संविधान दिवस पर दलेस व नवदलेस की साझा काव्य गोष्ठी



रिपोर्ट

संविधान दिवस पर दलेस व नवदलेस की साझा काव्य गोष्ठी

दिल्ली। कल दिनांक 26 नवंबर 2021, संविधान दिवस के अवसर पर दलित लेखक संघ व नव दलित लेखक संघ ने साझा काव्य गोष्ठी का आयोजन किया। जिसकी अध्यक्षता संयुक्त रूप से दलेस की अध्यक्ष अनिता भारती और नवदलेस के अध्यक्ष डा. अनिल कुमार ने की। संयुक्त रूप से संचालन डा. अमित धर्मसिंह और अंतिमा मोहन ने किया। गोष्ठी में काव्यपाठ कवियों की क्रमिक उपस्थिति के आधार पर हुआ, जिसमें डा. बिपिन कुमार, प्रियंका सोनकर, प्रियंका साहनी, पुष्पा विवेक, जय फाकिर, प्रदीप कुमार, खन्नाप्रसाद अमीन, चितरंजन गोप लुकाटी, जावेद आलम ख़ान, लहरीराम मीणा, समय सिंह जौल, अशोक कुमार, रवि निर्मला सिंह, अंजली रंगा, बृजपाल सहज, डा. सुरेखा, अंतिमा मोहन और डा. अमित धर्मसिंह और अनिता भारती आदि कवियों ने काव्यपाठ किया। गोष्ठी का संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने संविधान की प्रस्तावना पढ़कर शुरू किया। अलग-अलग जगह से जुड़े कुछ प्रमुख कवियों की कविताओं के अंश इस प्रकार रहे-
बनारस से जुड़े डा. बिपिन कुमार ने कविता कुछ इस प्रकार पढ़ी -
"पहले कितने गिरे थे
यह नहीं पता,
जबसे तुमको जाना
गिरते ही जा रहे हो
गिरते ही जा रहे हो
निंदा नही
बखाना तुमको
उठाने की आस में
सीखा नहीं तुमने उठना
गिरते ही जा रहे हो!"
कोलकाता से कार्यक्रम में जुड़ी प्रियंका सहानी ने काव्यपाठ किया। उनकी दो कविताओं के अंश इस प्रकार रहे -
"आज की स्त्री"
सौंदर्यता के चासनी के लिए
सोलह श्रृंगार में फंसाया
बोलने के अधिकार की जगह
मुँह पर ताले जड़े तुमनें
तभी तो शोषण के विरुद्ध अंनत आवाज हैं।
दूसरा कविता कुछ इस प्रकार रही -
"गर्व है हमें"
हजारों सालों की ग़ुलामी तोड़कर
शिक्षा का अधिकार तेरे संविधान से मिला।
शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने का अधिकार
 तेरे संविधान से मिला।
झारखंड से जुड़े चितरंजन गोप लुकाटी की कविताओं के प्रमुख अंश इस प्रकार रहे-
१. भगवान का जन्म
अंतिम चार पंक्तियां--
 वायरस से कोरोना जन्मी
 नई देवी, नया विधान
 इसी तरह जन्मा था कभी
 अल्लाह, गॉड, भगवान...!
२. कोर्ट में चाचा
अंतिम चार पंक्तियां---
और क्यों ले आते हैं हम
अपने घर का झगड़ा
 इस घर तक?

दिल्ली से जुड़ी प्रियंका सोनकर ने अपनी कविता कुछ यूं पढ़ी-
1. मोक्ष 
अमानुष से मानुष का दर्जा देकर 
तथाकथित समाज में हमको भी बैठने, बोलने और अपनी आवाज बुलंद करने का अधिकार दिया
दलितों के लिए पानी पीने का हक़ दिलाया
मन्दिर पर सतत कब्जाकरण के भ्रम को तोड़कर अछूतो के लिए भी द्वार खोला
2.मनुस्मृति
लड़कियां पढ़ने लगी हैं मनुस्मृति
और पैनी निगाह से उसके एक-एक पन्ने;
बुनने लगी हैं जाले,
खोलने लगी हैं परत दर परत,
लिखने लगी हैं इतिहास अपने होने का 
और तुम्हारे सदियों से फैले वर्चस्व का
सोचते होगे तुम मनु और मनुपुत्रों !
नव दलित लेखक संघ की संरक्षक दिल्ली निवासी पुष्पा विवेक ने अपनी कविताएं कुछ इस प्रकार पढ़ीं-
"संविधान बचायें"
आओ चलो संविधान बचायें
ब्राह्मणवाद  के चंगुल से
अपने अधिकार बचायें
संविधान पर मंडराते खतरे से
अपनों को बचायें
आओ चलो संविधान बचायें!
दूसरी कविता -
 "नई पीढ़ी"
इतिहास के पन्नों में
छुपे हैं
मेरे पूर्वजों के साथ
होने वाले अत्याचार 
उनके गले से
बंधी हांडी और 
कमर में पैरों के निशान मिटाती झाड़ू,
शिक्षा से वंचित रखने की साज़िश के तहत 
उनके कानों में डाला गया
गर्म गर्म पिघला सीसा
सब कुछ उधेड़ कर 
रख देंगे
इतिहास के उघडते पन्ने।
गोष्ठी में गुजरात से हिस्सा लेने वाले डाॅ खन्नाप्रसाद अमीन ने अपनी कविता शीर्षक "झूठ से सीधा साक्षात्कार" से कुछ इस प्रकार पढ़ा-
वे कौन थे  जिसने 
हमें इस वर्ण व्यवस्था में कैद  कर लिया 
हमारी सहमति के बिना 
वे कौन थे जिनमें  थोड़ी सी भी मानवता नहीं थी 
ठोक दी हमारी जाति पर ' अछूत '
होने की मुहर 
वो  कौन थे  जिसने 
वर्ण व्यवस्था बनाई शाश्वत 
और सदियों तक  शाश्वत रखता  रहा 
उस धूर्त  को  ढूंढ रहा  हूँ 
जिसने रची है जात-पाँत , ऊँच नीच की
 हीन  और संकीर्ण  भावना 
उसने अपने  शास्त्रों में गढ़ी  है 
झूठी कहानी ?
दिल्ली से शामिल हुए समय सिंह जौल ने शीर्षक "हे जाति तू जाती क्यों नहीं" से पढ़ा-
तेरे कारण मानव ने मानव का दंश झेला।
हजार प्रतिभा थी तेरे में फिर भी पीछे धकेला।।
तेरे कारण गुनी मानव भी सम्मान पाता क्यों नहीं 
हे जाति तू जाती क्यों नहीं।।
गाजियाबाद से शामिल हुए बृजपाल सहज ने अपना मुक्तक कुछ इस प्रकार पढ़ा-
कौन कहता है कि मुकम्मल जहां नही मिलता।
ग़र चाह हो तो ख़ुदा कहां नहीं मिलता। 
दूर नजर उठाकर देखना कभी,
क्या ज़मी से ये आसमां नहीं मिलता।
काव्य संध्या में नरेला से शामिल हुए रवि निर्मला सिंह ने कविता कुछ इस प्रकार पढ़ी-
" लक्ष्मण रेखा "
चार नहीं 
भले पैदा कर दो
चालीस हजार विभाजन 
खींच दो कदम कदम पर
लक्ष्मण रेखाएं
बांट नहीं सकते तुम
हवा,पानी, धूप
और हमारे हिस्से की आग
हम सांस लेते रहेंगे
पानी से पसीना
पसीने से पानी बनाते रहेंगे
धूप में सूरजमुखी की तरह
खिलखिलाते रहेंगे
तुम्हारी चतुरवर्णी लक्ष्मण रेखाएं
नहीं रोक सकती 
न्याय के लिए 
दिन रात हमारे सीनों में धधकती आग।
दिल्ली की रोहिणी से शामिल हुए अशोक कुमार ने अपनी कविताएं कुछ इस प्रकार पढ़ें-
(1) जहां सारी भाषायें
सारी वर्जनाएं
यहां तक कि ईश्वर भी
अभी गढ़े जाने के क्रम में है.
(2) डरा हुआ व्यक्ति
दरअसल में
भीतर से डरा हुआ 
वह व्यक्ति हूं
जो विद्रोह किये बगैर
क्रांति चाहता है.
(3) कोयलें फिर से कूकेंगी
पंचनामा न होने पर
हत्यायें, आत्महत्याओं में नहीं बदल गाएंगी
वक्त कर ही लेगा एक दिन
कातिलों की शिनाख्त
जब जिंदा गवाही नहीं देंगे
लाशें स्वयं बोल पड़ेंगी.
रोहिणी से ही गोष्ठी में भागीदार रहे जावेद आलम ख़ान ने अपनी कविता शीर्षक - अनचीन्ही पहचान, कुछ इस प्रकार पढ़ी-
जिन रंगों से त्योहार का उल्लास बरसाना था 
मुल्क के आईन का गिलाफ सिलना था 
सलाइयों से फूल काढ़कर बच्चों के स्वेटर बुनने थे 
जो रंग चढ़ने थे लहलहाती फसलों पर 
धान और गेंहू की बालों पर 
मेहंदी लगे हाथों पर शर्माए हुए गालों पर 
वे सभी रंग दंगाइयों के परचम पर चिंघाड़ रहे हैं
दिल्ली से जुड़े प्रदीप कुमार ने अपनी कविताएं कुछ इस प्रकार प्रस्तुत की-
1.पांव के छाले
 कहां नहीं हैं जख्म
 कहां नहीं हैं छाले
 कैसे बताऊं तुम्हें
 अगर कभी देखे होते
 मेरे दिल के छाले...
 2.गेहूंआ
 इंद्रधनुष के रंगों में
 रंग अनेक
 किंतु मैं खोजता हूं गेहूंआ
 गेहूं के जैसा...
गोष्ठी का संचालन कर रही अंतिमा मोहन की कविता का अंश कुछ इस प्रकार रहा-
' अकेले की नहीं होती लड़ाई'
जाना तो जाना हमने 
हर सच को झूठ ।
कि जन्म लेने भर से नहीं होता हर इंसान इंसान ।
जाना तो जाना 
लड़नी पड़ती है लड़ाई 
इंसान बनने के लिए ।
लड़ाई जो अकेले की नहीं होती 
अकेले नहीं लड़ी जाती
अकेले तो केवल तानाशाह बना जाता है..
हासिल नहीं हो जाता लोकतंत्र यू हीं एक रोज़ अचानक।
हासिल करते रहने का नाम है लोकतंत्र। 
लोकतंत्र को बचाने से पहले लोकतंत्र का विचार बचाना होता है।
दिल्ली से जुड़ी युवा कवयित्री अंजली रंगा ने कुछ यूं पढ़ा-
'गोल बिंदी'
चेहरा परतों में छिपा रहता है
परत दर परत उस मेकअप में
कितना छिपा लेती है न हम खुद को?
हरियाणा से जुड़ी कवयित्री डा. सुरेखा ने अपनी कविता कुछ इस प्रकार प्रस्तुत की-
'बस इतना बता दो'
चलो मान लिया आज मैंने 
तुम उच्चे हम नीचे है 
मगर बस इतना बता दो 
क्या खेतों में अनाज तुमने उगाया 
जिसे बिना सोचे खाया 
क्या सड़कों को तुमने बनाया 
जिस पर बेतहाशा कारों को दौड़ाया 
क्या जमीन खोद कर पानी तुमने निकाला 
भरकर जिसे स्विमिंग पुलों में गोता लगाया
गोष्ठी का संचालन कर रहे डा. अमित धर्मसिंह की कविता 'कूड़ी के गुलाब' की कुछ पंक्तियां इस प्रकार रही-
हम !
गमले के गुलाब की तरह नहीं,
कुकुरमुत्ते की तरह उगे ।
माली के फव्वारे ने 
नहीं सींचीं हमारी जड़ें,
हमारी जड़ों ने 
पत्थर का सीना चीरकर 
खोजा पानी
कुटज की तरह । 
कुम्हार के हाथों ने नहीं गढ़ा ,
वक़्त के थपेड़ों ने सँवारा हमें ।
किसी की ऊँगली पकड़ने से ज्यादा
हम अपनी ठोकरों से सम्भले ।
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रही अनीता भारती ने अपनी कविता 'किताब' कुछ इस तरह प्रस्तुत की-
किताब  
रात दिन रटते हो तुम 
बाबासाहेब का नाम 
राजनीति से लेकर साहित्य
साहित्य से लेकर धर्म 
धर्म से लेकर प्रजातंत्र
प्रजातंत्र से लेकर वोटबैंक
वोटबैंक से लेकर लूटतंत्र
आरक्षण से लेकर जन्मजात प्रतिभा
यहाँ तक कि 
पूंजीवाद सामंतवाद के समर्थन में भी 
ले लेते हो बाबासाहेब का नाम
पर क्या सच में हम 
आत्मसात कर रहे हैं उन्हें
उनके मार्ग को
उनके रास्ते को
बस उलझे पड़े हैं 
जातियों उपजातियों के संघर्ष में
इनके अलावा जय फाकिर, डा. लहरीराम  मीणा और परमवीर ने भी उत्कृष्ट काव्यपाठ किया। 
सफल और उत्कृष्ट काव्यपाठ के पश्चात अध्यक्ष अनिता भारती ने कहा कि सही मायने में संविधान दिवस को मनाने का यही एक तरीका हो सकता है कि हम लिखने पढ़ने वाले और विविध संगठनों से जुड़े दलित साहित्यकार एक मंच से जुड़े। यदि हम सब आज के दिन भी एक मंच पर नहीं आ सकते तो फिर हमारे एक होने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। उन्होंने संविधान से संबंधित अपनी कविता 'किताब' पढ़ी और संविधान को पुस्तकों में सर्वोपरि बताया। इसके साथ उन्होंने कविता प्रस्तुत करने वाले तमाम कवियों की कविताओं पर सारगर्भित टिप्पणी द्वारा सराहना करते हुए कहा कि इन कविताओं की बदौलत आज की यह गोष्ठी ऐतिहासिक हो गई है। गोष्ठी में वरिष्ठ कवियों से लेकर युवा कवियों की भागीदारी बड़ी गौरवमयी और भविष्य के प्रति आशान्वित करने वाली रही। गोष्ठी के दूसरे अध्यक्ष डा. अनिल कुमार ने कहा कि ये जो हमारी छोटी छोटी कविताएं हैं, छोटी छोटी सृजनात्मकता है, असल में यही बड़े बदलाव का कारण बनती हैं। हम सबको अपनी कलम और अभिव्यक्ति के माध्यम से अपने सामाजिक संघर्ष को आगे बढ़ाना चाहिए। यही हमारे लिए सामाजिक न्याय और समानता का समुचित रास्ता हो सकता है। आज हमें एकजुट होकर काम करने की आवश्कता है। इसलिए सभी को अपने छोटे-छोटे अहम छोड़कर इस सामाजिक लड़ाई में साथ रहना चाहिए। उन्होंने सभी कवियों की कविताओं को बेजोड़ बताया और माना कि ये कविताएं न सिर्फ बहुत कुछ कहती हैं बल्कि बहुत कुछ सिखाती भी हैं।
डा. अमित धर्मसिंह ने कहा कि हम जो  साहित्यकार और कविगण हैं, असल में हम सामाजिक पहरुए हैं। जिस तरह किसी गांव में, रात के समय एक या दो लोग जागकर पहरा देते हैं, ठीक उसी तरह हम मुट्ठीभर साहित्यकार और कविगण जीवन भर जागकर मनुष्य के हितों की रक्षा करते हैं। आज की गोष्ठी भी सामाजिक जागरण से कम नहीं। संविधान दिवस जैसे महत्त्वपूर्ण दिवस पर दलेस और नवदलेस ने यह पहला साझा आयोजन किया है। यह कई संदर्भों में बहुत महत्वपूर्ण है। उम्मीद की जाती है की इस तरह के साझा कार्यक्रम आगे भी होते रहेंगे। साझा काव्य गोष्ठी की दूसरी संचालन अंतिमा मोहन ने बाबा साहब के प्रथम वॉल्यूम में दर्ज एच. ड्रुमोंड की कोटेशन ( "जो तर्क नहीं करेगा, वह धर्मांध है, जो तर्क नहीं कर सकता, वह मूर्ख है, जो तर्क नहीं कर सकता, वह दास है।") को कोट करते हुए कहा कि आज संविधान दिवस है। संविधान हमें न सिर्फ मौलिक अधिकार देता है बल्कि अपने अधिकारों के लिया तर्क करना भी सिखाता है। इसलिए आज बड़ा ही ऐतिहासिक दिन है। इस दिन हम सामाजिक दासता से मुक्त होकर लोकतांत्रिक समाज में प्रविष्ट हुए थे। आज हम अपनी बात कह सकते हैं, लिख सकते हैं, गलत के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं, तर्क कर सकते हैं। यह सब बाबा साहब अम्बेडकर के संविधान की ही देन है। उनके द्वारा रचित संविधान भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर में मनुष्य मुक्ति का सबसे बड़ा आधार है। 
काव्य संध्या में कार्तिक चौधरी, रवींद्र पीएस, सिद्धार्थ साहू, हंसराज बड़सीवाल, सुनीता रानी, डा. गीता कृष्णांगी, रवि शाह, मीनाक्षी गौतम, रवींद्र प्रताप सिंह, लक्की चौहान, विद्यार्थी कुमार आदि कवि और साहित्यकार मौजूद रहे। सभी कवियों और उपस्थित साहित्यकारों का धन्यवाद ज्ञापन नदलेस की संरक्षक पुष्पा विवेक ने किया।

- डा. अमित धर्मसिंह
28/11/2021

प्रेस विज्ञप्ति

संविधान दिवस पर दलेस व नवदलेस की साझा काव्य गोष्ठी

दिल्ली। कल दिनांक 26 नवंबर 2021, संविधान दिवस के अवसर पर दलित लेखक संघ व नव दलित लेखक संघ ने साझा काव्य गोष्ठी का आयोजन किया। जिसकी अध्यक्षता संयुक्त रूप से दलेस की अध्यक्ष अनिता भारती और नवदलेस के अध्यक्ष डा. अनिल कुमार ने की। संयुक्त रूप से संचालन डा. अमित धर्मसिंह और अंतिमा मोहन ने किया। गोष्ठी में काव्यपाठ कवियों की क्रमिक उपस्थिति के आधार पर हुआ, जिसमें डा. बिपिन कुमार, प्रियंका सोनकर, प्रियंका साहनी, पुष्पा विवेक, जय फाकिर, प्रदीप कुमार, खन्नाप्रसाद अमीन, चितरंजन गोप लुकाटी, जावेद आलम ख़ान, लहरीराम मीणा, समय सिंह जौल, अशोक कुमार, रवि निर्मला सिंह, अंजली रंगा, बृजपाल सहज, डा. सुरेखा, अंतिमा मोहन और डा. अमित धर्मसिंह आदि कवियों ने काव्यपाठ किया।
अध्यक्ष अनिता भारती ने कहा कि सही मायने में संविधान दिवस को मनाने का यही एक तरीका हो सकता है कि हम लिखने पढ़ने वाले और विविध संगठनों से जुड़े दलित साहित्यकार एक मंच से जुड़े। यदि हम सब आज के दिन भी एक मंच पर नहीं आ सकते तो फिर हमारे एक होने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। उन्होंने संविधान से संबंधित अपनी कविता 'किताब' पढ़ी और संविधान को पुस्तकों में सर्वोपरि बताया। इसके साथ उन्होंने कविता प्रस्तुत करने वाले तमाम कवियों की कविताओं पर सारगर्भित टिप्पणी द्वारा सराहना करते हुए कहा कि इन कविताओं की बदौलत आज की यह गोष्ठी ऐतिहासिक हो गई है। गोष्ठी में वरिष्ठ कवियों से लेकर युवा कवियों की भागीदारी बड़ी गौरवमयी और भविष्य के प्रति आशान्वित करने वाली रही। गोष्ठी के दूसरे अध्यक्ष डा. अनिल कुमार ने कहा कि ये जो हमारी छोटी छोटी कविताएं हैं, छोटी छोटी सृजनात्मकता है, असल में यही बड़े बदलाव का कारण बनती हैं। हम सबको अपनी कलम और अभिव्यक्ति के माध्यम से अपने सामाजिक संघर्ष को आगे बढ़ाना चाहिए। यही हमारे लिए सामाजिक न्याय और समानता का समुचित रास्ता हो सकता है। आज हमें एकजुट होकर काम करने की आवश्कता है। इसलिए सभी को अपने छोटे-छोटे अहम छोड़कर इस सामाजिक लड़ाई में साथ रहना चाहिए। उन्होंने सभी कवियों की कविताओं को बेजोड़ बताया और माना कि ये कविताएं न सिर्फ बहुत कुछ कहती हैं बल्कि बहुत कुछ सिखाती भी हैं।
गोष्ठी का संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने संविधान की प्रस्तवाना पढ़कर शुरू किया। उन्होंने कहा कि हम जो  साहित्यकार और कविगण हैं, असल में हम सामाजिक पहरुए हैं। जिस तरह किसी गांव में, रात के समय एक या दो लोग जागकर पहरा देते हैं, ठीक उसी तरह हम मुट्ठीभर साहित्यकार और कविगण जीवन भर जागकर मनुष्य के हितों की रक्षा करते हैं। आज की गोष्ठी भी सामाजिक जागरण से कम नहीं। संविधान दिवस जैसे महत्त्वपूर्ण दिवस पर दलेस और नवदलेस ने यह पहला साझा आयोजन किया है। यह कई संदर्भों में बहुत महत्वपूर्ण है। उम्मीद की जाती है की इस तरह के साझा कार्यक्रम आगे भी होते रहेंगे। साझा काव्य गोष्ठी की दूसरी संचालन अंतिमा मोहन ने बाबा साहब के प्रथम वॉल्यूम में दर्ज एच. ड्रुमोंड की कोटेशन ( "जो तर्क नहीं करेगा, वह धर्मांध है, जो तर्क नहीं कर सकता, वह मूर्ख है, जो तर्क नहीं कर सकता, वह दास है।") को कोट करते हुए कहा कि आज संविधान दिवस है। संविधान हमें न सिर्फ मौलिक अधिकार देता है बल्कि अपने अधिकारों के लिया तर्क करना भी सिखाता है। इसलिए आज बड़ा ही ऐतिहासिक दिन है। इस दिन हम सामाजिक दासता से मुक्त होकर लोकतांत्रिक समाज में प्रविष्ट हुए थे। आज हम अपनी बात कह सकते हैं, लिख सकते हैं, गलत के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं, तर्क कर सकते हैं। यह सब बाबा साहब अम्बेडकर के संविधान की ही देन है। उनके द्वारा रचित संविधान भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर में मनुष्य मुक्ति का सबसे बड़ा आधार है। 
काव्य संध्या में कार्तिक चौधरी, रवींद्र पीएस, सिद्धार्थ साहू, हंसराज बड़सीवाल, सुनीता रानी, डा. गीता कृष्णांगी, रवि शाह, मीनाक्षी गौतम, रवींद्र प्रताप सिंह, लक्की चौहान, विद्यार्थी कुमार आदि कवि और साहित्यकार मौजूद रहे। सभी कवियों और उपस्थित साहित्यकारों का धन्यवाद ज्ञापन नदलेस की संरक्षक पुष्पा विवेक ने किया।

- डा. अमित धर्मसिंह
27/11/2021











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