शिमला में हुए तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय साहित्य उत्सव में दलित साहित्यकारों को शामिल न किए जाने पर नदलेस की विचार गोष्ठी

रिपोर्ट

शिमला में हुए तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय साहित्य उत्सव में दलित साहित्यकारों को शामिल न किए जाने पर नदलेस की विचार गोष्ठी

          आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर, भारत के संस्कृति मंत्रालय और साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में 'उन्मेष, अभिव्यक्ति का उत्सव' शीर्षक से शिमला में मनाए गए तीन दिवसीय (16 जून से 18 जून, 2022) 'अंतर्राष्ट्रीय साहित्य उत्सव' में दलित साहित्यकारों को शामिल न किए जाने पर नव दलित लेखक संघ द्वारा 18 जून 2022 की शाम सात बजे देश भर के दलित साहित्यकारों की गूगल मीट पर ऑनलाइन मीटिंग का आयोजन किया गया। जिसमें उक्त विषय को लेकर सभी वक्ताओं ने रोष प्रकट किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डा. अनिल कुमार ने की और संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। मीटिंग में कर्मशील भारती, हंसराज सुमन, पुष्पा विवेक, राजन तनवर, कौशल पंवार, आर. पी. सोनकर, चितरंजन गोप लुकाटी, डा. शंकर लाल, डा. हरकेश राठी, डा. अमित धर्मसिंह और डा. अनिल कुमार आदि ने विचार रखे। कार्यक्रम में आर. एस. मीना, प्रदीप ठाकुर, लोकेश चौहान, गीता कृष्णांगी, कार्तिक चौधरी, योगेंद्र सिंह, मोहनलाल सोनल मनहंस, नरेश संघवाहिया, डा. विजय लाल बैरवा, अरविंद भारती, प्रदीप कुमार गौतम, बृजपाल सहज, नवीन कुमार, राज बंशी, रितेश रावत, ज्योति पासवान, दीपक कुमार, श्रीलाल बौद्ध आदि दलित साहित्यकार मौजूद रहे।

           शिमला में हुए कार्यक्रम में दलित साहित्यकारों की हुई उपेक्षा का सर्वप्रथम संज्ञान लेने वाले कर्मशील भारती ने कहा कि मुझे यह जानकर अत्यंत दुख हुआ कि शिमला में इतना बड़ा साहित्य महोत्सव हो रहा है और उसमें दलित साहित्यकारों की उपस्थिति नगण्य मात्र है। न ही उसमें दलित विमर्श को लेकर कोई सत्र रखा गया है। सोचने वाली बात यह है कि जो इक्का दुक्का दलित साहित्यकार महोत्सव में शामिल किए गए हैं क्या वाकई वे दलित साहित्यकारों की हैसियत से शामिल किए गए हैं? मुझे लगता है कि वे दलित साहित्यकार की नहीं बल्कि किन्हीं दूसरी वजहों से शामिल किए गए हैं। वजह कोई भी हो सकती है। मसलन उनका पद हो सकता है, महोत्सव के उद्देश्य से सामंजस्य हो सकता है या फिर अकादमिक वजह हो सकती है। इतना जरूर है कि महोत्सव में उनकी उपस्थिति दलित साहित्यकारों के रूप में तो बिलकुल नहीं रही, जो अत्यंत खेद का विषय है। वास्तव में, जब इतना बड़ा साहित्य उत्सव हुआ तो उसमें दलित साहित्यकारों को अवश्य शामिल किया जाना चाहिए था। बल्कि उसमें दलित साहित्य और विमर्श को लेकर अलग से सत्र रखने की जरूरत थी। चूंकि दलित साहित्य आज किसी पहचान का मोहताज नहीं। यह न सिर्फ देश भर में बल्कि पूरी दुनिया में प्रतिष्ठित हो चुका है, जिसकी आज किसी भी स्तर से अनदेखी करना उचित नहीं।

         हंसराज सुमन के कहा कि यह बड़ी विडंबना है कि शिमला में हो रहे अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव में दलित साहित्यकारों और दलित विमर्श को उचित स्थान नहीं दिया गया। यह कोई अनजाने में नहीं हुआ है। यह जानबूझकर किया गया है। सोचने की बात है कि आज जो किन्नर विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श आदि कई तरह के छोटे-बड़े विमर्श चल रहे हैं, वे सब दलित विमर्श से ही उपजे हुए विमर्श हैं। बावजूद इसके, दलित विमर्श की अनदेखी किए जाना कोई छोटी बात नहीं है। दलित साहित्यकारों और संगठनों द्वारा इसका संज्ञान लिया जाना चाहिए। लेकिन नव दलित लेखक संघ को छोड़कर किसी ने भी इसका संज्ञान नहीं लिया। इसलिए इस संदर्भ में लिखा-पढ़ा जाना चाहिए। इस विषय में लेख लिखकर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित किए जाने चाहिए ताकि हमारी आवाज बड़े पैमाने पर लोगों तक पहुं सके। इसके अलावा और भी जो उचित कार्यवाही हो सकती है, वह भी की जानी चाहिए। क्योंकि इतने बड़े कार्यक्रम में कुछेक अकादमिक दलित रचनाकारों को ही शामिल किया जाना पर्याप्त नहीं है। आज दलित साहित्य को पाठ्यक्रमों से हटाने की पुरजोर कोशिश चल रही है। दलित शब्द का विरोध हो रहा है और अब कार्यक्रमों से भी दलित विमर्श को दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में आवाज उठाने के अलावा दूसरा कोई रास्ता बचता ही नहीं है। इसलिए इस तरह के सवाल उठाया जाना और हम सबका एकजुट होना आज बेहद जरूरी है। तभी हम दलित साहित्य और समाज के लिए कुछ बेहतर कर पाएंगे।

          पुष्पा विवेक ने कहा कि सरकारी या गैर सरकारी कार्यक्रमों में दलित साहित्य और साहित्यकारों की अनदेखी अक्सर होती रही है जो कि किसी भी रूप में ठीक नहीं है। हमें इस पर संज्ञान लेना चाहिए। यह बड़ी विडंबना है कि आज देश के विभिन्न राज्यों द्वारा दलित शब्द तक को प्रतिबंधित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। सोचने वाली बात यह है कि इतने बड़े पैमाने पर आज दलित साहित्य लिखा व पढ़ा जा रहा है। ऐसे में उसे प्रतिबंधित करना या उपेक्षित करना कहां तक उचित है? कौशल पंवार ने अपनी बात रखते हुए कहा कि यद्यपि मुझे शिमला में हो रहे कार्यक्रम की संपूर्ण जानकारी नहीं है। फिर भी यदि ऐसा हुआ है तो यह गलत हुआ है। निश्चित रूप से कार्यक्रम में दलित विमर्श को लेकर अलग से, एक पूरा सत्र रखा जाना चाहिए था, जो कि नहीं रखा गया। फिर भी हमें फैक्ट पर ध्यान देने की जरूरत है। क्योंकि जानकारी मिली है कि कार्यक्रम में कुछेक दलित साहित्यकार शामिल भी हुए हैं। इस संदर्भ में उनसे बात करनी चाहिए अथवा कार्यक्रम के सभी फैक्ट्स जुटाने चाहिए और उसके बाद ही उचित कार्यवाही करनी चाहिए। इस तरह के कार्यक्रमों आदि में होने वाली दलित साहित्य की उपेक्षा के खिलाफ आवाज अवश्य उठाई जानी चाहिए। 

          मीटिंग में शिमला से जुड़े रचनाकार राजन तनवर ने बताया कि वे इस तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव का हिस्सा रहे। साहित्य उत्सव में कुछेक ख्यातिलब्ध, दलित साहित्यकार शामिल थे, जिनमें शरण कुमार लिंबाले, श्योराज सिंह बेचैन और एस आर हारनोट के नाम प्रमुख हैं। भले ही ये साहित्यकार कार्यक्रम में शामिल थे लेकिन यह भी सच है कि ये दलित साहित्यकार के रूप में शामिल नहीं थे। न ही दलित साहित्य और विमर्श की कोई बात इनके द्वारा कार्यक्रम में रखी गई। इसलिए ऐसा सोचना कि कार्यक्रम में दलित साहित्य और साहित्यकारों की उपेक्षा हुई है, कुछ गलत नहीं है। इसका उचित संज्ञान लिया ही जाना चाहिए। चितरंजन गोप लुकाटी ने कहा कि दलित रचनाकारों को अब किसी भी स्तर से हो रही उपेक्षा को सहन नहीं करना चाहिए। सरकार या गैर दलित साहित्यकार नहीं चाहते कि दलित साहित्य आगे आए। इससे समाज की वास्तविकता सामने आती है। दलितों की समस्याएं सामने आती हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि वे दलित साहित्य और साहित्यकारों को कार्यक्रमों या पाठ्यक्रमों आदि में उचित स्थान नहीं देंगे। लेकिन हमें अपने हक की लड़ाई लड़ते रहना है। शिमला में हुए तीन दिवसीय कार्यक्रम में निश्चित ही दलित साहित्य और संगठनों से जुड़े प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाना चाहिए था।

          आर. पी. सोनकर ने माना कि दलितों के प्रति गैर दलितों का यह स्वभाव कोई आज का नहीं, सदियों पुराना है, जो अभी तक बदला नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हमें उनसे किसी तरह की अपेक्षा करनी चाहिए? आखिर हम उनके कार्यक्रमों में क्यों शामिल होना चाहते हैं? और वे क्यों हमें अपने कार्यक्रमों में शामिल करें? मुझे लगता है कि हमें इस ओर ध्यान न देकर अपनी एकजुटता पर ध्यान देना चाहिए। अपनी उपेक्षा के कारण हम स्वयं भी हैं। आज हमारे कई संगठन हो गए हैं। पहले दलेस, फिर अलेस और अब नदलेस आदि। लगता है इस तरह का विभाजन भी हमें नुकसान पहुंचा रहा है। जहां तक बात शिमला में हुए साहित्य उत्सव में की गई उपेक्षा की है तो इसका जवाब हम अपनी साहित्यिक और सांगठनिक एकजुटता से दे सकते हैं। दलित साहित्य के अकेडमिशियनों को भी इस तरफ ध्यान देना चाहिए। डा. हरकेश राठी ने कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं कि भले ही आज कितना ही दलित साहित्य लिखा पढ़ा जा रहा हो और कितना ही दलित समाज विभिन्न क्षेत्रों में तरक्की कर चुका हो लेकिन आज भी उसे जातिगत और सामाजिक उपेक्षा का शिकार बनाया ही जाता है। मुझे याद है कि जब अनिल जी अपनी एक पुस्तक गैर दलित प्रोफेसर को देने गए थे तो मैं उनके साथ गया था। पुस्तक देखकर प्रोफेसर ने तुरंत कहा था कि अब इस दलित वलित को छोड़ दो। अब कहां दलित रह गए हैं। हैरत की बात है कि उन साहब को दलितों के साथ हो रहे अन्याय दिखाई नहीं देते। अपनी इसी भेदभावपरक भावना और विचारों से वे लिखते पढ़ते हैं और कार्यक्रम आदि करते हैं, जिनमें दलितों की जान बूझकर उपेक्षा की जाती है। इसलिए उनकी इस प्रवृत्ति के खिलाफ आवाज उठाना बहुत जरूरी है।

          डा. अमित धर्मसिंह ने कहा कि यह सच है कि हमें उपेक्षित करना उनका सदियों पुराना स्वभाव है जो अभी तक नहीं बदला है, लेकिन इस बात से हम उनका प्रतिरोध करना बंद नहीं कर सकते। आप देखिए कि बुद्ध, रैदास, कबीर, फुले अंबेडकर आदि ने यदि प्रतिरोध न किया होता तो समाज में आज तक जो परिवर्तन हुए हैं, वे भी नहीं हुए होते। न आज हमारे पास बुद्धिज्म होता, न रैदास वाणी होती, न कबीर पंथ होता और न अंबेडकवाद। इसलिए यह सोचना जरूरी नहीं कि वे नहीं बदलने वाले, बल्कि यह सोचना जरूरी है कि अपने समय में जो कुछ भी गलत हो रहा है, उसके खिलाफ आवाज कैसे उठाई जाए ताकि समय रहते उनके द्वारा की गई उपेक्षा के साथ हमारा प्रतिरोध भी दर्ज हो सके। रही बात उनसे यह अपेक्षा करने कि वे हमें अपने कार्यक्रमों आदि में शामिल क्यों करें, तो इसके हम अधिकारी हैं। क्योंकि हम इसी देश के हिस्से हैं, कोई बाहर से आए हुए नहीं हैं। हमारी जिंदगी, हमारी सेवाएं और हमारा टैक्स आदि इसी देश के काम आता है तो ऐसे में हम अपने अधिकारों के विषय में आवाज भी न उठाए तो यह न तो सामाजिक रूप से उचित है और न ही संवैधानिक रूप से। चूंकि शिमला में हो रहे तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव सरकारी नीतियों और बजट के तहत हो रहा है इसलिए उसमें हमारी समुचित हिस्सेदारी और भागीदारी होनी चाहिए थी, जो कि नहीं हुई इसलिए इस विषय में जानने का हमें संवैधानिक अधिकार है। यह विचारणीय पक्ष है कि इसमें शामिल उच्च पदेन दलित साहित्यकारों को, क्या उक्त हिस्सेदारी का पात्र बनाया गया है या वे सिर्फ ख्यातिलब्ध साहित्यकार होने की वजह से ही साहित्य उत्सव में शामिल किए गए हैं। इस तथ्य का समुचित संज्ञान लिया जाना चाहिए।

          अध्यक्षता कर रहे, डा. अनिल कुमार ने कहा कि हम भारत में कुछ भी हों, लेकिन सबसे पहले हम दलित हैं। आज इसी रूप में हमारी पहचान है। पहले जब हमारी जातिगत पहचान थी लोग हमें हेय दृष्टि से देखते थे और हममें भी कुंठा का भाव जागृत होता था। मगर जबसे हम दलित कहलाने लगे हैं तबसे हमें दलित कहलाने में किसी भी प्रकार की शर्मिंदगी या कुंठा का अहसास नहीं होता है। बल्कि सामाजिक और सामूहिक एकता के बल का अहसास होता है। इसी से आज पूरा गैर दलित समाज ही नहीं, बल्कि वर्तमान सरकार तक भयभीत हैं। यही कारण है कि वे दलित शब्द का विरोध करने के साथ-साथ हमें अपने किसी कार्यक्रम आदि में भी शामिल नहीं करना चाहते। शिमला में हो रहे अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। उसमें जो एक दो साहित्यकार शिरकत करने पहुंचे हैं, निश्चित ही उनके वहां पहुंचने के कारण दूसरे हैं। दलित साहित्यकार बनकर, वे न तो वहां पहुंचे हैं, न उन्हें बुलाया गया, न उन्होंने वहां दलित की बात की है और न ही कार्यक्रम में दलित विमर्श को कोई स्थान दिया गया है। कह सकते हैं कि शिमला में हुआ आजादी का अमृत महोत्सव दलितों की आजादी से जुड़ा हुआ महोत्सव नहीं है। न ही वह विभिन्न विमर्शों की पैरवी करने वाला कार्यक्रम नहीं है। भले ही वहां देश-विदेश से सैकड़ों की संख्या में साहित्यकारों ने हिस्सा लिया हो लेकिन वे ज्यादातर वे साहित्यकार हैं जो पूर्व से प्रतिष्ठित हैं। संभवतः जिन्हें बुलाना उक्त कार्यक्रमों के संयोजकों की मजबूरी हो। ऐसे में यह वाकई चिंता का विषय है कि आखिर साहित्य उत्सव में दलित विमर्श को जगह क्यों नहीं दी गई। जबकि किन्नर विमर्श, आदिवासी विमर्श और स्त्री विमर्श आदि पर सत्र रखे गए। संदेह नहीं कि ये सारे विमर्श दलित साहित्य के बाद के अथवा उसी से उपजे हुए विमर्श हैं, तब भी दलित विमर्श की अनदेखी की गई। आज दलित साहित्यकार बहुत बड़ी संख्या में लिख पढ़ रहे हैं और कई नामों से उनके संगठन भी सक्रिय हैं लेकिन न तो साहित्य उत्सव में उनमें से किन्हीं पदाधिकारियों और प्रतिंधियों को आमंत्रित किया गया और न ही इन्होंने उनके विरुद्ध कोई आवाज उठाई। विचारणीय है कि जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किया गया है तब भी दोनों तरफ से ऐसी उदासीनता क्यों रहीं। इस उदासीनता को, कम से कम अपनी तरफ से तो तोड़ने की आज पुरजोर आवश्यकता है। 

          वक्ताओं के उक्त विचारों के बाद तय किया गया कि जल्दी ही दलित साहित्यकारों की ऑफलाइन मीटिंग बुलाई जाएगी, जिसमें अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव के विषय में अपनी आपत्ति दर्ज कर एक मांगपत्र तैयार किया जाएगा, जिसे संकृति मंत्रालय और साहित्य अकादमी के साथ-साथ अन्य संबंधित विभागों को भी प्रेषित किया जाएगा; ताकि भविष्य में दलित साहित्यकारों और विमर्श की अनदेखी न की जा सके। कार्यक्रम के अंत में सभी वक्ताओं और श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन डा. अमित धर्मसिंह ने किया।।

डा. अमित धर्मसिंह

महासचिव, नव दलित लेखक संघ

22/06/2022

9310044324







































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