रविदास की 645 वीं जयंती पर हुए कार्यक्रम की रिपोर्ट
रिपोर्ट :
रविदास जयंती पर नदलेस ने किया स्वतंत्र काव्य पाठ एवं विचार गोष्ठी का आयोजन
सामाजिक क्रांति के अग्रदूत रविदास जी की 645 वीं जयंती पर स्वतंत्र काव्य पाठ एवं विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें रविदास द्वारा सामाजिक समानता के लिए किए गए रचनात्मक कर्म को याद करते हुए सभी कवियों ने अपनी अपनी कविता के माध्यम से अपने अपने उद्गार व्यक्त किए। इन उद्गारों में सामाजिक न्याय, परिवर्तन और समानता की छटपटाहट थी। समाज में फैले जातिवाद, पुरुषवाद, पितृसत्ता, धार्मिक अंधविश्वास व रूढ़ीवाद के प्रति सटीक और तार्किक आक्रोश था। वैचारिक विद्रोह इन कविताओं का मूल स्वर रहा। गोष्ठी की अध्यक्षता डा. अनिल कुमार ने की और संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया।
रविन्द्र प्रताप सिंह ने अपनी पहली कविता में इंडिया और भारत के अंतर को स्पष्ट किया तो दूसरी कविता में उन्होंने प्रकृति के सौंदर्य से बढ़कर जीवन की बेसिक जरूरतों को बताया। समाज में पुरुषसत्ता के विरुद्ध बिगुल फूंकते हुए 'पेट का आयतन' कविता में उन्होंने कुछ यूं पढ़ा -
"मैं चाहता हूं कि मेरे नाम के आगे मेरी मां का नाम दर्ज किया जाय,
बसंत के आने का मतलब मेरे राशन के कनस्तर का खाली होना है।"
उमेश राज ने समाज में बरते जाने वाले जातीय भेदभाव को उजागर किया। उन्होंने अपनी कविता में आर्थिक रूप से समाज में व्याप्त गैर बराबरी को भी निशाना बनाया। दलित समाज की वास्तविक दशा को बयां करने वाली उनकी दो कविताओं में से एक का अंश कुछ इस प्रकार रहा - "हाँ ये भंगियों की बस्ती है
नंग-धड़ंग जीवन हमारा
फटी लंगोट और झुग्गी है
सुअरों का है खोबार यहाँ
ये ही हमारी हस्ती है
हाँ ये भंगियों की बस्ती है
दुख है ताप है विलाप है
और शोषितों का संताप है
उदधि में भूख की आग है
और चूल्हे में ठंडी राख है
व्यथाओं का है समंदर यहाँ
बिन पतवार हमारी कस्ती है
हाँ ये भंगियों की बस्ती है !"
आर. एस. आघात ने अपनी कविताओं में प्रतिरोध के मुखर स्वरूप को आवाज दी। उन्होंने दलित जीवन में व्याप्त गहरे संताप को शब्दबद्ध करते हुए कई कविताएं पढ़ीं। जिनमें से हमारी बस्ती, अब मुझे नहीं चाहिए तथा सुनो तुम नारी हो आदि प्रमुख हैं। उनकी एक कविता में नकार और विद्रोह का स्वर कुछ इस प्रकार मुखर हुआ -
"मैंने जीना सीख लिया है
तुम्हारी स्थिति
तुम्हारी परिस्थिति
और तुम्हारी वस्तुस्थिति के संग।
अब मुझे नहीं चाहिए
तुम्हारी भेंट की गई स्थिति
तुम्हारी सड़ी गली दोमुंही परिस्थिति,
और तुम्हारी झूठ से लथपथ वस्तुस्थिति।"
डा. नविला सत्यादास ने अपनी कविता में स्त्री की सामाजिक दशा को प्रस्तुत करते हुए पितृसत्ता, पुरुषवादी और मर्दवादी सोच पर कई सवाल खड़े किए। अपनी धीर गंभीर कविताओं की गंभीर प्रस्तुत करते हुए उन्होंने स्त्री के सामाजिक अस्तित्व, स्वतंत्रता और अस्मिता के प्रति सजगता दिखाई। उनकी कविता में नारी जीवन की त्रासदी प्रमुखता से उभरकर सामने आती है। उनकी एक कविता 'तुम चुप हो? में इसकी बानगी कुछ इस तरह उभरकर सामने आई-
"शक्ति दम्भ की इस जंग में
तुम फड़फड़ाती तितलियों से ज्यादा कुछ भी नहीं
उसकी मर्यादा-
उसके जुम्लों के इतिहास में
तेरी पहचान की कीमत कुछ भी नहीं।"
हिमाचल से जुड़े रचनाकर राजन तनवर ने समाज में फैली धार्मिक कुरीतियों पर जमकर कुठाराघात किया। उन्होंने बुद्ध, कबीर, रविदास, आंबेडकर, पेरियार आदि महापुरुषों के बलिदानों और सामाजिक कार्यों को याद दिलाते हुए सवाल खड़े किए कि इनसे भी तुमने कुछ नहीं सीखा। इनको भुलाकर तुम धार्मिक आडंबरों में उलझे रहे। उन्होंने कुल तीन कविताएं -नहीं सूखती, ढोंगियों से पीछा छुड़वाओ, ठगवाना नहीं छोड़ते होजेड शीर्षकों से पढ़ी और अखिल दलित समाज से प्रश्न किया -
"राम ने शम्भुक का वध किया,
कृष्ण ने एकलव्य का अंगूठा काटने दिया।
फिर भी
तुम झूठे असत्य कथन वाचकों से
सत्यनारायण की कथा सुनते हो।"
बंशीधर नाहरवाल ने दो कविताओं का पाठ किया। एक में उन्होंने प्रकृति और गौरैया के माध्यम से युवाओं को जागृति का संदेश दिया। उन्होंने कविताओं के माध्यम से बताया कि प्रकृति हमें हर रूप में कुछ न कुछ सिखाती है बशर्ते कि हम सीखने वाले बने। उन्होंने अपनी दूसरी कविता में गत दो वर्षों पहले घटित उस घटना का मार्मिक वर्णन किया जिसमें एक मजदूर अपनी पत्नी की लाश को अस्पताल से पैदल घर तक लेकर जाता है। उन्होंने इस महिला की लाश को व्यवस्था की लाश मानते हुए इसी शीर्षक से लिखी कविता में कुछ यूं कहा -
"बापू शहर गया है मां का इलाज करवाने
बापू कई दिन बाद लौटे कंधे पर एक गट्ठर लादे
बापू ये तुम क्या लाए हो, मां को साथ नहीं लाए क्या?
नहीं बेटा, तेरी मां का वजन ज्यादा था
इसलिए मैं उसकी लाश उठा लाया हूं।"
चितरंजन गोप लुकाटी ने अपनी कविताओं में मानव मूल्यों और स्वाभिमानी जीवन के प्रति विचार और अनुभव व्यक्त किए। उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से विपरीत परिस्थितियों और सामाजिक विसंगतियों से भरे जीवन में कभी हार न मानने की सीख दी और स्वाभिमान से जीवन यापन करने का आह्वान किया। सच्चे और खरे व्यक्तियों के विषय में उन्होंने बताया कि ये समझौतावादी नहीं होते और पूरे आत्मसम्मान के साथ जीते हैं। गलत लोगों की न ये संगत करते हैं, न ही उनका अनुकरण करते हैं। उन्होंने अपनी एक कविता मुझे गर्व है में कुछ यूं पढ़ा - "मुझे गर्व है कि
भांग-अफीम के नशे में धुत्त
अफीमचियों की भीड़ में
मैं शामिल नहीं हूं
निरीह लोगों के पीछे
तोप लेकर दौड़ने वाले
तोपचियों के साथ भी नहीं।
रवि निर्मला सिंह ने अपनी कविता के माध्यम से ऐसे इलीट वर्ग पर प्रहार किया जो निजी हित के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। उन्हें बाबा साहब तभी तक प्यारे होते हैं जब तक वे नौकरी आदि नहीं पाते। जैसे ही उनकी जीविका सुरक्षित होती है, वैसे ही वे अपने सामाजिक कर्तव्यबोध के साथ-साथ अपने महापुरुषों की देन को भी भुला देते हैं। यही कारण है वे अपनी एक कविता में अकेला होने को अधिक विश्वसनीय बताते हैं और ऐसे छद्म अंबेडकरवादियों पर प्रहार करते हैं जो बड़े बड़े पदों पर पहुंचकर बाबा साहब तक को भुलाए बैठे हैं।
"बाबू नहीं बाबा" कविता में उन्होंने पढ़ा -
"बाबू तो बन बैठे भईया
बाबा को क्यों दिया भुलाए?"
कवयित्री इंदु रवि ने अपनी कविता में जनमानस को जागृत करने के लिए कहा कि शोषण को सहन करना भी शोषण को बढ़ावा देने के बराबर होता है। इसलिए वे गलत के खिलाफ आवाज उठाने को प्रमुखता देती हैं। और अपनी "आवाज उठायें" कविता में वे कहती हैं -
"चुप रहना भी ,
गलत आदमी को
बढ़ावा देना है ।
इसलिए समाज के सभी
जागृत एवं सुप्त
लोगों से आग्रह है
कि सम्मान,स्वाभिमान
और अपने हक की आवाज उठाये।" दूसरी कविता अमर इतिहास में वे धार्मिक आडंबर के खिलाफ प्रतिरोध दर्ज करते हुए कहती हैं - "हमने सुना है
वो हमको तड़पाता था
कमाते थे हम,
वो हमारा धन खाता था ।
गोबर को पूज डाला उसने
जन को ठुकराया है
आर्यों ने आकर
आसन जमाया है।"
पवन कुमार ने बड़े ओज के साथ अपनी गेय कविता का गायन किया। जो काफी सराहा गया।
पुष्पा विवेक ने जंग ए मैदान, देश का लोकतंत्र, और बेटियों की गर्दन झुकी रहती है शीर्षकों से तीन कविताओं का पाठ किया। उनकी कविताओं में स्त्री चेतना का तो मूल स्वर है ही साथ ही समाज के दबे कुचले वर्ग दलित वर्ग के लिए भी आवाज मुखर होती है। इसलिए वे भारत की आजादी को अधूरी आजादी मानती है। उनका मानना है कि जब तक देश में वंचित समाज और स्त्रियों की दशा में आमूलचूल सुधार नहीं हो जाता तब तक देश की आजादी और लोकतंत्र के कोई मायने नहीं हैं। जंग -ए-मैदान कविता में उन्होंने सुनाया -
कोई लड़ा, जंग- ए-मैदान में
कोई सोती कौम जगाता रहा!
इसी तरह दूसरी कविता शाखाएं में उन्होंने कहा कि
हमारे अस्तित्व को बोनसाई बनाने में,
तुमने खींचीं थी अनेकों रेखाएँ.
तीसरी कविता में उन्होंने सवाल खड़ा किया कि
कैसी आजादी, किसकी आजादी? इसी तरह "देश का लोकतंत्र " कविता में उन्होंने पढ़ा -
सम्पन्न -सवर्ण समाज से दूर
गरीब, असहाय, बेबस, मजबूर
नाले के आसपास या
रेल की पटरियों के किनारे
जहाँ कूड़े और गंदगी के ढेर
रहने को होते मजबूर!"
इसी तरह डा. अमित धर्मसिंह ने अपनी कविताओं में दलित वर्ग की सामाजिक दशा को वाणी दी। उन्होंने थोड़ी सी जमीन बगैर आसमां और वे जब पैदा होते हैं शीर्षक से दो कविताएं पढ़ीं। एक में उन्होंने बताया कि किस तरह दलित, मजदूर और किसान तबके के लोग देश में बगैर आसरे के घोर आभावों में जीवन यापन करते हैं। दूसरी कविता में उन्होंने वंचित तबके के जीवन में व्याप्त त्रासदी को जन्म से मृत्यु तक के सफर में लिपिबद्ध किया कि किस तरह त्रासदियों के बीच उनका जीवन छला और ठगा जाता है। उन्होंने पढ़ा -
"वे जब पैदा होते हैं
तो उनकी आंखों में दूधिया चमक होती है
जो अल्पपोषण के कारण धीरे धीरे पीली पड़ती जाती है
और उनकी आखों में पसर जाता है अनचाहा कब्रिस्तान
जो सपने देखने के नहीं
दफनाने के काम आता है।" इसी के साथ उन्होंने रैदास के भी कई पद पढ़कर सुनाए। इन पदों में रैदास की सामाजिक चेतना मुखरित हुई।
अध्यक्षता कर रहे डा. अनिल कुमार ने सभी कवियों की कविताओं की प्रसंशा करते हुए कहा कि आज जो कविताएं सुनने को मिली हैं, वास्तव में ऐसी कविताएं ही सामाजिक परिवर्तन की संवाहक बनती हैं। इस तरह के छोटे छोटे आयोजन समाज में बड़े बदलाव लाने के कारक बनते हैं। उन्होंने रैदास के सामाजिक मूल्यों और विचारों पर समुचित प्रकाश डालते हुए कहा कि वास्तव में आज रैदास के आध्यात्मिक स्वरूप की अपेक्षा उनके सामाजिक क्रांति के अग्रदूत स्वरूप को देखने की पुरजोर आवश्यकता है। रैदास की जो बेगमपुरा की अवधारणा है। वास्तव में, उसी में हेर फेर करके तुलसीदास ने रामचरितमानस में रामराज्य की प्रतिष्ठापना की है। इसलिए रैदास के बेगमपुरा की अवधारणा को उसके वास्तविक स्वरूप में समझने की आवश्कता है। साथ ही जरूरत है रैदास के विचारों को जीवन में अपनाकर चलने की, ताकि रैदास की 'ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन को अन्न, छोट बड़ो सभ सम बने, रैदास रहे प्रसन्न।' वाली उक्ति साकार हो सके। बहरहाल, रैदास की 645 वीं जयंती के अवसर पर नदलेस का यह आयोजन अपने उद्देश्य में सफल रहा। कार्यक्रम में उक्त कवियों के अतिरिक्त कुमारी अनिता, गीता कृष्णांगी, बिभाश कुमार, समय सिंह जोल, सत्येंद्र कुमार, बृजपाल सहज, भूपसिंह भारती, बी. एल. तोंडवाल, जयराम पासवान और विद्याराम आदि कवि एवं रचनाकार उपस्थित रहे। सभी उपस्थित कवियों और श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन रवि निर्मला सिंह ने किया।।
डा. अमित धर्मसिंह
18/02/2022
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