नदलेस की ओपन मासिक गोष्ठी


रिपोर्ट :

नदलेस ने किया ऑनलाइन ओपन मासिक गोष्ठी का आयोजन

नव दलित लेखक संघ ने ओपन मासिक गोष्ठी के अंतर्गत मुक्त काव्य पाठ का ऑनलाइन आयोजन किया। जिसमें उपस्थिति के क्रम के अनुसार कवियों का काव्य पाठ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता डा. अनिल कुमार ने की व संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। गोष्ठी में सामाजिक न्याय और परिवर्तन के लिए जन जागरण की एक से बढ़कर एक कविता प्रस्तुत की गई। गोष्ठी में लखनऊ से उपस्थित रहे एस. एन. प्रसाद ने वर्णव्यवस्था के पोषकों पर करारा कटाक्ष करते हुए कई कविताएं और ग़ज़लें प्रस्तुत की। उनके द्वारा पढ़ी गई एक रचना की पंक्तियां कुछ इस प्रकार रही-

"वर्णव्यवस्था के पूजक मिल,

बंचित जन का रुधिर पिये हैं।

इनसे लड़ अपना हक छीनो,

पग पग ये छल कपट किये हैं।"

रामपुर उत्तर प्रदेश से गोष्ठी में जुड़े अमित कुमार बौद्ध ने अपनी रचनाओं के माध्यम से दलित समाज को जगाने का प्रयास करते हुए पढ़ा-

"भोर बहुजन हो गयी, अब जीओ खुशहाल तुम।

हक मिले, फिर क्यों पड़े आज भी बदहाल तुम।।

भुखमरी,असहाय,पीड़ित सभी क्यों हो तुम्हीं।

छीन हक अपने बनो आज मालामाल तुम।।"

नदलेस की उपाध्यक्ष पुष्पा विवेक ने दलितों की आजादी पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए पढ़ा कि 

"आजादी केवल और केवल 15% की है

आजादी पूंजी पतियों और साहूकारों की है

जो देश की 95% सम्पत्ति पर कुंडली मारे बैठे हैं

आजादी का जश्न केवल उनक लिए है 

जो देश की सत्ता पर कब्जा किए बैठे हैं

भूखी, अज्ञानी, मूल अधिकारों से वंचित जनता

कल भी गुलाम थी 

आज भी सवर्णो की बनाई व्यवस्था की गुलाम है,

आजाद भारत में 70% गुलाम हैं!"

सरिता भारत ने अपनी कविता के माध्यम से बीते समय की स्मृतियों को ताजा करते हुए वर्तमान का मूल्यांकन करने की बात कुछ इस प्रकार कही-  

"चलो खुद से बतियाये

और उतर जाए अपने अंतस में

टटोले अपने वजूद को

अपने होने ना होने की प्रामाणिकता में।

चलो खुद को ले जाए वहां

जहां से बरसों पहले निकले थे कभी हम,

मिट्टी गारे में सने हुए लहलहाते खेतों की पगडंडियों में मदमस्त हो नहाते।" 

रघुवीर सिंह नाहर ने 'आगे ही बढ़ता जाऊंगा' शीर्षक से प्रेरणा देने वाली कविता का बेहतरीन काव्य पाठ किया उन्होंने संसार के दूसरे जीवों और प्रकृति से शिक्षा ग्रहण करने की बात कुछ यूं कही-

"खग उड़ता-उड़ता कहता है,

संसार मापने निकला हूं।

चाहे कोई बाधा आये

या शिकारी कोई मिल जाए।

बाधाओं से भी टकराकर निकलूंगा,राह बनाऊंगा

आगे ही बढ़ता जाऊंगा।।

दिनकर,शशि, सितारे मापूं,

चपला,चमक चांदनी मापूं

तिनका तिनका चूम-चूमकर,

सागर की गहराई मापूं।

पंखों से ढ़ाल बनाऊंगा,

पंखों से पाल बनाऊंगा।

आगे ही बढ़ता जाऊंगा,

आगे ही बढ़ता जाऊंगा।।"

पटियाला, पंजाब से जुड़ी डा. नविला सत्यादास ने भी दलित समाज व शोषित स्त्रियों के हक में कविता के माध्यम से आवाज बुलंद की। उनकी कविता -मुट्ठी ताने बढ़ते रहो की कुछ पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार रहीं -

"नि:सन्देह मेरी आँखों की

चमकती दृढ़ता देखकर

दहक उठेंगे अँगारे उसकी आँखों में

मेरी कोशिशों के काफिले देखकर 

निकम्मी बाजुओं के हुजूम पगलाने लगेंगे

मगर गढ़ी रहेगी 

मेरी भी नज़र अपनी मंजिल पर 

मुट्ठी ताने बढ़ता रहूँगा मैं अपनी डगर।"

बिहार से उपस्थित रहे साहित्यकार अजय यतीश ने सामाजिक भेदभाव बरतने वालों पर करारा व्यंग्य करते हुए उनके साम्राज्यवादी मंसूबों को उजागर करते हुए कहा कि- 

"खड़ा करना चाहते हैं वे

छल छद्म लिए 

असत्य का साम्राज्य

थोपना चाहते हैं वे

बेशर्म ज़िन्दगी का 

वहीं आदिम काल।।"

दिल्ली के नरेला से जुड़े रवि निर्मला सिंह ने व्यक्तिवाद और अवसरवाद पर करारी चोट करते हुए पढ़ा -

"वाद विवाद के सारे वाद

अपना वाद व्यक्तिवाद

आई लव अवसरवाद"


कुंवर नाज़ुक ने अपनी ग़ज़ल के माध्यम से मिल जुलकर प्रेम से रहने का संदेश कुछ इस प्रकार दिया-

"मिलो सबसे मुहब्बत से, मुहब्बत की ज़रूरत है।

ज़मीं से गर मिटी नफरत, मुहब्बत ही मुहब्बत है।।"

उमेश राज ने हाथरस की बेटी मनीषा को याद करते हुए मार्मिक कविता प्रस्तुत करते हुए कहा कि मनीषा आज भी हमसे इंसाफ की मांग कर रही है -

"मैं हाथरस की बेटी हूँ 

तुमसे इंसाफ मांगती हूँ 

नही कुछ और तुमसे 

थोड़ी सी सांस मांगती हूँ!"

मेरे यहाँ राम राज है नामक कविता में उन्होंने पढ़ा -

ठाकुरों की बस्ती 

ठाकुरों का गांव 

ठाकुरों का तख्तों ताज है 

ठाकुरों की लाठी 

ठाकुरों का साम्राज्य है 

मेरे यहाँ राम राज है!"

नदलेस की वर्तमान कार्यकारिणी की सदस्य इंदु रवि ने '28 फरवरी विज्ञान दिवस' की पूर्वसंध्या पर वैज्ञानिक चेतना को अपनी कविता का विषय बनाया। उन्होंने 'विज्ञान दिवस' शीर्षक से कविता कुछ यूं पढ़ी-

"समाज से अंधविश्वास मिटाएं

आओ विज्ञान दिवस मनाएं

28 फरवरी 1928 को सी.वी.रमन ने

रमन इफेक्ट की खोज की

इस महान कार्य हेतु उन्हें

1930 में मिला नोबेल पुरस्कार

मानव प्रगति का विज्ञान है आधार।।"

वरिष्ठ कवि और नदलेस के संरक्षक डा कुसुम वियोगी ने सुमधुर कंठ से गीत सुनाकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके सुमधुर काव्य पाठ से गोष्ठी पीक पर पहुंची। उनके एक गीत की स्थाई कुछ इस प्रकार रही-

"उल्टा चलन चला है,बदला है ये जमाना !

जागरण नया है,और आचरण पुराना !!"

इसके अलावा कुमार शिव, हरकेश कुमार और समय सिंह जोल ने भी सार्थक काव्य पाठ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डा. अनिल कुमार ने कहा कि आज की गोष्ठी में मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत आनंद आया। गोष्ठी सुमधुर और प्रेरणीय रही। सभी कवियों ने समाज के प्रति अपनी अपनी वाजिब चिंताएं व्यक्त की। कवियों का यह कवि कर्म निश्चित ही समाज को दिशा देने में सफल साबित होगा। नदलेस के इस तरह के आयोजन में कवियों की रचनाएं ऐसे ही सुनने और गुनने को मिलती रहेगी। ऐसी मेरी अध्यक्ष होने के साथ साथ व्यक्तिगत अपेक्षा भी है। गोष्ठी में प्रमुख रूप से गीता कृष्णांगी, बृजपाल सहज, बी एल तोंदवाल, अजय कुमार, सुनीता मंजू, चितरंजन गोप लुकाटी, उमरशाह, विद्याराम और बंशीधर नाहरवाल आदि उपस्थित रहे। सभी उपस्थित कवियों और प्रबुद्धजनों का धन्यवाद ज्ञापन डा. अमिता मेहरौलीया ने किया।

डा. अमित धर्मसिंह

महासचिव, नदलेस

10/03/2022




 

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