पथरीली राहों पर पुस्तक लोकार्पण एवं परिचर्चा



'पथरीली राहों पर' काव्य का संग्रह का लोकार्पण एवं परिचर्चा 

मदर्स डे पर नदलेस ने पुष्पा विवेक के काव्य संग्रह 'पथरीली राहों पर' का लोकार्पण एवं परिचर्चा आयोजन किया। डा. रतन लाल के सहयोग से यह कार्यक्रम हिंदू कॉलेज के प्रांगण में हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता नदलेस के अध्यक्ष डा. अनिल कुमार ने की एवं संचालन डा. अमिता मेहरोलिया ने किया। स्वागत कथन और धन्यवाद ज्ञापन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। मुख्य वक्ताओं में डा. कुसुम वियोगी, कर्मशील भारती, डा. सुमित्रा मेहरोल, डा. टेकचंद और डा. रतनलाल रहे। पुष्पा विवेक ने विस्तार से अपनी काव्य यात्रा के विषय में बताते हुए अपनी कुछ कविताओं का पाठ किया। पुष्पा विवेक के पिता पूर्ण सिंह और पति आर. सी. विवेक ने अपने उद्गार व्यक्त किए। डा. अनिल कुमार ने पथरीली राहों पर काव्य संग्रह के लिए पुष्पा विवेक को हार्दिक बधाई देते हुए कहा कि दलित समाज में बहुत कम स्त्रियां पढ़ लिखकर आगे आ पाती हैं इसलिए उनका हर हाल में स्वागत किया जाना चाहिए। साहित्य के माध्यम से जो स्त्रियां अपने अनुभव दर्ज कर रही हैं, वे समाज को समझने में मदद करते हैं। पुष्पा विवेक जैसी रचनाकारों को प्रोसाहित करना प्रत्येक रचनाकार का सामाजिक कर्तव्य है। 

डा. टेकचंद ने कहा कि पुष्पा विवेक की कविताएं देश की चिंताओं से शुरू होकर नारी जीवन और समाज के अन्य पहलुओं तक जाती हैं। भारत में हाउस वाइफ के अथक परिश्रम और कार्यों को कार्य की श्रेणी में नहीं रखा जाता। ऐसे में, किसी कवयित्री का कविता संग्रह प्रकाशित होता है तो वह कई संदर्भों में महत्त्वपूर्ण हो जाता है। डा. सुमित्रा मेहरोल ने माना की पुष्पा विवेक की कविताएं केवल नारी चेतना की ही कविताएं नहीं हैं बल्कि इनमें समाज के बहुत से पक्षों को अभिव्यक्ति दी गई है। इसी तरह डा. रतन लाल ने कहा कि संग्रह में वेरियसन बहुत है। बहुत से विषयों पर कविताएं लिखी गई हैं। मैं ऐसा मानता था कि समाज में बदलाव के राजनीति जिम्मेदार होती है लेकिन बहुत बाद में ज्ञात हुआ कि साहित्य भी उसी कड़ी का मजबूत आधार होता है। जो आज नहीं तो कल हमारे सामने आता है। 

डा. कुसुम वियोगी ने माना कि समय अत्यंत जटिल है इसलिए लिखने पढ़ने का कार्य भी कोई कम चुनौतीपूर्ण नहीं। पुष्पा विवेक का काव्य संग्रह उन्होंने प्रकाशित होने के दौरान ही पढ़ लिया था, जिसमें कई कविताएं तो बेहद अच्छी हैं। कर्मशील भारती ने शब्दों के उचित प्रयोग पर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि लेखक को गैर जरूरी शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए। लेखक जो मूल्य और आदर्श अपने लेखन में लिखता है उसे अपने जीवन में भी अपनाना चाहिए। पुष्पा विवेक की कविताएं कई तरह से ध्यान आकृष्ट करती हैं, जो आशा जगाती हैं कि अभी उनकी और बेहतर कविताएं सामने आएंगी। 

धन्यवाद ज्ञापन करते हुए डा. अमित धर्मसिंह कहा कि किसी पुस्तक पर नदलेस ने यह पहला आयोजन किया जो कई संदर्भों में महत्त्वपूर्ण रहा। कार्यक्रम स्थल के साथ साथ मदर्स डे पर आयोजित नारी शक्ति की प्रतीक कवयित्री पुष्पा विवेक की पुस्तक का लोकार्पण और उस परिचर्चा किया जाना अपने आप में एक मिसाल है। पूर्ण सिंह ने अपने आशीर्वचन अपनी पुत्री पुष्पा विवेक को दिए और आर सी विवेक ने एक पति होने के नाते पुष्पा विवेक के काव्य कर्म की सराहना की। कार्यक्रम में शेखर पंवार, डा. गीता कृष्णांगी, डा. हरकेश, उमर शाह, लोकेश चौहान, समय सिंह जौल, प्रदीप कुमार ठाकुर, सौरन सिंह बौद्ध, जुगल किशोर, नीना विवेक, डिंपल विवेक, निरंजन राव, सतीश कुमार और अमर आदि गणमान्य साहित्यकार उपस्थित रहे।

डा. अमित धर्मसिंह

09/05/2022

9310044324


































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