दो दलित लेखक संघों को एक कराने हेतु प्रस्ताव पत्र पर ऑनलाइन प्राप्त मत
ऑनलाइन निवेदन
सम्मानित रचनाकर जय भीम!
जैसा कि आपको ज्ञात होगा कि 2019 में दलित लेखक संघ का विघटन होने से दलित लेखक संघ के दो भाग हो गए थे। दोनों के नाम, मोनोग्राम, पत्रिका और वैचारिकी एक जैसी होने से कई तरह के भ्रम पैदा हो गए हैं। दलित साहित्य को सांगठनिक, साहित्यिक व सामाजिक क्षति अलग से पहुंच रही है इसलिए दो दलित लेखक संघों को एक करने के लिए अपीली प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है, जिसमें दोनों दलित लेखक संघों को एक होकर, एक नई कार्यकारिणी का लोकतांत्रिक ढंग से गठन करने का निवेदन किया जा रहा है, जिससे कि दलित लेखक संघ और साहित्य की ऐतिहासिक परंपरा तथा उसकी सांगठनिक, सामाजिक और साहित्यिक शक्ति को बिखरने से बचाया जा सके। कृपया बताएं कि क्या आप इससे सहमत हैं? अपना मत (संभव हो तो विचार सहित) अवश्य दें। सादर...
अध्यक्ष, नदलेस : डा. अनिल कुमार
संरक्षक : नदलेस : डा. पुष्पा विवेक
कार्यवाहक अध्यक्ष, दलित प्रतिनिधि मंडल:
डा. गुलाब सिंह
कार्यवाहक सचिव, दलित प्रतिनिधि मंडल :
डा. अमित धर्मसिंह
सचिव, नदलेस : डा. राम कैन
एवं समस्त नदलेस व दलित प्रतिनिधि मंडल परिवार
दिल्ली
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ऑनलाइन प्राप्त सहमति और विचार
1.
दोनों को एक होना चाहिये - भंवर मेघवंशी
2.
खुशी की बात है, दोनों के एकीकरण से दलित लेखक संघ मजबूत बनेगा, मैं सहमत हूं, एक सुझाव यह है कि हो सके तो हरेक राज्य को कार्यकारीणी में प्रतिनिधित्व दिया जाए - डा. धीरज वणकर अहमदाबाद
3.
दोनों संगठनों का एकीकरण बहुत जरूरी है ! विघटन से साहित्यिक आंदोलन की बड़ी क्षति ही हो रही है !
4.
एक साथ आना ही चाहिए। कुछ असहमतियां हों तो उनपर संवाद करना चाहिए। -आशीष मिश्रा
5.
निश्चित रूप से प्रयास किये जाने चाहिए । -कश्मीर सिंह
6.
सहमत हूँ, आपके साथ हूँ। -हंसराज बडसीवल
7.
जी, मैं सहमत हूँ। -रामनरेश राम
8.
सहमत हूँ। सभी अम्बेडकरवादी संगठनों को एक होना चाहिए। परिस्थितियां लगातार हमारे विपरीत चल रही है, उसका प्रतिरोध एकजुट होकर किया जाना चाहिए। शिक्षा, संघर्ष और संगठन। बाबा साहब का यह त्रि जीवन सूत्र हम सबकी एकता का आधार होना चाहिए। आपने यह सोचकर बहुत अच्छा कदम उठाया है। आपको भी जय भीम। हम एक हैं, एक रहने भी चाहिए।
-मुकेश मिरोठा
9.
जय भीम! बाबा साहेब का रास्ता ही है पढ़लिख कर संगठित होना और अपने अधिकारों और कर्तव्यों को सक्रिय रखकर स्व समाज हित में विरोधी शक्तियों से संघर्ष करना। मतभेदों अथवा स्वार्थ जो भुलाकर एक होना निश्चय ही स्वागतेय कदम होगा। - मुसाफिर बैठा
10.
Subhkamnaye amit bhai. Aap dalit lekhak sangh ko nayi uchaiyo tk le jaye ye meri kamna hai -Umesh Shilpaya
11.
Right sir, Hm shemt h -Rishi Hariyanvi
12.
सादर वंदन जी सभी दलित रचनाकारों को एक मंच पर संगठित होकर साहित्य का प्रचार प्रसार करना चाहिए। अहम को त्याग कर एक दूसरे का सम्मान करें।राष्ट्र व क़ौम व साहित्य के लिए समर्पित रहे। - प्रदीप टांक मायूस
13.
जय भीम सर! पूर्णतः सहमत हूँ, आपके उपरोक्त विचार ही इस सहमति के आधार हैं। -बच्चा लाल उन्मेष
14.
वर्तमान नाजुक परिस्थिति में ऐक्यबद्ध होकर काम करने की जरूरत है। मेरे विचार से जितनी जल्दी हो सके, दोनों का एकीकरण हो। इससे सबकी एवं सभी तरह की भलाई होगी। जय भीम! -चितरंजन गोप लुकाटी
15.
जयभीम। सही विचार है। जरूरी प्रयास किया जाना चाहिए। -डी. के. भास्कर
16.
आज जबकि दलित समाज पर हमले तेज हुए हैं संवैधानिक व्यवस्थाओं, प्रावधानों को नष्ट किया जा रहा है। स्वयं संविधान संकट में है ऐसे में मजबूत एकता की, वास्तविक एकता की बहुत ज़रूरत है। कल जब आपदा के इन दिनों का हिसाब मांगा जाएगा, रचनाकारों को जवाब देना होगा। मैं आपके प्रस्ताव का पुरजोर समर्थन करता हूँ। -बजरंग बिहारी।
17.
जी बिल्कुल सहमत हूँ, एक ही मंच होना चाहिए। -वचन मेघ
18.
आपकी बात उचित है। -हरेप्रकाश उपाध्याय
19.
एक ही होना चाहिए । संगठित रहो। -खन्नाप्रसाद अमीन
20.
अच्छा प्रयास है। सफलता की कामना करता हूँ। -जय प्रकाश कर्दम
21.
Great job, go ahead. Thanks. -Ish Kumar gangania
22.
उद्देश्य और विचार अच्छा है। एक होना सबके हित में है। शुभकामनायें। -राजेश पाल, देहरादून
23.
बिल्कुल एक हो जाना चाहिए। -सुनील कुमार कर्दम
24.
समय की मांग है कि इस मामले का सही समाधान निकाला जाए। नाम की दुविधा से न केवल लोग दिग्भ्रमित हो रहे हैं बल्कि हमारी सांगठनिक एकता और वैचारिकता पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। मुझे लगता है कि थोड़े समय तक रुका जाय।अगले वर्ष दलेस की कार्यकारिणी का चुनाव होना और उसकी बैठक होनी है, उस समय जरूरी हस्तक्षेप किया जा सकता है। वैसे भी दलेस के साथ लोगो की सहानुभूति अधिक है। इस संगठन का ही विस्तार कर और नए लोगों को जोड़कर इस संगठन को मजबूत बनाया जा सकता है और उनकी गतिविधियों पर नज़र रखी जा सकती है और उनका सम्यक मूल्यांकन किया जा सकता है।
-प्रदीप कुमार
25.
जी, हम बिलकुल सहमत है। एक ही लक्ष्य, एक ही विचारधारा तो एक होने में दिक्कत ही क्या है। समाज को संगठित रहने का संदेश देने वाले हम खुद एक मंच पर नहीं बैठ सकते तो समाज कैसे एकजुट होगा। भलाई एक होने में ही है। -रिछपाल विद्रोही
26.
एकता में ही ताकत है बिखराव शक्ति को कम कर देता है इसलिए संगठन की मजबूती के लिए एकत्रित होना ही लाभ दायक है। जय भीम ,नमो बुद्धाए। -पुष्पा विवेक
27.
बिखराव से दलित अस्मिता का संघर्ष कमजोर होगा। मिलकर लड़े इसी में हम सबों की भलाई है।
-अजय यतीश
28.
Bahoot achha prays hai, Sanghtan me hi shakti hai. -Nandlal Ram
29.
एकता में ही बल होता है। जय भीम। -नरेश सागर
30.
आपके लिखने से अंदाज होता है कि इस विभाजन के पीछे कोई सोच या विचार नहीं है। मिला जुलाकर अहम् या व्यवहार का मामला है। इसे बिना लंबा किये जितनी जल्दी हो सलटा लेना चाहिए। -कर्मेंदु शिशिर
31.
दोनों संगठनों का एकीकरण बहुत जरूरी है ! विघटन से साहित्यिक आंदोलन की बड़ी क्षति ही हो रही है ! नवदलेस को उत्तम प्रयास के लिए हार्दिक बधाई ! डा.कुसुम वियोगी
32.
सर, इस तरह का सांगठनिक विघटन होना ही नहीं चाहिए अपने बौद्धिक वर्ग के साथ- साथ सामान्य बहुजन समाज में लेकिन फिर भी ऐसा हुआ । दलित साहित्य के लिए और समाज के लिए इस विघटन का संदेश लगभग इन दोनों संगठनों से जुड़े हुए तथा न जुड़े हुए दोनों ही तरह के लोगों में लगभग नकारात्मक असर पड़ रहा था । इस इन दोनों संगठनों का एक साथ आना बेहद जरूरी है और इस कार्य के लिए आप लोग व्यक्तिगत प्रयास कर रहे हैं इसके लिए मेरे तरफ से आप को बधाई और शुभकामनाएं। मैं पूर्णतः सहमत हूँ। -हरिकेश गौतम
33.
जी बिल्कुल ! यह सही निर्णय है। क्योंकि दो भागों में बंटकर न केवल दलित साहित्य की क्षति हो रही है।बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए यह घातक भी प्रमाणित होगी। उन्हें छाया प्राप्त करने के लिए किसी एक पेड़ का चयन करना होगा ।यह निर्णय करना उनके लिए कठिन होगा कि वे किस पेड़ का चुनाव करेंगे।वर्तमान समय की बात करें तो हम अपनी मांग के लिए दो भागों में बंटकर खड़े होने के बजाय अगर एक साथ खड़े होंगे तो प्रभावकारी होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात कि , अभी दलित साहित्य की जड़े मजबूती से जमी नहीं है। अतः मुख्यधारा में शामिल होने के लिए हमें अपने विचारों और संगठन में एकता बनाए रखनी होगी। दोनों दलित लेखक संघों को एक करने का आपका यह विचार स्वागत योग्य है। -ज्योति पासवान, पश्चिम बंगाल
34.
यह एक जरूरी पहल है, जो बहुत पहले की जानी चाहिए थी। नदलेस द्वारा की गई यह पहल एक नजीर भर है, जिसकी न सिर्फ आज जरूरत है बल्कि भविष्य में भी जरूरत पड़ सकती है। उम्मीद है कि यह पहल सार्थक साबित होगी -गीता कृष्णांगी
35.
शुक्रिया अमित जी...यह एक सराहनीय प्रयास होगा। मैं इसका दिल से समर्थन करता हूँ।
-जितेंद्र विसारिया
36.
सहमत। -संजीव कौशल
37.
जी, सहमत हूं। - सरिता संधू
38.
अच्छी पहल, मंगल कामनाएं । -राजपाल सिंह राजा
39.
सहमत ही नहीं समय आ गया है साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता से हटाने का और बहुजनों के हक अधिकार की लड़ाई को लड़ने के लिए प्रेरित करने का ।यदि ऐसा अलग- अलग डफली बजाई गई तो फिर से पिछड़े,दलितों को मनुस्मृति के युग में साम्प्रदायिक ताकत ढकेल देंगे । मुस्लिम अन्य अल्पसंख्यकों आदिवासियों को भी साथ करना होगा । -आप का साथी महेन्द्र नारायण पंकज राष्ट्रीय महासचिव जन लेखक संघ।
40.
संघ का टूटना बेहद दुखद है । ये कुछ ओछे लोगों की व्यक्तिगत अतिमहत्वाकांक्षाओ का परिणाम है । आज तक हम एक दूसरे को सम्मान नहीं दे पाए। वैसे दलित लेखक संघ को बने दो दशक से ज्यादा हो गए हैं लेकिन आज तक कोई बड़ा आयोजन जिसमें सैकड़ों लोग एक साथ शामिल हुए हों, मुझे याद नहीं । फिर भी, आपका प्रयास सराहनीय है और मैं आपके सद्प्रयासों में आपके साथ हूँ। बेहतर होगा कि हम नई पहचान और सपनों के साथ सबको साथ लेकर एक मजबूत लेखक संघ बनाएं । -सादर सुदेश तनवर
41.
सहमत। आवश्यक कदम। यही दलित चेतना है। -विजय कुमार भारती
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