24 जून 2022 को हुई नदलेस की विचार गोष्ठी की रिपोर्ट एवं फोटो
रिपोर्ट
नदलेस की विचार गोष्ठी
दिल्ली विश्विद्यालय, नॉर्थ कैंपस के आर्ट फैकल्टी लॉन में नदलेस की विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता डा. अनिल कुमार ने की तथा संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। गोष्ठी में कर्मशील भारती, बंशीधर नाहरवाल, डा. सुरेंद्र कुमार, डा. हरकेश राठी, डा. अमिता मेहरोलिया, डा. गीता कृष्णांगी, पुष्पा विवेक, आर. सी. विवेक, उमरशाह, बृजपाल सहज, महिपाल, रोक्सी, राजन कुमार, नरेश टांक आदि उपस्थित रहे। ज्ञात हो कि इससे पूर्व नदलेस ने शिमला में हुए तीन दिवसीय (16 जून से 18 जून 2022) अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव में दलित साहित्यकार संगठनों से दलित साहित्यकारों को शामिल न किए जाने के संदर्भ में 18 जून 2022 की शाम सात बजे गूगल मीट पर ऑनलाइन विचार गोष्ठी का आयोजन किया था, जिसमें उक्त विषय पर सभी साहित्यकारों ने रोष व्यक्त किया था। उसी बाबत आगे की कार्यवाही हेतु यह दूसरी विचार गोष्ठी रखी गई। इस संदर्भ में सर्वप्रथम डा. अमित धर्मसिंह ने विस्तार से प्रकाश डाला। तत्पश्चात उपस्थित वक्ताओं ने अपने विचार और मत रखे।
कर्मशील भारती ने कहा कि जैसे ही 17 जून को शिमला में हो रहे अंतर्राष्ट्रीय साहित्य उत्सव के विषय में पता चला तो मुझे यह जानकर दुख हुआ कि अंतर्राष्ट्रीय साहित्य उत्सव होने के बावजूद उसमें दलित साहित्यकारों की अपेक्षाकृत भागीदारी नहीं है। न ही उसमें दलित विमर्श पर कोई सत्र रखा गया है। जबकि दलित साहित्य आज किसी पहचान का मोहताज नहीं। ऐसे में यदि किसी भी स्तर से उसकी उपेक्षा की जाती है तो संबंधितों को इस विषय में अवगत करवाना जरूरी है ताकि आगे से ऐसा न हो सके। बंशीधर नाहरवाल ने कहा की आज दलित शब्द प्रयोग पर भी विभिन्न स्तरों से बेन लगाने की कोशिश हो रही है। हमें सोचना होगा कि यदि ऐसा हुआ तो हमारे पास दलित शब्द का विकल्प क्या होगा? या कि हमें दलित शब्द के प्रयोग की अलग से वैचारिक लड़ाई लड़नी होगी। मेरे ख्याल से दलित शब्द का विरोध और साहित्यिक कार्यक्रमों में दलित साहित्य और विमर्श की उपेक्षा कतई गैर जरूरी है। इसलिए शिमला में हुए कार्यक्रम का संज्ञान लेते हुए उचित कार्यवाही किए जाना बेहद जरूरी है।
राजन कुमार ने कहा कि हमारे संघर्ष की परंपरा कोई आज की नहीं बल्कि प्राचीन काल से ही चली आ रही है। हमारा यही संघर्ष हमारे अस्तित्व और अस्मिता को बचा पाएगा इसलिए नदलेस द्वारा जो यह कदम उठाया जा रहा है, बिलकुल उचित है, इसलिए मैं उचित कार्यवाही किए जाने के पक्ष में हूं। महिपाल ने राजन की बातों से सहमत होते हुए कहा कि असल में यह वैचारिक लड़ाई वर्चस्व की लड़ाई है इसे यदि नहीं लड़ा गया तो हमारे अस्तित्व और अस्मिता पर ही खतरा पैदा हो जायेगा। आज सबको अपनी अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई लड़ने का संवैधानिक हक है इसलिए उक्त संदर्भ में कार्यवाही किए जाना कोई बुरा नहीं। बड़ी स्पष्ट और गंभीर तरीके से उठाई गई आवाज असर अवश्य लाती है, इसलिए मैं भी उचित कार्यवाही किए जाने के पक्ष में हूं।
नरेश कुमार टांक ने अपनी बात रखते हुए कहा कि नदलेस यह बहुत जरूरी कार्य कर रहा है। यदि ऐसी छोटी-छोटी वैचारिक लड़ाई नहीं लड़ी गई तो सामाजिक और साहित्यिक परिवर्तन संभव नहीं। अक्सर देखने में आता है कि देश में बड़े स्तर से हो रहे साहित्यिक व सामाजिक कार्यक्रमों में दलित साहित्य और समाज की अनदेखी की ही जाती है। लेकिन उनका कोई भी उचित संज्ञान नहीं लेता और उपेक्षा दर उपेक्षा होती रहती है। इसलिए इस संदर्भ में लिखित कार्यकवाही किए जाना उचित है। हरकेश राठी ने कहा कि भले ही वे हमारी कितनी ही उपेक्षा करें लेकिन हमें अपनी आवाज उठाते रहना ही चाहिए। आज नहीं तो कल हमारी आवाज अवश्य सुनी जाएगी। और नहीं तो कम से कम हम अपना प्रतिरोध तो दर्ज करेंगे ही। वैसे भी दलित साहित्य तो प्रतिरोध की संस्कृति वाला साहित्य ही है। इसलिए न सिर्फ शिमला में हुए कार्यक्रम के संदर्भ में बल्कि समाज में कहीं भी किसी भी स्तर से हो रही दलित उपेक्षा के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठानी चाहिए। अतः मैं इस कार्यवाही का भी समर्थन करता हूं।
डा. सुरेंद्र ने माना कि असल में यह प्रतिरोध ऊपर से होना चाहिए था। यानी दलित साहित्य के जो वरिष्ठ साहित्यकार शिमला में हुए कार्यक्रम में शामिल हुए उन्हें उचित ढंग से कार्यक्रम की पड़ताल करके ही सम्मिलित होने की स्वीकृति देनी चाहिए थी, अन्यथा अस्वीकृत कर देना चाहिए था। आज हम आवाज उठा तो अवश्य रहे हैं लेकिन यह कितनी सुनी जाएगी और कितनी नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता। यह बड़ी विडंबना है कि दलित समाज के तथाकथित बड़े साहित्यकार अपना-अपना हित देखते हैं। उनमें दलित साहित्य और समाज की उतनी परवाह दिखाई नहीं देती जितनी कि होनी चाहिए। यही कारण है कि दलित समाज कभी एकजुट नहीं हो पाता है। बहरहाल कार्यवाही तो की ही जानी चाहिए। उमरशाह ने कहा कि दलित साहित्य केवल एक साहित्य नहीं बल्कि हमारी पहचान है। इसलिए अगर कोई दलित साहित्य की अनदेखी करता है तो समझो हमारी पहचान की अनदेखी करता है। यह कार्यवाही करना बेहद जरूरी है ताकि भविष्य में इस तरह के या किसी भी तरह के सामाजिक साहित्यिक कार्यक्रम हो तो उनमें हमारी उचित भागीदारी रह सके।
डा. अमिता मेहरोलिया ने कहा कि शिमला में हुए कार्यक्रम में भले ही जाने अनजाने दलित साहित्यकारों की अनदेखी हुई हो लेकिन इसका उचित संज्ञान लेना नितांत जरूरी है। कम से कम हमारी बात तो संस्कृति मंत्रालय और साहित्य अकादमी तक पहुंचनी चाहिए। हो सकता है कि वे आगे से इस बात का ध्यान रखे और दलित संगठनों के प्रतिनिधियों को इस तरह के कार्यक्रमों में शामिल करने लगे। डा. गीता कृष्णांगी ने माना कि जब तक हम अपनी बात नहीं कहेंगे और न ही उसे लिखित रूप में संबंधितों तक भिजवाएंगे तब तक किसी को क्या पता चलेगा कि दलित साहित्य में कौन सक्रिय हैं और वे क्या सोचते हैं। इस सब की जानकारी तो देनी ही चाहिए। इसलिए पत्र भेजा जाना जरूरी है ताकि भविष्य में दलित साहित्यकारों और संगठनों के प्रतिनिधियों को भी कार्यक्रम आदि में बुलाया जा सके। पुष्पा विवेक और आर. सी. विवेक ने भी माना कि नदलेस की यह जरूरी कार्यवाही है। इससे दूसरे संगठनों को भी कुछ सीखने की आवश्यकता है। बेहतर हो कि वे भी इस मुहिम में नदलेस के साथ आए। इससे और भी बड़े पैमाने पर हमारी बात सुनी जा सकती है। इसी तरह उक्त संदर्भ में बृजपाल सहज ने भी कार्यवाही किए जाने को उचित मानते हुए समर्थन किया।
डा. अमित धर्मसिंह ने दलित शब्द पर लगाए जा रहे बेन पर बात रखते हुए कहा कि एक बार रामधारी सिंह दिनकर ने पंडित नेहरू जी से कहा था कि जब-जब राजनीति के पांव लड़खड़ाते हैं तब-तब कविता उसे संभलती है। ऐसा ही कुछ मुंशी प्रेमचंद ने कहा कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। यानी कि राजनीति में बदलाव और सुधार साहित्य किया करता है लेकिन आज राजनीति साहित्य को बदलने का प्रयास कर रही है। जो कि असंभव ही है क्योंकि साहित्य लोक चेतना और लोक अनुभव से तैयार होता है जिसे राजनीति से कसा नहीं जा सकता है। ऐसा करना गैर संवैधानिक तो है ही साथ ही मानवीय मूल्यों का क्षरण करने जैसा भी है। साहित्यकारों की इतनी बड़ी तादात को मनचाहा लिखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। लोक विशेष की शब्दावली और अभिव्यक्ति विशेष को भी राजनीति पूर्णतः प्रभावित अथवा परिवर्तित नहीं कर सकती है दलित शब्द हो या कोई और शब्द अथवा विमर्श ही क्यों न हो, साहित्यकार अपने अनुभव और कला कौशल से ही सृजित करेंगे। कोई भी किसी को भी वांछित शब्दावली का प्रयोग करने अथवा न करने पर बाध्य नहीं कर सकता है। प्रशासनिक और मीडिया में भले ही शब्दों को प्रतिबंधित किया जा सकता हो लेकिन साहित्य में उनका स्वतंत्र इस्तेमाल होने की ही परंपरा रही है। रही बात उक्त कार्यक्रम के संदर्भ में तो हमारी कोशिश संबंधितों तक अपनी बात पहुंचाने की है, किसी का विरोध करने की नहीं। जो दलित साहित्यकार वहां गए, वे बधाई के पात्र हो सकते हैं लेकिन दलित संगठनों से किसी को न बुलाया जाना और कार्यक्रम में दलित विमर्श का सत्र न रखा जाना निराशाजनक है। अतः उचित कार्यवाही तो की ही जानी चाहिए।
अध्यक्षता कर रहे डा. अनिल कुमार ने कहा कि उक्त विषय में 18 जून को नदलेस ने जो ऑनलाइन कार्यक्रम किया था उसमें सभी वक्ताओं ने एक मत से कार्यवाही किए जाने की बात रखी थी। तय किया गया था कि जल्दी ही दूसरी मीटिंग बुलाकर कार्यवाही को अंतिम रूप दे दिया जाएगा। आज भी सभी वक्ताओं ने जो इस विषय में एक मत और एकजुटता दिखाई है, वह काबिले तारीफ है। इसलिए कार्यवाही न किए जाने का तो सवाल ही नहीं उठता। अगले एक हफ्ते के भीतर इस संदर्भ में लिखित पत्र तैयार करके संबंधितों को भेजा जाएगा। बाकी उनके ऊपर कि वे उसे कैसे लें। इतना जरूर है कि दलित साहित्यकारों और संगठनों को एकजुट होकर इस तरह के सामूहिक प्रयास करते रहने चाहिए ताकि दलितों और दलित साहित्य की किसी भी स्तर से अनदेखी न की जा सके। विचार गोष्ठी में उपस्थित सभी साहित्यकारों को धन्यवाद ज्ञापन डा. अमिता मेहरोलिया ने किया।
डा. अमित धर्मसिंह
महासचिव, नदलेस
28/06/2022
9310044324
















































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