दो दलित लेखक संघों को एक कराने हेतु मताभियान समिति की दस दिवसीय कार्यवाही में हुई लेखकों से मुलाकात, उनके मत व संक्षिप्त विचार

 दो दलित लेखक संघों को एक कराने हेतु मताभियान समिति की दस दिवसीय कार्यवाही में हुई लेखकों से मुलाकात और उनके मत व संक्षिप्त विचार



मुलाकात - एक

(दिनांक 09/11/2021 को कर्मशील भारती से उनके आवास मुनिरका पर नदलेस की संरक्षक पुष्पा विवेक, उपाध्यक्ष डा. अमित धर्मसिंह, प्रचार सचिव डा. अमित कुमार व एक अन्य साथ रवि प्रकाश की मुलाकात)



दो दलित लेखक संघों को एक कराने हेतु प्रस्ताव पत्र के प्रारूप के संदर्भ में मसौदा समिति के अन्य सदस्यों और प्रतिनिधि मंडल के कुछ सदस्यों के विचार इस प्रकार हैं- 

कर्मशील भारती ने कहा कि नदलेस की यह बहुत अच्छी पहल है। असल में यह पहल आज से बीस साल पहले की जानी चाहिए थी, उस वक्त से दलित लेखक संघ में विघटन की प्रक्रिया जारी होने लगी थी। कई बार दलित लेखक संघ में बहुत से विवाद खड़े हुए जिनकी वजह से अच्छे पढ़ने लिखने वाले लोग लगातार हाशिए पर जाते रहे। कुछेक जुगड़बाज दलित लेखक संघ में पद और प्रतिष्ठा हथियाते चले गए। मुझे यह देखकर अपार खुशी हो रही है कि आज युवा पीढ़ी दलित साहित्य और आंदोलन की कमान संभालने के लिए आगे आ रही है। दो दलित लेखक संघों को एक करने का बीड़ा जो इसने उठाया है, उससे लगता है कि दलित साहित्य और आंदोलन का भविष्य अब सुरक्षित हाथों में पहुंच रहा है। काश कि यह सब पहले किया जाता तो आज हमारे सामने दलित युवा बेरोजगारों की लंबी कतार न होती। दलित साहित्य और समाज को सिर्फ बाहर से ही नहीं अपितु भीतरघातियों से भी बड़ा नुकसान पहुंचा है और लगातार पहुंच रहा है इसलिए ऐसे लोगों को बेनकाब किया जाना जरूरी है। ऐसे लोग समाज में कहलाते तो दलित समाज के प्रतिनिधि हैं लेकिन दलित समाज का सबसे ज्यादा नुकसान यही लोग करते हैं। ऐसे लोग केवल अपना हित साधने जितनी ही मशक्कत करते हैं बाकी दलित साहित्य समाज और आंदोलन से उन्हें कोई लेना देना नहीं होता है। अब वक्त आ गया है कि ऐसे लोगों को चिह्नित कर उनका साहित्यिक और सांगठनिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। दलित शब्द पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा की दलित शब्द ही एक ऐसा शब्द है जो शोषित सभी जातियों को एकता के सूत्र में पिरोए रख सकता है। दलित शब्द किसी एक जाति का नहीं अपितु शोषित जातियों के साथ साथ शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। इस शब्द में न सिर्फ अनुसूचित जातियां बल्कि पिछड़ा वर्ग के शोषित तबके का समावेश भी हो जाता है। कुछ इसी तरह का उद्देश्य दलित आंदोलन और साहित्य अपने आरंभ में लेकर चला था। बाद में साहित्यकारों के आपसी स्वार्थ और मतभेदों से यह उद्देश्य कहीं पिछड़ता और बिखरता चला गया। अब मूल की तरफ फिर से लौटना होगा और दलित आंदोलन की ऐतिहासिक परंपरा तथा धरोहर को सहेजकर आगे बढ़ना होगा। आगे से ऐसा न हो इसके लिए दलित प्रतिनिधि मंडल का होना जरूरी है जो समय समय पर दलित मूवमेंट को बिखरने से बचा सके। मैं दलित प्रतिनिधि मंडल और नदलेस की इस सार्थक और अति महत्त्वपूर्ण पहल के साथ हूं।
















   
मुलाकात - दो
(दिनांक 11/11/2021 को रोहिणी सेक्टर 21 में श्रीलाल बौद्ध, शीलप्रीय बौद्ध से बिसंबर दयाल से नदलेस के उपाध्यक्ष डा. अमित धर्मसिंह की मुलाकात)

शीलप्रिय बौद्ध ने संवाद के दौरान कहा कि यद्यपि मैं किसी भी दलित लेखक संघ आदि का कभी सदस्य नहीं रहा लेकिन आपने जो अभी बताया उससे लगता है कि यह मुहिम बहुत जरूरी है। संगठनों की यही बड़ी समस्या है कि उसमें पदलोलुप कुछ लोग केवल अपनी मनमानियां करने लगते हैं और अच्छे लोग पीछे धकेल दिए जाते हैं, इससे विचार और आंदोलन दोनों को नुकसान पहुंचता है। यदि ऐसे लोग संगठनों से जुडें जिन्हें किसी के भी पद पर बने रहने या न रहने से कोई फर्क न पड़ता हो तो ही कोई संगठन अपने उद्देश्य की तरफ बढ़ सकता है, लेकिन ऐसा होता नहीं है। ऐसे हालात में संगठनों से जुड़ना और काम करना समय की बरबादी के अलावा कुछ नहीं रह जाता। मैं स्वयं इसलिए ही संगठनों से नहीं जुड़ा कि उनमें बेमतलब की जुगड़बाजियां होने लगती हैं, इससे सही मायने में पढ़ने लिखने वाले लोगों का अहित ही होता है। सही लोग संगठनों से बचने लगते हैं और मुट्ठी भर लोग संगठनों में रह जाते हैं। इस सबसे निपटने के लिए दो दलित लेखक संघों को एक कराने की मुहिम अच्छी पहल है, इसमें तो कोई शक नहीं और न ही इससे असहमत हुआ जा सकता है। श्रीलाल बौद्ध ने माना कि यह मुहिम चलाना बहुत जरूरी है और यह केवल दो दलित लेखक संघों को एक करने के लिए ही नहीं बल्कि और संगठनों में भी चलाई जानी चाहिए। ऐसा करने से वे लोग जो संगठनों को अपने घर की बपौती समझते हैं, बेनकाब होंगे। संगठन और आंदोलन को इन लोगों से आज बहुत बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है, जिसका समाधान खोजना ही होगा। इस संदर्भ में प्रस्ताव पत्र का जो प्रारूप नदलेस की पहल पर प्रस्तुत हुआ है, यह बहुत कारगर उपाय साबित होगा। इससे हमारी सामाजिक, सांगठनिक और प्रतिबद्धता का मूल्यांकन भी हो सकेगा और भटके हुए लोग भी रास्ते पर लाए जा सकेंगे। बिसंंबर दयाल ने कहा कि संगठनों में जमे बैठे मठाधीशों को सबक मिलना ही चाहिए। छद्म अंबेडकर वादियों ने दलित समाज का बहुत नुकसान किया है और लगातार कर रहे हैं। इसलिए उन्हें बेनकाब करना और रास्ते पर लाना बेहद जरूरी है। यह मुहिम सार्थक और बहुत जरूरी है। इस तरह की कार्यवाही जब तक बड़े स्तर से नहीं होगी,तब तक ये मुठ्ठी भर स्वार्थी लोग दलित समाज और साहित्य को ऐसे ही नुकसान पहुंचाते रहेंगे।






मुलाकात - तीन
(राजेंद्र कुमार राज जी से उनके आवास आर 429 मंगोलपुरी में नदलेस के उपाध्यक्ष डा. अमित धर्मसिंह की मुलाकात)

हीरालाल राजस्थानी वाले दलित लेखक संघ में महासचिव रह चुके राजेंद्र कुमार राज़ ने बताया कि हीरालाल राजस्थानी और मैं बहुत समय से मित्र रहे हैं। इसी मित्रता के नाते हीरालाल राजस्थानी ने उनसे दलेस से जुड़ने और महासचिव बनाने को कहा। मैंने इस संदर्भ स्पष्ट कहा कि भाई मैं तो इस बारे में कुछ नहीं जानता हूं। उन्होंने मित्रवत दबाव बनाया और इसी नाते मैं महासचिव बन गया। मैंने उनसे पूछा कि आखिर मुझे करना क्या होगा? तो उन्होंने कहा कि कुछ नहीं बस अध्यक्ष का कहा मानना होगा, यानी जो कुछ अध्यक्ष जी कहेंगे आपको वही करना होगा। मैंने कहा ठीक है। बाद में जब मैं अध्यक्ष के अनुसार कार्य करने लगा तो उन्हें यह बात अखरने लगी। उन्हें लगा कि उनकी अनदेखी हो रही है, क्योंकि संरक्षक होने के नाते वे चाहते थे कि दलेस में सबकुछ उनके हिसाब से चले। यहां तक कि अध्यक्ष भी उन्हीं के हिसाब से चले। मेरे लिए यह संभव न था क्योंकि मुझे अध्यक्ष से हिसाब से चलने के लिए कहा गया था। बात बढ़ गई और हीरालाल राजस्थानी ने मेरे और अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। सभी सदस्यों को फोन कर करके हमारे खिलाफ भड़काया। हालात यह हो गए कि मुझे और अध्यक्ष पूनम तुषामड को दलेस छोड़ना पड़ा। ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। हमसे पहले भी कई लोग हीरालाल राजसथानी की मनमानियों के चलते दलेस छोड़ चुके थे और सुनने में आया कि हमारे बाद भी कई अच्छे पढ़ने लिखने वाले लोग दलेस छोड़ चुके हैं। आप ( डा. अमित धर्मसिंह) भी उन्हीं में से एक हैं। हीरालाल राजस्थानी की यह सबसे बड़ी बीमारी है की वे चाहते हैं कि दलेस में सबकुछ उन्हीं के अनुसार चले। सारे पदाधिकारी एक कदम भी उनके बगैर न चले। संरक्षक पद उन्होंने अपने लिए खुद ही बनाया, जबकि दलेस के संविधान में संरक्षक पद की कोई व्यवस्था नहीं है और न ही संरक्षक कोई सक्रिय पद होता है। फिर भी वे चलाते बस अपनी ही है, मानों तो ठीक, नहीं तो निकलो दलेस से बाहर। यह स्वभाव उनकी अब बहुत बड़ी कमजोरी बल्कि यह कहिए कि बीमारी बन चुका है जिससे अब वे चाहे भी तो मुक्त नहीं हो सकते हैं। हम लोगों के साथ जब यह सबकुछ घटा तो हम तो केवल इसलिए चुप बैठ गए थे कि इससे अपने ही समाज और संगठन की बदनामी होगी। कुछ मित्रता का भी दबाव था, लेकिन आज नदलेस जो कर रहा है, यह होना चाहिए। आज यह होना बहुत जरूरी हो गया है।



मुलाकात - चार
(जगदीश पंकज जी से उनके आवास पर नदलेस के उपाध्यक्ष डा. अमित धर्मसिंह और नदलेस के प्रचार सचिव डा. अमित की मुलाकात, 12/11/2021)

दो दलित लेखक संघों को एक कराने के प्रस्ताव पत्र के संदर्भ में जगदीश पंकज ने गंभीरतापूर्वक विचार रखते हुए कहा कि यह प्रस्ताव पत्र बिलकुल ठीक है। दोनों दलित लेखक संघों को एक किया ही जाना चाहिए। दोनों संगठनों में मनमानी की व्यवस्था चल रही है। दलित साहित्य की नयी पीढ़ी के लिए ये लोग बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर रहे हैं। मैंने दलेस को 2013 में ज्वाइन किया था और उसी समय से देखता आया हूं कि अनीता भारती अपनी मनमानी करती हैं और हीरालाल राजस्थानी अपनी मनमानी करते हैं। इस तरह से संगठनों को नहीं चलाया जा सकता। हीरालाल राजस्थानी और अनीता भारती को एकजुट होना चाहिए। इस संदर्भ में बिलकुल सही प्रस्ताव पत्र तैयार किया गया है। दोनों दलित लेखक संघों को एक करने का यह महत्त्वपूर्ण कार्य अवश्य किया जाना चाहिए। उन्होंने वामपंथियों को दलितों का स्वाभाविक मित्र बताते हुए कहा कि बाबा साहब की विचारधारा है कि समतामूलक समाज की स्थापना हो, परंतु हमारे बहुत से दलित साथी वामपंथियों को दलितों से अलग रखने के पक्ष में हैं, इससे हमारी एकजुटता, संख्या बल और सामूहिक शक्ति को ठेस पहुंच रही है। आज वामपंथियों को साथ लेकर चलने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी मांग की कि हमें एकजुट होते हुए अन्य दलों को अपने भी अपने साथ मिलाकर एकजुट करने का प्रयास करना चाहिए जिससे हमारा दलित मूवमेंट और आगे जा सके।उन्होंने दोनों दलित लेखक संघों पर यह आरोप लगाया कि इनकी मनमानियों और इनके द्वारा वामपंथियों को एक तरफ करने के कारण ही दलित मूवमेंट कमजोर है।इस प्रकार उन्होने दोनों संगठनों की आपसी मनमानियों और वामपन्थियों से दलितों की दूरी को दलित मूवमेंट की कमजोरी बताया। उन्होंने कहा कि इसके लिए नदलेस को यह कार्य भी करना चाहिए कि जो वरिष्ठ दलित साथी किन्हीं कारणों से दोनों दलित लेखक संघों से अलग थलग पड़े हुए हैं। यानी जिन्होंने संघ की आपसी समस्याओं और मनमानियों के चलते दलेस को छोड़ दिया था, उन्हें फिर से जोड़ना चाहिए। यदि वे दलित लेखक संघ से न जुड़ना चाहे तो उन्हें पत्र लिखकर नदलेस से जुड़ने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए। इससे दलेस न सही तो कम से कम नदलेस तो मजबूत होगा। अंत में उन्होंने नदलेस के उपाध्यक्ष और प्रचार सचिव के आग्रह पर हाल ही में रचे अपने दो नवगीत सुनाकर दलितों की पीड़ा को स्वर दिया।










मुलाकात - पांच
(दिल्ली यूनिवर्सिटी की आर्ट फैकल्टी के नॉर्थ कैंपस में डा. टेकचंद जी से नदलेस के उपाध्यक्ष डा. अमित धर्मसिंह और सदस्य डा. गीता कृष्णांगी ने मुलाकात की। 13/11/2021)

डा. टेकचंद ने कहा कि हम मुट्ठी भर तो दलित साहित्यकार एक्टिविस्ट हैं, उसमें भी हम अलग थलग बिखरे पड़े हैं। हमें एकजुट होना ही चाहिए। मैं तो शुरू से ही दोनों दलित लेखक संघों के एक होने के पक्ष में रहा हूं। उन्हें फिर से एकजुट होकर कार्य करना चाहिए। पदों पर अकड़ दिखाते रहने से कुछ हाथ नहीं आने वाला है। प्रस्ताव पत्र में दिए गए सुझाव ठीक हैं। इसके माध्यम से दोनों दलित लेखक संघों को फिर से एक हो ही जाना चाहिए। मेरी इसी संदर्भ में शुरू से सहमति रही है और आज भी है। मुलाकात में नदलेस के उपाध्यक्ष डा. अमित धर्मसिंह ने डा. टेकचंद को तीन पुस्तकें कोरोना काल में दलित कविता, खेल जो हमने खेले और स्मारिका दलेस सादर भेंट की।









मुलाकात - छह

दो संघटनों की एक जैसी पहचान वाली दलित लेखक संघों की ज्वलंत समस्या को लेकर डा. कुसुम वियोगी ने कहा कि यह समस्या वर्तमान और भविष्य के लिए खतरे की घंटी की तरह है। हर दलित आदमी अपने नाम के आगे सामाजिक कार्यकर्ता तो लिखता है लेकिन उसका सामाजिक कार्य एक नहीं है। यही कारण है कि किसी आज सात सात संगठनों वाले कार्यक्रमों में भी बीस पच्चीस से अधिक लोग उपस्थित नहीं हो पाते हैं। विदित होगा कि दलेस के प्रमुख संस्थापक सदस्यों में मैं भी रहा हूं और 15 अगस्त 1997 को दलेस का गठन मेरे ही घर पर हुआ था। उस समय जलेस और प्रलेस चल रहे थे तो हमने सोचा कि हमारा दलेस क्यों नहीं हो सकता! आज उसी संगठन के दो भागों में विभाजित होने से मैं आहत हूं। दलित शब्द एक छतरी की तरह है । हर कोई इस छतरी के नीचे आ सकता है, चाहे वह सामाजिक रूप से प्रताड़ित हो या आथिर्क रूप से या नैतिक रूप से। दलित लेखक संघ को फिर से एक होकर बाबा साहब द्वारा प्रणीत बुद्धिज्म को स्वीकार करने की जरूरत है। दलितों की तीसरी पीढ़ी आ चुकी है और इसके अलग मूल्य हैं। हमें अब पुराने साहित्य से अलग हटकर ज्वलंत और व्यवहारिक समस्याओं पर अपनी वैचारिकी को गढ़ने की आवश्यकता है। इस अपील के आधार की बाबत कुसुम वियोगी ने कहा कि इस अपील का आधार एक नहीं तीन तीन आधार हैं। यानी इस मुहिम के आधार सामाजिक, नैतिक और साहित्यिक हैं। कई लोगों की पदलोलुपता संगठनों को सही कार्य नहीं करने देती। इसलिए यह मुहिम और इस तरह की मुहिम चलाना आज बेहद जरूरी है। वरना हम भीतर भीतर न सिर्फ सांगठनिक ढंग से बंट रहे हैं बल्कि हमारा जातीय विभाजन भी एक बड़ी समस्या बनकर उभर रहा है। अतः न सिर्फ दो दलित लेखक संघों को एक होने की जरूरत है बल्कि हमारे सभी संगठनों को एकजुट रहने की भी महती आवश्यकता है।





मुलाकात - सात


राजीव चौक स्थित आई आर सी ए के ऑफिस में हुई मुलाकात में शीलबोधि ने बताया कि वे करीब 1999 में जुड़ गए थे। उस समय दलेस में कोई अध्यक्षीय बॉडी नहीं थीं। ऐसे ही किसी पार्क आदि में गोष्ठी आदि हो जाया करती थी। बड़ा अपनापन था उस समय सभी लोगो में। किसी भी प्रकार के जातीय अथवा वरिष्ठता कनिष्ठता के भेदभाव नहीं थे। परंतु बाद में जब अध्यक्षीय बॉडी बनी तो तमाम तरह के गणित भिड़ाए जाने लगे। एक दूसरे से सहमतियां असहमतियां बनने लगी। कई बार कई तरह के विवाद खड़े हुए, बावजूद इसके कभी ऐसा विघटन दलित लेखक संघ का कभी नहीं हुआ जैसा कि आज देखने को मिल रहा है। यह विघटन सिर्फ सांगठनिक ही नहीं बल्कि आपस में छोटी छोटी जातियों में बंट जाने वाला विघटन भी है। मैं जब दलेस की पत्रिका का संपादक था तब मेरे साथ भी यही समस्या पेश आई। मैंने प्रतिबद्ध को अपने संपादकीय विवेक के आधार पर संपादित करना चाहा लेकिन हीरालाल जी को यह सब मंजूर नहीं था इसलिए उन्होंने मुझ पर जातिवादी होने जैसे आरोप मढ़े। जिसका मैंने सार्वजनिक खुलासा भी किया था। किंतु हालात सुधरने के बजाय और अधिक बिगड़े इसलिए मैंने दलेस से दूर हो जाना ही उचित समझा। आज जो दो दो दलित लेखक संघ चल रहे हैं, वे सिर्फ मजाक के विषय ही नहीं बनाएं जा रहे बल्कि उनका कोई रचनात्मक पक्ष भी सामने नहीं आ रहा है। कार्यक्रमों के नाम पर दोनों अपने अपने परिचितों के व्याख्यान अथवा कविता पाठ आदि करवाते रहते हैं। इससे न दलित साहित्य का कुछ भला होने वाला है और न ही दलित समाज का। इस विषय में हम सबको सोचना चाहिए। मुझे यह देखकर खुशी हो रही है कि दलेस को फिर से एक करने की बेहद जरूरी मुहिम चलाई रही है। नदलेस का यह कार्य बहुत ही सराहनीय है। मैं हर तरह से इस मुहिम के साथ हूं। उम्मीद है फिर से सब एक मंच पर आ सकेंगे।






मुलाक़ात आठ
पूनम तुषामड से उनके आवास पर हुई मुलाकात में उन्होंने कहा कि मैं 2009 में दलित लेखक संघ से जुड़ी थी। उस समय विमल थोराट अध्यक्ष थी। उनके कार्यकाल में दलित लेखक संघ कुछ खास एक्टिव नहीं था। छोटे मोटे मतभेद भी चलते रहते थे। बाद के कुछ वर्षों में, मैं अध्यापन हेतु मास्को चली गई। तीन वर्षों उपरांत लौटी तो फिर से दलित लेखक संघ से जुड़ी। रजनी तिलक की अध्यक्षता में सचिव बनी। कार्यकाल औसत रहा। इसके बाद कर्मशील भारती और हीरालाल राजस्थानी की जोड़ी उलटने पलटने लगी, इससे कई सदस्य और अनीता भारती काफी परेशान थी। वह बहुत पहले से चाहती थी कि उसे दलित लेखक संघ का कोई खास पद दिया जाए। यानी अध्यक्ष आदि बनाया जाए। मगर उक्त दोनों की जोड़ियों से यह संभव नहीं हो पा रहा था। नतीजा यह निकला कि 2019 में अनिता भारती ने कुछ साथियों के साथ मिलकर अचानक दलित लेखक संघ की अध्यक्ष होने की प्रेस विज्ञप्ति रिलीज कर दी। जिसके लिए हीरालाल राजस्थानी सहित हम सबने उन्हें रोका, मगर वह नहीं मानी। मजबूरन हमें अलग से दलित लेखक संघ की नवीं कार्यकारिणी गठित करनी पड़ी। जिसमें मुझे अध्यक्ष और राजेंद्र कुमार को महासचिव बनाया गया। हीरालाल राजस्थानी अपने लिए गैर संविधानिक पद होते हुए भी संरक्षक बना लिया। यहां तक तो बात ठीक थी लेकिन बाद में हीरालाल राजस्थानी ने पूरी कार्यकारिणी और दलित लेखक संघ को अनावश्यक रूप से नियंत्रण करना शुरू कर दिया। वह एक तरह से सबको डिक्टेट करने लगे। उनका यह व्यवहार मुझे और राजेंद्र कुमार राज को रास नहीं आया और हमें संबंधित दलित लेखक संघ छोड़ना पड़ा। सुनने में आया कि उनका यह व्यवहार हमारे बाद भी जारी रहा और जिसके चलते अन्य कई सदस्यों को भी दलित लेखक संघ छोड़ना पड़ा। कुछ लोगों की महत्त्वाकांक्षाओं के चलते हमने दलित लेखक संघ की नवीं कार्यकारिणी गठित की थी मगर व्यक्ति विशेष की वही महत्त्वकांक्षाएं यहां भी आड़े आई। इस वक्त जबकि दोनों दलित लेखक संघ बुरी तरह से ध्वस्त हो चुके हैं, उनको फिर से संगठित करने का यह प्रयास बहुत ही सराहनीय और सार्थक है। मेरी इसमें पूरी सहमति है।






मुलाकात नौ 

सुदेश कुमार तनवर से उनके ऑफिस आईआरसीए में हुई मुलाकात में उन्होंने कहा कि वे दलित लेखक संघ से 1998 में ही जुड़ गए थे और करीब 2008 तक काफी सक्रिय रहे। उस समय तक दलित लेखक संघ में काफी काम हुए। 2004 में तो जेएनयू में इतना बड़ा महासम्मेलन हुआ कि वहां का हॉल खचाखच भर गया था। बाद में लोगों में पदों को लेकर मतभेद बढ़ने लगे। कोई किसी का पक्ष लेता तो कोई किसी का। पार्क में जो बैठकर आराम से चुनाव कर लिए जाते थे, वे बाद के वर्षों में संभव नहीं हुए। लोगों की महत्तवाक्षाएं और आग्रह इतने बढ़ गए कि चाहकर भी दलित लेखक संघ में पहले जैसा माहौल न बनाया जा सका। वे लोग भी जिनकी न वैचारिकी क्लियर थी और न विजन, वे भी जबरन पदों पर आसीन होने लगे। और, एक बार जो पद पर आसीन हो गया, वह फिर उसे छोड़ना ही न चाहता था। ऐसे में संघ तो बिखरना ही था, साथ ही लोगों में भी अलगाव पैदा हुआ। जितनी एनर्जी हम दूसरों की चरण वंदना में लगाते हैं, उतनी एनर्जी और समय हमने अपने संघ और लोगों पर कभी खर्च नहीं की। कई लोग तो अपना एनजीओ चलाते थे, ऐसे लोग भी वक्त तो अपने एनजीओ को देते थे और पद दलित लेखक संघ में बनाएं रखना चाहते थे। नतीजा यह निकला कि हम सब एक दूसरे से अलग होते चले गए। बहुत बार मैंने और दूसरे कुछेक सदस्यों ने मिल बैठकर बात करके एक होने की कोशिश की, लेकिन लोगों का आग्रह और अहंकार इतना ज्यादा था कि अपने सामने वे किसी को कुछ समझते ही नहीं थे। आज तो स्थिति और भी बद से बदतर हो गई है। हराकर मैं तो अंबेडकर लेखक संघ से जुड़ गया था, लेकिन वहां भी वही निष्क्रियता और आग्रह उत्पन्न हो गए हैं। यह काफी दुखद है कि अपने संगठनों को देने के लिए न तो लोगों के पास समय है और न ही वे कुछ खर्चना चाहते हैं। ऐसे में कैसे दलित साहित्य और दलित संगठनों का भला हो पाएगा? इसलिए आप जो प्रयास कर रहे हैं, यह बहुत अच्छा है। देख लीजिए यदि वे दोनों फिर से एक हो सके तो बहुत बढ़िया है, वरना फिर नव दलेस को ही मजबूत करना।





















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