दो दलित लेखक संघों को लेकर मसौदा समिति का गठन और प्रस्ताव पत्र का प्रारूप
दो दलित लेखक संघों को लेकर मसौदा समिति का गठन और प्रस्ताव पत्र का प्रारूप
नदलेस की पहल पर दो दलित लेखक संघों को एक करने के उद्देश्य से मसौदा समिति के गठन हेतु जैपनीज पार्क, रोहिणी वेस्ट, दिल्ली में एक मीटिंग का आयोजन किया गया। मीटिंग की अध्यक्षता डा. गुलाब ने की और संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। सर्वप्रथम मसौदा समिति का गठन किया गया, जिसके सदस्य डा. गुलाब सिंह, डा. अमित धर्मसिंह, पुष्पा विवेक, सत्यप्रकाश नारायण, डा. अमित कुमार, डा. अनिल कुमार, डा. कुसुम वियोगी, श्रीलाल बौद्ध, राजेंद्र कुमार राज, कर्मशील भारती, डा. टेकचंद, जावेद आलम और अशोक कुमार बनाए गए। सर्वप्रथम डा. अमित धर्मसिंह ने प्रस्ताव पत्र के मसौदे का प्राथमिक रूप प्रस्तुत किया, जिसको गंभीरतापूर्वक सुनने के बाद मसौदा समिति के उपस्थित सदस्यों ने अपने विचार कुछ इस प्रकार रखें।
मसौदा समिति के कार्यकारी अध्यक्ष डा. गुलाब सिंह ने दलित साहित्य की ऐतिहासिक विस्तृत भूमिका बांधते हुए कहा कि असल में दलित साहित्य बहुत से चरणों से होते हुए यहां तक पहुंच पाया है, जिसमें किसी एक का नहीं अपितु बहुत से रचनाकारों, साहित्यकारों और एक्टिविस्टों का प्रत्यक्ष योगदान रहा है, जिनकी ऐतिहासिक परंपरा और साहित्यिक व सामाजिक अवदान की अवहेलना करना सरासर गलत है; क्योंकि अभी भी दलित साहित्य अपने उस मुकाम पर नहीं पहुंच सका है जिसके लिए दलित साहित्यकारों ने इतना बड़ा मूवमेंट खड़ा किया और इतना संघर्ष किया। आज दलित शब्द और साहित्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकारा जा चुका है। मुख्य धारा आज दलित साहित्य के प्रभाव से बुरी तरह त्रस्त है। वह आज तक भी दलित साहित्य को स्वीकारने में नाक भौं सिकोड़ती है। जैसे कि नामवर ने कहा था कि घोड़े पर लिखने के लिए घोड़ा होना जरूरी नहीं लेकिन दलित साहित्य के जागरूक साहित्यकारों ने ऐसी तमाम मान्यताओं को सिरे खारिज किया और बताया कि अपना वास्तविक दर्द तो दिनभर टांगें में जोते जाने वाला घोड़ा ही बता सकता है। इस तरह तमाम उतार चढ़ाव के बाद दलित साहित्य आज विस्तृत कैनवस पर अपनी उपस्थिति दर्ज किए हुए है, मगर खेद का विषय है कि आज दलित साहित्य जोकि आज सामाजिक न्याय और परिवर्तन का परिचायक बन गया है, को कुछ दलित साहित्यकार अपनी महत्वाकांक्षाओं से क्षति पहुंचा रहे हैं। देखने में आ रहा है कि कई तो ऐसे भी दलित साहित्यकार हैं जो दलित शब्द तक को अस्वीकार करते हैं। दलित साहित्य और शब्द के स्वीकार में उनका स्टेट्स सिंबल आड़े आता है। वे दलित साहित्य को विस्तृत कैनवस पर एक वर्ग और उस के स्वाभिमान का पर्याय नहीं अपितु हीनता का बोध का पर्याय मानते हैं। यह उनकी व्यक्तिगत कुंठाओं के अतिरिक्त कुछ नहीं। यह भी देखने में आ रहा है कि कुछ साहित्यकारों ने दो-दो, चार-चार दोस्तों और परिचितों को साथ लेकर दलित लेखक संघ के दो टुकड़े कर दिए हैं जिससे दलित साहित्य और मूवमेंट दोनों को भारी क्षति पहुंच रही है, इससे निपटने के लिए यह पहल सराहनीय ही नहीं अपितु बेहद महत्त्वपूर्ण और अनिवार्य पहल है। संबंधित दोनों दलित लेखक संघ के जिम्मेदार पदाधिकारियों को इस पर ध्यान देना चाहिए। उनके ध्यान देने के लिए मसौदा समिति द्वारा तैयार प्रस्ताव पत्र एक सुचिंतित और समुचित रास्ता हो सकता है।
पुष्पा विवेक ने संबंधित विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज देश में जो हालात बन रहे हैं, उनसे निरंतर दलितों के हित प्रभावित हो रहे हैं। आज न सिर्फ हमारे संवैधानिक मौलिक अधिकार खतरे में हैं बल्कि आरक्षण और संविधान तक खतरे में हैं इसलिए दलित जागरण और जागृति अति आवश्यक है। दलित जागरण से ही देश में दलित और उनके अधिकार तथा सम्मान सुरक्षित रह सकेगा। आज यह देखते हुए गहरे दुख की अनुभूति होती है कि कहां तो हमें इस विकट समय में एक होना चाहिए और कहां हम छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट रहे हैं; इससे तो दलित और दलित साहित्य का विरोध करने वालों को ही फायदा पहुंच रहा है। हमें अपने तमाम निजी हितों और आपसी मतभेदों को दरकिनार करके एक मंच पर आकर अपनी सामाजिक और साहित्यिक मुहिम को आगे ले जाना चाहिए। दो दलित लेखक संघों को एक करने का यह कदम न सिर्फ महत्त्वपूर्ण है बल्कि आज के समय की चुनौतियों को देखते हुए बहुत जरूरी भी है। दोनों दलित लेखक संघों को मसौदा समिति के प्रस्ताव को स्वीकार कर, उस पर जल्द से जल्द अमल करना चाहिए ताकि समाज में दलित साहित्य और सामूहिक संघर्ष को बिखरने से बचाया जा सके।
सत्यनारण जी ने विस्तार से अपने विचार रखते हुए कहा कि मैं दो दलित लेखक संघों के एक करने के पक्ष में शुरू से रहा हूं; क्योंकि विघटन एक बड़ी त्रासदी होती है इसलिए यह नहीं होना चाहिए। मैं स्वयं दो दलित लेखक संघों में से एक से जुड़ा भी रहा हूं लेकिन उसकी कार्यप्रणाली से पूरी तरह असंतुष्ट रहा हूं। संगठन में कुछ लोगों की मनमानियों को देखते हुए लगता है कि दोनों दलित लेखक संघों को एक होना ही चाहिए अथवा नए सिरे से नदलेस जैसे नए संगठन को मजबूत करना चाहिए। यद्यपि इससे पहले भी विघटन होते रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। नए गठन पहले भी हुए और आगे भी होंगे लेकिन एक जैसे नाम और वैचारिकी वालें दो संगठनों का होना ज़रा चौकाने वाला है। इस तरह का विघटन किसी भी स्तर से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है। माना कि तमाम तरह के संगठनों में असहमतियां होती हैं, मतभेद होते हैं लेकिन इस आधार पर एक ही संगठन के, एक ही नाम वाले दो संगठन बन जाना गैर जरूरी है। आप देखिए कि संगठन तो क्या एक ही परिवार के किन्हीं दो सदस्यों में असहमतियां होती हैं लेकिन उनके आधार पर वह परिवार इस तरह से अलग नहीं होता जैसे कि आज दलित लेखक संघ हुआ है। इसलिए दोनों दलित लेखक संघों को इस ओर गंभीरता से विचार करना चाहिए। हमारी गलत नीतियों के चलते ही आज हम छोटी-छोटी संख्याओं में बंटकर रह गए हैं। हमारी ये छोटी-छोटी संख्याएं आपस में मिल जाए तो एक बड़ी संख्या में बदल सकती हैं। हम सभी को अपने-अपने निजी हित छोड़कर सांगठनिक शक्ति को मजबूत करना चाहिए। दोनों दलित लेखक संघ को तो कम से कम एक होना ही चाहिए। यदि वे एक नहीं हो सकते तो नदलेस को मजबूत कर सकते हैं। यानी, यदि दोनों दलित लेखक संघ आपस में नहीं मिलना चाहते तो वे स्वेच्छा से नदलेस में मिल जाए। इस संदर्भ में हम सब सार्थक पहल कर सकते हैं। हमें समझना होगा कि लेखन का संबंध विचार से है और विचार का संबंध सामाजिक एकता और सामूहिक चेतना से; इसलिए हमें किसी एक मंच पर आना ही चाहिए। नए सिरे से नदलेस इसका बेहतर विकल्प हो सकता है।
डा. अमित कुमार ने कहा कि एक नाम के दो संगठन की एकरूपता न तो किसी तरह उचित है और न ही स्वीकार्य है। दोनों दलित लेखक संघ को फिर से एक होना चाहिए। यही दलित समाज और दलित साहित्य के लिए अच्छा है। यदि वे ऐसा न कर सके तो उन्हें कम से कम इतना तो करना ही चाहिए कि अपने नाम बदल लेने चाहिए। जैसा कि डा. अमित धर्मसिंह ने शुरू में ही कहा था कि नामों में भले ही नुक्ते भर का ही सही, फर्क कर लेना चाहिए, ताकि दोनों को आसानी से पहचाना जा सके। यह तो सबको पता ही है कि किसी भी संगठन को मजबूत करने के लिए अपने स्वार्थों को त्यागना पड़ता है, पद का लालच छोड़ना पड़ता है। तब कहीं जाकर कोई संगठन अपने उद्देश्य के पथ पर अग्रसर हो पाता है; लेकिन जहां इसके विपरीत कार्य किए जाते हैं वहां सांगठनिक पतन लाजिमी है। दोनों दलित लेखक संघों के साथ भी आज कुछ ऐसा ही हो रहा है। दोनों दलित लेखक संघों को इस ओर गंभीर संज्ञान लेना चाहिए; जिसके लिए प्रस्तुत प्रस्ताव से बढ़िया विकल्प दूसरा कोई नहीं हो सकता है।
डा. अमित धर्मसिंह ने दो दलित लेखक संघों के होने से आने वाली साहित्यिक व सामाजिक समस्याओं को विस्तार से रखते हुए कहा कि यह एक जेनुइन समस्या है, जिसको देखते हुए नदलेस ने 'दो समानांतर दलित लेखक संघों के होने से स्वीकारता के संकट' विषय पर 27 अक्टूबर 2021 को ऑनलाइन वेबीनार रखा था। सभी वक्ताओं ने दो समानांतर दलित लेखक संघों का होना गलत ठहराया। उसी के आधार पर प्रस्ताव पत्र का मसौदा तैयार करने की कोशिश गई है। सर्वविदित है कि एक परिवार में, एक ही नाम के दो प्राणी नहीं होते। यदि एक नाम के दो व्यक्ति होते भी हैं तो उनकी वल्दीयत अलग-अलग होती है। उनकी पारिवारिक अथवा सामाजिक पृष्टभूमि अलग होती है। यह भी कि परिवारों के विभाजन भी होते हैं तो दोनों परिवारों की अपनी एक स्वतंत्र पहचान होती है। किंतु, यहां तो एक ही परिवार के दो भाग हुए और दोनों एक ही नाम से अस्तित्वमान हैं फिर दो भाग होने के क्या मायने रह जाते हैं? विभाजन के बाद कम से कम उन्हें अपने नामों में नुक्तेभर का ही सही, मगर फर्क करना चाहिए था; जिससे कि दोनों को अलग-अलग पहचाना जा सकता, मगर हुआ इसके विपरीत। संगठनों का विभाजन होना या नए संगठनों का बनाना समस्या नहीं, किंतु एक ही नाम के दो संगठनों का होना कई समस्याओं को पैदा करने वाला अवश्य है। कई गणमान्य साहित्यकारों से इस संदर्भ में बात की गई, सबने इसे गलत ही ठहराया और दोनों के एक होने की बात उचित मानी। बातचीत के दौरान एक दो ने दलित शब्द और दलित लेखक संघ के होने पर सवाल खड़े किए। उनका मानना था कि हमें अब दलित शब्द और दलित लेखक संघ जैसे नामों और संगठनों को ढोना बंद कर देना चाहिए। शायद वे इन शब्दों में जातीय बोध वाले गैर दलितवादी स्वभाव की चपेट में हैं। जातीयता के इतने बड़े अंतरजाल में, यदि शोषित जातियां एक वर्ग में तब्दील होकर, किसी एक शब्द में सिमट आती हैं तो इसमें बुरा क्या है? दलितों की इसी एकजुटता की सर्वग्रह्यता से तो गैर दलित और उनका कलावादी साहित्य डरा हुआ है। हमें दलित शब्द और साहित्य को हीनता बोध, जातीय बोध जैसे संकुचित बोध से दूर, एकता के सूत्रधार के रूप में देखना चाहिए। सभी दलित साहित्यकारों व संगठनों को अपनी साहित्यिक और सामाजिक प्रतिबद्धता से इसे अपनाना चाहिए। अपने मतभेदों और अंतर्द्वंद्व को दरकिनार करके एक रहना चाहिए। दोनों समानांतर दलित लेखक संघ के जिम्मेदार पदाधिकारीगण यदि पद, प्रतिष्ठा और ओछे अहंकार के वशीभूत नहीं हैं तो उन्हें एक होकर दलित एकता की सांगठनिक एकता की ऐतिहासिक मिसाल पेश करनी चाहिए। इसके लिए जो उचित रास्ते हो सकते हैं वे प्रस्ताव पत्र में उल्लिखित कर दिए गए हैं। दोनों समानांतर दलित लेखक संघ ऐसा कर पाए तो बहुत हद तक संभव है कि भविष्य में होने वाले सांगठनिक विघटन की समस्या का समाधान हो जाए। उम्मीद की जाती है कि दोनों दलित लेखक संघ प्रस्ताव पत्र में उल्लिखित सुझावों को गंभीरता से लेंगे और तत्काल किसी बेहतर सुझाव पर अमल करेंगे। सवाल उठ सकता है कि नदलेस, दलित प्रतिनिधि मंडल अथवा मसौदा समिति के सदस्यों को यह प्रस्ताव पत्र तैयार कर दोनों समानांतर दलित लेखकों को देने का क्या अधिकार है और वे क्यों इस प्रस्ताव पत्र की बातों को स्वीकार करें तो इस संदर्भ में इतना ही कहा जा सकता है कि यदि साहित्य और संगठन किसी एक की बपौती नहीं है और वह सामाजिक और सामूहिक धरोहर होती है तो प्रत्येक संबंधित संगठन, समित और साहित्यकारों को यह हक और नैतिक अधिकार होता है कि वह साहित्य, समाज और संगठन में गलत करने वालों के प्रति सवाल खड़े करें और संबंधित विसंगतियों को दूर करने के रचनात्मक प्रयास करें। नदलेस, मसौदा समिति और प्रतिनिधि मंडल ने अपने इसी नैतिक अधिकार का सदुपयोग करते हुए यह प्रस्ताव पत्र तैयार किया है। जो इस प्रकार है -
27 अक्टूबर, 2021 को हुए वेबिनार और 31 अक्टूबर, 2021 को गठित प्रस्ताव पत्र की मसौदा समिति के निर्णय के अनुसार तैयार प्रस्ताव पत्र तथा उस पर सहमत दलित प्रतिनिधि मंडल का विवरण इस प्रकार है-
•यह कि 2019 में दलित लेखक संघ के विघटन हो जाने से दलित लेखक संघ के एक ही नाम दलित लेखक संघ के नाम से दो समानांतर दलित लेखक संघ बन जाने से अग्रलिखित परेशानियां सामने आ रही हैं। (ये परेशानियां नदलेस द्वारा 'दो दलित लेखक संघ के होने पर स्वीकार्यता का संकट ' विषय पर 27, अक्टूबर,2021 को कराए गए ऑनलाइन कार्यक्रम की रिपोर्ट के आधार पर अति संक्षेप रूप में दर्ज की गई हैं।)
1. दो दलित लेखक संघ के होने से पहचान, स्वीकार्यता और जुड़ने का संकट उत्पन्न हो गया है।
2. दोनों के नाम एक हैं, वैचारिकी एक है और कार्य प्रणालियां भी लगभग एक हैं जिससे दोनों के प्रति असली और नकली होने की भ्रामक स्थिति पैदा हो गई है।
3. एक जैसे दो दलित लेखक संघ हो जाने से दोनों उपहास का विषय बनाए जा रहे हैं, इससे दलित साहित्य और दलित मूवमेंट दोनों को क्षति पहुंच रही है।
4. दलित लेखक संघ का विघटन हो जाने से दलित समाज और साहित्य के सांगठनिक, सामाजिक हित और एकता को क्षति पहुंच रही है।
5. दो दलित लेखक संघों के होने से भविष्य में होने वाली अध्ययन और आंकड़े संबधी बहुत-सी गड़बड़ियां होने की आशंका उत्पन्न हो गई हैं।
6. दोनों संगठनों पर पदलोलुपता, मठाधीशी और निजी हित साधने जैसे आरोप लगाएं जा रहे हैं।
7. दोनों संगठनों की वर्तमान कार्यप्रणाली, साहित्यिक एवं सामाजिक अवदान पर बहुत से सवाल खड़े किए जा रहे हैं, जिनकी वजह से संबंधित साहित्य समाज में भारी असंतोष और रोष व्याप्त हो रहा है।
•यह कि उपर्युक्त सभी समस्याओं को देखते हुए दोनों दलित लेखक संघ के अध्यक्ष, संरक्षक, पदाधिकारियों और सदस्यगणों से सादर अपील की जाती है कि -
1. दोनों समानांतर दलित लेखक संघ यथाशीघ्र एक होकर, लोकतांत्रिक ढंग से एक नई कार्यकारिणी का गठन करें।
अथवा
2. दोनों समानांतर दलित लेखक संघ की वर्तमान कार्यकारिणियां क्रमशः छह-छह महीने, एक कर लिए गए दलित लेखक संघ का कार्यभार संभाले। तत्पश्चात, लोकतांत्रिक ढंग से एक नई कार्यकारिणी का गठन करें।
अथवा
3. दोनों दलित लेखक संघ में से कोई एक अथवा दोनों अपना नाम बदल लें अथवा दोनों आपस में मर्ज होकर एक नए दलित लेखक संघ का गठन करें। इस हेतु नदलेस को भी स्वीकार किया जा सकता है।
अथवा
4. दोनों दलित लेखक संघ अपने-अपने डॉक्यूमेंट ( दलित लेखक संघ के ऐतिहासिक दस्तावेज, परिचय, घोषणापत्र और अब तक किए गए साहित्यिक एवं सामाजिक कार्यों का ब्यौरा आदि) के आधार पर स्पष्ट करें कि वे दोनों किस प्रकार एक दूसरे से अलग हैं, अथवा अलग नहीं है तो फिर एक होते हुए भी एक-दूसरे से अलग क्यों है?
•कृपया उपर्युक्त के आधार पर दोनों दलित लेखक संघ अपने निर्णय आगामी एक से दो माह के भीतर अवश्य लें और अपने-अपने निर्णयों से मसौदा समित और दलित प्रतिनिधि मंडल को अवश्य अवगत कराने के कृपा करें।
अन्यथा
•यह कि यदि एक अथवा दोनों दलित लेखक संघ दलित प्रतिनिधि मंडल के प्रस्ताव की अनदेखी या अवहेलना करते हैं तो ऐसी दशा में प्रतिनिधि मंडल दोनों समानांतर दलित लेखक संघों में से किसी एक को अथवा दोनों को स्वीकार करने अथवा अस्वीकार करने का नैतिक अधिकार सुरक्षित रखता है। जिसका निर्णय दलित प्रतिनिधि मंडल डिबेट के जरिए प्राप्त बहुमत के आधार पर लेगा।
•दलित प्रतिनिधि मंडल
कार्यवाहक अध्यक्ष : डा. गुलाब सिंह
कार्यवाहक सचिव : डा. अमित धर्मसिंह
•मसौदा समिति के सदस्य
पुष्पा विवेक
सत्य नारायण
डा. अमित कुमार
डा. अनिल कुमार
श्रीलाल बौद्ध
राजेंद्र कुमार राज
कर्मशील भारती
सुदेश तनवर
डा. टेकचंद
जावेद आलम ख़ान
अशोक कुमार
•सहमत और समर्थित सदस्य
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