नदलेस की विचार गोष्ठी
नव दलित लेखक संघ की विचार गोष्ठी का आयोजन
दिल्ली। नदलेस की विचार गोष्ठी का आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय, नॉर्थ कैंपस की आर्ट फैकल्टी के लॉन में किया गया। विचार गोष्ठी का विषय था नदलेस की प्रथम कार्यकारिणी का स्थायीकरण और नदलेस के संविधान का प्रस्तुतिकरण। गोष्ठी की अध्यक्षता नदलेस के नव निर्वाचित अध्यक्ष डा अनिल कुमार ने की। गोष्ठी के प्रथम चरण का संचालन सह सचिव डा. दीपा ने और दूसरे चरण का संचालन सचिव डा राम कैन ने किया। गोष्ठी के प्रथम चरण में सर्वसम्मति से कार्यकारिणी का स्थायीकरण किया गया और कार्यकारिणी में दो नए सदस्य डा. विद्याराम और उमरशाह शामिल किए गए। गोष्ठी के दूसरे चरण में नदलेस के उपाध्यक्ष व सोच पत्रिका के संपादक डा अमित धर्मसिंह ने संविधान के लिखित मसौदे का सार संक्षेप मौखिक रूप से प्रस्तुत किया। अध्यक्ष डा. अनिल कुमार ने कहा कि नदलेस का संविधान दलित साहित्य और समाज में हुए बदलाव के अनुरूप तैयार किया गया है। इसमें किसी भी प्रकार का जातीय, धार्मिक, लैंगिक, भाषा अथवा क्षेत्र आदि को लेकर भेदभाव नहीं बरता गया है। और जैसा कि डा. अंबेडकर ने कहा था कि कोई भी संविधान अच्छा या बुरा नहीं होता, उसे लागू करने वाले लोग अच्छे या बुरे होते हैं। इस आधार पर उम्मीद है कि नदलेस से जुड़कर हम सब संविधान की मूलभावना, उद्देश्य और गरिमा के अनुरूप कार्य करेंगे। संरक्षक पुष्पा विवेक ने अपने जीवन के साहित्यिक और सामाजिक अनेक अनुभव साझा करते हुए कहा कि किसी संस्था, संगठन या संघ आदि को चलाने के लिए संविधान बहुत जरूरी चीज होता है। यूं समझिए कि संविधान संगठन की रीढ़ होता है। इसलिए संविधान जितना अच्छा और उपयुक्त होगा, वह उतना ही ग्राह्य और अनुकरणीय होगा। इस संदर्भ में नदलेस का संविधान समृद्ध संविधान है। डा अमित धर्मसिंह ने बताया कि संविधान की पांडुलिपि में कुल पच्चीस नियम और उनके पैंतालीस उपनियम लिखे गए हैं। जिनमें नदलेस की सदस्यता से लेकर नदलेस से जुड़े पदाधिकारियों और सामान्य सदस्यों के कर्तव्य और अधिकार, बड़ी बारीकी से दर्ज किए गए हैं। संविधान के पांचवे नियम के अंतर्गत पच्चीस उपनियमों में नदलेस के उद्देश्यों की विस्तार से चर्चा की गई है। जिनमें 21वीं सदी में बदले हुए संदर्भों में दलित साहित्य और समाज का समग्र चिंतन, अध्ययन, लेखन, संपादन व प्रकाशन आदि दलित साहित्य की नव वैचारिकी और नव सौंदर्यबोध के अनुसार करना तय किया गया है। खासतौर से दलित लेखकों की तीसरी पीढ़ी के जीवन की सर्वांगीण समस्याओं के प्रति संविधान में कई उपनियम दर्ज किए गए हैं। सचिव राम कैन ने कहा कि समय बदल रहा है, चुनौतियां और संघर्ष बदल रहे हैं, ऐसे में साहित्यिक और सामाजिक परिवर्तन स्वाभाविक है। बस इसी परिवर्तन को दर्ज करने का नाम नदलेस है और यही इसका संविधान है। उक्त के अतरिक्त विचार गोष्ठी में डा दीपा, डा. अमित कुमार, डा.गीता, डा. विद्याराम और उमरशाह ने भी अपने अपने विचार प्रकट किए और नदलेस से जुड़कर कार्य करने को हर्ष और जिम्मेदारी का विषय बताया। गोष्ठी के अंत में सभी उपस्थित सदस्यों और पदाधिकारियों को नदलेस के संविधान की एक एक हार्ड कॉपी दी गई, जिस पर एक हफ्ते के भीतर सुझाव आमंत्रित किए गए। इसके अतिरिक्त सर्वसम्मति से तय किया गया कि नदलेस की पत्रिका सोच का प्रथम अंक आजादी का अमृत महोत्सव विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया जायेगा।
डा. अमित कुमार
प्रचार सचिव, नदलेस
28/09/2021, मंगलवार
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