दो दलित लेखक संघों को लेकर नदलेस की विचार गोष्ठी
दो दलित लेखक संघों को लेकर नदलेस की विचार गोष्ठी
दिल्ली। नव दलित लेखक संघ की कार्यकारिणी द्वारा 'दो समानांतर दलित लेखक संघ के होने से स्वीकार्यता का संकट' विषय पर ओपन विचार गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता नदलेस के अध्यक्ष डा. अनिल कुमार ने की व संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। गोष्ठी में नदलेस की कार्यकारिणी के पदाधिकारियों के साथ-साथ कई गणमान्य साहित्यकारों ने सहभागिता और वैचारिक सक्रियता निभाई। अध्यक्षीय वक्तव्य में डा. अनिल कुमार ने बड़े ही कड़े शब्दों में आलोचना करते हुए कहा कि जो लोग संगठन में मठाधीश बने बैठे हैं और दलित साहित्य के नाम पर केवल अपना नाम चमका रहे हैं। यह किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। ऐसे लोग न सिर्फ संगठनों को भीतर से कमज़ोर कर रहे हैं बल्कि दलित समाज का सबसे ज्यादा अहित ये ही लोग कर रहे हैं। इसलिए ऐसे लोगों और संगठनों को चिह्नित करके उनका साहित्यिक बहिष्कार करना चाहिए। उनके साथ, न किसी प्रकार के कार्यक्रम साझा किया जाएं और न ही उनसे किसी प्रकार का साहित्यिक संबंध रखा जाए। इसके विपरित जो संगठन बेहतर कार्य कर रहे हैं और दलित साहित्य तथा समाज के साथ नई पीढ़ी को आगे लाने का कार्य कर रहे हैं, उन्हें हर स्तर से सहयोग और समर्थन देना चाहिए। जो लोग मनमाने तरीके से संगठन के सदस्यों को जोड़ने और हटाने का कार्य कर रहे हैं, वे लोग और वह संगठन पूर्ण रूप से गैर लोकतांत्रिक है। उनका यह स्वभाव गैर दलितों से भी अधिक खतरनाक और निंदनीय है। उन्होंने कहा कि ऐसे गैर लोकतांत्रिक संगठन को न तो मैं व्यक्तिगत रूप से मान्यता देता हूं और न ही नदलेस के अध्यक्ष पद पर होने के नाते मान्यता देता हूं।
बैठक का आरंभ संचालक डा. अमित धर्मसिंह ने अध्यक्ष महोदय की स्वीकृति से आरंभ किया। उन्होंने विषय की गंभीरता और उसकी पृष्ठभूमि को सभी श्रोताओं के समक्ष रखते हुए कहा कि 2019 में दलित लेखक संघ का विघटन हुआ था, जिससे दलित लेखक संघ के दो समानांतर संगठन अस्तित्व में आए। एक हीरालाल राजस्थानी एवं संबंधित साथियों का, दूसरा अनिता भारती एवं संबंधित साथियों का। समस्या के रूप में उन्होंने बताया कि दोनों ही संघटनो की रिपोर्ट एक जैसी छप रही है, दोनो के पोस्टर, मोनोग्राम एक जैसे हैं और उनके कार्यक्रम भी एक जैसे ही प्रतीत होते हैं, जिससे यह समझ नहीं आता कि कौन सा कार्यक्रम कौन से वाले दलित लेखक संगठन का है। इससे नवोदित रचनाकारों को दलित लेखक संघ और दलित साहित्यकारों को समझने में बड़ी मुश्किल पैदा हो रही है। जब दलित लेखक संघ की बात होती है तो वे यह नहीं समझ पाते कि कौन से दलित लेखक संघ की बात हो रही है अथवा संबंधित दलित साहित्यकार, कौन से दलित लेखक संघ से संबंधित हैं। दलित साहित्य लिखने वालों और दलित लेखक संघ से जुड़ने की आकांक्षा रखने वालों के सामने दोराहे वाली असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई है। कई बार नवागंतुक लेखक जुड़ना किसी और दलित लेखक संघ से चाहता है और जुड़ किसी और से जाता है। बहुत बाद में ज्ञात होता है कि उसे जिससे जुड़ना था वह संगठन तो कोई दूसरा है। इन दो समानांतर दलित लेखक संघ के होने की वजह से भविष्य में भी अध्ययन संबंधी और सूचनापरक जानकारियों में गड़बड़ियां होने की पुरजोर आशंकाएं हैं। ऐसी विसंगतियां और परेशानियां आगे उत्पन्न न हों इसके लिए नदलेस ने इस महत्त्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया। डा. अमित धर्मसिंह ने जोड़ा कि हम उसे दलित लेखक संघ मानेंगे जो दलित साहित्य की वैचारिकी उसके सौंदर्यबोध और उसकी ऐतिहासिक परंपरा को साथ लेकर चल रहा है। हमारा समर्थन किसी व्यक्ति विशेष को नहीं है। आज दुनियां भर में संगठन चल रहे हैं। हमें किसी भी व्यक्ति विशेष या संगठन विशेष से कोई आपत्ति नहीं है, न ही किसी के लिखने पढ़ने के हम विरोधी हैं। लेकिन एक जैसे नाम, एक जैसी पहचान, एक जैसी पत्रिका, एक जैसा संघ का लोगो होने से जो असमंजस की स्थिति बन गई है उस असमंजस को दूर करना और दो समानांतर दलित लेखक संघ की स्वीकारता के संकट का समुचित समाधान खोजना आवश्यक लगता है।
इस प्रकार नदलेस के उपाध्यक्ष डा. अमित धर्मसिंह ने विषय से परिचय कराते हुए पहले वक्ता के रूप में हीरालाल राजस्थानी से संबधित दलित लेखक संघ के महासचिव पद पर रह चुके रवि निर्मला सिंह को अपना मत रखने के लिए आमंत्रित किया। रवि ने अपने वक्तव्य में बताया कि मैं खुद इस पीड़ा का भुक्तभोगी रहा हूं कि जब मैं संगठन में महासचिव के पद पर रहा और कार्यक्रमों के आयोजन के दौरान मैंने जब आमंत्रण के लिए वक्ताओं को फोन मिलाया तो उन्होंने पूछा आप किस दलित लेखक संघ से बोल रहे हैं? हर बार इस स्पष्टीकरण की समस्या सामने आई। उन्होंने संगठन के चुनाव की बात रखते हुए कहा कि हमें यह देखना चाहिए कि दलित बुद्धिजीवी, दलित साहित्यकार और दलित एक्टिविस्ट किसे सपोर्ट कर रहे हैं। दूसरा आधार बताते हुए उन्होंने कहा कि संगठनों के कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी से भी अंदाजा लगाया जा सकता है और तीसरा आधार बताते हुए उन्होंने कहा कि जो संवैधानिक मूल्य हैं जैसे कि कार्यक्रम के स्तर पर लोगों को जोड़ने और उनके साथ सहयोग की भावना से काम करने का है, उस पर कौन सा संगठन खड़ा उतरता है। यह तय करना बहुत जरूरी है कि इस स्थित में जबकि दोनों दलों की पत्रिका एक है, मोनोग्राम एक है और पदाधिकारी भी एक ही वैचारिकी के हैं, मात्र अध्यक्ष को छोड़कर। इन सभी स्थितियों में हमें यह देखना होगा कि कौन सा दल उक्त सभी आधारों पर खरा उतरता है। रवि जी ने बताया कि वे हीरालाल राजस्थानी से संबंधित दलित लेखक संघ से जुड़े थे। संगठन में उनके साथ जो गैर संवैधानिक व्यवहार हुआ है, उसके अनुसार वे स्पष्ट रूप में अनीता भारती जी के संगठन को अपना समर्थन देंगे। उन्होंने बताया कि जिस संगठन को वे छोड़ चुके हैं उसकी नवीं और दसवीं कार्यकारिणी से एक वर्ष में करीब 15 सदस्य इस्तीफा दे चुके हैं या उनको निकला जा चुका है, तो इससे बड़ा सबूत और क्या होगा, उस संगठन के अलोकतांत्रिक होने का। इसलिए मैं उसे दलित लेखक संघ नहीं बल्कि हीरालाल लेखक संघ कहना अधिक पसंद करता हूं।
अगले वक्ता के रूप में राजेंद्र कुमार राज़ जी को आमंत्रित किया गया। राजेंद्र राज़ जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि पिछले 27 वर्षों से उनकी हीरालाल राजस्थानी से मित्रता है। संगठन में महासचिव पद के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया था, परंतु बिना कारण बताए अलोकतांत्रिक तरीके से उन्हें हटा दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि अनिता भारती जी के संगठन से मैं परिचित नहीं हूं। इसलिए मैं स्पष्ट मत बताने की स्थिति में नहीं हूं। यानी दोनों सगठनों के प्रति मेरी स्थिति फिलहाल न सावन हरे न भादौ सूखे जैसी है। फिर भी जो बेहतर कार्य कर रहा है, उसे ही समर्थन दिया जाना चाहिए और मैं उसी के साथ हूं। जैसे आज नदलेस से बहुत सी उम्मीदें जगी हैं, तो मैं इसके साथ हूं। अगले वक्ता के रूप में विद्याराम जी ने रवि जी के अनुभव को सहमति को आधार बनाते हुए कहा कि मैं अनिता भारती जी को काफी समय से जनता हूं। काफी लोकप्रिय लेखिका हैं। इस आधार पर मेरी सहमति स्पष्ट रूप से अनिता भारती जी के साथ हैं। मैत्री टाइम्स के संपादक श्रीलाल बौद्ध जी ने अपने वक्तव्य के कहा कि जिस संगठन में लोकतंत्र और स्वंत्रतता नहीं है, तो ऐसे संगठन का क्या महत्त्व रह जाता है? प्रत्येक संगठन का यह दायित्व होता है कि वह इस और भी देखे कि जो संगठन के सदस्य हैं वे किस प्रकार का साहित्य रच रहे हैं। उनकी कृतियों को भी संगठन के द्वारा महत्त्व मिलना चाहिए। जो भी बाबा साहेब की विचारधारा के साथ कार्य करेगा, मुझे लगता है उसके साथ कार्य करने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी। आपके पास ज्ञान है, अच्छे शब्द हैं तो उसे बांटें न कि आप अध्यक्ष या संरक्षक बन गए हैं तो आप बस अध्यक्ष या संरक्षक ही बने रहें।
अगले वक्ता के रूप में लोकेश चौहान जी को आमंत्रित किया गया। लोकेश जी ने बाबा साहब के शब्दों से आरंभ करते हुए कहा कि बाबा साहब कहते थे कि संगठित रहो, शिक्षित बनो। जो भी हमारे समाज के कल्याण में जिस तरह से अच्छा रहे, बेहतर रहे हम उसी का समर्थन करेंगे। मनमाने तरीके की गतिविधियों का हम अपने संगठन में भी विरोध करेंगे। नदलेस के सचिव डा. राम कैन ने कहा कि संगठन में बाबा साहब की वैचारिकी को लेकर चलना चाहिए। उन्होंने बताया कि यह तो अच्छा है कि ज्यादा से ज्यादा संगठन बनें और लोग उससे जुड़ें, क्योंकि संगठन बनने से अभिव्यक्ति और सहयोग का रास्ता खुलता है। लेकिन एक जैसे दो संगठनों का होना निराशाजनक है। उन्होंने विगत बैठक में साहित्यकार मुकेश मानस के एकाकीपन को याद करते हुए कहा कि सभी को साथ मिलकर अपनी वैचारिकी को आगे ले जाना चाहिए। आज एकाकीपन की जो भी स्थिति बन रही है, उसके अनुसार हमें निर्णय लेना है कि हमें किस संगठन का समर्थन करना है। इस संदर्भ में, मैं नदलेस की कार्यकारिणी के साथ हूं। अगले वक्ता के रूप में डा. सत्येंद्र कुमार ने कहा कि विचारधारा महत्व रखती है, संगठन नहीं। उन्होंने बाबा साहब की याद दिलाते हुए कहा कि बाबा साहब ने पद की तुलना में अपनी विचारधारा को महत्त्व दिया था। इस बात का गवाह इतिहास है कि दो नावों में सवार व्यक्ति हमेशा डूब जाता है। इसलिए हमें दो समानांतर दलित लेखक संगठनों में से किसी एक को, उसके कार्यों के आधार पर चुनना ही होगा। इस संबंध में मैं नदलेस और वक्ताओं के विचारों के बहुमत के साथ हूं।
अगले वक्ता के रूप में नदलेस के प्रचार सचिव डा. अमित कुमार ने अपनी बात रखते हुए कहा कि संगठन से जुड़कर सदस्य न केवल संगठन के लिए कार्य करता है बल्कि वह अपनी पहचान भी तलाशता है। अगर वह पहचान उसे ना मिले तो यह गलत है। अस्मिताओ के छोटे-छोटे संघर्ष में व्यक्ति को अपना हिस्सा तो मिलना ही चाहिए। इस तरह से उन्होंने अपनी बात रखी, और माना कि जो संगठन सही है, उसे ही अपनाना चाहिए। अगले वक्ता के रूप में अशोक कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बाहरी लोगों से ज्ञात होता है कि एक ही नाम के दो संगठन होना नैतिक और सांगठनिक दोनों ही दृष्टियों से सही नहीं है। इन दोनों ही समानांतर संगठनों को नदलेस के मंच से यह संदेश पहुंचाना चाहिए कि या तो आपमें से कोई एक अपना नाम बदल लें या एक रेखा खींचकर सभी को बताइए कि एक ही नाम वाले ये दो संगठन किस प्रकार अलग हैं। अशोक ने बताया कि यह विषय अब उपहास का विषय बन गया है। लोगों के शब्दों में कहूं तो वे स्पष्ट कहते हैं कि "इनके तो दो-दो चल रहे हैं, किसी को भी बुला लो कोई न कोई तो आ ही जायेगा।" उनके अनुसार यह संगठन के साथ-साथ दलित साहित्य की भी बहुत किरकिरी है। अर्थात उपहास और अपमान की बात है। इस प्रकार अशोक जी ने दो दलों के नाम अलग होने की मांग रखी और बेहतर कार्य करने वाले को समर्थन दिए जाने की बात कही।
अगले वक्ता के रूप में गंभीर विचारक डा. गुलाब सिंह जी को आमंत्रित किया गया। गुलाब सिंह जी ने संगठन के घोषणा पत्र का हवाला देते हुए कहा कि हमारे घोषणा पत्र में न केवल दलित वरन बहुजन, डिसेबल, और थर्ड जेंडर के बारे में भी बात की गई है कि किस प्रकार वह हमारे संगठन से जुड़ सकता है। लेकिन संगठन चंद लोगों की बपौती बनकर रह गया है। उन्होंने बताया कि हीरालाल राजस्थानी जी की फेसबुक पोस्ट्स में दलित वैचारिकी नहीं झलकती। जो अत्यंत निराशाजनक है। ऐसा लगता है कि संबंधित संगठन में, संगठन संगठन खेलने की प्रवृत्ति ने जन्म ले लिया है। अगर ऐसा है तो उन्हें संगठन और दलित साहित्य से खेलने की बजाए कोई और खेल, खेल लेना चाहिए। जैसे लूडो खेल लो, कैरम बोर्ड खेल लो या फिर मनमाने शौक ही पूरे करने हैं तो कोई क्लब आदि खोलकर उन्हें पूरा किया जा सकता है। अत्यंत खेद जनक है कि उन्हें जो करना चाहिए, वे वह न करके बाकी सबकुछ कर रहे हैं। ऐसी मानसिकता वाले संगठन का, संगठन होने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। अतः हम केवल उसके साथ हैं, जो दलित साहित्य की मूलभवना के अनुरूप कार्य कर रहा है। फिर चाहे वह दलेस हो या नदलेस। इसके अतिरिक्त वॉट्सएप के माध्यम से रत्नकुमार सांभरिया ने अनिता भारती जी के पक्ष में अपना मत प्रेषित किया। पुष्पा विवेक जी की टिप्पणी कुछ इस प्रकार प्राप्त हुई कि कुछ लोग पद, प्रतिष्ठा और पैसे के पीछे भागने वाले होते हैं। अपने स्वार्थ के लिए वे किसी के भी साथ गद्दारी,धोखा, झूठ का सहारा लेते हैं। ऐसे लोग किसी के साथ भला नहीं कर सकते। जो अपनों के साथ धोखा कर सकते हैं, वे किसी के सगे नहीं होते। ऐसे लोगों से दूरी बनाकर ही रखना बेहतर होता है। उनका बहिष्कार ही उनकी सजा है, क्योंकि कीचड़ में पत्थर फेंकने से छींटे अपने ऊपर भी आयेंगे। उस व्यक्ति को समझाना मुश्किल होता है, जिसकी बुनियाद झूठ,फरेब और धोखे पर रखी गई हो। जिस व्यक्ति की विचारधारा ही गलत हो, उससे अच्छाई की उम्मीद बेमानी होगी। डा. कुसुम वियोगी जी का मत इस प्रकार रहा, जो सामाजिक न्याय एवं परिवर्तन की मुहिम में सबको साथ लेकर चले, हम उसके साथ हैं। मठाधीशों के मठ अब तोड़ने ही होंगे। मठों से निकाल दलित महंतों को सड़क पर उतारना अब लाज़िम हो गया है।
समस्त वक्ताओं के विचार जानने के पश्चात तय किया गया कि अपना सांगठिक महत्त्व खो चुके संबंधित दलित लेखक संघ को दूसरे दलित लेखक संघ में मर्ज हो जाने के लिए एक निवेदित पत्र भेजा जाएगा, जिसके लिए जल्दी ही नदलेस एक कार्यवाहक समिति का गठन करेगा। यदि संबंधित दलित लेखक संघ और शेष बचे पदाधिकारीगण, पद के लोभी नहीं और सही मायने में दलित साहित्य और समाज के हितैषी हैं तथा इस संदर्भ में मिलकर चलने और पढ़ने-लिखने के हामी हैं तो निश्चित ही वे कार्यवाहक समिति के निवेदन को अस्वीकार नहीं करेंगे। उनके ऐसा करने से दलित लेखक संघ संबंधी जो साहित्यिक और सामाजिक परेशानियां पेश आ रही हैं, उनका निराकरण हो जायेगा। साथ ही, अध्ययन की सुविधा से, भविष्य में जो तथ्यपरक जानकारी संबंधी परेशानी आएंगी उससे भी सदा के लिए छुटकारा मिल जाएगा। संबंधित दलित लेखक संघ का यह कदम, दलित साहित्य के साथ-साथ सांगठनिक, साहित्यिक और सामाजिक एकता की उल्लेखनीय नजीर प्रस्तुत करेगा।, इसके विपरीत यदि संबंधित दलित लेखक संघ कार्यवाहक समिति के निवेदित पत्र की अवहेलना और अनदेखी करता है तो नदलेस किसी एक को साहित्यिक स्वीकृति देने और दूसरे का साहित्यिक बहिष्कार करने के लिए बाध्य होगा। नदलेस की इस बाध्यता का आधार दलित साहित्य की ऐतिहासिक परंपरा, बाबा साहब अम्बेडकर की वैचारिकी और बुद्ध का दर्शन व चिंतन होगा। कह सकते हैं कि दोनों समानांतर दलित लेखक संगठनों में से, जो उक्त आधारों को बेहतर ढंग से लेकर चल रहा है, उसे नदलेस का साहित्यिक समर्थन और सहयोग प्राप्त होगा, दूसरे को नहीं। बैठक में डा. कुसुम वियोगी, पूनम तुषामड़, डा. दीपा, बृजपाल सहज, नीरज सोदाई, चंद्रकला, प्रदीप कुमार, आदि रचनाकार उपस्थित रहें। अंत में, डा. अमित धर्मसिंह ने सभी वक्ताओं और उपस्थित साहित्यकारों का हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित किया।
डा. अमित कुमार
प्रचार सचिव, नदलेस
27/10/2021
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