राज़, पुष्पा विवेक, एस. एन. प्रसाद, अमित धर्मसिंह और बी. एल. पारस ने शानदार और जानदार कविताएं प्रस्तुत की। इन कविताओं में समाज और जीवन के विविध पक्ष खुलकर सामने आए। दलित साहित्य की ऐसी समृद्धता आशान्वित करती है कि हम सामाजिक न्याय और समानता की तरफ बढ़ रहे हैं। गोष्ठी की अध्यक्षता डा. कुसुम वियोगी ने की और संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। गोष्ठी में महिपाल, सुरेंद्र, विजय कुमार भारती, डा. मुकुंद दास, राज गौतम, डा. सुरेखा, बिभाष कुमार, डा. अमिता मेहरोलिया, रेनू गौर, सौरन सिंह बौद्ध, समय सिंह जोल, डा. गीता कृष्णांगी, सीएम क्लासेस, आर. सी. यादव, रमन टाकिया, अज्जू रानी, आर. एस. आघात लोकेश कुमार और बृजपाल सहज आदि साहित्यकार मौजूद रहे।
गोष्ठी का आरंभ कश्मीर सिंह की समसामयिक और प्रासंगिक कविता कन्या पूजन से हुआ। उन्होंने पढ़ा -"धनिया! याद कर/इक्कीस में से/अट्ठारह ही वापस आयी थीं/कन्या पूजन से, पिछले बरस l" मामचंद सागर ने अपनी पहली कविता में पढ़ा -"आजादी के अमृत काल में/सब खुश हैं क्या अपने हाल में? दूसरी कविता में पढ़ा - गायें खुश थीं/इठलाती, थूथ उठाती/दुम हिलाती आती थीं गलियों में!" धीरज वनकर ने अपनी गिरकिट कविता में कुछ यूं पढ़ा - "अरे! मनुष्य जात का क्या भरोसा? कभी भी बिना बारिस के/जब एक सभा में जाता है तो/ डा. अंबेडकर अमर रहे का नारा लगाता है/ और दूसरी सभा में सरदार पटेल की वाह वाह बुलवाता है।" आर.पी.सोनकर "तल्ख़ मेहनाजपुरी ने अपने तल्ख़ अंदाज में ग़ज़ल यूं पढ़ी - "ज़ुल्म शोषण से बगावत अनवरत होगी यहां/ अब तो हर मुंह को निवाला चाहिए तो चाहिए। उनकी कविता की पंक्तियां कुछ यूं रही "इनको तो जीने का हक है/और उनको जीने का हक है /दिल पे हाथ रखो फिर बोलो/क्या सबको जीने का हक है।" रामस्वरूप मीणा ने तेवर के साथ कविता कुछ यूं पढ़ी "कोई पूजे ब्रह्मा तो कोई पूजे राम को ये जगत पूजे भगवान को/लंबी चौड़ी इस दुनिया मे कोई पूजे नाम को मैं पूजू इंसान को/कोई पढ़ता गीता तो कोई पढ़ता बाइबल तो कुछ पढ़े कुरान को/जो करता हो सबकी हिफ़ाजत मैं पढ़ता उस संविधान को।" बंशीधर नाहरवाल की कविता 'मैं भी बाबा बन जाऊं' की कुछ पंक्तियां इस प्रकार रहीं- "जगी लालसा एक मन में/मैं भी बाबा बन जाऊं/ध्वल केशराशि का मैं/क्यों ना लाभ उठाऊं? नाम फकीरी, ऐश अमीरी/सारे सुख मिल जाते हैं/बाबा लोग जहां भी जाएं/भक्त जयकार लगाते हैं।" रॉक्सी कुमारी कविता पढ़ी "मैं किसी की तड़पन नहीं/किसी की धड़कन बनना चाहती हूँ/मैं किसी की जरूरत नहीं/किसी की फितरत बनना चाहती हूँ/मैं किसी का दुःख नहीं किसी का सुख बनना चाहती हूँ/मैं किसी का सपना नहीं किसी का अपना बनना चाहती हूँ।" हुमा खातून ने बेहतरीन ग़ज़ल प्रस्तुत की। उनकी गजल के शेर कुछ यूं रहे "हो सके तो मुझे भी ज़रा खबर देना/जो गुज़रा है, उसका पता देना/ कौन कर जाता है शर्मिंदा इन्सानियत को बारहा/हो सके तो इस भीड़ को उसका पता देना।"
रूपसिंह रूप ने बड़े ही व्यवस्थित ढंग से अपनी कविता 'बैठकर चौमंजिले पर' पढ़ी - "बैठकर चौमंजिले पर ख़्वाब गिनना छोड़ दो/अगर कुछ करना ज़मीं पर है/तो आओ उतर के/मोड़ दो नदियों की धारा/खेत सूखे हैं जहाँ वरना इस बंजर ज़मीं पर/हक़ जताना छोड़ दो।" योगेंद्र प्रसाद अनिल के हाइकु कुछ इस प्रकार रहे- "गरीबी रेखा/ऐंठती अंतड़ियां/मछली चारा।१। पीली कागज/नाचे मोर मतंग/हंसवा चोर।२।गरीबी रेखा/गरीबों को काटती/तिरछी रेखा।३।।गरीबी रेखा/पत्थरों चढ़ा सेव/करते त्मेव।४।आरक्षण/बंद पिंजर लोहा/लड़े तो होता।५। डॉ. विपुल कुमार भवालिया 'सर्वश्रेष्ठ' की कविता समतामूलक समाज की पंक्तियां कुछ इस प्रकार रही "मेरे हर कदम उठे हैं शोषण के विरुद्ध/ना झुकेंगे कभी, ना रुकेंगे कहीं, बढ़ते ही जाएंगे/जातीयता के बंधन को तोड़, समतामूलक समाज बनाएंगे/सड़ी गली परंपराओं को छोड़ बुद्ध, अंबेडकर के नियम अपनाएंगे।" रामदास बरवाली की राजस्थानी कविता खूब पसंद की गई। उन्होंने पढ़ा "जाग दलित अब जाग/जाग दलित अब जाग बावळा/जाग दलित अब जाग/जितणै रैसी सुत्यो बळसी/नित सोसण री आग/बावळा जाग दलित अब जाग/तूं है सूरो रण बांकूरो झट पाखंड नै त्याग/सिंह ज्यूं धाड़ गुलामी तजदे/दुश्मण देशी हाग/बावळा जाग दलित अब जाग!" मोहन लाल सोनल मनहंस ने अपनी कविता 'पर्व मेरी आबादी' में पढ़ा -"अगर अती अतीत के पन्नें देखे/जन्मभूमि में मूलनिवासी तिरस्कृत पुरखे/उनके टूटे फूटे घररोशनी का मायना/आता किसी बेगार ढोने ढाने का परवाना।" मदन लाल राज ने अपनी कविता कुछ यूं पढ़ी - "जब से हम थोड़ा सा पढने- लिखने लगे हैं/उनकी आंखों में तब से खटकने लगे हैं/समेटे हैं आंसू हमारे बाबा साहब ने/उनके तब से माटी के माधो बिखरने लगे हैं।"
पुष्पा विवेक ने अपनी कविता जंग -ए -मैदान में कुछ तरह पढ़ा - "कोई लड़ा जंग ए मैदान में /कोई सोती कौम जगाता रहाहक की लड़ाई के लिए/संघर्ष हमेशा जारी रहा/अनेकों नौजवां शहीद हुए/आजादी के लिए/अनेकों ने फांसी के फंदे को/हंसते हंसते गले लगा लिया।" एस. एन. प्रसाद के द्वारा पढ़ी गई कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार रहीं - "उतना ही समझा जितनी घुट्टी पिलाई गयी/सत्य में असत्य की मात्रा बढ़ाई गयी/झूठ का है बोलबाला अस्मिता गुलाम हुई/छल की महिमा चारो ओर फैलाई गयीं/नैतिकता का नाम लेकर काम बुरे हो रहे/मान्यता के नाम पर पाखण्ड सभी ढो रहे/प्रेम भाईचारा नहीं समता कहीं बन्धुता है/भ्रम में है लोग जीवन मूल्यों को खो रहे जाति- पाति कर्मकांड ऊंच-नीच छुआछूत/आदमी को जानवर बनाने में लगे हैं लोग/धर्म की कट्टरता से मारकाट रक्तपात/कपट अनीति है समाज में असाध्य रोग।" डा. ईश्वर राही ने अपनी कविता गांधी जी से एक मुलाकात में पढ़ा "कल रात मैं सो गया/ पता नही कैसे, मैंने सपना देखा/क्योंकि मैं सोता तो हूं पर सपने आते नहीं/क्योंकि मुझे नींद खुली आंखों से ही आती है/और वो अक्सर धोखा खा जाते हैं कि मैं अभी जागा हूं।" गोष्ठी का समाहार वक्तव्य एस एन प्रसाद ने दिया। उन्होंने कहा कि नदलेस ने बहुत कम समय में अपनी पहचान बनाई है। बहुत लोगों को इसने अपने साहित्यिक मंच से जोड़ा है। नदलेस की टीम सबकुछ इतने व्यवस्थित ढंग से करती है कि कहीं से भी कोई असंतुष्ट और नाराज़ नज़र नहीं आता है। यही कारण है कि नदलेस को लोगों का खूब सहयोग मिल रहा है। आज की गोष्ठी इसी परिप्रेक्ष्य में विराट और शानदार रही। इसका श्रेय नदलेस से जुड़े प्रत्येक साथी और गोष्ठी में कविता पाठ करने वाले प्रत्येक कवि को समान रूप से जाता है। गोष्ठी में पधारे सभी कवियों और श्रोताओं का अनौपचारिक धन्यवाद ज्ञापन लोकेश कुमार ने किया।
हुमा खातून
प्रचार सचिव, नदलेस
01/10/2022





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