सोच पर परिचर्चा गोष्ठी
रिपोर्ट
नदलेस की पत्रिका सोच पर परिचर्चा गोष्ठी का आयोजन
नव दलित लेखक संघ की पत्रिका सोच के प्रथम अंक पर ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी 10 अगस्त 2022 को रखी गई। सोच के इस अंक का संपादन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। परिचर्चा गोष्ठी अपेक्षा से अधिक सफल और सार्थक रही। कारण कि परिचर्चा गोष्ठी निर्धारित समय से दो घंटे अधिक चली। वक्ताओं ने जमकर विचार रखे। वक्ताओं में पंजाब से सरुप सियालवी और डा. नविला सत्यादास; दिल्ली से कर्मशील भारती और डा. कुसुम वियोगी; महाराष्ट्र से दामोदर मोरे और राजस्थान से रत्नकुमार सांभरिया जी जुड़े; जिन्होंने सोच पर हर दृष्टि से सारगर्भित विचार अभिव्यक्त किए। सभी वक्ताओं ने संपादक डा. अमित धर्मसिंह के संपादकीय कौशल के साथ-साथ सोच में प्रकाशित सभी रचनाकारों की रचनाओं का पर्याप्त संज्ञान लिया। खासतौर से रत्नकुमार सांभरिया, अनिल बिडलान, सतीश खनगवाल, राजेश पाल और नंदलाल की कहानियों; आर जी कुरील, पुष्पा विवेक, शीलबोधि, ईश कुमार गंगानिया, भूपसिंह भारती, बजरंग बिहारी और दीपक मेवाती के लेखों; समय सिंह जोल, राजेश कुमार बौद्ध और कुसुम वियोगी की कविताओं तथा दो दलित लेखक संघों के विभाजन से जुड़े प्रस्ताव पत्र पर खुलकर विचार व्यक्त किए। गोष्ठी की अध्यक्षता डा. अनिल कुमार ने की और संचालन डा. अमिता मेहरोलिया ने किया। उपस्थित रचनाकारों में अखिलेश कुमार, सोमी सैन, डा. गीता कृष्णांगी, आर. पी. सोनकर, मनोरमा गौतम, बी एल तोंदवाल, कुमारी अनिता, जय कौशल, रजनी दिसोदिया, खन्नाप्रसाद अमीन, आर. सी. यादव, चितरंजन गोप लुकाटी, बंशीधर नाहरवाल, बिभाष कुमार, मदनलाल राज़, मामचंद सागर, अमित रामपुरी, डा. हरकेश कुमार, रवि प्रकाश और सतीश खनगवाल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।
सर्वप्रथम सरुप सियालवी ने सोच पर अपने विचार रखे। उन्होंने दलित साहित्य और समाज की ऐतिहासिक परम्परा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गैर दलित समाज, दलितों के साथ हमेशा से ही भेदभाव वाला रवैया अपनाता आ रहा है। मनु द्वारा लिखित मनु स्मृति भेदभाव का आधार रही है। अन्य वेदों में भी उपेक्षित समाज के प्रति सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता के कठोर व्यवहार का उल्लेख मिलता है। अभी भी समाज में कुछ खास बदलाव नहीं हुआ है इसलिए सामाजिक विसंगति और भेदभाव के खिलाफ लगातार लिखने पढ़ने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में नदलेस द्वारा सोच का संपादन और प्रकाशन करना रचनात्मक रूप से लाभकारी है। इसमें जो रचना सामग्री संकलित की गई है, वह हर दृष्टि से उपयोगी है। इसके लिए संपादक बधाई के पात्र हैं। कर्मशील भारती ने कहा कि संगठन बनाने भर से कुछ नहीं होता, क्योंकि संगठन अपने काम से पहचाने जाते हैं। आप देखिए कि आज दलितों के जो भी नए पुराने संगठन है, उनमें से ज्यादातर ध्वस्त हो चुके हैं। उसका कारण यह है कि संगठनों में व्यक्तिवाद हावी हो गया है, जिससे संगठन विशेष से, व्यक्ति विशेष तो सामने आ रहे हैं लेकिन संगठन का सामाजिक अवदान लगातार पिछड़ रहा है। इसके विपरीत नदलेस ने जो काम किया है, वह काबिले तारीफ है। आज उसकी उपस्थिति को नकारा नहीं जा सकता। नदलेस ने अपने गठन के एक वर्ष की अल्पावधि में ही देश व्यापी पहचान बनाई है। मुझे खुशी है कि डा. अमित धर्मसिंह ने पूरी जिम्मेदारी से नदलेस गठन और संचालन को बखूबी अंजाम दिया है। उनके द्वारा संपादित सोच निश्चित ही वह ट्रैक साबित होगी जिस पर नदलेस और इसकी पत्रिका सोच सफलतापूर्वक आगे का सफर तय करेगी। जरूरत है तो बस,नदलेस के सभी साथियों को इसी तरह जिम्मेदारीपूर्वक कार्य करने की। डा. नविला सत्यादास ने पत्रकारिता की ऐतिहासिक परम्परा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पत्रकारिता हमेशा ही सामाजिक बदलाव के लिए प्रतिबद्ध रही है। संपादक भी एक किस्म का पत्रकार ही होता है जो अपने संपादन कौशल से संबंधित विचार और विचारधारा को समाज में प्रचारित और प्रसारित करने का कार्य करता है। बाबा साहब अम्बेडकर ने भी अपने जीवनकाल में कई पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन व संपादन किया। कोई भी अकेला आदमी अपने विचारों को दूर तक प्रेषित करने में व्यक्तिगत तौर से अति सीमित होता है इसलिए वह पत्र पत्रिकाओं का सहारा लेता है ताकि अपनी बात को अधिक से अधिक लोगों तक भेज सके। पत्रिका इसका सर्वाधिक मजबूत साधन होती है जिसमें एक से अधिक रचनाकारों और बुद्धिजीवियों के विचार दर्ज होते हैं और आम जन तक पहुंचते हैं। किसी संगठन के लिए भी पत्रिका बेहद जरूरी होती है। नदलेस की पत्रिका सोच को देखकर कहा जा सकता है कि यह बहुत ही उत्कृष्ट दर्जे का संपादन हुआ है। खासतौर से इसमें जो आधी आबादी के साहित्य को जगह दी गई है, वह काबिले तारीफ है, क्योंकि बगैर उनको सहयोग दिए, हमारा समाज आगे नहीं जा सकता है। दामोदर मोरे ने सोच के श्लोगन 'कल से कल तक के लिए' के विषय में कहा कि सोच निश्चित ही हमें अतीत, वर्तमान और भविष्य के विषय में सोचने पर मजबूर करती है। उन्होंने सोच में दर्ज काव्य सोपान का संज्ञान लेते हुए कहा कि सभी कवियों की कविताओं में अंबेडकर की विचारधारा अंतर्निहित है, हमें कविताओं में बौद्ध दर्शन का भी पर्याप्त समावेश करना होगा। उन्होंने पत्रिका के सौंदर्य, आकार प्रकार और गठन, सबकी भूरि भूरि प्रसंशा करते हुए नदलेस और संपादक दोनों को बधाई दी। उन्होंने यह भी कहा कि दलित साहित्य में आज भी मासिक और त्रैमासिक पत्रिकाओं का अभाव है इसलिए सोच को मासिक या त्रैमासिक बनाने पर विचार किया जाना चाहिए। इसके लिए लिए या तो बैंक में इतना धन जमा करना चाहिए कि जिसके ब्याज से पत्रिका निरंतर प्रकाशित की जा सके। या फिर बुद्ध और अंबेडकर से जुड़े सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्थानों से आर्थिक मदद लेकर पत्रिका का मासिक अथवा त्रैमासिक संपादन करना चाहिए। तभी सोच के माध्यम से स्तरीय सामग्री दलित समाज के अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सकेगी और तभी दलित समाज में बुद्ध और अंबेडकर से जुड़ी चेतना और दृष्टि तेजी से जागृत हो सकेगी। चूंकि सोच अपने उद्देश्य और विचारधारा को लेकर स्पष्ट है इसलिए इसका विस्तार किया ही जाना चाहिए।
यद्यपि, डा. कुसुम वियोगी ने पत्रिका के कवर पेज से आंबेडकरी विचारधारा के पता न चलने की बात कही। साथ ही सोच में संकलित सामग्री के चयन पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने बजरंग बिहारी के लेख का संज्ञान लेते हुए कहा कि सोच के प्रथम अंक में रचना संकलन करते हुए संपादक को विशेष ध्यान रखना चाहिए था। यह भी ध्यान रखना चाहिए था कि गैर दलित कितना ही बढ़िया क्यों न लिखे, वे दलित साहित्यकारों की बराबरी नहीं कर सकते हैं। इसलिए सोच में ऐसे साहित्यकारों की रचना संकलित नहीं करनी चाहिए थी। संदेह नहीं कि ऐसे गैर दलित साहित्यकार दलित साहित्य में जबरन उपस्थिति बनाए हुए हैं। नदलेस और सोच के संपादक को इस ओर ध्यान देना चाहिए। सोचने वाली बात है कि पत्रिका किसी खास विचारधारा की संवाहक होती है इस नाते सोच में भी स्तरीय रचनाएं ही संकलित की जानी चाहिए थीं। रत्नकुमार सांभरिया ने कुसुम वियोगी से पूरी तरह असहमत होते हुए कहा कि ऐसा नहीं कि सोच में स्तरीय सामग्री संकलित नहीं की गई है। रचनाओं को रचनाकार के फेस से नहीं बल्कि उसके कंटेंट से परखना चाहिए। रही बात संपादकीय कौशल की तो सोच में संकलित नदलेस सोपान को देखिए कितनी गंभीरता और सलीके से कार्य किया गया है। पत्रिका को इतने भी हल्के में नहीं लिया जा सकता है। प्रथम अंक होने के बावजूद सोच का यह अंक हर दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बन पड़ा है। कथा सोपान को देखिए! उसमें कुल पांच कहानियां संकलित की गई हैं जिनमें से चार कहानियां काफी अच्छी बन पड़ी हैं। एक कहानी का शिल्प थोड़ा कमज़ोर है, इसलिए वह कंटेंट को संप्रेषित करने में भी असफल रही है। आज समय दलित कहानी को विस्तार देने का है, जिसके लिए कहानी में और अधिक मेहनत करने की आवश्यकता है। खासतौर से उसके कंटेंट के साथ-साथ शिल्प पर भी पर्याप्त ध्यान देने की जरूरत है। फिर भी सोच में दर्ज कहानियां किसी भी स्तर से निराश नहीं करती हैं। इसके अलावा विमर्श सोपान में संकलित लेख भी महत्त्वपूर्ण बन पड़े हैं जो दलित साहित्य के सामयिक मुद्दों के साथ-साथ कुछ दूसरे जरूरी और गंभीर मुद्दों को भी ध्यान में रखकर लिखे गए हैं। बेगमपुरा की संकल्पना वाले लेख और दलित विमर्श का अगला पड़ाव आदि इसके सशक्त उदाहरण हैं। कुल मिलकर सोच अपने प्रथम अंक में ही महत्त्वपूर्ण बन पड़ी है। जिसको ठीक से पढ़े और समझे बिना कोई भी व्यक्तिगत राय कायम करना बेमानी है।
अध्यक्षता कर रहे डा. अनिल कुमार ने कहा कि जाने अनजाने हमसे और नदलेस से यह बहुत बड़ा काम हो गया है। इस कार्य में डा. अमित धर्मसिंह मुख्य सूत्रधार रहे हैं। गत वर्ष अमित जी ने ही हम सबका आह्वान किया था। हमने भी सोचा कि जब अपना भाई कुछ करना चाहता है तो हमें उसके साथ लगना चाहिए। हम उसके साथ लगे और आज रिजल्ट हम सबके सामने है। नदलेस ने गत एक वर्ष में न सिर्फ देशव्यापी पहचान बनाई है बल्कि सोच का प्रकाशन करके उसे स्थायी भी बना दिया है। सोच का यह प्रथम अंक आगामी अंकों के लिए एक नजीर प्रस्तुत करेगा। कह सकते हैं कि यह अंक नदलेस और पत्रिका के आगामी अंकों के लिए मिल का पत्थर साबित होगा। इस बात की पुष्टि अधिकतर वक्ताओं के वक्तव्यों ने भी की है। सभी वक्ताओं ने सोच के प्रथम अंक पर जो विचार व्यक्त किए हैं, वे सार्थक और विचारणीय हैं। जिनके आलोक में, आगे और भी बेहतर कार्य करने का प्रयास किया जाएगा। फिलहाल इस अंक के कर्मठ संपादक डा. अमित धर्मसिंह निश्चित ही बधाई के पात्र हैं। अंत में डा. अमित धर्मसिंह ने सभी वक्ताओं और श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन करने के क्रम में कहा कि पत्रिका के मुद्रण पृष्ठ पर बाकायदा दर्ज किया गया है कि पत्रिका पूरी तरह बुद्ध, फुले और अंबेडकर के चिंतन और दर्शन से प्रेरित है। इसमें उन्हीं की विचाधाराओं से जुड़ी सामग्री स्वीकृत की जाती है, इसलिए ऐसा कहना कि पत्रिका या पत्रिका का मुख पृष्ठ अपनी विचारधारा को स्पष्ट नहीं करता है, गलत है। सामग्री के संकलन के विषय में यह बात विचार करने की है कि दलित समाज में अभी तक भी कितने प्रबुद्ध रचनाकार हैं जो सशक्त रचनाकर्म करने में सक्षम हैं? केवल उनके भरोसे पत्रिका का संपादन नहीं किया जा सकता है इसलिए वही सामग्री संकलित करनी पड़ेगी जो दलित समाज के बड़े तबके द्वारा लिखी और पढ़ी जा रही है। इसके अतिरिक्त सोच में करीब ग्यारह पृष्ठों का सम्पादकीय लिखा गया है, जिसमें पत्रिका की पृष्ठभूमि, विचारधारा और संकलित सामग्री के विषय में पर्याप्त संज्ञान लिया गया है। संपादकीय में यह भी दर्ज किया गया है कि इस बार के अंक में रचनाकारों द्वारा दिए गए उनके प्राथमिक रचनात्मक सहयोग की सामग्री को स्वागत सत्कार के तौर पर संकलित किया जा रहा है। सामग्री के चयन में शिल्प की अपेक्षा कथ्य और विचारधारा को केंद्र में रखा गया है। रही बात उनके परिष्करण की तो यह प्रक्रिया बहुत धीमी होती है जो समयानुसार अपनाई जाती है और अपनाई जाती रहेगी। निश्चित ही आगे के संपादक इस ओर पर्याप्त ध्यान देंगे। इसी उम्मीद और विश्वास के साथ संपादक डा. अमित धर्मसिंह ने सभी वक्ताओं और उपस्थित रचनाकारों का यथायोग्य धन्यवाद ज्ञापन किया।
डा. अमित धर्मसिंह
21/08/2022
9310044324
प्रेस विज्ञप्ति
नदलेस की पत्रिका सोच पर परिचर्चा गोष्ठी का आयोजन
दिल्ली। नव दलित लेखक संघ की पत्रिका सोच के प्रथम अंक पर ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी रखी गई। सोच के इस अंक का संपादन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। परिचर्चा गोष्ठी अपेक्षा से अधिक सफल और सार्थक रही। कारण कि परिचर्चा गोष्ठी निर्धारित समय से दो घंटे अधिक चली। वक्ताओं ने जमकर विचार रखे। वक्ताओं में पंजाब से सरुप सियालवी और डा. नविला सत्यादास, दिल्ली से कर्मशील भारती और डा. कुसुम वियोगी, महाराष्ट्र से दामोदर मोरे और राजस्थान से रत्नकुमार सांभरिया जी जुड़े, जिन्होंने सोच पर हर दृष्टि से सारगर्भित विचार अभिव्यक्त किए। सभी वक्ताओं ने संपादक डा. अमित धर्मसिंह के संपादकीय कौशल के साथ-साथ सोच में प्रकाशित सभी रचनाकारों की रचनाओं का पर्याप्त संज्ञान लिया। खासतौर से रत्नकुमार सांभरिया, अनिल बिडलान, सतीश खनगवाल, राजेश पाल और नंदलाल की कहानी; आर जी कुरील, पुष्पा विवेक, शीलबोधि, ईश कुमार गंगानिया, भूपसिंह भारती, बजरंग बिहारी और दीपक मेवाती के लेख; समय सिंह जोल, राजेश कुमार बौद्ध और कुसुम वियोगी की कविता तथा दो दलित लेखक संघों के विभाजन से जुड़े प्रस्ताव पत्र पर खुलकर विचार व्यक्त किए। गोष्ठी की अध्यक्षता डा. अनिल कुमार ने की और संचालन डा. अमिता मेहरोलिया ने किया। उपस्थित रचनाकारों में अखिलेश कुमार, सोमी सैन, डा. गीता कृष्णांगी, आर. पी. सोनकर, मनोरमा गौतम, बी एल तोंदवाल, कुमारी अनिता, जय कौशल, रजनी दिसोदिया, खन्नाप्रसाद अमीन, आर. सी. यादव, चितरंजन गोप लुकाटी, बंशीधर नाहरवाल, बिभाष कुमार, मदनलाल राज़, मामचंद सागर, अमित रामपुरी, डा. हरकेश कुमार, रवि प्रकाश और सतीश खनगवाल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। सभी वक्ताओं और श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन सोच के संपादक डा. अमित धर्मसिंह ने किया।
सर्वप्रथम सरुप सियालवी ने सोच पर अपने विचार रखे। उन्होंने दलित साहित्य और समाज की ऐतिहासिक परम्परा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नदलेस द्वारा सोच का संपादन और प्रकाशन करना रचनात्मक रूप से लाभकारी है। इसमें जो रचना सामग्री संकलित की गई है, वह हर दृष्टि से उपयोगी है। इसके लिए संपादक बधाई के पात्र हैं। कर्मशील भारती ने कहा कि संगठन बनाने भर से कुछ नहीं होता, क्योंकि संगठन अपने काम से पहचाने जाते हैं। नदलेस ने यह काम कर दिखाया कि आज उसकी उपस्थिति को नकारा नहीं जा सकता। मुझे खुशी है कि अमित धर्मसिंह ने पूरी जिम्मेदारी से इस कार्य को बखूबी अंजाम दिया है। डा. नविला सत्यादास ने पत्रकारिता परम्परा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह बहुत ही उत्कृष्ट दर्जे का संपादन हुआ है। खासतौर से इसमें जो आधी आबादी के साहित्य को जगह दी गई है, वह काबिले तारीफ है, क्योंकि बगैर उनको सहयोग दिए, हमारा समाज आगे नहीं जा सकता है। दामोदर मोरे ने सोच के श्लोगन 'कल से कल तक के लिए' के विषय में कहा कि सोच निश्चित ही हमें अतीत, वर्तमान और भविष्य के विषय में सोचने पर मजबूर करती है। उन्होंने सोच में दर्ज काव्य सोपान का संज्ञान लेते हुए कहा है सभी कवियों की कविताओं में अंबेडकर की विचारधारा अंतर्निहित है, हमें कविताओं में बौद्ध दर्शन का भी पर्याप्त समावेश करना होगा। उन्होंने पत्रिका के सौंदर्य, आकार प्रकार और गठन सबकी भूरी भूरी प्रसंशा करते हुए नदलेस और संपादक दोनों को बधाई दी। यद्यपि, डा कुसुम वियोगी ने पत्रिका के कवर पेज से आंबेडकरी विचारधारा के पता न चलने की बात कही। साथ ही सोच में संकलित सामग्री के चयन पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने बजरंग बिहारी के लेख का ज्ञान लेते हुए कहा कि अंक में रचना संकलन करते हुए संपादक को विशेष ध्यान रखना चाहिए था।
रत्नकुमार सांभरिया ने कुसुम वियोगी से पूरी तरह असहमत होते हुए कहा कि ऐसा नहीं कि सोच में स्तरीय सामग्री संकलित नहीं की गई। रचनाओं को रचनाकार के फेस से नहीं बल्कि उसके कंटेंट से परखना चाहिए। रही बात संपादकीय कौशल की तो सोच में संकलित नदलेस सोपान को देखिए कितनी गंभीरता और सलीके से कार्य किया गया है। पत्रिका को इतने भी हल्के में नहीं लिया जा सकता है। प्रथम अंक होने के बावजूद सोच का यह अंक हर दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बन पड़ा है। अध्यक्षता कर रहे डा. अनिल कुमार ने कहा कि जाने अनजाने हमसे और नदलेस से यह बहुत बड़ा काम हो गया है। इस कार्य में डा. अमित धर्मसिंह मुख्य सूत्रधार रहे हैं, क्योंकि गत वर्ष अमित जी ने ही हम सबका आह्वान किया था। हमने भी सोचा कि जब अपना भाई कुछ करना चाहता है तो हमें उसके साथ लगना चाहिए। हम उसके साथ लगे और आज रिजल्ट हम सबके सामने है। इसके अलावा सभी वक्ताओं ने सोच के प्रथम अंक पर जो विचार व्यक्त किए, वे सभी सार्थक और विचारणीय हैं। आगे और भी बेहतर कार्य करने का प्रयास किया जाएगा। अंत में संपादक डा. अमित धर्मसिंह ने सभी वक्ताओं और श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन के क्रम में कहा कि पत्रिका के मुद्रण पृष्ठ पर बाकायदा दर्ज किया गया है कि पत्रिका पूरी तरह बुद्ध, फुले और अंबेडकर के चिंतन और दर्शन से प्रेरित है। इसमें उन्हीं की विचाधाराओं से जुड़ी सामग्री स्वीकृत की जाती है, इसलिए ऐसा कहना कि पत्रिका या पत्रिका का मुख पृष्ठ अपनी विचारधारा को स्पष्ट नहीं करता, गलत है। सामग्री के संकलन के विषय में यह बात विचार करने की है कि दलित समाज में अभी तक भी कितने प्रबुद्ध रचनाकार हैं जो सशक्त रचनाकर्म करने में सक्षम हैं? केवल उनके भरोसे पत्रिका का संपादन नहीं किया जा सकता है। इसलिए वही सामग्री संकलित करनी पड़ेगी जो दलित समाज के बड़े तबके द्वारा लिखी पढ़ी जा रही है। रही बात उनके परिष्करण की तो यह प्रक्रिया बहुत धीमी होती है जो समयानुसार अपनाई जाती है और अपनाई जाती रहेगी। इसी उम्मीद और विश्वास के साथ संपादक डा. अमित धर्मसिंह ने सभी वक्ताओं और उपस्थित रचनाकारों का यथायोग्य धन्यवाद ज्ञापन किया।
डा. अमित धर्मसिंह
11/08/2022
9310044324
नदलेस की रचनात्मक प्रस्तुति
'सोच'
संपादक : डा. अमित धर्मसिंह
वक्तागण :
रत्नकुमार सांभरिया
दामोदर मोरे
डा. नाविला सत्यादास
सरुप सियालवी
डा. कुसुम वियोगी
कर्मशील भारती
अध्यक्षता : डा. अनिल कुमार
संचालन : डा. अमिता मेंहरोलिया
धन्यवाद ज्ञापन : संपादक
दिन/दिनांक/समय : बुधवार, 10 अगस्त, 2022, शाम सात बजे से।
स्थान गूगल मीट :
meet.google.com/xaw-yfbv-yra
आयोजक : नव दलित लेखक संघ, दिल्ली।।
सच्चाई अभी तक 14/08/2022

















Comments
Post a Comment