कार्यकारिणी की ऑनलाइन बैठक



रिपोर्ट 

नदलेस कार्यकारिणी की ऑनलाइन बैठक

नव दलेस या नव दलित लेखक संघ की कार्यकारिणी की बैठक का ऑनलाइन आयोजन गूगल मीट पर दिनांक 17 अक्टूबर 2021 को शाम सात बजे किया गया, जिसका विषय 'गत कार्यक्रम की समीक्षा, आगामी कार्यक्रम की योजना और सोच पत्रिका के प्रकाशन के संदर्भ में' था। बैठक की अध्यक्षता नदलेस के अध्यक्ष डा. अनिल कुमार ने की व संचालन डा. अमित धर्मसिंह ने किया। बैठक में नदलेस के संरक्षक डा. कुसुम वियोगी, पुष्पा विवेक, सहसचिव डा. दीपा, प्रचार सचिव डा. अमित कुमार तथा कार्यकारिणी के सदस्यों में सुशील कुमार झंझोड़, डा. सत्येंद्र कुमार, डा. विद्याराम, उमरशाह, डा. गीता कृष्णांगी, लोकेश चौहान और नीरज सौदाई उपस्थित रहे। बैठक की कार्यवाही विषय के अनुरूप तीन चरणों में बांटी गई। 

             पहला चरण, गत कार्यक्रम जो कि दलित साहित्यकार मुकेश मानस की स्मृति सभा के रूप में आयोजित किया गया था , उस पर सभी पदाधिकारियों ने अपने विचार अभिव्यक्त किए। सर्वप्रथम उमरशाह को गत कार्यक्रम पर अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किया गया। उमर शाह ने बताया कि कार्यक्रम में मुकेश मानस की रचनाओं के बारे में बात की गयी, जिसका प्रस्तुतीकरण बहुत ही अच्छा था। साथ ही उन्होंने बताया कि इस तरह के कार्यक्रम में अलग-अलग मंच से भी लोग आने चाहिए, न कि केवल दलित साहित्य के क्षेत्र से इससे हमें अपना विपक्ष जानने को मिलेगा। हमें अपने इस संघ को सीमित और संकुचित नहीं बनाना है। इसके पश्चात् डा. विद्याराम ने गत कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति की असमर्थता जताते हुए बताया कि रिपोर्ट के आधार पर कहा जा सकता है कि कार्यक्रम बहुत अच्छा था और ऐसे कार्य भविष्य में होते रहने चाहिए। अगले वक्ता के रूप में नीरज सौदाई ने स्मृति सभा को अपने उद्देश्य में सफल बताया। उन्होंने कहा इस कार्य को आगे तक जाना चाहिए। लोकेश चौहान ने कार्यक्रम के लिए बाकी सदस्यों के विचारों के साथ अपनी सहमति जताई और कहा कि नई पीढ़ी के साहित्यकारों पर चर्चा आगे भी होती रहनी चाहिए। डा. सत्येंद्र कुमार ने नदलेस के द्वारा सीमित संसाधनों के बावजूद इस तरह के कार्यक्रम के आयोजन और उसकी सफलता को एक लड़ाई की भांति बताया उन्होंने कहा कि आगे भी इस लड़ाई को जारी रखा जाए सुशील झंझोड़ ने कार्यकारिणी की प्रथम बैठक में उपस्थिति रहने को अपने लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया और आगे के अन्य कार्यक्रमों की सफलता की आशाएं व्यक्त करते हुए अपनी अभिव्यक्ति दी। पुष्पा विवेक जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि संगठन में स्त्रियों की सहभागिता अधिक से अधिक होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि बाबा साहेब अम्बेडकर के आंदोलनों में 75 प्रतिशत तक आंदोलनकारी महिलाएं होती थीं। उन्होंने संगठन की गतिविधियों और कार्यों को ग्रासरूट तक ले जाने की बात जोड़ी। अगली वक्ता के रूप में गीता कृष्णांगी जी ने साहित्यकारों के निजी जीवन के अकेलेपन की बात मुकेश मानस के संदर्भ में उठाते हुए कहा कि हमें अपने आसपास के लोगों से अभिव्यक्ति के स्तर पर जुड़े रहना चाहिए। जब तक हम एक दूसरे से नहीं जुड़ेंगे तब तक हमें कैसे पता चलेगा कि किसको हमारी जरूरत है? अगली वक्ता के रूप में दीपा जी ने अपनी बात रखते हुए कहा यदि हमें समय रहते मुकेश मानस जैसे साहित्यकारों की मानसिक स्थितियों का पता लग जाए तो ऐसे साहित्यकारों की मदद तो की ही जा सकती है। नदलेस के संरक्षक डा. कुसुम वियोगी जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि हमें अपने ताले और अपनी कुंजियां अपने पास ही रखने चाहिए। अध्यक्षीय वक्तव्य में डा. अनिल कुमार ने अपनी विचार रखते हुए कहा कि जैसा कि स्मृति सभा में डा. टेकचंद जी और गंगानिया जी ने बताया था कि इतना पढ़ा-लिखा व्यक्ति का एकाकी हो जाना और परिवार से कटाव होना सचमुच आश्चर्य में डालने वाले तथ्य हैं। उन्होंने कहा कि मन की कुंठाओं का यदि समय रहते विरेचन नहीं होगा तो परिणाम बुरा होना ही है। 

          तत्पश्चात बैठक के दूसरा चरण में संगठन द्वारा आगामी कार्यक्रम की योजना के बारे में उपाध्यक्ष डा. अमित धर्मसिंह ने नवम्बर माह में नदलेस के संरक्षक डा. कुसुम वियोगी जी की चार पुस्तकों का विमोचन और उन पुस्तकों पर "चार विभिन्न वक्ताओं द्वारा वक्तव्यों का कार्यक्रम चार पुस्तक चार वक्ता '' शीर्षक के अंतर्गत आयोजित करने का प्रस्ताव रखा। इस कार्यक्रम के आयोजन पर बैठक में उपस्थित कार्यकारिणी के सभी पदाधिकारियों और सदस्यों ने अपनी सहमति दी और सर्वसमती से उक्त प्रस्ताव हो गया।

          बैठक के तीसरे चरण में सोच पत्रिका के सम्पादक होने के नाते डा. अमित धर्मसिंह ने, ‘सोच’ पत्रिका का प्रवेशांक ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ विशेषांक जिसकी मूल थीम 'दलितों की आजादी' रखी गई थी के संदर्भ में सभी पदाधिकारियों और सदस्यों के रचनात्मक सुझाव आमंत्रित किए। सर्वप्रथम डा. अमित कुमार ने रचनाओं की समसामयिकता की बात रखी। लोकेश चौहान ने शिक्षा को केंद्र में रखने वाली रचनाओं को छापने की बात रखी। डा. विद्याराम ने अन्य सदस्यों के साथ अपनी सहमति जताई। पुष्पा विवेक जी ने महत्त्वपूर्ण सुझाव दिया कि आमंत्रित रचनाओं में बात केवल समस्याओं तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि रचनाओं में समस्याओं के हल पर भी बात होनी चाहिए। उन्होंने उदाहरण स्वरूप शिक्षा में समाप्त किये जा रहे आरक्षण की बात कही। रचनाओं की प्रकृति और उनके चुनाव के संबंध में नदलेस के संरक्षक डा. कुसुम वियोगी अपने विचारों को रखते हुए कहा कि यूं तो बहुत से संगठन दलित लेखक संगठन के नाम पर चल रहे हैं लेकिन वे किसी न किसी के पिछलग्गू बन कर काम कर रहे हैं, जबकि हमारी अपनी विचारधारा होनी चाहिए। नवदलेस से उम्मीद है कि जो हमारा चिंतन है वो महात्मा बुद्ध, कबीर, फुले तथा बाबा साहेब अम्बेडकर का चिंतन और विचार हैं- इन्हें हमें लेकर चलना है और जो परिवर्तनवादी विचारधारा के लोग हैं, हमे उनको भी साथ लेकर चलना है, लेकिन इसमें समस्या एक और यह है कि घर तो हमारा है लेकिन ताले और कुंजी हमने दूसरों के हाथ में सौंप रखी है। ऐसा नहीं होना चाहिए। समस्याओं पर बहुत बात हो चुकी है, अब उनके निराकरण पर बात होनी चाहिए गंदगी को ढका जाता है न कि उसे उघाड़ा जाता है। हमें ऐसी रचनाएं चाहिए जिससे कि समाज को दिशा मिल सके। डा. अमित धर्मसिंह ने सभी सुझावों को महत्त्वपूर्ण बताते हुए सोच पत्रिका के प्रवेशांक को उनके अनुरूप संपादित और प्रकाशित करने की बात स्वीकारी। साथ ही नदलेस को एक परिवार की तरह देखने और उससे जुड़कर एकजुटता से कार्य करने सदस्यों की प्रवृत्ति की सराहना करते हुए कहा कि भविष्य में नदलेस परिवार निश्चित रूप से और बड़ा होगा और बहुत से रचनात्मक कार्य करने में अपनी महती भूमिका अदा करेगा अध्यक्षीय वक्ता के रूप में डा. अनिल ने आजादी के मिलने का संदर्भ जोड़ते हुए कहा कि जिनको ऊंचे-ऊंचे पद मिले हैं, आजादी उन्हीं को मिली है। साधारण दलित जन के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। नई शिक्षा नीति की बात हो या डूटा के चुनाव की बात हो प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के बाद साधारण दलित की ओर वे मुड़कर भी नहीं देखते। संगठन को अपने वरिष्ठ, हम उम्र और कनिष्ठ सभी से सामग्री का संकलन करना चाहिए। अंत में दीपा जी ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित कर किया।

रिपोर्ट 

डा. अमित कुमार

प्रचार सचिव, नदलेस

18/10/2021







 



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