दो दलित लेखक संघों को लेकर फाइनल रिपोर्ट
रिपोर्ट
दो दलित लेखक संघों को एक कराने हेतु दिए गए प्रस्ताव पत्र को लेकर नदलेस ने किया समीक्षा एवं निष्कर्ष बैठक का आयोजन
दिल्ली। नव दलित लेखक संघ ने "दो दलित लेखक संघों को एक कराने हेतु दिए गए प्रस्ताव पत्र की समीक्षा एवं निष्कर्ष बैठक" का ऑनलाइन आयोजन किया। जिसमें उक्त विषय पर उपस्थित सभी रचनाकारों के मत एवं विचार आमंत्रित किए गए। बैठक की अध्यक्षता डा. अनिल कुमार ने की एवं संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। सर्वप्रथम डा. अमित धर्मसिंह ने विषय की गंभीरता और उसकी पृष्ठभूमि पर संक्षिप्त प्रकाश डाला। सर्वविदित है कि 15 अगस्त 1997 में गठित हुए दलित लेखक संघ में हमेशा ही विभाजनकारी लोग सम्मिलित होते रहे, जिन्होंने दलित लेखक संघ से अधिक निजी हित को वरीयता दी। परिणामस्वरूप कभी दलित लेखक संघ विवाद का विषय बना और कभी दलित लेखक संघ में बहुत से विवाद पनपे। कई लोग जो दलित लेखक संघ के कारण ही सामने आएं उन्होंने भी अपनी महत्त्वाकांक्षा के चलते अलग-अलग गुट और संगठन बना लिए। कइयों ने दलित लेखक संघ के संबंधित पदों पर आसीन होकर उनका जी भरकर दुर्पयोग किया। लेकिन इन सारे मामलों में दलित लेखक संघ व्यक्ति प्रधान होकर भी अपनी सांगठनिक पहचान से चिपका रहा। जिस कारण इसके अपेक्षाकृत साहित्यिक और सामाजिक अवदान अपेक्षाकृत सामने आते रहे। इस तरह, दलित लेखक संघ ने लड़खड़ाते हुए ही सही, दो दशकों से अधिक का सफर तय किया और एक बने रहकर देश भर में अपनी पहचान बनाई। लेकिन 2019 में दलित लेखक संघ का विभाजन हो गया। विभाजन पहले भी हुए लेकिन वे विभाजन ऐसे थे जो कि अपनी अलग-अलग सांगठिक पहचान से सामने आए। इस बार जो विभाजन हुआ उसने मनमर्जी और हठधर्मी की सारी हदें ही पार कर दी। इस बार के विभाजन ने एक ही नाम (दलित लेखक संघ) के दो दलित लेखक संघ बना दिए। परिणाम स्वरूप एक तरफ अनिता भारती जी प्रमुख बनकर सामने आईं तो दूसरी तरफ हीरालाल राजस्थानी जी। दोनों ने दलित लेखक संघ पर अपनी दावेदारी प्रस्तुत की और दलित लेखक संघ को दोहरी पहचान में तब्दील कर दिया। यह दोहरी पहचान कुछ ऐसी थी कि जिसमें संगठन का नाम, मोनोग्राम, पत्रिका, विरासत और इतिहास सभी कुछ तो एक था, किंतु एक ही नाम के संगठन दो थे और एक ही विरासत वाले दोनों संगठनों के उतराधिकारी भी अलग-अलग थे। यह विभाजन, न सिर्फ साहित्य समाज को भ्रमित और गुमराह करने वाला था बल्कि दलित लेखक संघ को ही हास्यास्पद बना देने वाला था। मगर विभाजन करने वालों पर इस गंभीर समस्या और असंगति का शायद ही कोई प्रभाव पड़ा हो। वे दलित लेखक संघ के वजूद के हुए दो टुकड़ों में से अपने-अपने हिस्से में आए टुकड़े को मनमाने ढंग से दुहने लगे। कुल मिलाकर, दलित लेखक संघ की अब एक स्वतंत्र पहचान नहीं रह गई थी। अब दलित लेखक संघ का नाम आने पर यह प्रश्न सामने आने लगा कि कौन से वाला दलित लेखक संघ- हीरालाल राजस्थानी जी वाला दलित लेखक संघ या अनिता भारती जी वाला दलित लेखक संघ। इस तरह दलित लेखक संघ के दोनों हिस्से संगठन प्रधान नहीं बल्कि व्यक्ति प्रधान हो गए। इससे न सिर्फ दलित साहित्य का साहित्यिक समाज बंट गया अपितु दूसरे संगठनों के लोगों को दलित लेखक संघों और उससे जुड़े साहित्यकारों को लेकर मनोविनोद करने का अवसर भी मिल गया। दलित लेखक संघ के विभाजन ने और भी कई त्रासदियों को जन्म दिया, जिन पर प्रस्तुत प्रस्ताव पत्र में विस्तार से चर्चा की गई है। 20 नवंबर 2021 को यह प्रस्ताव दस्ती तौर से सौंपने डा. गुलाब सिंह और मैं (डा. अमित धर्मसिंह) अनिता भारती जी और हीरालाल राजस्थानी जी के घर गए थे। अनिता भारती जी ने हमारा समुचित आदर सत्कार करते हुए प्रस्ताव पत्र स्वीकार किया, किंतु हीरालाल राजस्थानी जी ने हम दोनों के साथ दुर्व्यवहार करते हुए प्रस्ताव पत्र को लेने से इंकार कर दिया और कहा कि अपना प्रस्ताव डा. राजकुमारी को जाकर दें। तत्पश्चात प्रस्ताव पत्र की पीडीएफ फाइल नदलेस के अध्यक्ष डा. अनिल कुमार द्वारा डा. राजकुमारी जी को वॉट्सअप पर भेजी गई। प्रस्ताव पत्र पर दोनों दलित लेखक संघों द्वारा निर्णय प्रस्तुत करने का समय जनवरी 2022 तक निर्धारित था। इस संदर्भ में अनिता भारती जी ने यह बात स्वीकारी कि उनका अध्यक्षीय कार्यकाल सितंबर 2022 में पूरा हो जाएगा तो वह सितंबर में इलेक्शन अवश्य करवा देंगी। उन्होंने यह भी कहा कि "अगर हीरालाल और उसके साथ जुड़े दो चार साथी भी हमारे साथ आकर जुड़ना चाहे तो जुड़ सकते हैं। दलित लेखक संघ फिर से एक हो जाए तो इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है।" मगर हीरालाल राजस्थानी जी एवं उसके ग्रुप के किसी भी पदाधिकारी ने किसी भी संदर्भ में कोई भी जवाबदेही प्रस्तुत नहीं की। इसके अतिरिक्त एक होने का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष न्योता दोनों दलित लेखक संघों में से किसी ने भी एक दूसरे को नहीं दिया। न ही उक्त संदर्भ में दोनों दलित लेखक संघों के प्रमुख पदाधिकारियों में से किसी ने, एक दूसरे से कोई संपर्क साधने की कोशिश की। परिणामस्वरूप हालात जस के तस बने रहे और प्रस्तुत प्रस्ताव पत्र में जिन समस्याओं को उठाया गया था, वे भी ज्यों की त्यों बनी रह गईं। इसलिए, किसी एक को स्वीकारने और दूसरे को नकारने की मजबूरी पेश आ गई। स्वीकार और नकार का आधार आज की बैठक में उपस्थित साहित्यकारों के बहुमतीय जनाधार है। इस संदर्भ में सभी उपस्थित साहित्यकारों के विचार और मत आमंत्रित हैं।
अध्यक्षता कर रहे डा. अनिल कुमार ने कहा कि दलितों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वे आपस में ही एक नहीं है। जितना दूसरों की स्वामी भक्ति में लगे रहते हैं, उतना अपने समाज के साथ खड़े नहीं होते। मुझे नहीं लगता कि दलित समाज में जब कोई किसी पद या नौकरी पर पहुंच जाता है, वह तब भी किसी जरूरतमंद दलित की किसी प्रकार सहायता करता है। ऐसा होता तो दलित समाज के संगठनों में इतना बिखराव और युवा पीढ़ी में इतना भटकाव न होता। मैं खुद नदलेस से जुड़ने से पहले किसी भी वरिष्ठ दलित साहित्यकार को नहीं जानता था। बयान पत्रिका के सिलसिले में एक दो मुलाकातें मोहनदास नैमिश्राय से अवश्य हुई थीं। लेकिन वे मुलाकातें भी केवल पत्रिका खरीदने तक ही सीमित होकर रह गई थीं। नतो मैं ही उनसे कुछ अधिक जान पाया और न ही उन्होंने कुछ और बताने की जहमत उठाई। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दलित साहित्य को लेकर जितने भी अच्छा लिखने पढ़ने वाले हैं वे ज्यादातर स्वभाव और धरातलीय स्तर पर दलित समाज और उसकी युवा पीढ़ी के कितने हितैषी हैं। आज जो भी दलित समाज की युवा पीढ़ी के बच्चे अपने-अपने स्वामियों की भक्ति में लगे हुए हैं, या अपने स्वामियों की भाषा बोल रहे हैं, उन्हें भी ठहरकर विचार करना चाहिए कि वे खुद कहां गलत है! कहां बेवकूफ बनाएं जा रहे हैं! तभी हम दलित साहित्य और साहित्यकारों के छद्म तिलिस्म को तोड़कर एक मजबूत समाज और एक मजबूत संगठन बनाने में कामयाब हो सकेंगे। जिस संगठन में लोकतांत्रिक मूल्यों को न अपनाया जा रहा हो, उसे तत्काल छोड़ देने में कोई बुराई नहीं। फिर चाहे वह कितना ही बड़ा और पुराना ही संगठन क्यों न हो। बढ़िया लिखने-पढ़ने या बढ़िया बोलने से अच्छा होता है, बढ़िया बनकर दिखाना। तभी हमारा साहित्य, समाज और हमारे संगठन बढ़िया बनाए जा सकेंगे। अब समय शुरू हो चुका है सभी मठाधीशों की मठाधीशी तोड़ने का, संगठनों में व्यक्तिवादी मूल्यों और वर्चस्ववाद को अब बर्दाश्त करने से कोई लाभ नहीं है। दलित साहित्य में आज तीसरी पीढ़ी का समय है। यह उसी की जिम्मेवारी है कि साहित्य, समाज और संगठनों में जिन मूल्यों की अनदेखी होती आई है, उन्हें फिर से पुनर्जीवित करके लागू करें और स्वार्थ सिद्धि करने वाले साहित्यकारों को किनारे लगाए। नदलेस ने इस ओर ठोस कदम उठाए हैं। युवा पीढ़ी का नदलेस में हर समय स्वागत है। रही बात दो दलित लेखक संघों में से किसी एक को स्वीकारने की, तो नदलेस जरूरत पड़ने पर अनिता भारती वाले दलित लेखक संघ और दूसरे दलित लेखक संगठनों के साथ तो साझा कार्यक्रम कर सकेगा लेकिन हीरालाल राजस्थानी जी वाले ग्रुप के साथ इसकी कोई भी रचनात्मक भागीदारी कभी नहीं रहेगी।
अमिता मेहरोलिया ने कहा कि यह किसी भी तरह से अच्छा नहीं कि एक ही नाम से दो दलित लेखक संघ अस्तित्व में रहे। दोनों को एक होना ही चाहिए था। प्रस्ताव पत्र दिए जाने के बावजूद ऐसा नहीं हुआ। यह अत्यंत निराशाजनक है। अब इनमें से किसी एक को अपनाना और किसी एक को नकारना ही होगा। बावजूद इसके मुझे लगता है कि शायद इससे भी बहुत सी समस्याओं का हल होने वाला नहीं, क्योंकि हमें उस संगठन को सपोर्ट करना चाहिए जो अधिक से अधिक युवाओं को प्रत्साहित करे और उन्हें अपने साथ लेकर चले, तभी हम दलित साहित्य और समाज का भला कर पाएंगे। दोनों दलित लेखक संघों ने युवाओं की बहुत अनदेखी की है। इसके विपरीत नव दलित लेखक संघ ने बहुत कम समय में बहुत से युवाओं को दलित साहित्य और नव दलित लेखक संघ के मंच से जोड़ा है। अगर दोनों दलित लेखक संघ फिर से एक नहीं हो सकते तो दोनों को नव दलित लेखक संघ से जुड़ जाना चाहिए, या नदलेस को इनसे आगे की राह लेनी चाहिए।
गीता कृष्णांगी ने कहा कि जो दो दलित लेखक संघ बने हुए हैं दोनों में ही कुछ ही लोगों का प्रभाव है। जिसके चलते दलित साहित्य और समाज में अच्छा संदेश नहीं जा रहा है। ऐसा लगता है कि जैसे दलित लेखक संघ अब दलित लेखक संघ न होकर दो गुटों या ग्रुपों में तब्दील हो गए हैं। एक अनिता भारती जी का ग्रुप और दूसरा हीरालाल राजस्थानी जी का। यह कहीं से भी संगठन की गरिमा के अनुकूल नहीं है। इन दोनों को फिर से एक होना ही चाहिए था। मगर ऐसा नहीं हुआ तो अब हमें अनिता भारती वाले समूह को दलित लेखक संघ की स्वीकार्यता देनी चाहिए और हीरालाल राजस्थानी जी वाले ग्रुप को दलित लेखक संघ मानने से सामूहिक इनकार कर देना चाहिए। दोनों की कार्यप्रणाली और सक्रियता को देखते हुए यही उचित लगता है कि हम अनिता भारती जी वाले दलित लेखक संघ के साथ मिलकर काम कर सकते हैं, किंतु दूसरे वाले के साथ नहीं।
अंतिमा मोहन ने कहा कि दो हजार उन्नीस से पहले दलित लेखक संघ इस कदर निष्क्रिय हो चुका था कि हम सब तो लगभग भूल ही चुके थे कि कोई दलित लेखक संघ भी है। दो हजार उन्नीस में अनिता भारती ने उसे फिर से जीवित किया और एक नई कार्यकारिणी का गठन किया। जिसकी सबने सराहना की। पहली बार दलित लेखक संघ में कई स्त्रियों को न सिर्फ जोड़ा गया बल्कि पदों पर आसीन भी किया। उसके कुछ महीने बाद कुछेक लोगों ने हीरालाल राजस्थानी के साथ मिलकर एक अलग दलित लेखक संघ बनाकर एक अलग कार्यकारिणी बना ली, जोकि किसी भी तरह से उचित नहीं था। आप देखिए कि जबसे अनिता भारती दलित लेखक संघ की अध्यक्ष बनी हैं, तबसे कितने काम हुए हैं। आए दिन कोई न कोई कार्यक्रम होता ही रहता है। इससे न केवल दलित लेखक संघ की पहचान सुदृढ़ हुई है बल्कि उसका विस्तार भी हुआ है। इसलिए दलित लेखक संघ को किसी में मर्ज नहीं किया जा सकता है, हां साथ में मिलकर काम अवश्य किया जा सकता है। दूसरे वाले दलित लेखक संघ को तो बिलकुल छोड़ ही देना चाहिए और अनिता भारती वाले दलित लेखक संघ और नव दलित लेखक संघ को अपनी अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ काम करने के साथ साथ आवश्यकता पड़ने पर साथ मिलकर भी काम करना चाहिए। अंजली रंगा ने अंतिमा मोहन के विचारों से सहमति जताते हुए कहा कि ऐसा नहीं है कि अनिता भारती वाला दलित लेखक संघ युवाओं को प्रोत्साहित नहीं करता। मैं खुद युवा हूं और काफी समय से अनिता भारती वाले दलित लेखक संघ से जुड़ी हूं। मुझे हमेशा ही दलित लेखक संघ ने प्रोत्साहित किया है। इसलिए मैं अनिता भारती वाले दलित लेखक संघ को ही सही मायने में दलित लेखक संघ मानती हूं।
विद्याराम ने पूर्व के वक्ताओं से सहमति जताते हुए कहा कि यदि बात स्वीकृति अस्वीकृति की है तो निश्चित ही मेरा समर्थन अनिता भारती वाले दलित लेखक संघ के साथ है। ऐसा इसलिए कि मैं अनिता भारती को तो बहुत पहले से जानता हूं मगर मैंने नदलेस से जुड़ने से पहले हीरालाल राजस्थानी जी का नाम तक नहीं सुना था। नदलेस ने दोनों दलित लेखक संघों को एक कराने के लिए जो महत्त्वपूर्ण मुहिम चलाई, वह निश्चित ही सराहनीय है। जिस पर दोनों दलित लेखक संघों को फिर से एक होकर काम करना चाहिए था। लेकिन यह सब नहीं हुआ तो अब केवल दो ही विकल्प रह जाते हैं। अनिता भारती वाले संगठन को दलित लेखक संघ मानते हुए नदलेस को अपना कार्य करते रहना चाहिए। जरूरत पड़ने पर दोनों को एक साथ भी काम करना चाहिए। आज नदलेस ने भी बहुत अच्छा मुकाम हासिल कर लिया है इसलिए जो दलित लेखक संघ में काम करने के इच्छुक न हो अथवा वहां से संगठन छोड़ चुके हों तो वे नदलेस से जुड़कर भी कार्य कर सकते हैं। नदलेस उनके लिए बेहतर सांगठनिक विकल्प हो सकता है।
सुशील झंझोट ने कहा कि मैं नदलेस से जुड़ने से पहले न किसी साहित्यकार को जानता था और न ही किसी संगठन को। नदलेस ने मेरे जैसे कई युवाओं को साहित्यकारों और संगठन से जुड़ने का अवसर दिया। यदि दूसरे संगठनों ने भी कुछ ऐसा ही किया होता तो दो दलित लेखक संघ वाला संकट पैदा न हुआ होता। वास्तव में नदलेस से यह सीखने की आवश्यकता है कि कैसे मेरे जैसे नव रचनाकारों को भी अवसर दिया जाता है। मुझे नव दलित लेखक संघ से जुड़कर अब किसी दूसरे दलित लेखक संगठन से जुड़ने की जरूरत महसूस नहीं होती। यद्यपि साहित्य के क्षेत्र में मेरे लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। फिर भी मुझे नदलेस से जुड़कर बेहद खुशी महसूस होती है। इसके प्रत्येक कार्यक्रम से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। इसलिए मुझे लगता है कि कम से कम युवाओं को तो नदलेस से ही जुड़कर कार्य करना चाहिए। उन्हें न तो किसी की स्वामी भक्ति करनी चाहिए और न ही वरिष्ठों के अहम का शिकार होना चाहिए। पुराने संगठनों की यही सबसे बड़ी मुसीबत होती है कि उसमें वरिष्ठों के किले में प्रवेश करना करीब करीब निषेध ही होता है, इसलिए आपको बरसों बरस दरबान बनकर बाहर खड़े रहना पड़ता है। नए संगठन में यह सब नहीं होता है। कम से कम वह अपने निर्माण के समय तो अधिक सक्रिय और अधिक जिम्मेदारी से कार्य करता है। उसके द्वार सबके लिए खुले होते हैं। नदलेस इसका बेहतरीन उदाहरण है। मेरा तो मत यही है कि हमें नदलेस से ही जुड़कर कार्य करना चाहिए और पुराने संगठनों को भी नदलेस में मर्ज हो जाना चाहिए। बाकी तो जैसा नदलेस के साथी और आज उपस्थित साहित्यकार जैसा तय करेंगे, मैं भी उनके साथ हूं।
रवि निर्मला सिंह ने कहा कि नव दलित लेखक संघ ने इतिहास को दुरुस्त करने का जो महत्त्वपूर्ण कार्य शुरू किया है, वह अत्यंत सराहना का पात्र है। इस साहसिक मुहिम को छेड़ने के लिए अमित भाई और नव दलित लेखक संघ की पूरी टीम बधाई की पात्र है। यह बात सही है कि एक ही नाम के दो दलित लेखक संघ बन जाने से दूसरे संगठनों और समाज में दलित साहित्यकारों और दलित लेखक संघ का कोई अच्छा संदेश नहीं जा रहा है। आज दोनों हंसी के पात्र बनाए जा रहे हैं। जब भी दलित लेखक संघ की बात चलती है तो सबसे पहले इसी सवाल से जूझना पड़ता है कि कौन से वाले दलित लेखक संघ की बात कर रहे हैं। पहले यह बताना पड़ता है कि हम कौन से दलित लेखक संघ के संदर्भ में बात कर रहे हैं तब कहीं जाकर बात आगे बढ़ती है। ऐसा होने से दलित लेखक संघ की सामाजिक प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लग गया है। लोगों को हम पर मजाक करने का सहज अवसर मिल गया है इसलिए दोनों दलित लेखक संघ को फिर से एक होकर एकता की एक नई नजीर प्रस्तुत करनी चाहिए थी। मगर दोनों के पदाधिकारियों के अहम के चलते ऐसा नहीं हुआ। दोनों तरफ के प्रभावशाली लोगों को अपने निजी हित साधने और अपना प्रभुत्व कायम रखने का चस्का लग चुका है इसीलिए वे दोनों ही एक होने की कोई रचनात्मक पहल नहीं कर पाए। कुछ ऐसे ही कारणों से आज नव दलित लेखक संघ और दूसरे कई संगठन अस्तित्व में है। नव दलित लेखक संघ की तो आज स्वतंत्र और व्यापक पहचान है जिसने बहुत कम समय में साहित्य जगत का न सिर्फ ध्यान आकर्षित किया है बल्कि युवाओं को जोड़कर लोकतांत्रिक संगठन का उदाहरण भी प्रस्तुत किया है। इस कारण नव दलित लेखक संघ से जुड़ी नई संभावनाओं ने जन्म लिया है। दोनों दलित लेखक संघों को इससे भी कुछ सीखना चाहिए था। मगर उनका एक न हो पाना निराशाजनक है।अब यही विकल्प बच जाता कि सक्रियता और कुछ नई संभावनाओं को देखते हुए अनिता भारती वाले दलित लेखक संघ को वास्तविक दलित लेखक संघ माना जाए।
मुकेश मिरोठा ने कहा कि यह विचारणीय है कि गत कुछ वर्षों में दलितों के कई संगठन अस्तित्व में आए हैं। यह कई कारणों से है। सामाजिक परिवर्तन, संगठनों के लगातार बिगड़ते स्वरूप और लेखकों की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा इसके केंद्रीभूत कारणों में से हो सकते हैं। देखने वाली बात तो यह कि एक तरफ तो कुछ स्थापित संगठन दम तोड रहे हैं दूसरी तरफ संगठन पर संगठन बनाए जा रहे हैं। और, जिस तरह संगठन पर संगठन बनाए जा रहे हैं उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि संगठन अब संगठन न रहकर एक तरह के अखाड़ों में तब्दील होते जा रहे हैं। जिनका मकसद एक दूसरे को कमतर आंकना और स्वयं के विकास पर जोर देना है। इससे दलित साहित्य में काफी विसंगतियों ने जन्म ले लिया है। जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। जहां तक बात एक ही नाम वाले दो दलित लेखक संघों की है तो मुझे लगता है कि दोनों ही दलित लेखक संघों के पास अभी तक भी न तो अपना कोई संविधान है और न ही वे किसी प्रकार के नियम अनुशासन से चलाए जा रहे हैं। ऐसे में लगता है कि किसी भी दलित लेखक संघ पर न तो किसी की दावेदारी हो सकती है और न ही किसी का नियंत्रण। ऐसे में मनमानियां ही पनपेगी, इसलिए अब जरूरत है कि सभी को एक मंच पर आकर फिर से दलित साहित्य और संगठन को मजबूत करें। जिसके लिए इस पहल को और अधिक जोर पकड़ाने की जरूरत है। यद्यपि नए संगठन बनाना कोई बुरी बात नहीं लेकिन इतने विभाजनों में बंट जाना किसी भी संदर्भ में अच्छा नहीं। फिर भी, दो दलित लेखक संघों को एक कराने के संदर्भ में नदलेस ने बेहद महत्त्वपूर्ण और साहसिक कदम उठाया है और हम इसकी इस ऐतिहासिक पहल के साथ हैं। संभव है कि समस्या का कुछ हल निकले। यदि नहीं निकलता तो हम आखिर कर भी क्या सकते हैं? क्योंकि, हम किसी भी संगठन को न तो बना सकते हैं और न ही खारिज कर सकते हैं। फिर भी यह पहल कुछ संभावना लिए हुए अवश्य है। शायद कुछ परिवर्तन हो। उसके लिए हम सांगठनिक नहीं तो साहित्यिक रूप से तो साथ हैं ही बेहतर कार्य करने वाले संगठन को भी हमारा समर्थन है।
बिपिन कुमार ने कहा कि दलित लेखक संघ का लंबा इतिहास रहा है इससे उसकी देश भर में प्रतिष्ठा है। इस कारण उसे तो किसी भी कीमत पर छोड़ा नहीं जा सकता है। उसे छोड़ने का मतलब है कि अपनी लंबी सामाजिक और साहित्यिक विरासत को खो देना। जो किसी भी हाल में नहीं होना चाहिए। जहां तक बात दो में से एक दलित लेखक संघ को स्वीकारने की है तो इसके लिए चुनाव को आधार बनाया जा सकता है। जो दलित लेखक संघ शुरू से समय पर चुनाव कराता आ रहा है, वास्तव में वही असली दलित लेखक संघ माना जाना चाहिए। जैसा कि अमित जी ने बताया कि कोई से भी दलित लेखक संघ का अभी तक न तो रजिस्ट्रेशन है और न ही कोई इस ओर ध्यान दे रहा है तो यह दलित लेखक संघ का निराश करने वाला पहलू है। बावजूद इसके दलित लेखक संघ को छोड़ा नहीं जा सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज नव दलित लेखक संघ का भी अपना स्वतंत्र वजूद है और इसने बेहद कम समय में अपनी स्वतंत्र पहचान कायम की है। उसका कारण इसकी सक्रियता और इसके द्वारा जीता गया भरोसा है। मुझे जब भी नदलेस के किसी कार्यक्रम की सूचना कहीं से मिलती है, या अमित जी का मैसेज मिलता है तो मुझे लगता है कि हां अब कुछ बेहतर होने वाला है। यानी कुछ अच्छा, जरूरी और रचनात्मक होने वाला है। इसलिए मुझे लगता है कि संबंधित दलित लेखक संघों को अपना कार्य करने दिया जाए और नदलेस को अपना कार्य करते रहना चाहिए। जो बेहतर करेगा लोग उससे स्वतः ही जुड़ते चले जायेंगे। बाकी पीछे छूट जायेंगे। बात यदि दो दलित लेखक संघों में से किसी एक को अपनाने की है तो मुझे लगता है कि अनिता भारती जी की तो काफी गतिविधियां सामने आती ही रहती हैं और दूसरे का कहीं जिक्र तक नहीं आता। इससे लगता है कि अनिता भारती वाले संगठन को ही दलित लेखक संघ माना जाए और इस वाले दलित लेखक संघ तथा नव दलित लेखक संघ को मिलकर काम करना चाहिए।
डा. अमित धर्मसिंह ने दलित लेखक से जुड़कर हुए अपने अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि अक्सर हम दूसरों पर सवाल खड़ा करते हैं जबकि बहुत सी खामियां खुद हममें और हमारे संगठनों में हैं। जिसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाता। छोटे छोटे हितों को लेकर हम सब खामोशी से एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। अपने इस स्वभाव के चलते हम संगठन, साहित्य और समाज का बहुत भारी नुकसान करते हैं। मेरा मानना है कि जब तक हम खुद अपने संगठनों के स्वरूप को दुरुस्त नहीं करेंगे तब तक कुछ भी होने वाला नहीं है। आत्ममुग्ध कार्यक्रमों और साहित्य लिखकर छपवाते रहने भर से तो सामाजिक परिवर्तन का ख्वाब दूर की कौड़ी ही बना रहेगा। जरूरत है अपनी सामूहिक एकता को मजबूत करने और अपने संगठनों के स्वरूप को सुधारने की। आज करीब-करीब सभी संगठनों का यही हाल है कि उनमें दो-दो चार-चार लोग ही प्रभावी हैं, जो अपनी सुविधानुसार कार्यक्रम आदि करते हैं और समझते हैं कि वे बहुत बड़ी सामाजिक क्रांति की ओर बढ़ रहे हैं!! उनको अपने द्वारा किए जा रहे कार्यक्रम या लिखे जा रहे साहित्य के प्रति इस स्तर का भ्रम होता है कि वे इस विश्वास के साथ लोगों से मिलते हैं जैसे संपूर्ण दलित साहित्य और समाज का सिर्फ वे ही प्रतिनिधित्व करते हैं। कितना छोटा सोचते हैं ऐसे लोग। कितने छोटे-छोटे कारनामों के बल पर कितनी बड़ी-बड़ी महत्त्वाकांक्षाएं पाले रहते हैं। दलित साहित्य और समाज का जितना नुकसान ऐसे लोग करते हैं, उतना ही नुकसान बाकी लोग उन पर सवाल खड़ा न करके करते हैं। अक्सर देखा गया है कि दलित समाज के ऐसे साहित्यकार अथवा बड़ी-बड़ी नौकरी पर आसीन लोग अपने ही समाज के बच्चों को अंधेरे में रखते हुए गुमराह करते रहते हैं। उन्हें न तो कैरियर संबंधी ही सीख देते हैं और न ही वैचारिकी संबधी। न उनको किसी भी तरह से सपोर्ट करते हैं। एक ही समाज के होने नाते भुक्तभोगी उन पर सवाल भी कम खड़े नहीं करते हैं। वरिष्ठजन तो अपनी और अपने समाज की प्रतिष्ठा के चलते खामोश रहते हैं और युवा अपने कैरियर को लेकर चुप्पी साधे रहते हैं। इससे दलित समाज और साहित्य का दिन दूना और रात चौगुना नुकसान होता रहता है और कुछ तथाकथित दलित मसीहा बने मान, सम्मान, प्रतिष्ठा के शिखर पर बैठे मलाई काटते रहते हैं। आज नदलेस ने दो दलित लेखक संघों की मनमानियों पर सवाल खड़ा करके उन पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अब यह नहीं चलेगा कि दो-दो चार-चार लोग गुट बनाकर संगठन को अपनी बपौती बनाकर रखे या कि कोई साहित्यकार विशेष अपनी अतिशय चालाकियों से समाज को मूर्ख बनाकर वरिष्ठता और महानता की चादर ओढ़े फिरे। मुझे लोगों का यह कहना नागवार गुजरता है कि छोड़िए! आप अपना देखिए और उनको अपना करने दीजिए। या जब कोई कहता है कि सब अपना-अपना करते रहो और बाकी सब वक्त पर छोड़ दो। वक्त छद्मवादियों को खुद हाशिए पर धकेल देगा। मेरा कहना है कि वक्त तो छद्मवादियों को हाशिए पर धकेल देगा लेकिन तब तक कितनी देर और कितनी हानि हो चुकी होगी, कोई नहीं कह सकता। दूसरे यह बात भी सोचने की है कि अगर साहित्य समाज की धरोहर है और वह समाज के लिए लिखा जाता है तो समाज के प्रत्येक व्यक्ति का उस पर समान अधिकार तो होता ही है, साथ ही सवाल करने और आवश्यकतानुसार रोक-टोक करने का भी अधिकार होता है। ऐसे ही यदि संगठन समाज के भले के लिए है तो समाज के हर व्यक्ति को उसकी गलत नीतियों के चलते, उस पर सवाल खड़े करने, विरोध करने और स्वीकार या अस्वीकार करने का भी सामाजिक, नैतिक और साहित्यिक अधिकार होता है। नदलेस और इसकी टीम ने इसी अधिकार का उपयोग करते हुए दो दलित लेखक संघों को एक कराने के संदर्भ में प्रस्ताव पत्र के माध्यम से इस मुहिम को अंजाम दिया है। प्रस्ताव पत्र के माध्यम से किसी निष्कर्ष तक पहुंचने का आधार मुहिम में शामिल साहित्यकारों के मत और विचार संबधी जनाधार को बनाया गया था। सभी वक्ताओं ने इस संदर्भ में आज अपने-अपने मत और विचार रखे। कुछ ने नदलेस को मजबूत करने की बात कहीं तो कुछ ने अनिता भारती वाले दलित लेखक संघ को समर्थन देकर कहा कि आगे से नदलेस और दलेस को मिलकर कार्य करना चाहिए। दोनों सुझाव अच्छे हैं। मेरी दोनों में सहमति है। जहां तक बात एक ही नाम वाले दो दलित लेखक संघों में से किसी एक को स्वीकृति देने की है तो निश्चित ही मेरा अपना मत भी अनिता भारती वाले दलित लेखक संघ को ही दलित लेखक संघ के रूप में स्वीकृति देने के पक्ष में है। इसके बाद जैसे भी संभव होगा हम सब मिलकर कार्य करेंगे और आगे भी किसी ऐसे व्यक्ति या संगठन को अस्वीकार करेंगे जो दलित साहित्य की वैचारिकी और दलित समाज के हितानुसार कार्य नहीं करेगा।
कर्मशील भारती ने कहा कि नदलेस ने यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण मुहिम छेड़ी है। असल में यह बहुत पहले छेड़ी जानी चाहिए थी। यदि ऐसा होता तो दलित लेखक संघ का आज जो हाल हुआ है, वह न हुआ होता। मैं ऐसा इसलिए कह सकता हूं कि मैं खुद दलित लेखक संघ से एक अरसे जुड़ा हुआ हूं। इस आधार पर मैं कह सकता हूं कि दलित लेखक संघ में बहुत पहले से विभाजनकारी नीतियां अपनाई जाने लगी थी। कुछ षड्यंत्रकारी लोग हमेशा से ही दलित लेखक संघ पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते थे। इसलिए उनकी नजर में दलित लेखक संघ का या दलित समाज का हित कभी रहा ही नहीं, वे हमेशा ही अपना फायदा देखकर दलित लेखक संघ में बने रहे और दलित लेखक संघ को भीतर से नुकसान पहुंचाते रहे। जबकि उन्हें, संगठन को वरीयता देनी चाहिए थी। उन्हें यह समझना चाहिए था कि संगठन से बढ़कर कोई चीज नहीं होती है। संगठन के बलबूते ही सामाजिक बदलाव की बात सोची जा सकती है। इस संदर्भ में आरएसएस को देखिए उसकी सांगठनिक शक्ति कितनी मजबूत है। आज उसी के बल पर, वह देश पर राज कर रहा है। इसके विपरीत दलित समाज के ज्यादातर संगठन आज किस हालत में हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। बाबा साहब अम्बेडकर ने खुद अपने जीवन काल में तीन संगठन बनाए जो आज कहीं दिखाई नहीं देते। निश्चित ही अभी तक भी हमारी सांगठनिक समझ नहीं बढ़ पाई है और हम आज भी विभिन्न खेमों में बंटे दिखाई देते हैं। जब तक हम ऐसे ही बंटे रहेंगे तब तक न तो दलित समाज का भला होने वाला है और न ही दलित साहित्य का। नदलेस ने आज संपूर्ण साहित्य जगत का इस ओर ध्यान दिलाया है कि हमें एक होकर कार्य करने की आवश्यकता है, अन्यथा दिनों दिन हालात तो बिगड़ ही रहे हैं। मुझे यह सोचकर और देखकर गहरा दुख होता है कि इतनी समृद्ध विरासत वाला दलित लेखक संघ आज विभाजन के सबसे निकृष्ट रूप तक आ गया है। इस तरह का विभाजन न तो पहले कभी किसी संगठन में देखा गया और संभवतः न कभी आगे देखा जायेगा। अच्छा तो यही होता कि दोनों दलित लेखक संघ आपस में एक होकर फिर से एक मंच पर आ सकते। मगर ऐसा होना ही नहीं था, और हुआ भी नहीं। लेकिन अच्छी बात यह है कि इनमें से एक तो पहले से ही साहित्य समाज की नजरों में गिर चुका था और इस मुहिम के बाद तो उसका नामलेवा भी कोई नहीं बचेगा। वैसे भी उसमें बचे ही कितने लोग हैं। जो बचे भी हैं, उनकी भी कोई वैचारिकी नहीं है, इसलिए उनका अब कोई सांगठनिक वजूद नहीं रहा गया है। रही बात दूसरे दलित लेखक संगठन की तो वह भी अगर बेहतर कार्य करेगा तो ही वह भी बचेगा नहीं तो नदलेस ने तो सबका ध्यान आकर्षित किया ही है। यदि नदलेस ऐसे ही कार्य करता रहा तो निश्चित ही यह दलित साहित्य और समाज के लिए एक नई जागृति लेकर आएगा। मेरा ऐसा मानना है कि संबंधित दलित लेखक संघ और नदलेस को यदि जरूरत पड़े तो मिलकर काम करने में भी कोई बुराई नहीं। बाकी नदलेस की इस पहल की जितनी सराहना की जाए उतनी कम है।
पुष्पा विवेक ने पूर्व वक्ताओं द्वारा अनिता भारती वाले संगठन के विषय में व्यक्त बहुत से विचारों का खण्डन करते हुए कहा कि वे बहुत लंबे समय से दलित लेखक संघ से जुड़ी रही है। है कार्यक्रम में आती जाती रही हैं। न जाने कितने साहित्यिक और सामाजिक कार्य दलित लेखक संघ में रहते हुए किए। लेकिन वहां भी कुछ लोग अपनी ही चलाते हैं। न तो वे वरिष्ठों का सम्मान करते हैं और न ही युवाओं को प्रोत्साहित करते हैं। उन्होंने बताया कि वे इस वक्त भी अनिता भारती वाले दलित लेखक संघ की संरक्षक हैं लेकिन उन्हें कभी, न तो किसी कार्यक्रम की सूचना दी जाती है और न ही किसी कार्यक्रम की योजना आदि तक में सम्मिलित किया जाता है। कब किस कार्यक्रम को करना है, कब किस कार्यक्रम की योजना बनी, कैसे बनी, यह कभी भी पता नहीं चलता है। जब कार्यक्रम हो जाता है, तब ही जाकर पता चलता है कि कोई कार्यक्रम हुआ है। एक तरह से यह दलित लेखक संघ भी वन मैन शो की श्रेणी में आ चुका है। इसलिए पूर्व के वक्ताओं ने जो अनिता भारती वाले संगठन के सक्रिय और बेहतर होने के विचार रखे हैं, उनसे सहमत नहीं हुआ जा सकता है। आज जो एक दो युवा लड़की उसका समर्थन करते हुए, अनिता भारती वाले दलेस को युवा को प्रोत्साहित करने वाला बता रही हैं, खुद वे दलित लेखक संघ के कितने कार्यक्रमों की योजनाओं में शामिल की जाती हैं? उन्हें इस बारे में सोचना चाहिए। कुछ भी कह देने से काम नहीं चलता है। किसी संगठन को जमीनी स्तर से काम करना पड़ता है, तब जाकर वह अपनी प्रतिष्ठा को बचा पाता है। ये नहीं कि एक ही आदमी संगठन में सबकुछ करता रहे। सबको साथ लेकर चलना पड़ता है। वरिष्ठों का सम्मान करना पड़ता है और नई पीढ़ी तैयार करते हुए चलना पड़ता है। आज देश के जो हालात हैं उन्हें देखते हुए तो सभी संगठनों की यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि उन्हें सबको साथ लेकर काम करना चाहिए। आज संविधान खतरे में है, दलित समाज और साहित्य खतरे में है। ऐसे में, संगठन में कुछ लोगों की मनमानियां बहुत दुख देती है। मेरा खुद का अनुभव ऐसा रहा है कि मैं संबंधित दलित लेखक संघ के हर कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ करती थी। जब भी कोई कार्यक्रम हुआ, मुझे निमंत्रण मिला या नहीं, पता होने भर से, मैं उसमें पहुंच जाया करती थी। लेकिन कभी किसी ने इसका संज्ञान नहीं लिया। पिछले कुछ वर्षों में तो जो दलित लेखक संघ का हाल हुआ है, उससे तो उसे संगठन कहना भी उचित नहीं लगता है। आज नदलेस ने उनके संगठन होने पर सवाल खड़ा कर दिया है तो आज सभी झूठी दावेदारी प्रस्तुत करने में लगे हुए हैं। अगर वे दोनों ही संगठन इतने ही सही हैं तो क्यों नहीं आए एक मंच पर। क्यों फिर से एक होकर दलित लेखक संघ की शाख गिरने से नहीं बचाई। मैं बताती हूं, इसलिए नहीं बचाई कि दोनों में जिनकी मठधीशी चल रही हैं, उनमें से कोई भी अपनी मठाधीशी को त्यागने के लिए तैयार नहीं। सबको अपनी पद प्रतिष्ठा देखनी है, किसी को दलित लेखक संघ की पड़ी ही नहीं है। इसलिए अच्छा तो यही है कि नदलेस को मजबूत किया जाए। यह युवा पीढ़ी के उत्थान और जागृति के लिए दूसरे दोनों दलित लेखक संघों से बेहतर विकल्प है। यह नया भी है, नई संभावनाओं से भरा हुआ भी है। दोनों ही दलित लेखक संघों से आज ज्यादातर दलित साहित्यकार ऊब चुके हैं। बहुतों के साथ दलित लेखक संघों में विविध तरह की ज्यादतियां हुई हैं। इसलिए दोनों से अब किसी तरह की अपेक्षा रखकर चलना बेमानी है। हां अगर भविष्य में नवदलेस में भी कुछ ऐसा हुआ को आज के दलित लेखक संघों में हो रहा तो तो निश्चित ही नदलेस का भी वो ही हश्र होगा जो दलित लेखक संघों का हो रहा है।
डा. गुलाब सिंह ने कहा कि हम जिस दलित लेखक संघ से जुड़े थे, उसे हमने एक मजबूत आधार देने के बहुत प्रयास किए। उसका घोषणापत्र तैयार करने के साथ साथ, किसानों, मजदूरों यहां तक कि उसमें थर्ड जेंडर तक के विषय शामिल किए। लेकिन संगठन को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति मानने वाले हीरालाल राजस्थानी जी ने कभी भी किसी को संगठन की गरिमानुरूप कार्य नहीं करने दिया। वह चाहता रहा कि संगठन में सबकुछ इसके कहे अनुसार हो। किसी पद और किसी की योग्यता से उसे कोई लेना देना कभी नहीं रहा। उसकी खुद की फेसबुक पर लगाई पोस्ट से पता चलता है कि वास्तव में उसकी कोई वैचारिकी है ही नहीं। यदि है भी तो वह अंबेडकरवादी तो बिलकुल नहीं है, फिर चाहे वह गांधीवादी हो, या फिर तथाकथित प्रगतिवादी। संगठन के हर कार्य में खुद को वरीयता देना और प्रत्येक कार्यक्रम में स्वयं को हाइलाइट करना, जैसे उसका स्वभाव बन गया है। यही कारण है कि गत दो वर्षों में ही बीसियों लोगों ने संगठन छोड़ा। कई बार कार्यकारिणी के चुवाव हुए, मगर इससे भी उसने कोई सीख नहीं ली। परिणामस्वरूप संगठन पूरी तरह बिखर गया। नदलेस की पहल पर सबको पुनः जोड़ने का कार्य शुरू किया गया, वह अत्यंत सराहनीय रहा। मैं खुद इस पूरी मुहिम का हिस्सा रहा हूं। मैं और अमित धर्मसिंह गए थे अनिता भारती जी और हीरालाल राजस्थानी जी को प्रस्ताव पत्र की कॉपी देने। अनिता भारती ने तो समुचित आदर सत्कार के साथ प्रस्ताव पत्र स्वीकार किया किंतु हीरालाल जी ने मानवीयता के न्यूनतम मूल्यों तक का भी निर्वाह नहीं किया। साहित्य और समाज में, न जाने कितने मतभेद बने रहते हैं लेकिन उनका यह मतलब कतई नहीं होता है कि कोई किसी का सम्मान तक करना भूल जाए। वह भी अपने घर आए व्यक्ति का!! समझ नहीं आता कि संगठन तोड़ू नीतियों और निंदनीय स्वभाव के दम पर आखिर समाज में हम कौन-सा बदलाव लाना चाहते हैं? यह कतई संभव नहीं कि केवल व्यक्तिगत हितों के अनुरूप किसी संगठन को अधिक दिनों तक नियंत्रित किया जा सके। एक न एक दिन संगठन में इस तरह के व्यक्ति अथवा स्वभाव का विरोध होता ही है। संबंधित दलित लेखक संघ में भी हुआ और आज आप देख ही रहे हैं कि वह किस कदर सिमटकर रह गया है। इससे दूसरे संगठनों को भी सीख लेने की आवश्यकता है। बाकी हम तो साहित्य और समाज के सापेक्ष बेहतर काम करने वाले व्यक्ति और संगठन के साथ है। जैसा कि नदलेस ने अच्छा काम किया तो हमने इसका भी साथ दिया। भविष्य में भी कोई दलित साहित्य की वैचारिकी के अनुसार कार्य करेगा तो हम उसके भी साथ खड़े होंगे। पूर्व वक्ताओं के अनुसार फिलहाल कुछ संभावनाएं अनिता भारती वाले दलित लेखक संघ से अभी बची हुई हैं। जब तक ये संभावनाएं हैं तब तक हम उसके साथ भी साझा कार्यक्रम आदि कर सकते हैं। जिस दिन ये संभावनाएं खत्म हो गईं तो दूसरे विकल्प खोज ही लिए जायेंगे। इसमें कोई दो राय नहीं।
अंत में सभी वक्ताओं के मत अभिमत और सवाल जवाबों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया गया कि जिस समस्या को लेकर प्रस्ताव तैयार किया गया था। उस समस्या के निपटारे के लिए रचनात्मक पहल संबंधित दलित लेखक संघों ने नहीं की है। अब इस समस्या के दो हल हो सकते हैं। ये दोनों हल प्रस्ताव पत्र में भी दर्ज हैं और आज के वक्ताओं ने भी अलग-अलग ढंग से इन दोनों ही रास्तों के विषय में सुझाते हुए अपने-अपने मत और विचार प्रस्तुत किए हैं। दो में से एक हल तो यह है कि प्रस्ताव पत्र के अनुरूप समुचित कार्यवाही न करने और यथावत बने रहने के कारण दोनों ही दलित लेखक संघों को उनके हाल पर छोड़कर नव दलित लेखक संघ को मजबूत किया जाए। दूसरा यह कि दो में से कम बुरे संगठन को स्वीकृति देकर दूसरे को सिरे से खारिज कर दिया जाए। दूसरे हल के विषय में यदि प्रकाश डाला जाए तो अनिता भारती वाले दलित लेखक संघ को साहित्यिक स्वीकृति देने के कई माकूल कारण दिखाई देते हैं। ये कारण हैं - अधिक दस्तावेजीकरण, लगातार सक्रियता और दलेस द्वारा सितंबर 2022 में चुनाव करवाने के को स्वीकृति। सितंबर, 2022 में चुनाव करवाने की बात स्वयं अनिता भारती जी ने कई बार स्वीकारी है। वे दलित लेखक संघ को लेकर काफी सक्रिय भी रहती हैं और अपने लोगों और संगठनों के साथ मिलकर कार्य करने की इच्छुक और उत्साहित हैं। यद्यपि यहां यह बात भी नोट करने की है कि संबंधित दलित लेखक संघ की अध्यक्ष अनिता भारती के अलावा कार्यकारिणी के दूसरे पदाधिकारीगण सामने क्यों नहीं आ पाते हैं? हम सब उनके नामों तक से परिचित क्यों नहीं हैं? क्या संगठन उनके पद के अनुरूप उनके साथ न्यायसंगत रवैया इख्तियार नहीं करता है? या कि स्वयं पदाधिकारीगण सक्रिय नहीं रहते हैं। कुछ भी हो यह स्थिति किसी भी संगठन के लोकतांत्रिक होने पर प्रसन्नचिह्न लगाती है। रही बात हीरालाल राजस्थानी जी वाले दलित लेखक संघ की तो उनकी ओर से तो प्रस्ताव पत्र को लेकर न्यूनतम कार्यकवाही भी नहीं की गई। न ही उनका कोई संदेश प्राप्त हुआ। न ही निमंत्रण दिए जाने के बाद भी वे इस मुहिम के किसी कार्यक्रम में शामिल हुए। इससे ज्ञात होता है कि उन्होंने प्रस्ताव पत्र में दर्ज सैकड़ों रचनाकारों के विचारों और भावनाओं की कोई वैल्यू ही नहीं समझी। यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं। इसके अलावा उनके पास दलित लेखक संघ के न तो दस्तावेज हैं और न ही वे दलित समाज के विषयों को लेकर कुछ खास सक्रिय रहते हैं। उनकी सारी सक्रियता दूसरे संगठनों प्रलेस, जलेस, जसम, इप्टा, सिप्टा आदि के साथ रहती है। दलित संगठनों और साहित्यकारों से उनका कुछ अधिक लेना देना नहीं है। वे केवल अपने नाम चमकाने और व्यक्तिगत हित साधने तक सीमित हैं। उनकी इन छद्म गतिविधियों से दलित साहित्य, दलित समाज और दलित संगठनों का कोई भला होने वाला नहीं है। यही कारण hahai कि आज की इस गोष्ठी में भी वक्ताओं के मत, अभिमत और विचार आदि हीरालाल राजस्थानी जी वाले दलित लेखक संघ को स्वीकृति देने के पक्ष में नहीं बन पाए हैं। प्रस्ताव पत्र में दर्ज जनाधार और आज की गोष्ठी के जनाधार को देखते हुए, अगर किसी दलित लेखक संघ को स्वीकृति दी जा सकती है तो वह अनिता भारती जी वाले दलित लेखक संघ को दी जा सकती है। वह भी इस उम्मीद के साथ कि वे भी निकट भविष्य में अपने संगठन में व्याप्त असंतोष और अंतर्विरोधों को दूर करने की कोशिश करेंगी और यथासमय लोकतांत्रिक तरीके से कार्यकारिणी का चुनाव करवाएंगी। इसके अतिरिक्त नदलेस सभी साथियों की उन भावनाओं और विचारों को भी स्वीकार करता है, जिनमें उन्होंने यह सुझाव दिया है कि जरूरत पड़ने पर नदलेस को स्वीकृति पाए दलित लेखक संघ के साथ ही रचनात्मक भागीदारी करनी है, दूसरे वाले के साथ नहीं। अंततः प्रस्ताव पत्र, आज की गोष्ठी और नदलेस का जनाधार, हीरालाल राजस्थानी वाले तथाकथित दलित लेखक संघ को आज दिनांक 13 फरवरी, 2022, दिन, रविवार, समय रात्रि 9 बजे से दलित लेखक संघ के रूप में पूरी तरह से अस्वीकृत करता है। ऑनलाइन हुई इस महत्त्वपूर्ण बैठक में बंशीधर नाहरवाल, बृजपाल सहज, खन्नाप्रसाद अमीन, अनुज कुमार, ऋषि हरियाणवी, अनिता भारती, रिछपाल विद्रोही, सतेंद्र कुमार, बी. एल. तोंदवाल, बिभाष कुमार, चितरंजन गोप लुकाटी, जयराम पासवान, ज्योति पासवान, जावेद आलम ख़ान, भूपसिंह भारती, भीमराव गणवीर, समय सिंह जौल और उमेश राज आदि दलित साहित्यकार मौजूद रहे। गोष्ठी में उपस्थित सभी साहित्यकारों का धन्यवाद ज्ञापन नदलेस की संरक्षक पुष्पा विवेक ने किया।
डा. अमित धर्मसिंह
उपाध्यक्ष, नदलेस
18/02/2022
Comments
Post a Comment